मॉब लिचिंग क्या है ? ( What is mob lynching )

न्याय का सार्वभौमीकरण तो सर्व स्वीकार्य हैपरंतु बात जब न्यायाधिकार के सार्वभौमीकरण की होतो स्थिति इसके उलट होती है। सभी की हर समय न्याय तक पहुंच जहां व्यवस्था को बनाए रखती हैवहीं सभी को न्याय करने का अधिकार व्यवस्था को मत्स्य न्याय की स्थिति में ले जाता है। यहां बलशाली खुद की रची परिभाषा के अनुसारकिसी को भी दोषी निर्दोष सिद्ध करने लगता है तथा अपने ही अनुसार उसके लिए दण्ड और पुरस्कार का निर्धारण भी इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा हैजहां लोगों ने अपने अनुसार न्याय किया और पूरी मानवता को दांव पर लगा दिया जहां हिटलर ने प्रजातिधर्म और शारीरिक क्षमता को न्याय का अधिकार बनायातो वहीं लेनिन माओमुसोलिनी आदि ने विचारधारा के नाम पर रक्तरंजित न्याय किया।
न्यायाधिकार जब एक व्यक्ति से परे जाकर भीड़ को प्राप्त हो जाता है। तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है भीड़ द्वारा दिया जाने वाला न्याय कभी - कभी न केवल व्यक्ति विशेष को अपितु पूरे समुदाय के अस्तित्व को संकट में डाल देता है।


क्या है लिंचिंग ?
लिंचिंग शब्द का अर्थ होता है- किसी को दोषी करार देकर उसे बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए मृत्युदण्ड देना लिंचिंग शब्द लिंच कानून (Lynch Law) से आया है। इसे 1780 ई. के आस पास संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्जीनिया प्रांत के निवासी विलियम लिंच (WilliamLynch) के कुकृत्यों के बाद गढ़ा गया |  विलियम लिंच द्वारा खुद के बनाए न्यायाधिकरण, जिसका वह स्वघोषित न्यायाधीश भी था, के माध्यम से बिना किसी कानूनी प्रकिया का पालन किए अनेक आरोपियों को उनका पक्ष रखने का अवसर दिए बिना मौत की सजा सुनाई गई। इस न्यायाधिकरण के सर्वाधिक शिकार अफ्रीकी मूल के व्यक्ति हुए, जिन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया। यद्यपि प्रारंभ में यह अमेरिका तक ही सीमित थापरंतु समय के साथ इस कुप्रथा का विस्तार अन्य देशों में भी होता गया।


भारत में मॉब लिचिंग -
भारत जैसा सहिष्णु देशजिसकी विशेषता ही रही है कि सबको अपनाया जाए भी भीड़  हिंसा के दाग से खुद को बचा नहीं पाया। आधुनिक भारत में देखा जाए तो स्वतंत्रता आंदोलन के समय अनेक अवसरों पर भीड़ ने अनियंत्रित होकर हिंसात्मक गतिविधियों को अंजाम दिया। असहयोग आंदोलन के समय में घटी चौरीचौरा अग्निकांड की घटना तो जग जाहिर है। इसी तरह भारत छोड़ो आंदोलन में भी भीड़ हिंसा की अनेक घटनाएं प्रकाश में आती हैं। स्वातंत्रयोत्तर भारत में विभाजन के कारण आबादी स्थानांतरण के समय मुस्लिम समुदाय तो इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात सिख समुदाय भीड़ के निशाने पर रहे। 
हाल -फिलहाल में भारत में मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएं प्रकाश में आईं जिनमें किसी व्यक्ति को दोषी करार देकर भीड़ द्वारा सजा-ए-मौत का फरमान सुनाया गया। किसी को बच्चा चोरी के आरोप मेंतो किसी को व्यभिचार के आरोप मेंकिसी को गो-वध के लिए तो किसी को तांत्रिक क्रियाओं के लिए किसी को धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने कातो किसी को जातीय भावनाओं को चोट पहुंचाने का दोषी करार दिया गयाभले ही सभी घटनाएं अलग-अलग क्षेत्रों में और अलगअलग कारणों से घटी होंलेकिन सभी घटनाओं में ये बातें समान रही हैं कि इनमें न तो किसी का दोष सिद्ध हुआ थान ही किसी को अपनी बात रखने का अवसर मिला और न ही उन्हें सजा देने के लिए किसी न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया गयाये सभी घटनाएं भीड़ द्वारा की गई मान्यताओं पर आधारित रहीं।


