कैसे होती है WHO की फंडिंग

कैसे होती है WHO की फंडिंग
How-is-the-funding-of-WHO

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जो संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अंग के तौर पर कम करता है इसका मुख्यालय स्विजरलैंड के जेनेवा में स्थित है इसका काम दुनियाभर के तमाम देशों में स्वास्थ्य और चिकित्सा सम्बन्धी समस्याओ पर ध्यान देना है और इसके लिए दुनियाभर के देशों को एकजुट करना है यही संस्था यह निर्धारित करती है की कब किसी बीमारी को महामारी घोषित करना है और कैसे उस महामारी से निपटना है दुनिया के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती कोरोना के रूप में मौजूद है इस बीमारी को भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ही वेश्विक महामारी घोषित किया था हालाकि कुछ देशों ने हाल ही में WHO के इस बीमारी से लड़ने के लिए उठाये गये कदमो पर सवाल उठाये है तथा इन सारे देशों में सबसे मुख्य है अमेरिका ,
अमेरिका ने अभी हाल ही में WHO को दिया जाने वाला फण्ड बंद कर दिया WHO पर इल्जाम लगते हुए अमेरिका ने कहा है की चीन परस्त विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिय कोशिश तक भी नही की


अमेरिका की फंडिंग रोकने से इस संस्था पर क्या असर पड़ेगा-

  • दुनिया के कई देश उदारवादी संस्थाए विश्व स्वास्थ्य संगठन को धन मुहिया कराते है
  • विश्व स्वास्थ्य संघठन की बेबसाइट के मुताबिक संस्था के सदस्य देशों को ओर से कुल पैसे का 35.41 फीसदी, करों से 15.66 फीसदी, उदारवादी संगठनो से 9.33 फीसदी, संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से 8.1 फीसदी और बाकीअन्य स्रोत्रों के जरिये आते है विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाले कुल धन का अकेले 15 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है संस्था की सदस्य देशों के जरिये जो पैसा दिया जाता है , उसका तकरीबन 31 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका देता है वही सदस्य देशों की ओर से मिलने वाले कुल धन का तकरीबन 1 फीसदी हिस्सा भारत द्वारा दिया जाता है विश्व स्वास्थ्य संगठन को किसी देश द्वारा कितना धन दिया जायेगा इसका फैसला खुद देश द्वारा किया जाता है हलाकि ये सदस्य देशों की मर्जी पर होता है की उन्हें ये धन राशि देना जारी रखना है या बंद करना है अमेरिका ने अभी यही फैसला किया है हलाकि अमेरिका द्वारा फंडिंग बंद किये जाने पर WHO को काम करने पर कुछ खास समस्या नही आएगी देशों द्वारा दी गई धन राशि का इस्तेमाल विश्व स्वास्थ्य  संगठन दुनियाभर में फैली बीमारियों को कम करने में उनका ईलाज खोजने में तथा टीका विकसित करने में करता है 
  • साल 2018-19 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पोलियो को जड़ से ख़त्म करने पर करीब एक बिलियन डॉलर (करीब 767 करोड़ रुपये) खर्च किये थे ये कुल खर्च का करीब 19.36 फीसदी था संस्था ने 2018-19 में स्वास्थ्य और पोषण सेवओं की पहुंच बढ़ाने पर करीब 8.77 फीसदी रकम , 7 फीसदी रकम इलाज लायक बीमारियों को फैलने से रोकने पर खर्च की थी इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन की और से अफ्रीकन देशों को 1.6 बिलियन डॉलर दक्षिण पूर्वी एशियाइ देशों को 375 मिलियन डॉलर दिये गये थे पैसे हासिल करने वाले देशों में भारत भी शामिल था किस देश को कितनी रकम देनी है और किस कार्यक्रम पर कितने पैसे खर्च किये जाने है इसके पूरे साल का लेखा-जोखा WHO द्वारा तैयार किया जाता है इसके लिये संस्था के फैसले लेने वाली body ball health assembly की बैठक होती है जिसमे संस्था के सदस्यों के प्रतिनिधि शामिल होते है हर साल जेनेवा में इसकी बैठक होती है जिसमे WHO की नीतियां तय की जाती है महानिदेशक की नियुक्ति की जाती है पैसे की लेन-देन की देख-रेख की जाती है और संस्था के वजट पर बातचीत कर उसे अंतिम रूप दिया जाता है किस देश को कितने पैसे दिये जायेंगे यह सब देश की परिस्थिति पर निर्भर करता है

WHO के साथ भारत के रिश्ते-

12 जनवरी 1948 को भारत WHO का सदस्य बना था विश्व स्वास्थ्य संगठन की दक्षिण पूर्वी एशिया के लिए बनी स्थाई कमिटी की बैठक 4 और 5 अक्टूबर 1948 को दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री के दफ्तर में हुयी थी जिसका उद्घाटन तब के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने किया था तब से लेकर अब तक WHO भारत की मदद करता रहा है कुष्ठ रोग या टीबी जैसी बीमारी से लड़ना हो या कालाजार के इलाज की बात हो या फिर पोषण के प्रति जागरूकता की बात हो,  भारत ने सब में कामयाबी पाई है और इसमे WHO संघठन का अहम योगदान रहा है                                              

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