जीवन का उद्भव एवं विकास (The Origin and Evolution of Life)



पृथ्वी की उत्पत्ति तथा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति सहस्त्रों वर्षों से सभी के चिंतन का विषय रहा है। पृथ्वी की उत्पत्ति के रहस्य के संदर्भ में मात्र विज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म एवं आध्यात्म आदि भी अपनी संकल्पनाएँ देते हैं। संपूर्ण ब्रह्माण्ड में पृथ्वी अभी तक का ज्ञात एक मात्र ऐसा पिण्ड है जहाँ जीवन पाया जाता है। शेष किसी भी ग्रह में जीवन के ठोस प्रमाण अभी तक खोजें नहीं जा सके हैं, परंतु इस ओर मनुष्य निरंतर प्रयासरत है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से लेकर पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति तथा जीवन का विकास एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है। पृथ्वी पर उपस्थित विभिन्न जीवों, उनकी क्रिया-विधि एवं जीवन की जटिलता को समझने से पहले आवश्यक है कि यह जान लिया जाए कि आखिर पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई कैसे? पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर अनेक मत रहे हैं, अलग-अलग विद्वानों ने जीवन को अलग-अलग तरह से समझाया। इस अध्याय में पृथ्वी तथा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण सिद्धान्तों तथा संकल्पनाओं की चर्चा की जाएगी तथा उन प्रमाणों का उल्लेख किया जाएगा जो जीवन के उद्विकास को प्रदर्शित करते हैं।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण सिद्धान्त


    धार्मिक सिद्धान्त (Religious Concepts)


    इस सिद्धान्त को मानने वाले पृथ्वी की उत्पत्ति और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को किसी अलौकिक शक्ति का कार्य मानते हैं। धार्मिक मत के अनुसार ईश्वर ने पृथ्वी पर जीवन को उत्पत्ति की। जिस तरह विभिन्न धर्म को मानने वाले लोग एवं एक ही धर्म में विभिन्न मान्यताएँ हैं, उसी प्रकार धार्मिक सिद्धान्त में भी पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर अनेक मत एवं उनके बीच मत-भेद है। कुछ का कहना है कि पृथ्वी पर प्रथम जीव के रूप में आदमी और हवा आए, कुछ का मानना है कि मनु और श्रद्धा के रूप में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई। हमारे वेद भी पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में अलग-अलग मत रखते हैं। इस सिद्धान्त का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।


    स्वतः उत्पत्तिवाद या जनन सिद्धान्त (Theory of Spontaneous Generation)

    इस सिद्धान्त के प्रतिपादक अरस्तु एवं प्लेटो हैं। इनका मानना था कि पृथ्वी पर जब कहीं जीवन की संभावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं, तब वहाँ जीवन अस्तित्व में आने लगता है। उनका मानना था कि पृथ्वी पर जीवन निर्जीव वस्तुओं से उत्पनन हुआ है। इसे इस तरह समझा जा सकता है, कि यदि कहीं जंगल उत्पन्न कर दिया जाए (पेड़-पौधे, नदी, झील आदि) तो पशु वहाँ स्वतः ही उत्पन्न हो जाते हैं। इस सिद्धान्त को बाद में कई प्रयोगों द्वारा नकार दिया गया, और यह सिद्ध हो गया कि जीवन की उत्पत्ति जीवन से ही हो सकती है, निर्जीव से नहीं।


    ब्रह्माणवाद या कास्मोजोइक सिद्धान्त (Cosmozoic Theory)

    यह संभावनाओं और कल्पनाओं पर आधारित सिद्धान्त है, जिसमें यह मान लिया गया था कि पृथ्वी के बाहर पहले से ही जीवन उपस्थित था और ये दूसरे ग्रहों के सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर आए और इन्हीं के द्वारा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई। खगोल विज्ञान के क्षेत्र में हुए बाद के प्रयोगों एवं खोजों ने यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी के बाहर किसी दूसरे ग्रह में अब तक जीवन के अंश नहीं दिखे हैं, अतः इस सिद्धान्त की मान्यता भी समाप्त हो गई।

