मरुस्थल पारिस्थितिकी तंत्र (Desert Ecosystem) |

मरुस्थल पारिस्थितिकी तंत्र (Desert Ecosystem)
मरुभूमि पारितंत्र में बहुत लंबी अवधि तक आर्द्रता की कमी रहती है। तापमान के आधार पर मरुभूमि को गर्म मरुभूमि तथा ठंडी मरुभूमि में विभाजित किया गया है। ज्यादातर मरुभूमि उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध के उष्णकटिबंधीय कर्क और मकर रेखा के पास महाद्वीपों के पश्चिमी तट पर 15° से 35° अक्षांश पर पाई जाती है। मरुस्थल पृथ्वी का लगभग 1/7वाँ भाग घेरे हुए हैं।



मरुभूमि वनस्पति को निम्न तीन वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं।

1. वार्षिक शाकीय झाड़ी (इफिमेरल)- जो कि पर्याप्त जल रहने पर ही उगती है।
2. खास गूदेदार मरुस्थलीय पौधे- जैसे-कैक्टी, जो कि जल संचित रखती
3. झाड़ियाँ तथा छोटे वृक्ष, जैसे- प्रोसोपिस और टैमेरिक्स जिनकी जड़े जल की सतह तक पहुँच जाती हैं। कुछ मरुभूमियों में लंबे गूदेदार खासकर कैक्टी पौधे ज्यादा दिखाई पड़ते हैं जो कि साधारण आवरण से ऊँचे होते हैं। 

मरुस्थलीय पौधों की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं |

  • ये अधिकतर झाड़ियाँ हैं।
  • इनमें पत्तियाँ नहीं होती हैं या फिर बहुत छोटी और नुकीली होती है।
  • पत्तियाँ तथा तने गूदेदार होते हैं जो जल को संचित रखते हैं।
  • कुछ पौधों के तनों में प्रकाशसंश्लेषण के लिये क्लोरोफिल पाया जाता है।
  • जड़तंत्र सुविकसित एवं बड़े क्षेत्र में फैला रहता है।

प्रमुख पादप प्रजातियों में नागफनी, बबूल, युफोर्बिया आदि शामिल हैं। मरुभूमि के जन्तु शारीरिक और व्यावहारिक रूप से मरुस्थलीय परिस्थितियों के अनुकूलित होते हैं।

  • ये तेज दौड़ने वाले जीव हैं।
  • रात्रिचर स्वभाव होने के कारण दिन के समय सूर्य की गर्मी से दूर रहते हैं।
  • ये गाढे (सान्द्र) मूत्र का उत्सर्जन करके जल को संरक्षित रखते हैं।
  • जन्तु और पक्षी सामान्यतः लम्बी टाँगों वाले होते हैं जिससे उनका शरीर गर्म धरातल से दूर रहता है।
  • छिपकलियाँ अधिकतर कीटभक्षी होती हैं और कई दिनों तक बिना पानी के जीवित रह सकती हैं।
  • शाकाहारी जन्तु उन बीजों से पर्याप्त जल प्राप्त कर लेते हैं जिन्हें वे खाते हैं।

भारत में मरुस्थल पारितंत्र (Desert Ecosystem in India)
राजस्थान का थार मरुस्थल, सहारा, अरब और फारस के मरुस्थलों का विस्तार है। यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान से लेकर गुजरात तक फैला हुआ है। थार मरुस्थल को भारत का महान मरुस्थल भी कहा जाता है। विशाल भारतीय मरुस्थल अरावली पहाड़ियों के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह एक ऊबड़-खाबड़ भूतल है जिस पर बहुत से अनुदैर्घ्य रेतीले टीले और बरखान पाए जाते हैं। यहाँ पर वार्षिक वर्षा 25 सेमी. से कम होती है जिसके परिणामस्वरूप यह एक शुष्क और वनस्पति रहित क्षेत्र है। यह माना जाता है कि मेसोजोइक काल में यह क्षेत्र समुद्र का हिस्सा था। इसकी पुष्टि जैसलमेर के आकल में स्थित काष्ठ जीवाश्म पार्क (Akal Wood Fossil Park) में उपलब्ध प्रमाणों से होती है।

थार के मरुस्थल में टीले अत्यधिक रेतीले हैं और इनमें रेत के कण, चिकनी मिट्टी तथा गाद सम्मिलित रूप से पाई जाती है। रेत के टीले चलायमान होते हैं इसलिये मरुस्थल में वनस्पति को सहारा नहीं दे सकते। यहाँ केवल कँटीले वन तथा शुष्क खुले घास के मैदान पाए जाते हैं। पंजाब तथा हरियाणा से होकर राजस्थान आने वाली इंदिरा गांधी नहर के कारण यहाँ कुछ वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। मरुस्थलीय क्षेत्र की मुख्य फसलें बाजरा, ज्वार, गेहूँ, जौ, मक्का हैं। यहाँ मेंहदी, खेजड़ी, इसबगोल तथा गुगुल जैसे औषधीय पादप पाए जाते हैं।

भारतीय मरुस्थल में पक्षियों और स्तनधारियों की कई संकटापन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जैसे- जंगली गधा, चमगादड, शल्कीय चींटीखोर, रेगिस्तानी लोमड़ी, भारतीय गेजल, चार सींग वाले हिरन, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, सारस तथा ब्लैक बक।

भारत में शीत मरुस्थल हिमालय की श्रेणियों में, उत्तर में लद्दाख (जम्मू-कश्मीर) से लेकर दक्षिण में किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) तक अवस्थित है। इसमें लेह, लद्दाख, कारगिल, लाहौल और स्पीति के क्षेत्र आते हैं। ये क्षेत्र हिमालय के वर्षा छाया क्षेत्र में अवस्थित हैं इस कारण यहाँ अत्यंत कम वर्षा होती है। इसके अलावा ये क्षेत्र अत्यधिक ऊंचाई (3000-5000 मीटर) पर हैं। इस कारण यहाँ पर अत्यधिक ठण्ड पड़ती है और इन्हीं दो भौगोलिक कारणों के चलते ये शीत मरुस्थल के क्षेत्र बन जाते हैं।

अत्यधिक कठोर जलवायु के कारण यहाँ पर सीमित मात्रा में ही वनस्पति पाई जाती है। ओक, पाइन, बर्च (Birch), बुरुंश (रोडोडेंड्रान) यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं।
शीत मरुस्थल के क्षेत्र में चिरु (Tibetan antelope), हिमतेंदुआ, जंगली याक, एशियाटिक आइबेक्स, भूरा भालू, कियांग, ब्लैक नैक्ड क्रेन जैसी संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं।