अपराध तथा भ्रष्टाचार की बुनियाद पर कैसा लोकतन्त्र |



भारत में राजनीतिक प्रशासनिक तथा कॉरपोरेट तन्त्र की जुगलबन्दी में दिनदोगुनी रात-चौगुनी तरक्की करने वाले भ्रष्टाचार की कहानी ऐसा नहीं कि कोई नई हो, बल्कि भारत की आजादी के बाद से ही इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ फलने-फूलने लगी थीं, मसलन भारत में समग्र व समावेशी विकास का सपना जिन पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत देखा गया था, उनका अधिकांशतः भाग राजनीतिक एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, इन योजनाओं पर सरकार द्वारा अब तक अरबों-खरबों रुपए पानी की तरह बहाए गए हैं, मगर अगर सही-सही विश्लेषण किया जाए तो इसका 15% भी वास्तविक जरूरतमन्दों एवं लक्षित परिवारों को नहीं मिल पाया, कमोबेश यही हाल सरकार द्वारा दी जाने वाली रियायतों, अनुदानों का भी है, यही नहीं सरकार द्वारा बुनियादी सुविधाएँ एवं ढाँचागत विकास से सम्बन्धित जितनी भी छोटी-बड़ी योजनाएँ-परियोजनाएँ निर्माणाधीन हैं अथवा संचालित की जा रही हैं, उनमें भी प्रशासनिक, राजनीतिक तथा कॉरपोरेट तन्त्र की मिलीभगत से बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार,अनियमितताएँ मुनाफाखोरी तथा कमीशन खोरी व्याप्त है, राजनीतिक तथा प्रशासनिक सरपरस्ती में मनचाहे ठेकेदारों व कम्पनियों को ठेके आवंटित किए जाते हैं, विभिन्न योजनाओं व परियोजनाओं के निर्माण व संचालन में काम आने वाली मशीनरी भी मनमाफिक कम्पनियों से खरीदी जाती हैं। और जान-बूझकर परियोजनाओं के निर्माण व संचालन में लेटलतीफी व लापरवाही बरती जाती है ताकि लागत बढ़ने से और अधिक मुनाफा कमाया जा सके, अगर वर्तमान में निर्माणाधीन, निर्मित तथा संचालित विभिन्न छोटी-बड़ी परियोजनाओं के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल, मशीनरी, तकनीकी तथा अन्य प्रकार के सामानों की सही-सही जाँच पड़ताल की जाए तो एक तिहाई से अधिक परियोजनाएं तो गुणवत्ता के मानकों पर खरा ही नहीं उतरती, मगर सवाल यह उठता है कि विभिन्न कम्पनियों एवं ठेकेदारों द्वारा गुणवत्ता के मानकों से ऐसा खिलवाड़ क्यों किया जाता है ?

इसका भी एक ही जवाब है अधिकाधिक मुनाफाखोरी, मसलन सड़क निर्माण में कार्यरत ठेकेदारों द्वारा जानबूझकर वैश्विक मानकों के मुताबिक सड़कें नहीं बनाई जाती, क्योंकि अगर एक ही बार में अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कों का निर्माण हो गया, तो फिर ठेकेदारों को दुबारा ठेके मिलने में वर्षों इन्तजार करना होगा, जबकि वे चाहते हैं कि सड़कों का निर्माण ऐसी कम गुणवत्ता से किया जाए, ताकि वे साल-दो साल में उखड़ती रहें और उन्हें लगातार इनकी मरम्मत के ठेके मिलते रहें, इस प्रकार कॉरपोरेट तन्त्र द्वारा विभिन्न छोटी बड़ी परियोजनाओं से लगातार जो मुनाफा कमाया जाता है उसका बड़ा हिस्सा । प्रशासनिक व राजनीतिक तन्त्र को भी पहुँचता है, ऐसा सिर्फ एक क्षेत्र में नहीं है। बल्कि कई क्षेत्रों में है, यहाँ तक कि सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सरकारी नौकरियों को तक ठेकेदारों के हाथों में सौंप दिया है ताकि अधिकाधिक मुनाफा कमाया जा सके, यही कारण है कि आज शिक्षा, पैसे लेकर डिग्रियाँ या सर्टिफिकेट बाँटने का धन्धा बन चुका है, यही हाल स्वास्थ्य व चिकित्सा क्षेत्र का भी। है जो मरीजों से लूट-खसोट कर अन्धाधुन्ध पैसा कमाने का धन्धा बन चुका है,