भारत में भीड़ द्वारा की गई हिंसा न तो कानूनी दृष्टि से मान्य है। और न ही नैतिक दृष्टि से उचित। इसी कारण हाल की मॉब लिंचिंग की घटनाओं से पूरे देश में चिंता का माहौल बना हुआ है। भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा की घटनाओं तथा उस घटना की वीडियोग्राफी तथा उसका प्रचार कर श्रेय लेने की होड़ ने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। भारत में मॉब लिंचिंग के कारणों तथा प्रभाव पर आने से पूर्व सामूहिक हिंसा के सामाजिक मनोवैज्ञानिक कारणों की पड़ताल भी आवश्यक है।

सामूहिक हिंसा का सामाजिक - मनोविज्ञान -
सामूहिक हिंसा एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक क्रियाकलाप है। हिंसा के विस्तारलक्ष्य तथा इसकी योजना बद्धता के आधार पर इसे तीन प्रमुख वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इसका एक प्रकार है-


सामुदायिक हिंसा जिसमें किसी जातीय समूह को निशाना बनाकर सामूहिक हिंसा की जाती है। बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों के विरुद्ध की गई हिंसा इसके अंतर्गत आती है। ऐसी हिंसाएं आमतौर पर नियोजित होती हैं तथा इनका विस्तार काफी अधिक होता है। इनसे पूरे समुदाय के विनाश का भी जोखिम बना रहता है। सामूहिक हिंसा का दूसरा प्रकार है- सामाजिक मान्यताओं को बचाने के लिए की जाने वाली हिंसा। इस प्रकार की हिंसा परंपरा को कानून से ऊपर मानने के कारण होती हैइसमें हिंसा के द्वारा डर का माहौल पैदा कर एक संदेश दिया जाता है। इस प्रकार की हिंसा में हिंसा को एक पवित्र कार्य माना जाता है तथा इसे धर्म की गलत व्याख्याओं के द्वारा समर्थन भी प्राप्त होता है। जैसे कि वेदों का आदेश है कि गो हत्या करने वालों को मार डालना पाप नहीं है (यद्यपि इसकी सत्यता संदिग्ध है)। इस तरह की हिंसा भी नियोजित होती है। सामूहिक हिंसा का तीसरा प्रकार है- भीड़ हिंसा। सामान्यतः यह किसी तात्कालिक कारण से उत्पन्न आवेश का परिणाम होता है। आमतौर पर यह अनियोजित होता है और इसका विस्तार काफी सीमित क्षेत्रों तक होता है।
मॉब लिंचिंग के कारण-
ऊपरी तौर से देखने से मॉब लिंचिंग किसी ऐसी तात्कालिक घटना का परिणाम होता है, जिससे जन भावनाएं आहत हों। जन । भावनाओं को ठेस पहुंचने की स्थिति में लोगों द्वारा सामूहिक प्रतिक्रिया (हिंसात्मक) की जाती है तथा समूह तथाकथित दोषी को शारीरिक दण्ड देता है। सामान्यतः भीड़ का उद्देश्य दोषी को केवल शारीरिक पीड़ा पहुंचाना होता है, परंतु इतनी अधिक हिंसा के बाद ज्यादातर मामलों में व्यक्ति काल के गाल में समा जाता है।
भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के पीछे का तात्कालिक कारण केवल क्षणिक उन्माद को जन्म देता है, जबकि लोगों के मन में अनेक कारणों से उन्मादी पृष्ठभूमि पहले से ही बन चुकी होती है, जिस कारण उनकी सहिष्णुता क्षीण हो | चुकी होती है। भीड़ हिंसा के पीछे छिपे कारणों को मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक चश्मों से देखने पर स्थिति और भी स्पष्ट होती है।

