अयोध्या प्रकरण और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

प्रस्तावना
  • 9 नवंबर, 2019 की सुबह नई दिल्ली स्थित भारतीय सर्वोच्च न्यायालय पर दुनिया भर की निगाहें टिकी हुई थीं। पंच न्यायाधीशों की खंडपीठ भारतीय न्यायपालिका के इतिहास के ऐसे मसले पर अपना फैसला सुनाने जा रही थी, जिसकी मियाद तकरीबन डेढ़ सौ साल होने को आई थी। एक हजार से अधिक पृष्ठों में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई सहित चार अन्य न्यायाधीशों के सर्वमत से फैसला सुनाया गया। इन पृष्ठों में अयोध्या विवाद के बहाने न केवल हिंदुस्तान के भीतर हुए धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष की कहानी कही गई है, बल्कि इसमें धार्मिक सहिष्णुता के साथ सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहने की नसीहतें और तरीके भी सुझाए गए हैं। सेकुलर राष्ट्र के भीतर रहने वाले नागरिकों के लिए धार्मिक आजादी के मायने भी स्पष्ट किए गए हैं, सबसे बढ़कर अयोध्या विवाद का एक ऐसा समाधान पेश किया है। गया है, जिससे अधिक व्यावहारिक समाधान फिलहाल नहीं हो सकता था। हालांकि अब इस निर्णय को कार्यरूप में अंजाम दिये जाने और उसके बाद देश के माहौल पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा, फिलहाल अभी तक यहां से देश की राजनीति को एक नई दिशा मिली है।
  • इसलिए 9 नवंबर, 2019 का दिन इक्कीसवीं सदी के हिंदुस्तान के लिए एक अहम दिन है। इसी दिन अयोध्या विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। यह मसला सर्वोच्च न्यायालय में आने के पहले न्यायिक प्रक्रिया के कई चरणों से गुजरा। इसीलिए यहां बहसतलब केवल सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ही नहीं है, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया के विधिक आयाम को समझने के लिए कालक्रमानुसार इसके पूरे विकास को समझना होगा। इसमें पौराणिक मत, आस्था पर आधारित धारणाओं के साथ इतिहास के कंक्रीट तथ्य और विश्लेषण शामिल हैं। और इन सबके ऊपर सेकुलर राष्ट्र और धार्मिक स्वतंत्रता में यकीन रखने वाले एक संप्रभु राष्ट्र का संविधान है, जिसकी न्यायिक प्रक्रिया की ग्राम स्तर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की एक पदानुक्रम व्यवस्था है। विदित है कि इस मसले की अवधि के सामने भारतीय संविधान के लागू होने से लेकर अब तक की अवधि काफी छोटी है. लेकिन संविधान गठन का आदेश में निहित मूल्य हमारे देश के वर्तमान और भविष्य के लिए एक कसौटी की तरह हैं, आयोध्या 'सरयू जिसके आधार पर ही हम अपने इतिहास किनारे की व्याख्या को स्वीकार करते हैं। भारतीय संविधान इतिहास में निहित उन व्याख्याओं को इन्कार करता हैं जो उसकी प्रस्तावना में निहित मूल्यों के खिलाफ जाते हों। इसलिए राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को उसकी व्यापकता में समझने की जरूरत है जिससे हम सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय की सार्थकता और विधिसंगतता को समझ पाए।

फैसले में शामिल पांच न्यायाधीशों के बारे में प्रमुख तथ्य
1. न्यायमूर्ति रंजन गोगोई
  • तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने पांच सदस्यीय खंडपीठ की अध्यक्षता की थी। उन्होंने 3 अक्टूबर, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय के 46वें मुख्य न्यायाधीश का पदभार ग्रहण किया था। वे इस पद पर पहुंचने वाले पूर्वोत्तर (असम के मूल निवासी) के पहले व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने न्यायिक जीवन की शुरुआत वर्ष 2001 से गुवाहाटी उच्च न्यायालय से की। वे पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में पहले न्यायाधीश तदुपरांत मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन रहे।

2. न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे
  • पांच सदस्यीय खंडपीठ के दूसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति शरद अरविंद बोबडे रहे जिन्होंने 18 नवंबर, 2019 को देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपना पदभार ग्रहण किया। न्यायमूर्ति बोबडे ने अपने न्यायिक जीवन के बारह वर्ष (2000-12) बतौर न्यायाधीश बॉम्बे उच्च न्यायालय में बिताए। तदुपरांत वे मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए (अक्टूबर, 2012-अप्रैल, 2013 तक)| उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में 12 अप्रैल, 2013 को शपथ ली।

3. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़
  • अयोध्या विवाद से जुड़ी खंडपीठ के तीसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ रहे उन्होंने अपने न्यायिक कार्यकाल की शुरुआत वर्ष 2000 से बॉम्बे हाईकोर्ट में बतौर न्यायाधीश की। इसके पहले वे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया' भी थे। उन्होंने 31 अक्टूबर, 2013 से 12 मई, 2016 तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवा दी। 13 मई, 2016 को उन्हें सर्वोच्च न्यायालय | में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उनके पिता यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ भारत के 16वें मुख्य न्यायाधीश थे, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक इस पद को सुशोभित किया।

4. एस. अब्दुल नजीर
  • इस फैसले से जुड़ी खंडपीठ के चौथे न्यायाधीश अब्दुल नजीर रहे। वे वर्ष 2000 में कर्नाटक हाईकोर्ट में अतिरिक्त न्यायाधीश' (Additional Judge) के रूप में नियुक्त हुए, बाद में वर्ष 2004 में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए। उन्होंने 17 फरवरी, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया। वर्ष 2017 में ही तीन तलाक के मामले में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर के साथ कहा था कि न्यायालय किसी धर्म के निजी कानूनों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

5. अशोक भूषण
  • उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जन्में अशोक भूषण इस फैसले से जुड़े पांचवें न्यायाधीश थे। वे वर्ष 2001 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में| न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। बाद में वे केरल उच्च न्यायालय में न्यायाधीश और फिर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में 13 मई, 2016 को न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1979 में पूरी की थी।

अयोध्या विवाद
  • हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान विष्ण स्थल पर भगवान राम का एक प्राचीन मंदिर स्थित था, जिसे मुगल के अवतार के रूप में अयोध्या में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। जनमानस के मध्य अयोध्या निर्विवादित रूप से राम की जन्म स्थली मानी जाती रही। इस तथ्य की पहले संस्कृत साहित्य और फिर अवधी अन्य भाषाओं में लिखे गए साहित्य ने किसी न किसी रूप में पुष्टि की है। यानी राम और अयोध्या एक-दूसरे के समानांतर अर्थों में प्रयुक्त किए गए हैं। 1500 वर्ग गज के एक भू-भाग के स्वामित्व को लेकर दो धार्मिक समुदायों के मध्य विवाद रहा है। जहां हिंदू संप्रदाय के लोगों का दावा है कि यह भगवान विष्णु के अवतार, भगवान राम का जन्मस्थान है, जबकि मुस्लिम समुदाय के दावे के अनुसार, इस स्थान पर प्रथम मुगल शासक, बाबर ने 1528 ई. में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था। यह विवादित भू-भाग अयोध्या (जिला फैजाबाद) के कोट रामचंद्र गांव (या रामकोट के नाम से भी प्रसिद्ध) में स्थित है। हिंदू पक्ष के अनुसार, इस विवादित स्थल पर भगवान राम का एक प्राचीन मंदिर स्थित था, जिसे मुगल शासक बाबर ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी विजय यात्रा के दौरान ध्वस्त कर दिया था, जबकि मुस्लिम पक्ष के अनुसार, बाबर द्वारा (या  उसकी आज्ञा से) रिक्त स्थान (Vacant Land) पर ही मस्जिद का निर्माण करवाया गया था तथा इस हेतु किसी मंदिर को ध्वस्त नहीं किया गया था। मुस्लिम पक्ष जहां इस विवादित भूमि पर हिंदुओं के  इसी अयोध्या में किसी भी मालिकाना दावे को अस्वीकार करता है, वहीं हिंदू पक्ष के अनुसार, हिंदुओं के लिए इस स्थल के पौराणिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता।

उन्नीसवीं सदी में विवाद की शुरुआत
  • शुरुआत में अयोध्या विवाद का विषय सीधे बाबरी मस्जिद से जुड़ा नहीं था। इस विवाद की बुनियाद में बाबरी मस्जिद से तकरीबनएक किलोमीटर दूर हनुमानगढ़ी मंदिर है। 1855 ई. के आस-पास सहित

हिंदू पक्ष के वकील
  1. के. परासरन
  2. पी.एस. नरसिम्हा
  3. रंजीत कुमार
  4. हरिशंकर जैन
  5. सी.एस. वैद्यनाथन
  6. पी.एन. मिश्रा
  7. सुशील कुमार जैन
  8. जयदीप गुप्ता
मुस्लिम पक्ष के वकील .
  1. राजीव धवन
  2. शेखर नाफड़े
  3. मीनाक्षी अरोड़ा
  4. जफरयाब जिलानी
  5. निजामुद्दीन पाशा
के. परासरन
  • इस वाद से जुड़े सबसे वयोवृद्ध वकील के. परासरन रहे। 92 वर्षीय के. परासरन का जन्म तमिलनाडु में हुआ था। वे आपातकाल के दौरान तमिलनाडु के महाधिवक्ता (वर्ष 1976) रहे तथा वर्ष 1983 से 1989 के मध्य पहले इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी सरकार में भारत के महान्यायवादी (Attorney General of India) थे। वाजपेयी सरकार ने उन्हें संविधान के काम-काज की समीक्षा के लिए 'ड्रॉफ्टिंग एंड एडिटोरियल' समिति में शामिल किया था। उन्हें| क्रमशः वर्ष 2003 में पद्मभूषण तथा वर्ष 2011 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया। वर्ष 2012 में राष्ट्रपति ने उन्हें राज्य सभा के लिए नामित भी किया था। राज्य सभा में बतौर नामित सांसद उन्होंने 28 जून, 2018 को अपना कार्यकाल पूरा किया। वे सबरीमाला वाद में भगवान अयप्पा के वकील थे। अयोध्या वाद में वे रामलला विराजमान की ओर से अदालत में उपस्थित हुए। 20 अक्टूबर, 2019 को उन्हें उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सबसे प्रसिद्ध वरिष्ठ नागरिक (Most Eminent Senior Citizen) का पुरस्कार प्रदान किया।
  • कुछ मुसलमानों में यह बात फैली कि यह हनुमानगढ़ी मंदिर एक मस्जिद को गिराकर बनाया गया है, और मुसलमानों को उस पर फिर से अपना अधिकार करना चाहिए। उस वक्त मुसलमानों की अगुवाई सैयद गुलाम हुसैन नामक शख्स कर रहे थे, उन्होंने जेहाद के लिए मुसलमानों को सैकड़ों की संख्या में इकट्ठा किया और अयोध्या की ओर कूच किया, अयोध्या के पहले बाराबंकी के रुदौली की भेलसर क्रॉसिंग के पास हजारों की संख्या में एकत्र हुए बैरागियों और मुसलमानों के मध्य हिंसक संघर्ष हुआ, जिसमें तकरीबन सभी मुसलमानों की मृत्यु हो गईं। उस समय के नवाब ने इस घटना की जांच के लिए समिति बनाई
  • जिसमें मुस्लिम, हिंदू और ब्रिटिश प्रतिनिधियों को शामिल किया गया, समिति की विस्तृत जांच में यह पाया गया कि पिछले पच्चीस-तीस साल में किसी मस्जिद को गिराकर हनुमानगढ़ी मंदिर नहीं बनाया गया, यह घटना महज अफवाह की देन थी।
  • 1857 ई. में 'बाबरी मस्जिद' अयोध्या विवाद के केंद्र में तब आई, जब हनुमानगढ़ी के एक महंत ने बाबरी मस्जिद के प्रांगण में डेढ़ फीट के एक चबूतरे का निर्माण कर लिया, जिसे बाद में तीन फीट तक ऊंचा किया गया। इस चबूतरे के निर्माण का उस समय स्थानीय मुसलमानों ने विरोध किया। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ऐहतियातन 1861 ई. में चबूतरे और मस्जिद के बीच एक दीवार बनवा दी, क्योंकि ब्रिटिश सरकार किसी भी तरह के द्विपक्षीय विवाद से बचना चाहती थी, इसलिए उसने मूल स्थिति पर वापस न जाकर यथास्थिति' पर ही रहना उचित समझा। यहां से अयोध्या विवाद की शुरुआत मानी जा सकती है, जिस पर अब जाकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला दिया है।
  • के.एन. पणिक्कर अपनी किताब एनाटोमी ऑफ अ कॉन्फ्रेंटेशन' में लिखते हैं कि हनुमानगढ़ी की घटना के बाद यह बात प्रचलित हुई कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर पर बनाया गया है। यह कदम हनुमानगढ़ी पर मुसलमानों के दावे को नियंत्रित और उसे खत्म करने के लिए था। इस तरह बाबरी मस्जिद पर दावे को हनुमानगढ़ी के काउंटर में आगे बढ़ाते हुए मार्च-अप्रैल, 1883 ई. में महत रघुवर दास ने चबूतरे के ऊपर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू कर दिया, जिसे जिला प्रशासन ने मुसलमानों के विरोध के कारण रोक दिया। उन्होंने 29 जनवरी, 1885 को चबूतरे पर मंदिर बनाने के लिए पहला मुकदमा किया, जिसे फैजाबाद के उप-आयुक्त (डिप्टी कमिश्नर) ने रद्द कर दिया। महंत रघुवर दास ने इस फैसले के खिलाफ दो अपीलें कीं। पहली अपील में उन्होंने फैजाबाद के उप-न्यायाधीश के यहां एक दावा दायर किया, जिसमें उन्होंने खुद को चबूतरे के मालिक की तरह पेश किया और उसी स्थान पर एक मंदिर बनाने की अनुमति मांगी।
  • इस अपील पर 24 दिसंबर, 1885 को निर्णय देते हुए उप-न्यायाधीश पंडित हरिकिशन ने महंत रघुवर दास का दावा खारिज कर दिया। यद्यपि उन्होंने चबूतरे पर हिंदुओं के अधिकार एवं स्वामित्व की पुष्टि अवश्य की। फिर महंत ने दूसरी अपील फैजाबाद के जिला न्यायाधीश एफ.ई.ए. चैमियर के यहां दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए 18 मार्च, 1886 को जिला न्यायाधीश ने उप-न्यायाधीश के फैसले का समर्थन किया, लेकिन उप-न्यायाधीश के निर्णय में से उस भाग को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि चबूतरे का मालिकाना हक महंत रघुवर दास और हिंदुओं का है। इस तरह उन्नीसवीं सदी 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवाद पूरी तरह स्थापित हो जाता है, लेकिन यह अभी मस्जिद के भीतर तक नहीं पहुंचा था, अभी तक मस्जिद के मुख्य गुम्बद के नीचे राम जन्मस्थान होने की बात नहीं आई थी। अभी तक विवाद का विषय केवल राम चबूतरे पर मंदिर निर्माण ही था, जिसको लेकर महंत रघुवर दास ने न्यायिक प्रक्रिया में यकीन दिखाते हुए न्यायालय का दरवाजा खट-खटाया, लेकिन उन्हें न्यायिक मंचों से राम चबूतरे, जिसे वे जन्मस्थान में कहते थे, पर मंदिर बनाने की अनुमति नहीं मिली।

बीसवीं सदी का मध्य और अयोध्या विवाद
  • 1886 ई. से लेकर वर्ष 1934 तक अयोध्या विवाद ठंडा पड़ गया था, जैसा की विदित है कि देश उस दौर में राष्ट्रबाद के ऐसे स्वरूप में पिरोया हुआ था, जिसमें जातीय और धार्मिक मतभेद कम थे औ देश के सामूहिक हित को समझने की कोशिश अधिक इसी बीच वर्ष 1934 में अयोध्या में भीषण दंगे हुए, अयोध्या के नजदीक बकरीद। अवसर पर एक गाय की हत्या किए जाने से ये दंगे भड़क उठे थे जिसमें हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद को क्षतिग्रस्त कर दिया था। ब्रिटिश। सरकार ने अपने खर्चे से मस्जिद की मरम्मत कराई थी। इसके बाद कुछ समय तक अयोध्या का माहौल ठीक रहा, मस्जिद में नमाज और चबूतरे पर पूजा होती थी, लेकिन इस बीच वर्ष 1936 में बने उत्तर प्रदेश मुस्लिम वक्फ अधिनियम के तहत सरकार ने बाबरी मस्जिको ‘सुन्नी वक्फ संपत्ति में शामिल कर लिया, जिसके बाद वर्ष 1941 में सुन्नी समुदाय के सैयद मुहम्मद जाकी ने बाबरी मस्जिद को  वक्फ की संपत्ति बनाए जाने के खिलाफ मुकदमा कर दिया, लेकिन उनक दाबा खारिज हो गया।
  • विदित हो कि जो संपत्ति एक बार 'वक्फ (स्थाई समर्पण) घोषित कर दी जाती है. उस पर अल्लाह/भगवान (God) के अलावा कोई भी अपना दावा नहीं कर सकता। बाबरी मस्जिद के मामले में सुन्नी समुदाय के बाद मार्च, 1946 में शिया समुदाय भी न्यायालय जाता है और बाबरी मस्जिद को शिया वक्फ घोषित करने की मांग करता है। शिया समुदाय का तर्क यह था कि मस्जिद का निर्माणकर्ता मीर बाकी शिया समुदाय से था, इसलिए बाबरी मस्जिद को शिया वक्फ घोषित किया जाना चाहिए। न्यायाल ने बाबर को मस्जिद का स्थापनाकर्ता माना और बाबरी मस्जिद क "सुन्नी वक्फ संपत्ति' माना और शियाओं का दावा खारिज कर दिया। इस तरह 'अयोध्या विवाद में यहीं से शिया और सुन्नी के बीच का एक झगड़ा भी जुड़ गया, जिसका निस्तारण अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में किया, जिसका जिक्र आगे किया गया है।