भ्रष्टाचार का यह राष्ट्रव्यापी खेल प्रशासनिक व राजनैतिक छत्रछाया में निजी क्षेत्र व कॉरपोरेट तन्त्र की मिलीभगत के साथ वर्षों से खेला जा रहा है और इसका फायदा भी राजनैतिक व प्रशासनिक तन्त्र, निजी क्षेत्र तथा कॉरपोरेट जगत को ही पहुँच रहा है, कहने का तात्पर्य यह है कि अधिकांश योजनाएँ-परियोजनाएँ तथा राष्ट्रीय कार्यक्रम तो महज जनता को दिखाने, लुभाने व बहकाने के लिए पेश की जाती है, पर्दे के पीछे असल खेल तो इनके नाम पर अरबों-खरबों रुपए ठिकाने लगाने का होता है,
यद्यपि आजादी के बाद कुछ दशकों तक भ्रष्टाचार का यह खेल कुछ लालफीताशाह तथा सफेदपोशों द्वारा आराम से चलाया जाता रहा, मगर जब आम जनता थोडी शिक्षित व जागरूक हुई तो आम जनता को डराने-धमकाने, बहकाने तथा उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिए अपराधियों एवं बाहुबलियों का सहारा लिया जाने लगा और जब इससे भी राजनीतिक पार्टियों एवं राजनेताओं के संकीर्ण स्वार्थ पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हुए तो फिर अपराधियों और बाहुबलियों को ही राजनीति में प्रवेश दिलाया जाने लगा, तकरीबन नव्ये के दशक के बाद इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगी थी और यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते आज राजनीति में बड़ी मात्रा में भष्टाचारियों, अपराधियों, बाहुबलियों तथा माफियाओं का बोलबाला हो चुका है और इस प्रकार की जुगलबन्दी से राजनीतिक पार्टियों, राजनेताओं तथा प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों ने खूब मुनाफा कमाया, यानि बिना भष्टाचार, अपराध एवं नाजायज तौर तरीकों के आज राजनीति करना या सत्ता सुख भोगना काफी मुश्किल है, धीरे-धीरे राजनीति एक ऐसा धन्धा बनता जा रहा है। जिसमें एक बार जायज नाजायज तरीकों से चुनाव जीत जाओ उसके बाद अपने पद के कर्तव्यों व दायित्वों को भूलकर अपनी पद, प्रतिष्ठा तथा शक्ति का जमकर दुरुपयोग करो और अधिकाधिक मुनाफा कमाओ नहीं तो वह आखिर कौनसी जादू की छड़ी है।
जिसके चलते पद पर पहुँचते ही कुछ ही सालों में अधिकांश जनप्रतिनिधियों एवं नौकरशाहों के पास अकूत दौलत आ जाती है, सरकारी तथा गैर सरकारी क्षेत्र की विभिन्न संस्थाओं द्वारा विगत 8-10 सालों में जारी आँकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो इस दौरान आधे से अधिक जन-प्रतिनिधियों तथा नौकरशाहों की चल-अचल सम्पत्ति में अप्रत्याशित रूप से कई गुना अधिक वृद्धि हुई है और अगर यह बात भी खंगाली। जाए कि आखिर जन प्रतिनिधियों तथा नौकरशाहों के पद पर रहते हुए उनके कितने रिश्तेदार एवं नजदीकी विभिन्न सरकारी विभागों में नौकरी पा गए कितनों का मनचाहा स्थानान्तरण या प्रमोशन हुआ, कितनों को ठेके आवंटित हुए तथा कितनों को व्यावसायिक व आर्थिक लाभ पहुँचाए। गए, तो फिर आम जन के तो पाँवों तले जमीन खिसक जाएगी और उसे इस बात की वास्तविकता का पता चलेगा कि