    आकस्मिक अकार्बनिक उत्पत्तिवाद या प्रलयवाद (Theory of Sudden Creation)

    यह हैकल द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त है। हैकल के मत के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की घटना आकस्मिक है, जैसे किसी बाढ़ या प्रलय जैसी भीषण त्रासदी के फलस्वरूप पृथ्वी पर उपस्थित अकार्बनिक पदार्थों के पुनः संयोजन के फलस्वरूप जीवन की उत्पत्ति हुई है। वैज्ञानिक तर्कों के अभाव में इस सिद्धान्त को भी बाद में नकार दिया गया।
    इसी प्रकार जीवन की उत्पत्ति के अनेक सिद्धान्त दिये गए जिनमें से अधिकांश का कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं था। परंतु इन तर्को से एक बात स्पष्ट हो गई थी कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कई वर्षों लंबी घटना है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर आज जो मत सर्वमान्य है वह है ओपेरिन का आधुनिक सिद्धान्त जो पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को क्रमवार वैज्ञानिक रूप से उल्लिखित करता है।

    ओपैरिन का आधुनिक सिद्धान्त (Oparin's Modern Theory)

    औपैरिन के मत के अनुसार जीवन की उत्पत्ति सर्वप्रथम समुद्र में हुई। यह बहुत ही धीमी प्रक्रिया के रूप में जीव रसायन (biochemical) के रूप में उत्पन्न हुई जो कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों के हजारों वर्षों में अभिक्रिया से बना। ओपैरिन के सिद्धान्त का समर्थन इस बात से मिलता है कि जीवों के जीवद्रव्य में उपस्थित सभी तत्व एवं यौगिक जैसेहाइड्रोजन, अमोनिया, कार्बन, गन्धक, फास्फोरस, और जल सभी कुछ समुद्र में उपस्थित थे। इस प्राथमिक पदार्थों से जटिल पदार्थों, जैसे- एथेन, प्रोपेन, ब्यूटेन एथिलीन, एसिटिलीन, और एल्कोहल का निर्माण हुआ। इन्हीं यौगिकों ने पराबैंगनी किरण तथा एक्स किरणों के विद्युत विसर्जन द्वारा जी उत्पत्ति के आवश्यक अवयव जैसे शर्करा, ग्लिसरीन, वसा अम्ल (Fatty acids) अमीनो अम्ल, लैक्टिक अम्ल पिरीमिडीन, प्यूरीन का निर्माण किये। ये सरल यौगिक तुलनात्मक जटिल यौगिकों जैसे न्यूक्लिक अम्ल ATP जटिल शर्करा इत्यादि के निर्माण में जुट गए। यही न्यूक्लियोप्रोटीन उत्परिवर्तन (Mutation) के फलस्वरूप नये-नये न्यूक्लिओ प्रोटीन अथवा पोलीपेप्टाइड का निर्माण किये और इस तरह प्रथम सजीव कोशिका का निर्माण हुआ। यह सजीव लक्षण सर्वप्रथम विषाणुओं में पाया गया इसलिए इस न्यूक्लियो प्रोटीन को प्रारंभिक जीव की संज्ञा दी गई।
    • ये न्यूक्लियोप्रोटीन आकार में बड़े होकर कोयसरवेट (Coacervate) का निर्माण किये और इसके ऊपर चारों तरफ पारगमन झिल्ली (Permeable membrane) का निर्माण हो गया। यह अवस्था कोशिका निर्माण की प्रथम अवस्था कहलाती है। इसके पश्चात धीरे-धीरे कोशिका के अन्य कोशिकांग विकसित होने लगे। इन कोशिकाओं में विभिन्न कार्यों के लिए विभाजन शुरू हुआ जिससे साधारण कोशिका से जटिल कोशिका का निर्माण हुआ, यही प्रक्रिया जैव-विकास कहलाती है।
    जैव विकास (Organic Evolution)