अयोध्या विवाद : नए चरण में प्रवेश
  • अयोध्या में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर शिकायत मुकदमेबाजी की शुरुआत काफी पहले से ही हो चुकी थी, लेकिन 22-23 दिसंबर की मध्यरात्रि को मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्ति रखने की इस मामले को अलग स्तर पर पहुंचा दिया हुआ यह कि 22-23 दिसंबर की रात में मस्जिद का ताला तोड़कर मस्जिद के केंद्रीय गुंबद के नीचे राम लला की मूर्तियां रख दी गई। इस घटना के बाद 23 दिसंबर (उस दिन जुम्मे की नमाज होनी थी) को अयोध्या थाना, फैजाबाद के सीनियर सब-इंस्पेक्टर पंडित श्री राम देव दुबे ने अयोध्या के अभय राम दास, राम शुक्ला दास और सुदर्शन दास और पचास साठ अन्य बेनाम लोगों के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की।
  • इसके बाद 29 दिसंबर, 1949 को अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट मार्कडेय सिंह ने बाबरी मस्जिद को अपने हक में लेते हुए फैजाबाद म्युनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन प्रिय दत्त राम को रिसीवर नियुक्त कर दिया, जिन्होंने 5 जनवरी, 1950 को बाबरी मस्जिद का चार्ज ले लिया। मजिस्ट्रेट के आदेश के तहत, मूर्तियों के रखे जाने के स्थान में केवल दो या तीन पुजारियों को ही भोग एवं पूजा आदि के लिए प्रवेश की अनुमति थी, जबकि आमजन के लिए अंदर प्रवेश प्रतिबंधित था| आम-जन को केवल ग्रिल या ईट की दीवार के बाहर से ही दर्शन की अनुमति थी।

राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद विध्वंस
  • वर्ष 1983 से विश्व हिंदू परिषद (विहिप- स्थापना 29 अगस्त, 1964) ने राम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया। विहिप ने इस बाबत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ज्ञापन दिया और 'श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया। इस क्रम में विहिप ने 7 अक्टूबर, 1984 को अयोध्या में सरयू के किनारे लोगों के इकट्ठा होने का आह्वान किया, अगले ही दिन अयोध्या से लखनऊ तक की यात्रा शुरू की गई 14 अक्टूबर, 1984 को विहिप ने लखनऊ के हजरत महल पार्क में एक प्रस्ताव पारित किया कि देशभर में जितनी भी मस्जिदें हैं, जिन पर आरोप हैं. वे सभी हिंदुओं को स्थानांतरित कर दी जाएं।
  • 15 अक्टूबर, 1984 को श्री राम जानकी रथ यात्रा शुरू की गई जो 31 अक्टूबर, 1984 को दिल्ली पहुंची। इत्तेफाक से उसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो जाने के कारण विश्व हिंदू परिषद ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया। 30 जून, 1985 को श्री राम जन्मभूमि यज्ञ समिति ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि 6 मार्च, 1986 तक मस्जिद के ताले नहीं खोले गए तो उनका 'ताला खोलो आंदोलन' ताला तोड़ो आंदोलन में तब्दील हो जाएगा। इसी क्रम में 1 फरवरी, 1986 को अयोध्या के जिला जज के.एम. पाण्डेय के आदेश पर मस्जिद पर लगे ताले को खोल दिए गए और हिंदुओं को वहां पूजा करने की इजाजत दी गई। 27 जनवरी, 1989 को विहिप ने इलाहाबाद में कुंभ मेले के दौरान तीन दिवसीय सम्मलेन में 'राम जन्मभूमि मुक्ति संकल्प पारित किया। उसमें संकल्प लिया गया कि बाबरी मस्जिद पर अदालत या किसी

