वायुराशि तथा वाताग्र (Air Mass and Fronts) |

वायुराशि तथा वाताग्र (Air Mass and Fronts) -

वायुमंडलीय हवा की विशाल राशि या पुंज जिसके भौतिक गुण, खासकर तापमान और आर्द्रता, क्षैतिज दिशा में लगभग एक समान होते हैं, वायु राशि कहलाती हैं। सामान्यत: वायुराशि सैकड़ों किमी. तक विस्तृत होती है। वह प्रदेश जहाँ समान गुण धारण करने वाली वायुराशियों का जनन होता है, वायुराशि का उदगम क्षेत्र कहलाती है। सामान्यत: उपोष्ण उच्च वायु दाब क्षेत्र व प्रति चक्रवात के क्षेत्र वायुराशियों के उद्गम स्रोत होते हैं।
वायुराशि के क्षेत्र में वायुदाब एवं समदाब रेखाएँ समदूरस्थ एवं समानांतर होती हैं। मौसम विज्ञान में इसे बैरोट्रॉपिक एयर केडीशन (Barotropic Air Condition) कहा जाता है।



वायुराशि के क्षेत्रों को निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं|

1. वायुराशि के क्षेत्र में वायु दाब सदैव उच्च होता है।
2. इन क्षेत्रों को वायु प्रवाह का स्रोत क्षेत्र भी कहा जाता है क्योंकि वायुराशि के सीमांत क्षेत्रों से वायु निम्न वायुदाब की ओर प्रवाहित होती हैं।
3. यह प्रतिचक्रवातीय विशेषताओं का क्षेत्र होता है।
4. इन क्षेत्रों में वायु सतत् रूप से केंद्र में निचे की और उतरने या बैठने की प्रवृत्ति रखती है।
5. वृहद् मध्यवर्ती क्षेत्र में तापमान एवं वायुमंडलीय नमो में समरूपता होती है।
6. वायुराशि के क्षेत्रों में अति उचाई वाले बादल पक्षाभ बदल होते है जिसकी छाया का प्रभाव लगभग नहीं के बराबर होता है |
7. वायु के बैठने की प्रवृति के क्रम में धूलकण भी सतह पर आ जाते है जिससे वायुराशियाँ को उत्पत्ति के समय द्रश्यता काफी उच्च होती है |
8. वायु में क्षैतिज गति अति मंद होती है।

वायुराशि को ठण्डी एवं उष्ण वायुराशि में वर्गीकृत किया जाता है। यदि वायुराशि को तापमान-गतिशील सतह के तापमान से कम है तो उस वायुराशि को ठंडी वायुराशि कहते हैं। उत्पत्ति क्षेत्र में वायुराशि ठंडी स्थिर व उसमें आर्द्रता की मात्रा न्यून होती है। आगे बढ़ने के क्रम में वायुराशि के गर्भ धरातल से संपर्क में आकर अस्थिर होने से वायुराशियों में संवहन तरंगे उठने लगती हैं, किन्तु आर्द्रता की कमी के कारण वर्षा नहीं होती व मौसम साफ रहता है |
उष्ण वायुराशि का तापमान प्रवाहित क्षेत्र के तापमान से अधिक होता है। इस वायुराशि को महाद्वीपीय एवं महासागरीय वायुराशि में वर्गीकृत किया जाता है। महासागरीय गर्म वायुराशि की आर्द्रता सामर्थ अधिक होती है। इस वायुराशि के आगे बढ़ने के क्रम में नीचे से ठंडी होने के कारण सापेक्षिक आर्द्रता में वृद्धि से वायु के शीघ्र संघनन से बादलों का निर्माण होता है व हल्की बारिश होती है। जब गर्म महासागरीय वायुराशि किसी पर्वतीय अवरोध के सहारे ऊपर उठती है तो उस क्षेत्र में वर्षा होती है।