    प्राणियों में व्यक्तिगत एवं जाति स्तर पर होने वाले परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप सरल जीवों से जटिल जीवों के विकास की प्रक्रिया एवं घटना जैव विकास (Organic Evolution) कहलाता है। कोयसरवेट के रूप में जीवन की उत्पत्ति के पश्चात से अभी तक जीवन में जितनी जटिलताएँ आ चुकी हैं, यह विकास यात्रा का पूरा पथ जैव-विकास कहलाता है। जिस प्रकार जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेक सिद्धान्त हैं, उसी प्रकार जीवन के विकास के संदर्भ में भी अनेक मत दिये गए हैं, और नकारे गए-

    जैव विकास से संबंधित विभिन्न सिद्धान्त (Different concepts related to Organic Evolution)

    लैमार्कवाद (Lamarckism)

    लैमार्क फ्रांसीसी वैज्ञानिक थे। लैमार्क ने अपनी पुस्तक "फिलासॉफी जूलोजिक" (Philosophic Zoologique), में जैव-विकास के संदर्भ में अपना मत रखा। लैमार्क के जैव-विज्ञान के सिद्धान्त को मुख्य रूप से उपार्जित लक्षणों की वंशागति के रूप में जाना जाता है, परंतु उनके सिद्धान्त में उन्होंने जीवन के विकास पर तीन कारकों के प्रभाव पर महत्व दिया-

    वातावरण का प्रभाव (Effect of Environment) :

    इसके अनुसार वातावरण जीवों के बाह्य, आंतरिक कार्यिकी लक्षणों में अपना प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव डालता है। लैमार्क के अनुसार प्राणियो के शरीर में उनके वातावरण के कारण बहुत से परिवर्तन आते हैं, अर्थात् जीव के आस-पास का पर्यावरण निर्धारित करता है कि उस जीव में कौन-कौन से गुण होंगे। लैमार्क ने अपने प्रयोग को जिराफ का उदाहरण देकर समझाया, उन्होंने कहा कि वातावरण में जब कम ऊँचाई पर पत्तियाँ उपलब्ध थी तब जिराफ को भोजन के लिए गर्दन ऊंची करने की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उसकी गर्दन पहले छोटी हुआ करती है, परंतु वातावरणिक परिवर्तनों के कारण जब पत्तियो की ऊंचाई बढ़ने लगी तब जिराफ की गर्दन भी आवश्यकतानुसार लंबी होने लगी

    अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग (Use and unuse of organs) :

    इससे संदर्भ में लैमार्क ने बताया कि वातावरण में परिवर्तन के साथ जीव अपने कुछ अंगों का अधिक प्रयोग करता है, और कुछ अंगों का कम प्रयोग करता है। जिन अंगों का वह अधिक प्रयोग करता है, वह समय के साथ विकसित होने लगते हैं, और जो अंग अधिक प्रयोग नहीं किये जाते वे समय के साथ समाप्त होने लगते हैं। अवशेषी अंगों को लैमार्क के इस सिद्धान्त के आधार पर समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर मनुष्य के शरीर में उपस्थित वर्मीफार्म अपेन्डिक्स अब अवशेषी अंग हो गया है। पहले जब आग का आविष्कार नहीं हुआ था और मनुष्य कच्चे पौधे एवं मॉस से अपना पेट भरता था तब अपेन्डिक्स क्रियाशील हुआ करता था परंतु बाद में इसके प्रयोग में कमी आई और यह अवशेषी अंग हो गया। दॉये हाथ से काम करने वाले लोहार के दॉये और बॉये हाथ की ताकत में अंतर होता है, इससे भी लैमार्क के इस सिद्धान्त को समझा जा सकता है।


    उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance ofAcquired Characters) :