मनोवैज्ञानिक कारण -
भीड़ द्वारा की गई हिंसा के पीछे संदर्भ समूह (Reference Group) की अवधारणा कार्य करती है। संदर्भ समूह एक मनोवैज्ञानिक समूह होता है, जिसमें व्यक्ति सदस्य न होते हुए भी खुद को उससे जोड़ लेता है तथा अपने आप को उस समूह का सदस्य मानने लगता है। इसी मनोयोग के वशीभूत भीड़ के सदस्य जब भीड़ के किसी अन्य सदस्य (भले ही वो अनजान हो) के खिलाफ कोई उत्पीड़क कृत्य देखते | हैं, तो वे उसे खुद पर उत्पीड़न मान बैठते हैं तथा प्रतिक्रिया करते हैं और इसका परिणाम होता है- सामूहिक रूप से दोषी को दण्ड देने | का क्रिया-कलाप। इसके अतिरिक्त अन्य कारणों (पारिवारिक, सामाजिक, नौकरी संबंधी आदि) से मानसिक तनाव से ग्रसित व्यक्ति भी ऐसे अवसरों पर अपनी खीझ निकालने लगते हैं। इससे कई बार हिंसा का स्वरूप और भी वीभत्स हो जाता है।

कानूनी एवं राजनैतिक कारण -
भारत में भीड़ हिंसा से निपटने हेतु किसी स्पष्ट कानून के अभाव में सामान्य अपराध कानूनों से ही भीड़ हिंसा के दोषियों को दण्डित किए जाने के कारण कई बार सामूहिक अपराध करने वाले कई लोग | बच निकलते हैं। कई बार पुलिस भी अनावश्यक विवेचना से बचने हेतु इसे अज्ञात द्वारा किया गया अपराध करार देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। कुछ मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप भी पुलिस के कदमों को रोकने का कारण बनते प्रतीत होते हैं।
इसके अतिरिक्त राजनीतिक विफलता भी भीड़ हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार करती है। जब सरकार लोगों को अपराध पूर्व सुरक्षा तथा अपराध पश्चात न्याय दिलाने में असफल रहती है, तो लोगों का धीरे-धीरे कानून एवं न्याय व्यवस्था पर विश्वास कम होता जाता है। ऐसी रिस्थति में लोगों द्वारा इस भावना के वशीभूत कि अपराधी (भीड़ द्वारा घोषित) कानूनी प्रक्रिया में बच निकलेगा, अपराधी को तुरंत दण्ड दिया जाता है।
कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा भी अपने संकीर्ण स्वार्थों के वशीभूत होकर वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कभी-कभी भीड़ को गुमराह करके हिंसात्मक कार्रवाइयां करवाई जाती है। इस स्थिति में लोगों को यह विश्वास दिलवाया जाता है कि अमुक गतिविधि जायज है तथा उन्हें उनके कृत्यों के लिए न केवल कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा, अपितु उन्हें भविष्य में राजनैतिक लाभ भी मिलेंगे। भीड़ हिंसा में नेतृत्व करने वाले का महिमामंडन तथा उसे समुदाय का हीरो बनाने की भावना ने भी भीड़ हिंसा की घटना में वृद्धि की पृष्ठभूमि बनायी है। इसके अतिरिक्त इस संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि संगठित अपराधी भी खुद को जांच से दूर रखने हेतु किसी की हत्या को भीड़ हत्या का जामा पहना दे।