किसी वायु राशि की उष्णता व शीतलता के अतिरिक्त स्थायित्व का बोध तापमान के लम्बवत् वितरण से संबंधित है। वायुराशियों में होने वाले परिवर्तन तापमान, आर्द्रता तथा स्थायित्व से संबंधित होते हैं। किसी वायुराशि के प्रभाव क्षेत्र से संबंधित मौसम वायुराशि में होने वाले भौतिक परिवर्तन पर निर्भर करता है। वायुराशियाँ उत्पत्ति क्षेत्र से जेब अन्य क्षेत्रों की ओर गतिमान होती हैं तो उन क्षेत्रों के मौसम पर स्पष्ट प्रभाव डालती है।

वायु राशियों का वर्गीकरण -
अक्षांशीय वितरण की दृष्टि से वायु राशियों को दो भागों में बाँटते हैं- प्रथम, धुवीय वायु राशि (P) तथा दूसरी, उष्ण वायु राशि (T)। पुनः स्थलाकृतिक विशेषताओं के दृष्टिकोण से या सतही विशेषताओं की दृष्टि से वायु राशियों को दो भागों में बाँटते हैं- प्रथम, महासागरीय (m) तथा दूसरी, महाद्वीपीय (c)। इसी प्रकार अन्य आधारों पर भी वायुराशियों को वर्गीकृत किया गया है।

अक्षांशीय आधार पर वर्गीकरण - (1) ध्रुवीय (P), (2) उष्ण कटिबंधीय (T)
स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर वर्गीकरण - (1) महाद्वीपीय (c), (2) महासागरीय (m)
तापीय विशेषताओं के आधार पर वर्गीकरण – (1) शीतल (k), (2) उष्ण (w)
स्थिरता की दृष्टि से वर्गीकरण - (1) स्थिर, (5),. (2). अस्थिर (u)

किन्तु मूल रूप से चार प्रकार की वायु राशियाँ ही हैं जो निम्न प्रकार से हैं |
(i) महाद्वीपीय ध्रुवीय (CP) (ii) महासागरीय ध्रुवीय (MP)
(iii) महाद्वीपीय उष्ण कटिबंधीय (CT) (iv) महासागरीय उष्ण कटिबंधीय (MT)
वायु राशियों का वर्गीकरण मौसमी परिस्थितियों के अनुसार भी किया गया है | यह वर्गीकरण उत्तरी गोलार्द्ध में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तरी गोलार्द्ध में स्थलखंड एवं महासागरीय क्षेत्रों के वितरण की विषमता के कारण एक ही क्षेत्र पर अलग-अलग मौसमी परिस्थितियाँ उपस्थित रहती हैं। अत: वायु राशियों का निर्माण एवं उसके वितरण पर इन मौसमी परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता है। इन्हीं मौसमी परिवर्तनों को आधार मानकर उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु (सूर्य की दक्षिणायन स्थिति) तथा ग्रीष्म ऋतु (सूर्य की उत्तरायण स्थिति) में अलग-अलग वायु राशियों को वर्गीकरण योजना प्रस्तुत की गई है।
उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु में छः तथा शीत ऋतु में सात प्रकार (स्रोत क्षेत्र के आधार पर) को वायु राशियाँ पायी जाती हैं। शीत ऋतु में पाई जाने वाली सात प्रकार की वायु राशियों को नीचे की तालिका के अंतर्गत देखा जा सकता है |
वायु राशियों के नाम
वितरण
1. आर्कटिक महाद्वीपीय
ग्रीनलैण्ड तथा बेफिन द्वीप (उत्तरी गोलार्द्ध में) तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अंटार्कटिका के ऊपर भी इसी प्रकार की वायु राशि गतिशील होती है।
2. आर्कटिक महासागरीय
आर्कटिक महासागर के ऊपर।
3. ध्रुवीय महाद्वीपीय
साइबेरिया का अधिकांश क्षेत्र, कनाडा एवं अलास्का के ऊपर की वायु राशि।
4. ध्रुवीय महासागरीय
उत्तरी अटलांटिक महासागर, विशेष रूप से नार्वे सागर, उत्तरी सागर, बेरिंग सागर तथा ओखेट्स सागर।
5. उष्ण महाद्वीपीय
संयुक्त राज्य अमेरिका का दक्षिणवर्ती क्षेत्र, चीन का मैदानी क्षेत्र, द. पूर्व एशिया का मैदानी क्षेत्र, सहारा एवं उप सहारा क्षेत्र अर्थात् विश्व के लगभग सभी मरुस्थलीय एवं उपोष्ण उच्च भार का क्षेत्र।
6. उष्ण महासागरीय
उत्तरी अटलांटिक तथा उत्तरी प्रशांत महासागर का उपोष्ण उच्च भार का क्षेत्र।
7. भूमध्यसागरीय
भूमध्य सागर की सतह।

ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की लंबवत् किरणों का प्रभाव जब उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ता है तब सभी वायु राशियाँ क्रमशः उत्तर की तरफ स्थानान्तरित हो जाती हैं जिसका परिणाम यह होता है कि आर्कटिक महाद्वीपीय वायु राशि गौण हो जाती है। उस प्रदेश का तापमान ध्रुवीय महाद्वीपीय वायु राशि के समान हो जाता है तथा आगे वे धुवीयमहाद्वीपीय वायु राशि के अंग हो जाते हैं। अत: कुल वायु राशियाँ मात्र छः ही रह जाती हैं।

वायु राशियों का वितरण एवं मौसमी विशेषताएं -
प्रत्येक वयुराशियों के गुण उनके स्त्रोत क्षेत्रों की दशाओ पर निर्भर करती है ज्यों ज्यों वायुराशियाँ गंतव्य की ओर गतिशील होती है उनके गुणों में क्रमिक परिवर्तन होता है | यह क्रमिक परिवर्तन तापमान एवं स्थिरता के सम्बन्ध में होता है ये परिवर्तन मौसमी विशेषताओ के नाम से जाने जाते है | क्रिचफील्ड महोदय ने इन्ही मौसमी विशेषताओं के आधार पर वायुराशियों को चार भागों में वर्गीकृत किया है |
महासागरीय ध्रुर्वीय वायु राशी का स्त्रोत क्षेत्र आर्कटिक सागर है | उप धुर्वीय निम्न भार के उत्तर अवस्थित उत्तरी अटलांटिक सागर तथा बेरिंग सागर के क्षेत्र भी इस वायु राशि के अंग होते हैं | किन्तु बेरिंग सागर में इसका प्रभाव गौण होता है |
क्योंकि तीन दिशाओं से स्थलखंड द्वारा घिरे होने के कारण महासागरीय प्रभाव संशोधित हो जाते हैं। अतः यह वायु राशि मूल रूप से उत्तरी अटलांटिक में ही मौसमी प्रभाव उत्पन्न करती है। इस वायु राशि के प्रवाहित होने से उत्तरी अटलांटिक क्षेत्रों में कड़ाके की सर्दी पड़ती है तथा तापमान में भारी गिरावट के साथ हिमपात की आशंका होती है। लेकिन जब यह वायु मध्य अक्षाशों की तरफ प्रवाहित होती है तो इसके तापमान में वृद्धि होने लगती है। जब यह वायु उप-ध्रुवीय निम्न भार के क्षेत्र में प्रवेश करती है तब इसका संपर्क उष्ण प्रदेश से आने वाली गर्म वायु प्रवाह से होता है। अत: दोनों के मध्य एक संक्रमण क्षेत्र के विकास से सीमाग्र/वाताग्र जनन होता है। इसी वाताग्र के सहारे शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है जो यूरोप के तटीय व आन्तरिक भागों को प्रभावित करता हैं।
महाद्वीपीय ध्रुवीय वायु राशि के दो प्रमुख स्रोत क्षेत्र हैं- कनाडा/अलास्का प्रदेश तथा साइबेरियाई प्रदेश। कनाडा की वायु राशि का विस्तार महान झील क्षेत्र (Great Lakes Region) तक होता है जबकि साइबेरियाई वायु राशि का विस्तार तिब्बत के पठार तक होता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से शीत ऋतु में विकसित साइबेरियाई वायु राशि का क्षेत्र विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीपीय वायु राशि क्षेत्र होता है।