    इसके अनुसार वे लक्षण जो बदलते वातावरण के अनुसार अधिक अनुकूलित होते हैं, अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित हो जाते हैं। लैमार्क के अनुसार उत्तम लक्षणों के इस सतत हस्तान्तरण के कारण भावी पीढ़ी अपने पूर्वज पीढ़ी से भिन्न होती चली जाती है और अंततः नयी जाति का उद्भव हो जाता है।
    लैमार्क का सिद्धान्त प्रथम दृष्टया तर्क संगत लगता है, किन्तु इसमें कुछ त्रुटियाँ हैं। वातावरणिक दशाएँ यदि जीव के शरीर में इतना अधिक परिवर्तन ला सकतीं (जिराफ की गर्दन का इतना लंबा हो जाना) तो पृथ्वी पर से जीव विलुप्त नहीं होते, सभी जीव वातावरणिक दशाओं के अनुसार स्वयं को अनुकूलित कर लेते और अपने अंगों एवं क्रियाविधियों मे कुछ परिवर्तनों के साथ वे अस्तित्व में बने रहते परंतु हम जानते हैं कि डायनासोर जैसे कुछ जीव विलुप्त हो चुके हैं। उपार्जित लक्षणों की वंशागति भी गलत साबित होती है, क्योंकि यदि परिवर्तन वातावरणिक दशाओं से आया तो यह अगली पीढ़ी में कैसे स्थानान्तरित हो गया, वैसे भी लोहार का बच्चा जन्म से ही मजबूत दाहिने हाथ के साथ पैदा नहीं होता, जो यह सिद्ध करता है कि वातावरिणक दशाओं के कारण आये परिवर्तन वंशागत नहीं हो सकते।

    डार्विनवाद (Darwinism)

    डार्विन ब्रिटेन के वैज्ञानिक थे। डार्विन “प्राकृतिक वरण द्वारा नयी जातियों का उद्भव" (Origin of Species by Natural Selection) के रचियता हैं। अपनी इसी किताब में इन्होंने अपना प्राकृतिक वरण (Natural selection) का सिद्धान्त दिया। डार्विन के सिद्धान्त के मूल बिन्दु में यह बात निहित थी कि प्रकृति जीवों में गुणों को बदलती नहीं, बल्कि विभिन्न गुणों में से उत्तम गुणो का चयन कर लेती है, और शेष गुण जीवन संघर्ष में विफल होकर समाप्त हो जाते हैं।
    जिस जिराफ की लंबी गर्दन की व्याख्या करके लैमार्क ने अपने वातावरणिक प्रभाव के तथ्य को सिद्ध करने का प्रयास किया उस जिराफ की व्याख्या डार्विन दूसरे रूप में करते हैं। डार्विन के अनुसार प्रकृति में लंबे और छोटे दोनों तरह की गर्दन वाले जिराफ पहले से ही उपस्थित थे। जैसे- जैसे वातावरणिक दशाएँ बदली और कम ऊंचाई वाली पत्तियाँ समाप्त हो गई, छोटी गर्दन वाले जिराफ भोजन के संघर्ष में बड़ी गर्दन वाले जिराफ से पिछड़ गए और समाप्त हो गए, इस प्रकार प्रकृति ने बड़ी गर्दन वाले जिराफ का चयन कर लिया।
    डार्विन के प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त को निम्न शीर्षकों में समझा जा सकता है


    प्रचुर मात्रा में जीवों द्वारा संतानोत्पत्ति :

    पृथ्वी पर रहने वाले विविध जीव अपने जीवन-काल में कई हजार बच्चों को जन्म देते हैं, यदि ये सभी जीव जीवित रह गए तो पृथ्वी पर इन जीवों की भरमार हो जाएगी और पृथ्वी इन जीवों से पूरी तरह भर जाएगी, इसलिए प्राकृतिक वरण के अंतर्गत कुछ जीव जन्म के साथ ही विविध तरीकों से मर जाते हैं।


    जीवित जीवों के बीच संघर्ष :

    जीवों के बीच जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए संघर्ष गभावस्था से ही प्रारंभ हो जाता है। यह संघर्ष उनकी मृत्यु तक कभी आवास के लिए, कभी भोजन के लिए, कभी संगत के लिए चलता रहता है। इस संघर्ष में भी कुछ जीव हार जाते हैं, और समाप्त हो जाते हैं। जीवों के बीच होने वाला संघर्ष तीन प्रकार का होता है