सामाजिक-सांस्कृतिक कारण-
भीड़ हिंसा के पीछे अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक कारण भी उत्तरदायी हैं। कई बार ऐसा होता है कि लोगों द्वारा अपनी आस्था एवं विश्वास को कानूनों से ऊपर माना जाता है। ऐसी स्थिति में उनकी आस्था एवं विश्वास को तोड़ने वालों को सजा देने को एक पवित्र कार्य माना जाता है। किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह से इस भावना को और भी बल मिलता है। भारत में गो हत्या को लेकर की जा रही भीड़ हिंसा इसका एक उदाहरण है। इसके अतिरिक्त धर्म की गलत व्याख्या, सामान्य कृत्य को धार्मिक अपराध के रूप में दर्शाना आदि भी भीड़ हिंसा के प्रमुख कारण रहे हैं।
आर्थिक कारण -
मॉब लिंचिंग के लिए सबसे जरूरी है- मॉब अर्थात भीड़ा जब कोई देश पूर्ण रोजगार की स्थिति में होता है, तो प्रत्येक व्यक्ति अपने दायित्वों के निर्वहन में व्यस्त रहता है और भीड़ के हिंसात्मक स्वरूप का निर्माण ही नहीं हो पाता है। यह सामान्य धारणा है कि जितनी अधिक बेरोजगारी होगी, उतनी ही बड़ी भीड़। इसके अतिरिक्त बेरोजगारी आर्थिक अभाव को जन्म देती है और आर्थिक अभाव अनेक तनावों को तनावों के हिंसात्मक होने की संभावना काफी अधिक होती है। बड़ी मात्रा में बेरोजगारी की स्थिति अराजक तत्वों के लिए एक आसान परिवेश का निर्माण करती है तथा वे इसे नकारात्मक भीड़ में रूपांतरित कर देते है।
अनियंत्रित सोशल मीडिया -
अनियंत्रित सोशल मीडिया ने तथ्यहीन तथा भड़काऊ सामग्रियों के तीव्र संप्रेषण को आसान बना दिया है। इससे स्थानीय एवं सामान्यसी घटना को भी संवेदनशील स्वरूप में ढालकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया जाता है। इसके दो दुष्प्रभाव होते हैं। इससे एक तो सामान्यसी घटना को बृहद दंगे की पृष्ठभूमि बना दिया जाता है और दूसरे इन तथ्यहीन सामग्रियों से किसी समुदाय/जाति/वर्ग विशेष को देश के शत्रु के रूप में रेखांकित कर दिया जाता है। इसका समग्र परिणाम देश में नागरिक सैन्यीकरण के रूप में भी होता है तथा नागरिक देश के भीतरी शत्रुओं से मातृभूमि की रक्षा करने हेतु मनोवैज्ञानिक रूप से लामबंद होने लगते हैं। परिणामस्वरूप पहले से ही शत्रु मान बैठे किसी समुदाय/वर्ग/जाति के सदस्य को उसकी सामान्य गलती के लिए भी देशद्रोह करार देकर उसको सजा दी जाने लगती है।
प्रभाव -
भीड़ द्वारा सड़कों पर दिया जा रहा न्याय न केवल स्थानीय अपितु राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की नींव खोदने का कार्य कर रहा है। यह न केवल देश की कानून व्यवस्था के समक्षा खतरा उत्पन्न करेगा, अपितु खुद न्याय प्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर देगा। यदि इसी तरह लोगों को सड़कों पर न्याय करने का अधिकार मिलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग न्याय की समानांतर व्यवस्था बनाने लगेंगे और वर्तमान न्याय व्यवस्था का औचित्य जाता रहेगा।
भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के व्यष्टि एवं समष्टि दोनों प्रभाव काफी कष्टकारी होते हैं। स्थानीय एवं तुच्छ से मुद्दे को लेकर की गई हिंसा बड़े दंगों में रूपांतरित हो जाती है। इससे कुछ लोगों के मूर्खतापूर्वक कृत्यों का दण्ड पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। जब स्थिति पारिवारिक स्तर पर देखी जाती है, तो वह और भी हृदयविदारक नजर आती है। हिंसा में मारे गए व्यक्ति के परिवार को काफी मनोवैज्ञानिक एवं आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है। कई बार तो उनके सभी आर्थिक विकल्प ही समाप्त हो जाते हैं और उनके समक्ष आजीविका का प्रश्न खड़ा हो जाता है।
देश में हो रही भीड़ हिंसा से देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह देश के व्यापार एवं देश में आने वाले निवेश को भी दुष्प्रभावित कर सकता है। भीड़ हिंसा से देश का अंतरराष्ट्रीय कद भी घटता है, क्योंकि इससे देश में कानून व्यवस्था की विफलता का संदेश जाता है।
नियंत्रण के उपाय -
भीड़ हिंसा से निपटने का सर्वोत्तम उपाय है, उसे होने से ही रोक दिया जाए। भीड़ हिंसा से निपटने हेतु तीन स्तरीय रणनीति होनी चाहिए। प्रथम स्तर पर निवारक उपायों को अपनाना चाहिए, जिनसे ऐसी घटनाओं को होने ही न दिया जाए। दूसरे स्तर पर हिंसा के तुरंत बाद इस पर आवश्यक कार्रवाई कर इसके प्रभावों को शिथिल किया जाना चाहिए। तीसरे स्तर पर दोषियों की पहचान करके उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए। भीड़ हिंसा को रोकने के लिए सबसे पहले प्रशासनिक सूचना तंत्र को मजबूत बनाना होगा, जिससे कि ऐसी घटनाओं के होने की संभावना को ही दबा दिया जाए। इसके बाद घायल व्यक्ति को तुरंत इलाज दिलाया जाना अति आवश्यक है ताकि उसे बचाया जा सके। पुलिस को अफवाहों को रोकने की प्रणाली पर भी ध्यान देना होगा तथा उन व्यक्तियों की पहचान को सुनिश्चित | करना होगा तथा उन्हें कानूनी प्रक्रिया के अधीन दण्डित करना होगा।
भीड़ हिंसा के अपराधियों की परिभाषा को व्यापक करने की आवश्यकता है। इसमें प्रत्यक्ष हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल लोगों के साथ-साथ उन लोगों को जो इसमें सहयोग करते हैं तथा उन्हें भी जो इसे प्रोत्साहित करते हैं, को भी शामिल करना होगा। पुलिस को भी भीड़ हिंसा का नाम देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेने की मनोवृत्ति से बाहर आना होगा।
भीड़ हिंसा के खिलाफ सामाजिक-सांस्कृतिक नियंत्रण भी अपनाना होगा। लोगों तक धर्म की गलत व्याख्या को पहुंचने से रोकने हेतु स्थानीय संतों एवं स्थानीय नेतृत्व को भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व करना चाहिए तथा लोगों को जागरूक करना चाहिए। भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा की स्थिति में स्थानीय प्रशासन को बिना किसी भी राजनीतिक दबाव के काम करना चाहिए तथा दोषियों को दण्डित करना चाहिए।
क्या अलग कानून ही एकमात्र समाधान है?
भीड़ द्वारा की जा रही हिंसाओं से निपटने हेतु स्पष्ट कानून के अभाव के आलोक में अनेक व्यक्तियों द्वारा एक बिल्कुल नए कानून की। वकालत की जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की तर्ज पर इसे मानव सुरक्षा कानून (मासुका) नाम दिया जा रहा है। मासुका की मांग करने वालों का तर्क है कि यह भीड़ हत्या की रोकथाम हेतु यह भारतीय न्याय शास्त्र के शून्य को भर देगा। इसके अतिरिक्त मासुका का एक सकारात्मक प्रभाव इस रूप में भी पड़ेगा कि इससे लोगों तक एक सख्त संदेश जाएगा और लोग हिंसात्मक भीड़ की सदस्यता से बचेंगे।
परंतु कानूनविदों का एक वर्ग अलग कानून को अनावश्यक मानता | है। उनका मानना है कि मौजूदा कानून ही इतने पर्याप्त हैं कि मॉब लिंचिंग पर लगाम लगा सकते हैं। अपने कथन के समर्थन में वे अनेक देशों का भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जहां कम कानूनों के बावजूद नागरिक सुरक्षा की स्थिति उन देशों से काफी बेहतर है, जहां अनेक कानून हैं।कानूनविद इस नए कानून के राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना | को भी नकारते नहीं हैं। उनके अनुसार, इस नए कानून से सत्ताधारी दल विपक्ष की जायज मांगों हेतु शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर भी प्रतिबंध लगा देगा अथवा दण्डात्मक कार्रवाई कर सकता है। इससे लोकतंत्र का दर्शन जाता रहेगा। इससे सकारात्मक भीड़ (अच्छे परिवर्तन हेतु एकत्रित) एवं नकारात्मक भीड़ का विभेद ही समाप्त हो जाएगा। इसके अतिरिक्त जब कार्रवाई मौजूदा पुलिस को ही करनी है, तो चाहे कितने भी कानून क्यों न बना दिए जाए स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही रहेगी। अतः आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति और पुलिस की दक्षता बढ़ाने की है न कि नए कानून बना कर कर्तव्यों के इतिश्री कर लेने की।

