क्या है त्रिशूर पूरम उत्सव (Thrissur Pooram Festival)


यह त्यौहार मनाने की परम्परा सबसे पहले कोचीन के महाराजा राजा राम वर्मा ने शुरू की थी राजा राम वर्मा को सकथन तंपुरान के नाम से भी जाना जाता था आधिकारिक रूप से पूरम की शुरुआत कोडियट्टम या झंडा फहराने की रस्म से शुरू होती है जिसमे त्यौहार के सभी प्रतिभागी मंदिरों के लोग मौजूद रहते है पूरम में त्रिशूर के चारो और 10 मंदिर होते है और ये एक ऐसा समारोह होता है जिसमे सभी देवता साथ मिलकर नगर के बीचो बीच वडक्कुन्नाथान मंदिर में भगवान शिव की वन्दना करते है त्यौहार की सबसे खास बात  इसमे परम्परागत आघात वाद्य यंत्रो का जमावड़ा जिसमे चेदा , मद्लम , ईदिका , तिमला ,और कोम्बू जैसे वाद्य यंत्र शामिल है पूरम के आखिरी 7 वे दिन को पाकल परम के नाम से जाना जाता है पूरम हालाकि एक हिन्दू त्यौहार है लेकिन इसने केरल में मौजूद सभी धर्मो के लोगो को अपने प्रभाव में ले लिया है, मुस्लिम और ईसाई दोनों सम्प्रदाय के लोग इस त्यौहार में शामिल होते हैं जिससे राज्य में फैली धार्मिक समरसता का पता चलता है त्रिशूर में हाथियों का जुलूस सभी के आकर्षण का केंद्र रहता है जिसे देखने के लिए भारत के अलावा दुनियाभर के पर्यटक आते है 
  • ज्ञात हो कि भारत का दक्षिण भारतीय राज्य केरल अपने मंदिरों के कारण लगातार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है और आज केरल और पर्यटन लगभग एक दूसरे के पर्यावाची बन गये है ये भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ जितना महत्व मंदिर और भगवान को दिया जाता है उतना ही हाथियों को भी , शायद यही कारण है कि हाथी केरल का राज्य पशु है केरल के सभी त्योहरों में हाथी अति महत्वपूर्ण है त्रिशूर पूरम की शुरुआत आज से 200 साल पहले त्रिशूर के राजा ने इस मकसद से की थी की सारे मंदिर एकजुट हो जाएँ केरल का ये लोकप्रिय त्योहार हर साल थेक्किउनाडु मैदान पर्वत पर स्थित वडक्कुन्नाथान मंदिर में , नगर के बीचोंबीच आयोजित होता है इस त्योहार में शामिल मंदिरों को दो वर्गो में पूर्वी मंदिरों एवं पश्चिमि मंदिरों में वर्गीकृत किया गया है यहाँ पर मुख्य पूरम समारोह 7 दिनों तक चलता है फिर बाद में पूजा होती है हाथियों की पीठ पर रंगारंग छतरियों का प्रदर्शन इस त्योहार का मुख्य आकर्षण होता है जिसके लिये मंदिर समिति द्वारा एक विशेष प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है इस दौरान प्रतियोगिता जीतने के लिय अलग-अलग मंदिरों के लोग अपने-अपने हाथियों को मोरपंख , छतरियों और आभूषणों से सजाते है ये विशेष पारंपरिक ढ़ोल , नगाड़े और ये कलाकार भी हाथियों के अलावा त्योहार के मुख्य आकर्षण होते है यहाँ 250 से अधिक कलाकार अपनी कला को लोगो के बीच दिखाते है पर्व के दौरान ये ढ़ोल बजाने वाले कलाकार स्वंम भगवान का रूप होते है तथा इन्हें राज्य में विशेष सम्मान दिया जाता है                                  

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