कनाडा प्रदेश के वायु राशि क्षेत्र से वायु का प्रवाह दो दिशाओं में होता है। एक दक्षिण की ओर तथा दसरा उत्तर पूर्व की ओर दक्षिण की ओर चलने वाली वायु पूर्णत: महाद्वीपीय होती है। यह संपूर्ण उत्तर अमेरिकी क्षेत्रों में कड़ाके की सर्दी लाती है। यहाँ तापमान हिमांक से नीचे होता है जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकतर भाग, विशेषकर उत्तरी एवं मध्यवर्ती भाग में पाला पड़ने लगता है। यह पाला फसलों के लिए काफी घातक होता है। उत्तर पूर्व की तरफ प्रवाहित होने वाली वायु की दिशा स्थल खंड से समुद्र की ओर होती है। अत: इसके तापमान में तुलनात्मक दृष्टि से वृद्धि होती है। समुद्री क्षेत्रों में यह वायुराशि आर्द्रता भी ग्रहण करती है। जिससे वायु के संतृप्त होने से यहाँ वर्षण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यदि तापमान हिमांक के नीचे हो तो हिमवर्षा तथा तापमान हिमांक से ऊपर होने पर जल वर्षा होती है।
साइबेरियाई वायु राशि से वायु का प्रवाह मुख्यत: तीन दिशाओं में होता है। प्रथमत: यह बेरिंग सागर की तरफ जाती है, जो बेरिंग सागर की गर्म वायु को अलास्का तथा कनाडा की ओर ढकेलती है। इसकी दूसरी दिशा दक्षिण-पूर्व की ओर है जिसका प्रभाव, कोरियाई प्रायद्वीप, जापान सागर तथा जापान के द्वीपों (मुख्यत: होंशू एवं होकैडो पर) पर पड़ता है। ये सभी वायुराशियाँ कड़ाके की सर्दी एवं शीतलहर भी लाती हैं। साइबेरियाई वायु राशि की तीसरी शाखा दक्षिण की तरफ अर्थात् चीन के मुख्य भूमि की तरफ गतिशील होती है। यह उत्तरी चीन में ठंडक का वातावरण बनाती है।
महासागरीय उष्ण वायु राशि का क्षेत्र मुख्यत: उपोष्ण उच्च दाब की महासागरीय क्षेत्र है। यह वायु राशि उत्तरी अटलांटिक और उत्तरी प्रशांत महासागर में विकसित होती है। यहाँ से उत्तर की ओर चलने वाली वायु की दिशा उत्तर पूर्व की ओर (जिसे पछुआ वायु कहते हैं) मुड़ जाती है। ये वायु प्रवाह शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का आधार होती है। इसकी दूसरी शाखा विषुवतीय निम्न की ओर सन्मार्गी वायु के नाम से जानी जाती है। विषुवतीय प्रदेश के महासागरीय क्षेत्र में यह वायु अति उष्ण अभिसरण क्षेत्र का निर्माण करती है। लेकिन ग्रीष्म ऋतु में अधिक तापीय प्रभाव के कारण तापीय विषुवत रेखा उत्तर की ओर खिसक जाती है। जब दो गर्म वायु प्रवाह का मिश्रण किसी निम्न वायुदाब केन्द्र पर होता है तो इससे उष्ण चक्रवात की उत्पत्ति होती है।
महाद्वीपीय उष्ण वायु राशि का विकास मरुस्थलीय क्षेत्रों में होता है। यहाँ से वायु विषुवत रेखा की तरफ सन्मार्गी वायु के रूप में एवं उच्च अक्षांशों की ओर पछुआ वायु के रूप में गतिशील होती है | दोनों ही वायु राशियों का प्रभाव शुष्क एवं उच्च ताप युक्त होता है | ज्यों ज्यों ये दोनों वायु प्रभाव समुद्री वातावरण में प्रविष्ट करते है तो उनकी आद्रता में वृद्धि होती है तथा उनसे वर्षा होने की सम्भावना भी बढ़ जाती है ये विषुवत रेखा के निम्न दाब क्षेत्र में अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र का निर्माण करते है जबकि उपधुर्विये निम्न दाब के क्षेत्र में इस वायु की उपस्थिति से ठण्ड एवं गर्म सीमाग्र का निर्माण होता है जो शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के उत्पत्ति का प्रमुख कारण है | पुनः यदि ये गर्म वायु 8°-20° अक्षांशो के मध्य किसी भी दुसरे गर्म वायु से मिलती है तो उष्ण चक्रवात की उत्पत्ति भी होती है |