मॉब लिंचिंग पर उच्चतम न्यायालय का दिशा-निर्देश -
* 17 जुलाई2018 को भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने देश में भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा से निपटने हेतु दिशा-निर्देश दिया।

 * इसमें घटना को होने से पूर्व ही रोक देने (निवारक) संबंधी निर्देशघटना की स्थिति में सहायता देने (उपचारात्मक) संबंधी निर्देश तथा लापरवाही हेतु दण्डात्मक निर्देश दिए गए हैं।

निवारक उपाय (Preventive Measures) -
* प्रत्येक जिले में पुलिस अधीक्षक (SP) रैंक के एक अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया जाएजो पुलिस उपाधीक्षक (DSP) रैक के सहायक अधिकारी की सहायता से भीड़ हिंसा को रोकने का कार्य करे।

 * नोडल अधिकारी इंटेलिजेंस अधिकारियों तथा थाना प्रभारियों के साथ नियमित बैठक (महीने में कम-से-कम एक) करेगा तथा भीड़ हिंसा के विरुद्ध आवश्यक कदम उठाएगा।

 * सभी राज्य निर्णय के तीन सप्ताह के भीतर उन सभी जिलों/संभागों/ग्रामों की पहचान करेंगेजहां पिछले पांच वर्षों में भीड़ हिंसा की घटना घटी हो।

 * पुलिस महानिदेशक (DGP) अथवा गृह सचिव प्रत्येक तिमाही में कम-से-कम एक बार सभी नोडल अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा करेंगे।

 * पुलिस अधिकारी CrPC की धारा 129 का प्रयोग करते हुए उस भीड़ को जिसमें हिंसा की प्रवृत्ति होको तुरंत तितर-बितर करेंगे।

 * केंद्रीय गृह मंत्रालय सभी राज्यों के सहयोग से भीड़ हिंसा के कारणों की पहचान करे तथा विधि के शासन को सुनिश्चित कराए।

 * सभी संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित पेट्रोलिंग को सुनिश्चित कराया जाए।

 * केंद्र एवं राज्य सरकारें रेडियोटेलीविजन सहित समस्त संचार माध्यमों से यह प्रसारित करवाए कि मॉब लिंचिंग गंभीर अपराध है।

 * केंद्र एवं राज्य सरकारें उन समस्त संदेशोंचलचित्र एवं अन्य सामग्रियों जिनसे घृणा तथा हिंसा फैल सकती हैको फैलने से रोके।

 * ऐसे संदेशों को प्रसारित करने को भी IPC की धारा 153के तहत FIR का आधार बनाया जा सकता है।

उपचारात्मक उपाय (RemedialMeasures) -
* भीड़ हिंसा अथवा लिचिंग की कोई भी घटना प्रकाश में आने के तुरंत बाद बिना किसी देर किए पुलिस द्वारा FIR दर्ज किया जाएगा।

 * जिस थाने में FIR दर्ज किया जाएगाके थाना प्रभारी का यह दायित्व होगा कि वे जिले के नोडल अधिकारी को सूचित करेंगे तथा यह सुनिश्चित करेंगे कि पीड़ित परिवार के किसी भी सदस्य को हानि न पहुंचे।
 * नोडल अधिकारी व्यक्तिगत रूप से ऐसी घटनाओं की विवेचना की निगरानी करेंगे।
 * इस निर्णय से एक महीने के भीतर CrPCकी धारा 357A (पीड़ित मुआवजा योजना) के तहत राज्य सरकारें भीड़ हिंसा से पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे की योजना तैयार करेंगी।
 * पीड़ितों के मुआवजे का आकलन व्यापक दृष्टिकोण के साथ किया जाएगाजिसमें शारीरिक क्षति के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक क्षतिरोजगार अवसरों की क्षतिशिक्षा की क्षतिउपचार तथा कानूनी प्रक्रिया पर क्षति आदि शामिल होगा। इसे पीड़ित को अंतरिम राहत के रूप में हिंसा से तीस दिनों के भीतर प्रदान कर दिया जाए। 
* ऐसे मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से 6 माह के भीतर निपटाया जाए।
 * ऐसे केसों के गवाहों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं।
 * पीड़ित अथवा उसका परिवार ऐसे मामलों में निःशुल्क विधिक सहायता पाने का भी पात्र है।