प्रस्तावित राम मंदिर की रूपरेखा
  • प्रस्तावित राम मंदिर के शिल्पकार चंद्रकांत सोमपुरा हैं। वे गुजरात के पालीताणा से हैं, उनका परिवार पीढ़ियों से मंदिर निर्माण में संलग्न है। सोमपुरा ने स्वयं अब तक हिंदू, जैन और स्वामी नारायण संप्रदाय के सौ से अधिक मंदिरों का शिल्प तैयार किया है।
  • प्रस्तावित राम मंदिर की लंबाई 240 फीट, चौड़ाई 145 फीट और ऊंचाई 141 फीट होगी। कुल पांच प्रखंडों क्रमशः अग्रभाग, सिंहद्वार, नृत्यमंडप, रंगमंडप और गर्भगृह सहित इस मंदिर में कुल 251 स्तंभ लगेंगे प्रत्येक स्तंभ पर 
  • यक्ष-यक्षिणी की 16 मूर्तियां लगेंगी तथा प्रत्येक स्तंभ की परिधि 4 फीट की होगी। यह मंदिर अष्टकोणीय आकार में बनेगा, जिसकी शैली नागर होगी, जिसे ढाई लाख घनफीट तराशे हुए पत्थरों से बनाया जाएगा। इस मंदिर में कुल दो तल होंगे। मंदिर की प्रथम पीठिका (चबूतरा) आठ फीट ऊंची होगी, जहां तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां होंगी। इस पीठिका पर दस फीट चौड़ा परिक्रमा मार्ग होगा तथा इस तल पर चार फीट, नौ इंच ऊंची एक आधार पीठिका पर मंदिर का निर्माण होना है।
  • इस प्रस्तावित राम मंदिर का मॉडल सबसे पहले वर्ष 1989 में इलाहाबाद के कुंभ में रखा गया था।
  • उल्लेखनीय है कि राम मंदिर के शिल्पी चंद्रकांत के पिता प्रभाशंकर भाई सोमपुरा गुजरात के सोमनाथ मंदिर के शिल्पकार थे।
  • अन्य निकाय के फैसले का विहिप विरोध करेगी और राम मंदिर के निर्माण के लिए शिलान्यास करेगी। इस क्रम में विहिप ने पूरे देश भर से ईंटें मंगवाई, देशभर में शिलापूजन के कार्यक्रम आयोजित किए गए। 17 अक्टूबर, 1989 को विहिप के सदस्यों ने तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह से मुलाकात की और उन्होंने शिलान्यास की अनुमति दे दी। 9 नवंबर, 1989 को शिलान्यास का कार्यक्रम संपन्न हुआ, इसमें पहली ईट बिहार के एक दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों रखवाई गई।
  • शिलान्यास की पृष्ठभूमि में देश के कुछ हिस्सों में दंगे भी हुए, इस बीच मुसलमानों ने अपनी गोलबंदी शुरू कर दी और अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और हिफाजती दस्ता' का गठन किया। इस बीच विहिप और केंद्र सरकार के मध्य एक समझौता हुआ, जिसमें विहिप ने सरकार को आश्वासन दिया कि वह उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हुए शांति और सौहार्ट बनाए रखेगी। लेकिन साल भर के अंदर ही विहिप ने जून, 1990 में हरिद्वार में अपने सम्मेलन से यह घोषणा की कि वह 30 अक्टूबर, 1990 के पहले अयोध्या में राम मंदिर निर्माण शुरू कर देगी अब यह आंदोलन विहिप का ही नहीं रह गया, इसमें भारतीय जनता पार्टी भी कूट पड़ी।
  • 25 सितंबर, 1990 से तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी रथयात्रा की शुरुआत सोमनाथ से की जो 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में पूरी होनी थी. लेकिन बिहार के समस्तीपुर जिले में उन्हें बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया गया, हालांकि इधर विहिप ने अपनी तैयारी जारी रखी थी। आडवाणी द्वारा की गई यह रथ यात्रा आजाद भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक लामबंदी थी, इससे पूरे देशभर में धार्मिक आधार पर हिंदू लामबंद हुए, कई जगह दंगे भी हुए, परिणाम यह कि 30 अक्टूबर, 1990 को अयोध्या में कारसेवा के लिए जो भीड़ इकट्ठा हुई थी, उसने मस्जिद की बाहरी दीवारों को क्षतिग्रस्त कर दिया और पुलिस के साथ हुए संघर्ष में तकरीबन एक दर्जन व्यक्तियों की मृत्यु हुई।
