स्थलीय पारितंत्र (Terrestrial Ecosystem) |


वन पारिस्थितिकी तंत्र -
  • वन पारिस्थितिकी तंत्र के लिये तापमान, आर्द्रता और मृदा अनिवार्य तत्त्व हैं। जलवायु और मृदा का स्वरूप यह निर्धारित करता है कि वनस्पति का वितरण किस प्रकार है।
  • वन पारितंत्र को मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- उष्णकटिबंधीय, शीतोष्ण कटिबंधीय और शंकुधारी वन जो क्रमशः निम्न अक्षांश, मध्य अक्षांश और उच्च अक्षांश पर पाए जाते हैं, किन्तु एक ही अक्षांश पर ऊँचाई में वृद्धि के साथ भी ये सभी वन प्रतिरूप क्रमशः देखे जा सकते हैं।
उष्णकटिबंधीय वन
उष्णकटिबंधीय वनों को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन और उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन।

उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन
  • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन विषुवत् रेखा के निकट, जहाँ सालभर तापमान और आर्द्रता काफी उच्च रहती है तथा औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी. से अधिक होती है, पाए जाते हैं। यहाँ जैव विविधता सर्वाधिक होती है। सामान्यत: इन क्षेत्रों में लेटेराइट मिट्टी पाई जाती है, जो कृषि की दृष्टि से उपजाऊ नहीं होती है क्योंकि निक्षालन (Leaching) से पोषक तत्त्व मृदा के निचले संस्तर में चले जाते हैं।
  • यहाँ वृक्ष और झाड़ियों के तीन स्तर पाए जाते हैं, जो सूर्य की रोशनी को जमीन पर नहीं आने देते। सबसे ऊपरी स्तर पर लम्बे और विशाल वृक्ष (उदाहरण- महोगनी, आबनूस, रोजवुड) फिर अधिपादप (Epiphytes) और सबसे नीचे लताएँ (Lianas) होती हैं। प्रमुख जीवों में हाथी, गैंडा, जंगली सूअर, शेर आदि पाए जाते हैं।
  • इन वनों का विस्तार अमेज़न बेसिन, कांगो बेसिन, अफ्रीका का गिना तट, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा जावा व सुमात्रा आदि क्षेत्रों में है। ब्राजील में इन वनों को सेल्वास कहा जाता है।
उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन या मानसूनी वन

इस वन के पौधे सामान्यतः शुष्क ग्रीष्म ऋतु में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, ताकि वाष्पोत्सर्जन कम-से-कम हो इसी कारण इन वनों को पर्णपाती वन कहा जाता है।

यहाँ औसत वर्षा सदाबहार वनों की अपेक्षा कम होती है।

यहाँ के वृक्षों में सागवान, शीशम, साल, बाँस आदि प्रमुख हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत, ब्राजील, मध्य और दक्षिणी अमेरिका, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में इस तरह के वन पाए जाते हैं।


शीतोष्ण कटिबंधीय या मध्य अक्षांशीय वन
इन वनों को मध्य अक्षांशीय सदाबहार वन, मध्य अक्षांशीय पर्णपाती वन और भूमध्यसागरीय वनों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

मध्य अक्षांशीय सदाबहार वन
  • उपोष्ण (Subtropical) प्रदेशों में महाद्वीपों के पूर्वी तटीय भागों के वर्षा वनों को इसके अंतर्गत रखा जा सकता है।
  • चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष, जैसे- लॉरेल, मैग्नोलिया, यूकेलिप्टस आदि इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
  • दक्षिणी चीन, जापान, दक्षिणी ब्राजील, दक्षिण-पूर्व संयुक्त राज्य अमेरिका आदि क्षेत्रों में इस प्रकार के वन पाए जाते हैं।

मध्य अक्षांशीय पर्णपाती वन
  • मानसूनी वनों के विपरीत इनकी पत्तियाँ शीत ऋतु में ठण्ड से बचने के लिये झड़ जाती हैं।
  • वालनट, मैपल, ऐश, चेस्टनट, बीच आदि इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष हैं।
  • यहाँ पॉडजॉल मिट्टी पाई जाती है।
  • उत्तर-पूर्वी अमेरिका, दक्षिणी चिली जैसे शीतल जलवायु वाले प्रदेशों में इस प्रकार के वन देखे जा सकते हैं।

भूमध्यसागरीय वन
  • मध्य अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में ये वन पाए जाते हैं।
  • यहाँ ग्रीष्म ऋतु गर्म और शुष्क, जबकि शीत ऋतु ठण्डी और आर्द्र होती है। यहाँ वर्षा जाड़ों में होती है।
  • यहाँ के प्रमुख वृक्ष कार्क, जैतून, पाइन आदि हैं। यह प्रदेश रसदार फलों, जैसे- अंगूर, नींबू, नारंगी, अनार व नाशपाती आदि के लिये जाना जाता है।
  • रंग-बिरंगे पक्षियों और सुगंधित जड़ी-बूटियों की यहाँ अधिकता है।
  • इस बायोम को बांज वन या चैपरेल (Chaparral) भी कहते हैं।

शंकुधारी वन या टैगा वन
  • सामान्यत: टैगा वन के वृक्ष कोणधारी होते हैं अर्थात् इन वनों के वृक्षों की पत्तियाँ नुकीली होती हैं ताकि वाष्पोत्सर्जन तो कम हो ही साथ ही पत्तियों पर बर्फ रुक न सके।
  • शंकुधारी वनों का विस्तार सभी वन क्षेत्रों में सर्वाधिक है, जबकि जैवविविधता और उत्पादकता वन पारितंत्रों में सबसे कम है।
  • इस तरह के वन के क्षेत्रों में वर्षा अच्छी होती है और शीत ऋतु काफी लम्बी होती है।
  • आर्कटिक वृत्त (66°) के चारों ओर यूरोप, एशिया व उत्तरी अमेरिका महाद्वीपों में ये वन पाए जाते हैं। इसके अलावा, अन्य भागों में ऊँचे पर्वतों पर कोणधारी वृक्ष मिलते हैं।
  • टैगा वनों से सबसे अधिक मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है जिसका सभी बायोमों के वृक्षों से अधिक आर्थिक महत्त्व है।
  • चीड, देवदार, फर, स्प्रूस आदि इस क्षेत्र के प्रमुख मुलायम लकड़ियों वाले वृक्ष हैं, जबकि लोमड़ी, मिंक, समूर, साइबेरियन क्रेन आदि यहाँ के प्रमुख जंतु हैं।
  • यहाँ अम्लीय पॉडजॉल मिट्टी पाई जाती है जो खनिजों से रहित होती है।
वनों का महत्त्व
कार्य
लाभ
उत्पादक कार्य
विभिन्न प्रकार की लकड़ी, फलों का उत्पादन तथा रेजिन, सुगंधित तेल, लेटेक्स और औषधीय तत्त्वों का उत्पादन करना।
रक्षात्मक कार्य
विभिन्न जीवों का पर्यावास, मृदा और जल का संरक्षण, सूखे से बचाव, हवा, सर्दी, शोर, विकिरण, तीव्र गंध से बचाव।
नियामक कार्य
गैसों (मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड), खनिज तत्त्वों और विकिरण ऊर्जा को सोखना, भंडारण करना और मुक्त करना। ये सब कार्य वायुमंडल और तापमान की स्थिति में सुधार लाते हैं और भूमि के आर्थिक और पर्यावरण संबंधी मूल्य में वृद्धि करते हैं। वन प्रभावी रूप से बाढ़ और सूखे को भी नियमित करते हैं। इस तरह वे जैव भू-रासायनिक चक्र के नियामक हैं।