सोहराय और कोहबर कला (Sohrai and Kohbar Art)
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  • झारखंड राज्य के हजारीबाग की सोहराय और कोहबर कला जो अभी तक यहाँ के स्थानीय और ग्रामीण अंचल में प्रसिद्ध थी अब उन्हें अंतराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक और सांस्क्रतिक पहचान मिल सकेगी। यह पहली बार होगा जब झारखण्ड राज्य में किसी कला को पहली बार ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई टैग ) मिला है। सोहराय और कोहबर कला के साथ ही साथ तेलंगाना की तेलई रुमल कला को भी जीआई टैग दिया गया है तथा सोहराय और कोहबर के पंजीकरण समय से मात्र नौ महीने चार दिन में इसे यह टैग हासिल हुआ है। इसे हजीराबाग के कलाकार अलका इमाम की ओर से गठित सोहराय महिला विकास सहयोग समिति द्वारा 23 अगस्त 2019 को इसके लिए आवेदन किया गया था , चेन्नई में मौजूद जीआई रजिस्ट्ररा ने 12 मई को इसके लिए आदेश पर अपनी मुहर लगाई।       
जीआई टैग मिल जाने के कारण सोहराय कला की वास्तविक पहचान को बढ़ावा मिलेगा। इसमें मिट्टी के रंगों का इस्तेमाल होता है। गेरु पत्थर से बना लाल रंग, पीली मिट्टी, दूधी मिट्टी और काली मिट्टी का इसमें प्रयोग होता है। झारखण्ड के अनेक जिलों में कोहबर एवं सोहराई की समृद्ध परम्परा रही है। कोहबर शब्द दो शब्दों ' कोह है एवं 'वर' से बना माना जाता है। कोह या खोह का अर्थ गुफा होता है। बर 'दल्हे' को कहा जाता है अत : कोहबर का अर्थ दूल्हे का कमरा है। कोहबर आज भी इसी नाम से प्रचलित है और आज भी कोहबर विहार, मधुबनी/दरभंगा आदि स्थानों पर भव्य रूप से बनाया या लिखा जाता है।
  • ध्यान से देखें तो आज की कोहबर कला झारखण्ड में पायी जाने वाले सदियों पुराने गुफाचित्रों का ही आधुनिक रूप है। हजारीबाग की कोहबर चित्रकला को फैलाने का श्रेय यहाँ के आदिवासियों को दिया जाता है। मिट्टी की दीवारों पर बनाये जाने वाला यह चित्रण पूरी तरह से महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह चित्रण बहुत ही कलात्मक और इतना स्पष्ट होता है कि पढ़ा जा सकता है। कोहबर के चित्रों का विषय सामान्यत: प्रजनन, स्त्री-पुरुष संबंध, जादू-टोना होता है, जिनका प्रतिनिधित्व पतियों,पशु -पक्षियों, टोने-टोटकै के ऐसे प्रतीक चिन्हों द्वारा किया जाता है, जो वंश वृद्धि के लिये प्रचलित एवं मान्य हैं 
जैसे -बांस, हाथी, कछुआ, मछली, मोर, सौप, कमल या अन्य फूल आदि। इनके अलावा शिव की विभिन्न आकृतियों और मानव आकृतियों का प्रयोग भी होता है। ये चित्र घर की बाहरी अथवा भीतरी दीवारों पर पूरे आकार में अंकित किये जाते हैं।
  • कोहबहर चित्र बनाने की दो शैलियाँ प्रचलित है। मिट्टी को दीवारों पर पृष्ठभूमि तैयार करने के लिये काली मिट्टी का लेप हाथ से या झाडू से किया जाता है। सूख जाने पर उसके ऊपर सफेद मिट्टी का लेप चढाया जाता है। इस गीली मिट्टी पर ही बास या प्लास्टिक के कंघे से तरह तरह की आकृतियाँ" इस तरह बनाई जाती है कि उपर की सफेद मिट्टी हट जाती है और नीचे की काली मिट्टी में आकृतियाँ" स्पष्ट हो जाती हैं। कहीं-कहीं कंघी की जगह चार उँगलियों का इस्तेमाल भी किया जाता है। दूसरे तरीके में दीवारों या मिट्टी की सतह तैयार कर कूचियों से आकृतियां बनाई जाती है। आकृतियों में सामान्यत: सफेद, गेरू, वाला, पीला, हरा आदि रंग का प्रयोग होता है। हजारीबाग जिले के जोरकाठ, इस्को, शरैया, सहैदा, ढेठरिगे, खराटी, राहम आदि गाँवों में कोहबर चित्रांकन सदियों से होता आ रहा है।
सोहराई पर्व, दीवाली के तुरंत बार, फसल कटने के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर आदिवासी अपने घर की दीवारों यर चित्र बनाते है। सोहराई के दिन गाँव के लोरा पशुओं को सुबह जंगल को और ले जाते है एवं अपराह्न में उनका अपने द्वार पर स्वागत करते हैं। इस क्रम में वे अपने घर के द्वार पर अरिपन" का चित्रण करते हैं। अरिपन भूमि पर किया जाता है। जमीन को साफ कर उस पर गोबर या मिट्टी का लेप लगाया जाता है। फिर चावल के आटे से बने घोल से अरिपन का चित्रण किया जाता है। ज्यामितीय आकार में बने इन चित्रों पर चलकर पशु घर में प्रवेश करते हैं। यह चित्रण भी घर की महिलाओं के द्वारा ही किया जाता है। इन लोक कलाओं की शिक्षा हर बेटी अपनी माँ या घर की अन्य वरिष्ट महिलाओं से पाती है।
  • सोहराई चित्रों में दीवारों की पृष्ठभूमि मिट्टी के मूल रंग की होती है। उस पर कत्थई राल, गोद (कैओलीन) और काले (मैंगनीज) रंगों से आकृतियां बनायी जाती है। कोहबर एबं सोहराई चित्र विभिन्न आदिवासी समूह या उपजाति के अनुसार अलग अलग होते हैं। सोहराई और कोहबर कला की लोकप्रियता के बारे में इससे अंदाj लगाया जा सकता है कि 2015 में मन की बात कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कला का उल्लेख किया था।
जीआई टैग मिलने के बाद यह कला दुनिया दुनिया के कोने कोने में जानी जाएगी इसके साथ ही इसकी लोकप्रियता बढ़ने के साथ ही इसके स्थानीय कारीगरों को भी देश विदेश में पहचान मिलेगी और इनके द्वारा बनाये गए चित्रों का सही मूल्य भी इन्हे मिल पायेगा।

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