वायुराशियों का प्रभाव
1. वाताग्रों का निर्माण  2 वायुमंडलीय विक्षोभ, चक्रवात तथा प्रति चक्रवात की उत्पत्ति
3. ऊष्मा तथा आर्द्रता का स्थानांतरण 4 क्षेत्रीय मौसमी दशाए

वाताग्र (Fronts)
जब किसी क्षेत्र में दो भिन्न भौतिक गुण वाली वायुराशियों का अभिसरण होता है तो अभिसरण के क्रम में ये वायुराशियाँ पूर्णत: मिल नहीं पाती जिससे इन वायुराशियों के मध्य एक ढलुआ-सीमा का विकास होता है जिसे वाताग्र कहते हैं। अर्थात् दो विपरीत गुणों वाली वायुराशियों से निर्मित ढलुआ सतह वाताग्र कहलाती है। प्रत्येक वाताग्र के वायु के तापमान में भारी अन्तर पाया जाता है। वाताग्र सदैव न्यूनदाब द्रोणी में ही स्थित रहते हैं। वाताग्री प्रदेशों में सदैव मेघाच्छादन पाया जाता है जिनसे अनुकूल, परिस्थतियों में वर्षा होती है। वर्षा का प्रकार वाताग्र के ढोल तथा आरोही वायु की आर्द्रता पर निर्भर करता है।
वाताग्रजनन (Frontogenesis) शब्द का प्रयोग नये वाताग्रों के निर्माण या पूर्वनिर्मित वाताग्रों के पुनर्नवीकरण की क्रिया के लिए किया जाता है। इसके विपरीत वाताग्रक्षय (Frontolysis) से तात्पर्य वाताग्रों के निर्बल हो जाने से या पूर्ण रूप से विघटित हो जाने से है। विभिन्न वायुराशियों के मध्य वाताग्रों का जनन तथा विघटन अनेक क्रियाओं के सदैव क्रियार्शील रहने के फलस्वरूप होता। है। वाताग्रजनन के लिए वायुराशियों का वाताग्र रेखा के निकट होना तथा तापमान में विषमता एक आवश्यक दशा है।