    1.अन्तराजातीय संघर्ष (Intra specific) : यह संघर्ष एक ही जाति के सदस्यों के बीच होता है, यह संघर्ष मुख्य
    रूप से संगत एवं भोजन के लिए होता है।

    2. अन्तर्जातीय संघर्ष (Inter Specific) : यह संघर्ष भिन्न जाति के जीवों के बीच होता है, यह संघर्ष मख्य रूप से भोजन, आवास एवं वर्चस्व के लिए होता है।

    3. वातावरणीय  संघर्ष (Enviromental) : यह संघर्ष जीव का क वातावरण में होने वाले परिवर्तन से होता है, जैसे बाढ़, सूखा, अकाल, भूकम्प आदि।।


    योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the fittest) :

    इसके अनुसार वह जीव जो इन सभी तरह के संघर्षों में जीतता है, वही जीव प्रकृति में अस्तित्व रख पाता है, शेष सभी जीव समाप्त हो जाते हैं। यह प्राकृतिक वरण के द्वारा होता है। और संघर्ष में सफल यह जीव अपनी अगली पीढ़ी में अपने गुणो को स्थानान्तरित करता जाता है।
    डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धान्त सभी मायनों में सही था, उन्होंने सभी प्रश्नों का सही हल दिया परंतु डार्विन इस बात का उत्तर नहीं दे पाये कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में गुणों का हस्तान्तरण होता कैसे है? यह डार्विन के सिद्धान्त का दोष नहीं था, डार्विन तब तक मात्र मेण्डल के आनुवांशिका के नियम से अनभिज्ञ थे और उन्हें आनुवांशिक लक्षणों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, मेण्डल द्वारा आनुवांशिकता के नियम को खोजे जाने के बाद डार्विन के सिद्धान्त पर उठने वाला प्रश्नचिह्न स्वतः ही समाप्त हो गया।


    जैव विकास के पक्ष में कुछ प्रमाण

    समजात अंग (Homologous Organs)

    वे अंग जिनकी मौलिक संरचना एवं उत्पत्ति समान होती हैं, उन्हें समजात अंग कहते हैं। समजात अंग विभिन्न जीवों में उनके वातावरणिक अनुकूलन के कारण विभिन्न रूपों में रूपान्तरित हो जाते हैं, और उनकी बाह्य संरचना एवं कार्य भिन्न हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर मनुष्य के हाथ, चमगादड़ के पंख और घोड़े के अग्र पाद समजात अंग हैं, अर्थात् इनकी उत्पत्ति एवं मौलिक संरचना एक समान है। इन जीवों की भ्रूणावस्था का अवलोकन करने पर पता चलता है, कि अपनी भ्रूणावस्था के प्रारंभिक अवस्था में ये संरचनाएँ अत्यधिक समानता रखती हैं, परंतु कालांतर में पकड़ बनाने, उड़ने और दौड़ने के अनुसार इनमें अत्यधिक रूपान्तरण हो जाता है, और ये पूर्णतः भिन्न अंग प्रतीत होते हैं।

    समवृत्ति अंग (Analogous Organs)

    जीवों की विभिन्न जातियों में कुछ ऐसे अंग होते हैं, जिनकी बाह्य संरचना एवं कार्य तो समान होते हैं, किन्तु मौलिक संरचना एवं उत्पत्ति पूर्णतः भिन्न होती है, इन अंगों को समवृत्ति अंग कहते हैं। चमगादड़ के पंख और कीटों के पंख समवृत्ति अंगों के उदारहण हैं, क्योंकि दोनों ही उड़ने में सहायक होते हैं, परंतु इन दोनों की उत्पत्ति पूर्णतः भिन्न होती है, चमगादड़ के पंख इसके अग्रपाद का रूपान्तरण होते हैं जबकि कीटों के पंख इनके बाह्य कंकाल का रूपान्तरण।


    अवशेषी अंग (Vestigial Organs)