आखिर कितने लम्बे समय से उसकी भावनाओं के साथ कुत्सित खेल खेला जा रहा है, तो क्या समता, न्याय तथा समावेशी विकास के लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना का सपना यों ही धरा का धरा रह जाएगा, सत्ताशक्ति पूँजी व संसाधन कुछ ही लोगों की बपौती बनकर रह जाएंगे ? अगर ऐसा हुआ तो यह एक स्वस्थ पारदर्शी व स्वैच्छिक लोकतन्त्र नहीं, बल्कि जबरदस्ती थोपा गया लोकतन्त्र होगा, जिसकी बुनियाद अपराध तथा भ्रष्टाचार की वैसाखियों पर टिकी होगी और इस प्रकार के लोकतन्त्र का स्वरूप किसी निरंकुश या तानाशाही शासन से भी भयानक होगा,
भ्रष्टाचार तथा अपराध की राजनतिक व प्रशासनिक तन्त्र से घुसपैठ ने देश में सामाजिक आर्थिक विषमताओं की खाई को और भी अधिक गहरा तथा चौड़ा किया है, आलम यह है कि दुनिया की सर्वाधिक गरीब, बीमार तथा कुपोषित आबादी भारत में है और सरकारों द्वारा विगत दो-तीन दशकों से लगातार 6-7 फीसदी जीडीपी विकास दर के ढोल पीटे जा रहे हैं, हाल ही में 22 जनवरी, 2018 को एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन 'ऑक्सफेम" द्वारा विश्व असमानता रिपोर्ट-2018" जारी की गई, जिसमें भारत के सन्दर्भ में कहा गया है कि भारत में वर्ष 2017 में सृजित कुल सम्पत्ति व आय का 73% हिस्सा महज 1% अमीरों के पास चला गया, जबकि वर्ष 2016 में कुल अर्जित परिसम्पत्तियों व आय का 58% भाग ही 1% अमीर लोगों के पास गया था, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वर्ष 2017 में 67 करोड़ भारतीयों की आय में महज 1% का इजाफा हुआ, पर्यावरण संरक्षण व सुधार के मानकों पर भी देश का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है, आलम यह है। कि भारत के अधिकांश बड़े शहरों का शुमार दुनिया के चोटी के प्रदूषित शहरों में होता है, समझ में नहीं आता कि जब में इतनी बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार, सामाजिक आर्थिक विषमता, बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी, कुपोषण व बीमारियाँ व्याप्त हैं तो लम्बे समय से राजनेताओं तथा कई मीडिया समूहों द्वारा आखिर क्यों लगातार भारत की चमकदार तस्वीर पेश की जा रही है।
आँकड़ों पर गौर करें तो विगत् कुछ सालों से राजनीति में भ्रष्टाचारियों, अपराधियों तथा बाहुबलियों को टिकट देने की दर लगातार बड़ी है, क्योंकि ये लोग साम दाम दण्ड भेद किसी भी कीमत पर चुनाव जिताऊ उम्मीदवार साबित हो रहे हैं, कई बाहुबली व आपराधिक छवि के लोग पूर्व में जेलों में बैठे बैठे चुनावी दंगल जीत चुके हैं, वर्ष 2004 में लोक सभा में कुल 128 सदस्य ऐसे थे जिनके विरुद्ध विभिन्न प्रकार के आपराधिक मामले लम्बित थे, वर्ष 2009 की लोक सभा में उनकी संख्या बढ़कर 162 हो गई और वर्ष 2014 की लोक सभा में यह संख्या 185 पहुँच गई, विधान सभाओं तथा स्थानीय निकायों में चुने गए आपराधिक व भ्रष्ट प्रवृत्ति के जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या यह बताने के लिए काफी है कि अधिकांश राजनीतिक दलों को राजनीति के अपराधीकरण तथा अपराधियों के राजनीतिकरण से कोई विशेष परहेज नहीं है |





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