वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट : दिसंबर, 2019।

वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट : दिसंबर, 2019
वर्तमान परिप्रेक्ष्य
  • 27 दिसंबर, 2019 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट श्रृंखला का 20वां तथा वर्ष 2019 का दूसरा संस्करण 'वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट : दिसंबर, 2019' (Financial Stability Report: December, 2019) शीर्षक से जारी किया गया।
  • वर्ष 2019 की पहली रिपोर्ट जून, 2019 में जारी की गई थी।
  • यह एक छमाही प्रकाशन है।

रिपोर्ट का विवरण
  • वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट भारत की वित्तीय प्रणाली की स्थिरता और वैश्विक तथा घरेलू कारकों से उत्पन्न जोखिमों के प्रति इसकी लोचशीलता का समग्र आकलन करती है।
  • इसके अतिरिक्त इस रिपोर्ट में वित्तीय क्षेत्र के विकास और विनियमन से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा की जाती है।

आर्थिक स्थिति
  • भारत की वित्तीय प्रणाली घरेलू संवृद्धि में मंदी के बावजूद स्थिर बनी हुई है। सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के पुनर्पूजीकरण के बाद बैंकिंग क्षेत्र के लचीलेपन में सुधार हुआ।
  • हालांकि वैश्विक घरेलू आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न होने वाले जोखिम बने हुए हैं।

वैश्विक और घरेलू समष्टि-वित्तीय जोखिम
  • कई अनिश्चितताओं जैसे ब्रेक्सिट सौदे में देरी, व्यापार तनाव, एक आसन्न मंदी की भावना, तेल बाजार में व्यवधान और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण मंदी देखी गई।
  • इन अनिश्चितताओं ने उपभोक्ताओं के विश्वास और व्यापार मनोभावों को प्रभावित किया, निवेश के इरादे को कमजोर कर दिया और जब तक कि इन अनिश्चितताओं का ठीक से निपटान नहीं किया जाता है. वैश्विक विकास पर इनका एक महत्त्वपूर्ण दबाव बने रहने की संभावना है।
  • घरेलू अर्थव्यवस्था के संबंध में वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में सकल मांग में कमी आई, जिससे संवृद्धि में मंदी को बढ़ावा मिला, जबकि पूंजी अंतर्वाह की संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई है।
  • भारत के निर्यात को निरंतर वैश्विक मंदी की स्थिति में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन चालू खाता घाटा कमजोर ऊर्जा मूल्य संभावनाओं के कारण नियंत्रण में रहने की संभावना है।
  • वैश्विक वित्तीय बाजारों से स्पिल ओवर (Spillovers) के बारे में सतर्कता बरतते हुए उपभोग एवं निवेश के जुड़वा इंजनों को पुनर्जीवित करना भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।



वित्तीय संस्थान : कार्य निष्पादन और जोखिम
  • अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCB) की ऋण वृद्धि सितंबर, 2019 में वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 8.7 प्रतिशत बनी रही।
  • हालांकि निजी क्षेत्र के बैंकों (PVBs) ने दोहरे अंक में अर्थात 16.5 प्रतिशत की ऋण वृद्धि दर्ज की।
  • सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के पुनपूंजीकरण के बाद अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात में काफी सुधार हुआ।
  • मार्च और सितंबर, 2019 के बीच अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCB) का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (GNPA) अनुपात 9.3 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रहा।
  • सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का प्रोविजन कवरेज अनुपात (PCR) मार्च, 2019 में 60.5 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर, 2019 में 61.5 प्रतिशत हो गया, जो बैंकिंग क्षेत्र के लचीलेपन में वृद्धि दर्शाता है।

वित्तीय क्षेत्र : विनियमन और विकास
  • रिजर्व बैंक ने दबावग्रस्त आस्तियों के समाधान और भुगतान की आधारिक संरचना के विकास हेतु एनबीएफसी (NBFC) के लिए चलनिधि प्रबंधन व्यवस्था शुरू करने, बैंकों की अभिशासन संस्कृति में सुधार लाने हेतु नीतिगत उपाय आरंभ किए हैं।
  • रिजर्व बैंक ने ऑफशोर रुपया बाजार पर कार्य दल की कुछ प्रमुख सिफारिशों जैसे घरेलू बैंकों को गैर-निवासियों को स्वतंत्र रूप से विदेशी मुद्रा की कीमतों की अनुमति देना और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (IFSC) में रुपये डेरिवेटिव (विदेशी मुद्रा में निपटान के साथ) कारोबार की अनुमति देना को स्वीकार कर लिया है।
  • भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने वित्तीय बाजारों को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसमें-
  1. तरल निधियों का संशोधित जोखिम प्रबंध ढांचा
  2. निवेश के लिए संशोधित मानदंड और म्यूचुअल फंडो (MF) द्वारा मुद्रा बाजार और ऋण प्रतिभूतियों का मूल्यांकन
  3. क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (CRA) के लिए संशोधित मानदंड
  4. नए पण्य डेरिवेटिव उत्पादों की सुविधा और स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के लिए स्टॉक एक्सचेंजों पर संस्थागत ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (ITP) स्थापित करना शामिल है।
  • भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) दबावग्रस्त आस्तियों के समाधान में लगातार प्रगति कर रहा है।
  • पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) पेंशन नेट के तहत अधिक नागरिकों को लाने की प्रक्रिया में है।
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