    विकास की प्रक्रिया में जिन अंगों का प्रयोग बंद हो गया और वे पूर्णतः लुप्त होने के बजाए अवशेषी एवं अक्रियाशील रूप में शरीर में उपस्थित रह गए उन्हें अवशेषी अंग कहा जाता है। हमारे शरीर के बाल, कर्ण पल्लव, अक्ल दाढ़, वर्मीफार्म अपेन्डिक्स, निमेषक पटल, आदि अवशेषी अंगों के ही उदाहरण हैं। मनुष्य के शरीर में ही लगभग 180 अवशेषी अंग पाये जाते हैं, जो कभी काम में लाए जाते थे परंतु कालान्तर में उपयोगहीनता के कारण अब अवशेषी अंग कहलाने लगे हैं।

    संयोजक कड़ी (Connecting Link)

    वे जीव जो विकास की प्रक्रिया में दो विभिन्न प्रकार के जीनों का संबंध स्थापित करते हैं, संयोजक कड़ी कहलाते हैं। इन संयोजक कड़ियों में उन Paceकार जीव26 लक्षण पाये 0 हैं, कनक बीच यह संबंध स्थापित करते हैं। संयोजक जीव विकास की प्रक्रिया को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यह कम विकसित जीवों से अधिक विकसित जीवों के निर्माण के जीते-जागते सबूत होते हैं। उदाहरण के तौर पर विषाणु को निर्जीव एवं जीवन के बीच की संयोजक कड़ी माना जाता है, क्योंकि इसमें बहुत से गुण निर्जीवों के और बहुत से गुण सजीवों के पाये जाते हैं, जो यह दर्शाता है कि जीवन की उत्पत्ति अंततः हुई तो निर्जीव तत्वों से ही है। आक्रियोप्टेरिक्स को सरीसृप और पक्षियों के बीच की कड़ी माना जाता है, जिसके बहुत से गुण सरीसृपों की तरह थे परंतु जो पक्षियों की तरह उड़ सकता था, जो यह बताता है कि पक्षियों की उत्पत्ति सरीसृपों से हुई है। इसी प्रकार हमारे जीव-जगत में अनेक ऐसे संयोजक कड़ी हैं जो विकास की प्रक्रिया को समझने में सहायक होते हैं।
    1. पेरीपेटस एनीलिडा और आर्थोपोडा के बीच की संयोजी कड़ी है।
    2. एकीडना सरीसृप एवं स्तनधारी के बीच की संयोजी कड़ी है।
    3. विषाणु निर्जीव एवं सजीव के बीच की संयोजी कड़ी है।
    4. आक्रियोप्टेरिक्स सरीसृप एवं पक्षियों के बीच की कड़ी हैं।
    5. नियोपाइलाइना एनीलिडा और मोलस्का के बीच की कड़ी है।
    6. प्रोटोप्टेरस मछली और उभयचर के बीच की कड़ी है।
    7. काईमेरा उपास्थिल एवं अस्थिल मछलियों के बीच की कड़ी हैं।
    8. बैलेनोग्लोसस अकशेरूक एवं कशेरूक जीवों की बीच की कड़ी हैं।

    जीवों का भ्रूणीय विकास (Embryonic Development of Organisms)

    विभिन्न जीवों के भ्रूणीय विकास के चरणों को अवलोकित करने पर सभी में भ्रूणीय विकास के चरण एक समान प्रतीत होते हैं, जो इन जीवों का एक-दूसरे से संबंध दर्शाता है।