दण्डात्मक उपाय (Punitive Measures) -
 * उच्चतम न्यायालय ने अधिकारियों के दायित्व को भी निर्धारित करने हेतु निर्देश दिया है।
 * यदि कोई पुलिस अधिकारी अथवा जिला प्रशासन का कोई अधिकारी मॉब लिंचिंग के संदर्भ में उक्त निर्देशों का पालन करने में विफल रहता हैतो उसे जान-बूझकर लापरवाही माना जाएगा तथा उसके विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी।
 * यदि कोई अधिकारी पूर्व सूचना होने के बावजूद भी भीड़ हिंसा की घटनाओं को रोकने हेतु आवश्यक कदम नहीं उठाता है। अथवा जहां पर ऐसी घटना घट चुकी हो और अधिकारी अभियुक्त के विरुद्ध त्वरित कार्रवाही नहीं करता हैके भी खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।

भीड़ हिंसा की रोकथाम हेतु गठित समिति

• भीड़ हिंसा से निपटने से संबंधित उपाय सुझाने हेतु भारत सरकार द्वारा जुलाई2018 में केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई। न्याय विभागकानूनी मामले विभागविधायी विभाग तथा सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव इस समिति के सदस्य हैं।
• समिति को चार सप्ताह में अपनी अनुशंसाएं प्रस्तुत करना है।
• इस समिति की अनुशंसाओं पर विचार गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रालयी मंत्रि समूह द्वारा किया जाएगा।
• इसमें विदेश मंत्रीसड़क परिवहन एवं राजमार्गनौवहनजल संसाधननदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रीकानून व न्याय मंत्री तथा सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री सदस्य होंगे।


संस्थागत न्याय ही समाधान है।
न्याय का मौजूदा बहुस्तरीय स्वरूप लंबे अनुभवों के बाद आया है। मौजूदा प्रणाली में दण्ड-प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ (सभी के लिए एक समान) रखा गया है तथा न्याय पाने को बहुस्तरीय। इस व्यवस्था में आरोपी को अपना पक्ष रखने का भी पूरा अवसर दिया जाता है तथा न्याय में एक स्तर पर चूक को दूसरे स्तर पर सुधार का विकल्प भी मिलता है। भले ही न्यायिक प्रक्रिया में विलंब होता हो, परंतु इससे किसी को भी यह अधिकार नहीं मिल जाता है कि वह समानांतर प्रणाली बनाकर न्याय करने लगे। चाहे वह कोई संगठन हो या व्यक्तियों का असंगठित समूह। बहुमत को भी न्याय का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। भारत में भीड़ द्वारा की जा | रही हिंसात्मक घटनाओं पर तुरंत लगाम लगाने की आवश्यकता है, नहीं तो ये देश में गलत परंपराओं को जन्म दे देंगी। शासन, प्रशासन तथा न्यायालय स्तर से सख्त संदेश दिया जाना चाहिए कि किसी का भी अपराध कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बण्ड देने का अधिकार केवल और केवल न्यायालय को है। यदि भीड़ न्याय पर नियंत्रण नहीं लगाया जाता है, तो यह धीरे-धीरे भारत को एक संयुक्त एवं सौहार्दपूर्ण भारत से परस्पर विवेषों से भरे सामुदायिक समूहों वाले भारत में रूपांतरित कर देगा। इस संदर्भ में कवि कैलाश असोनिया' की चेतावनी काफी प्रासंगिक प्रतीत होती है।
न्याय के मंदिर से, क्या उठ रहा भरोसा है ;
इस मंदिर का पुजारी, क्यों हुआ अब झूठा है ;
यदि यही होता रहा तो, मानवता कहाँ बच पायेगी ;
एक उन्नत भीड़ ही, न्याय का उपहास उड़ाएगी