वताग्रों का वर्गीकरण  (Classification of Fronts)
वाताय़ों को चार वर्गों में विभक्त किया जाता है। इन वाताग्रों का पूर्ण रूप से विकास मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में संभव है। ये वाताग्र निम्न हैं|
1. उष्ण वाताग्र (Warm Front) 2. शीत वाताग्र (Cold Front)
3. संरोधित वाताग्न (Occluded Front) 4. स्थिरवत या स्थायी वाताग्न (Quasi-Stationary Front)
(अ) उष्ण वाताग्र     (ब) शीत वाताग्र
(स) अधिविष्ट वाताग्र   (द) स्थायी वाताग्र
उष्ण वाताग्र की स्थिति में गर्म वायुराशियां आक्रामक रूप से ठंडी वायुराशियों के ऊपर चढती है | उष्ण वताग्रों के क्षेत्र में मौसम वाताग्र के ऊपर तथा निचे की वयुराशियों में आद्रता की मात्रा तथा उनके स्थायित्व व अस्थायित्व पर निर्भर करता है | जब उष्ण वाताग्र किसी क्षेत्र से गुजरता है तो तापमान में वृद्धि के साथ वायु की दिशा में आकस्मिक परिवर्तन होता है | तथा वर्षा आरम्भ हो जाती है वाताग्र के आगे बढ़ जाने से वर्षा बंद हो जाती है आकाश में मेघाच्छादन आंशिक या पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है |
जब शीतल व भारी वायु आक्रमक रूप में उष्ण वायुराशी को ऊपर धकेलती है तब शीत वाताग्र का निर्माण होता है शीत वताग्रों के किसी क्षेत्र में गुजरने से तापमान में आकस्मिक गिरावट के साथ वायु की दिशा में परिवर्तन तथा तेज हवाएं चलती है | ऐसी स्थति में मौसम तूफानी हो जाता है | शीत वाताग्र की गति का मौसम पर प्रभाव पड़ता है | तीव्र गति से चलते वाले शीत वाताग्र की स्थति में आकाश शीघ्र मेघरहित हो जाता है | वही मंद गति वाले वताग्रों से अधिक क्षेत्र में मेघाच्छादन तथा वर्षा होती है |    
जब शीत वाताग्र तीव्र गति के कारण उष्ण वाताग्र में मिल जाता है। ऐसी स्थिति में संरोधित वाताग्र का निर्माण होता है। इस वाताग्र को शीत वाताग्र संरोध तथा उष्ण वाताग्र संरोध में वर्गीकृत किया जाता है।
जब वायुराशियों के मध्य का वाताग्र कुछ समय के लिए स्थिर रहता है ऐसी स्थिति में स्थिरवत वाताग्र का निर्माण होता है। ऐसे वाताग्रों के निर्माण की स्थिति में आकाश मेघाच्छादित रहता है तथा वर्षा होती है।
उपध्रुवीय निम्न वायु दाब पेटी में उष्ण व शीत वायुराशियों के अभिसरण से वाताग्र के निर्माण द्वारा शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है। वस्तुतः वाताग्र जनन की अवस्थाएं ही शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की अवस्थाएं हैं। अत: वाताग्र वैश्विक जलवायु एवं मौसम पर व्यापक प्रभाव डालते हैं |

वाताग्न प्रदेश
स्थायी वायुदाब पेटियों के मध्य वायु प्रवाह से तीन क्षेत्रों में पवनें अभिसरित होती हैं। इन्हीं तीन क्षेत्रों में वाताग्र का विकास होता है |
ये तीन क्षेत्र निम्न हैं

1. ध्रुवीय वाताग्र क्षेत्र  2. आर्कटिक वाताग्र क्षेत्र  3. अन्तरा उष्णकटिबन्धीय वाताग्र क्षेत्र

ध्रुवीय वाताग्र का निर्माण मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के दोनों गोलाद्ध में ध्रुवीय ठण्डी एवं उष्ण कटिबंधीय गर्म पवनों के अभिसरण से होता है। इस वाताग्र का विस्तार उत्तरी अटलान्टिक तथा उत्तरी प्रशान्त महासागर क्षेत्र में अधिक है। ये वाताग्र शीतकाल में अधिक सक्रिय तथा ग्रीष्मकाल में कम सक्रिय होते हैं।

आर्कटिक वाताग्र प्रदेश का विस्तार यूरेशिया तथा उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भागों में है। इस वाताग्र का विकास आर्कटिक क्षेत्र की महाद्वीपीय वायु तथा धुर्वीय सागरीय वायु के अभिसरण से होता है | तापमान में अधिक अंतर नही होने के कारण ये अधिक सक्रीय नहीं होते है |
उत्तर-पूर्व गर्म व्यापारिक पवन एवं दक्षिण-पूर्व गर्म व्यापारिक पवनों के अभिसरण के क्रम में आन्तरा उष्णकटिबंधीय वाताग्र का पूर्ण विकास नहीं हो पता है | इस क्षेत्र में अभिसरण से वायु ऊपर उठकर वर्षा करती है |