    • धार्मिक मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति किसी अलौकिक शक्ति या दैवीय कृपा से हुआ है।
    • स्वतः उत्पत्तिवाद के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति निर्जीव वस्तुओं से हुई है- अरस्तु एवं प्लेटो को जाता है।
    • ब्रह्माणवाद के अनुसार पृथ्वी से पहले ब्रह्माण्ड के दूसरे ग्रहों पर जीवन का अस्तित्व था।
    • आकस्मिक अकार्बनिक उत्पत्तिवाद या प्रलयवाद के अनुसार पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी पर आये प्रलय या क्रान्ति के फलस्वरूप पृथ्वी पर उपस्थित अकार्बनिक पदार्थों में पुनः संयोजन के फलस्वरूप हुई- हैकल
    • ओपैरिन का आधुनिक सिद्धान्त (Oparin's Modern Theory) के अनुसार जीवन की उत्पत्ति जीव रसायन के रूप में समुद्र में हुई है। जीवन के उद्भव में कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों प्रकार के यौगिकों के हजारों वर्षों की क्रिया का योगदान है।
    • कोयसरवेट कोशिका निर्माण की प्रथम अवस्था कहलाती है।
    • प्राणियों में व्यक्तिगत एवं जाति स्तर पर होने वाले परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप सरल जीवों से जटिल जीवों के विकास की प्रक्रिया एवं घटना जैव विकास (Organic Evolution) कहलाता है।
    • लैमार्क ने अपनी पुस्तकफिलासॉफी जूलोजिक (Philosophic Zoologique) में जैव विकास का सिद्धान्त दिया। लैमार्क ने जैविक विकास के सिद्धान्त में तीन तथ्यों पर बल दिया-
    • वातावरण का प्रभाव (Effect of Environment)
    • अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग (Use and unuse of organs)
    • उपार्जित लक्षणों की वंशागति (Inheritance of Acquired Characters)
    • डार्विन की पुस्तक- "प्राकृतिक वरण द्वारा नयी जातियों का उद्भव" (Origin of Species by Natural Selection) डार्विन ने प्राकृतिक वरण के अनुसार-
    • पृथ्वी पर सभी जीव प्रचूर मात्रा में सन्तानोत्पत्ति करत हा इन संतानों में से अधिकतर मर जाते हैं।
    • जीवन के लिए संघर्ष भ्रूणावस्था से प्रारंभ होता है और जीव के मरते तक चलता रहता है। जीवों का जीवन संघर्ष तीन प्रकार का होता है- अन्तराजातीय संघर्ष (Intra specific) (एक ही जाति के सदस्यों के बीच), अन्तर्जातीय संघर्ष (Inter Specific) (विभिन्न जातियों के बीच), वातावरणीय संघर्ष (Environmental) (वातावरणीय आपदाओं से अपने जीवन की रक्षा के लिए संघर्ष)
    • इस संघर्ष में जो योग्यतम होता है, उसकी उत्तरजीविता निश्चित होती है (Survival of the fittest)। इनके
    • अतिरिक्त अन्य जीव समाप्त हो जाते हैं।
    • योग्यतम की उत्तरजीविता प्राकृतिक वरण के सिद्धान्त से होता है, अर्थात् पृथ्वी पर रहने वाले जीवों का प्रकृति उनके गुणों के आधार पर चयन करती है।
    • योग्यतम जीव प्रजनन करके अगली पीढ़ी में अपने गुणों का स्थानान्तरण करता है, इस प्रकार पृथ्वी पर नयी जातियों का विकास होता है।
    • जिन अंगों की मौलिक रचना तथा उद्भव समान , बाह्य रचना एवं कार्य भिन्न उन्हें होते हैं उन्हें समजात अंग कहते हैं। उदाहरण- मनुष्य के हाथ, घोड़े के अग्रपाद, चमगादड के पंख आदि समजात अंग हैं।
    • वे अंग जिनका कार्य समान, मौलिक रचना एवं उद्भव भिन्न होता है उन्हें समवृत्ति अंग कहते हैं। उदाहरणचमगादड़ और कीटों के पंख समवृत्ति अंग हैं।
    • वे अंग जो विकास के क्रम में अक्रियाशील हो गए हैं और अविकसित या अर्धविकसित रूप में जीवों में पाये जाते हैं, अवशेषी अंग कहलाते हैं। उदाहरण- वर्मीफार्म अपेन्डिक्स, कर्ण पल्लव, अक्ल दाढ़, मनुष्य की त्वचा के बाल आदि।
    • मनुष्य के शरीर में लगभर 180 अवशेषी अंग पाये जाते हैं।

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