  • इस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, लेकिन वर्ष 1991 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को जबरदस्त फायदा मिला और कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अक्टूबर, 1991 में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद और उसके आस-पास की 2.77 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में यह कहते हुए ले लिया कि वहां पर पर्यटन संबंधी विकास कार्य कराने हैं और श्रद्धालुओं को सुविधाएं मुहैय्या करानी हैं।
  • अंततः भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने मिलकर 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कारसेवा का आयोजन किया। इसके पहले 28 नवंबर, 1992 को कल्याण सिंह सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर यह कहा था कि वह बाबरी मस्जिद की हिफाजत करेगी। लेकिन सरकार का यह दावा कामयाब नहीं हो सका, कारसेवा के लिए देशभर से इकट्ठा तकरीबन दो लाख लोगों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी। 16 दिसंबर को केंद्र सरकार ने इस घटना की जांच के लिए जस्टिस लिबहान आयोग का गठन कर दिया, जिसने 17 वर्ष बाद वर्ष 2009 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी, जिसमें 68 व्यक्तियों को विवादित ढांचा गिराए जाने का दोषी पाया।
  • नब्बे के दशक के अंत तक देश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आ गई, और देश में धार्मिक आधार पर लामबंदी तेज होने लगी, परिणामस्वरूप अयोध्या विवाद परोक्ष रूप से अपने सबसे रक्त रंजित चरण में पहुंचता है। फरवरी, 2002 में अयोध्या में कारसेवा से लौट रहे कारसेवकों की गोधरा रेलवे स्टेशन के नजदीक साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने से मृत्यु (59 कारसेवकों की) हो गई। उसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे फैल गए, जिसमें आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार एक हजार से अधिक व्यक्तियों की मृत्यु हुई।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला
  • 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने मुख्य रूप से दाखिल की गई तीन याचिकाओं पर अपना फैसला दिया। लगभग दस हजार पृष्ठों में लिखे गए इस फैसले में कुल 82 गवाहों ने अपनी गवाही दी, जिसमें 54 हिंदू पक्ष से थे, और 28 मुस्लिम पक्षा से। पहली याचिका गोपाल सिंह विशारद ने विवादित स्थल पर पूजा करने की अनुमति के लिए, दूसरी याचिका निर्मोही

तारीखों के आइने में अयोध्या विवाद
  1. 1528 - मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने मस्जिद बनवाई।
  2. 1859 - ब्रिटिश सरकार ने विवादित भूमि के आंतरिक और बाह्य परिसर के बीच एक दीवार खड़ी कर दी। हिंदुओं और मुसलमानों को क्रमशः पूजा और नमाज की इजाजत दी गई।
  3. 19 जनवरी, 1885 - राम चबूतरे पर मंदिर बनाने के लिए निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास ने फैजाबाद के उप-जिला न्यायाधीश के यहां मुकदमा किया। बाद में इसकी दो अपीलें हुईं, जिसमें रघुवर दास को मंदिर बनाने की इजाजत नहीं मिली।
  4. 1934 - बकरीद के अवसर पर गोवध की अफवाह से अयोध्या में सांप्रदायिक दंगे हुए. जिसमें बाबरी मस्जिद क्षतिग्रस्त हो गई, जिसकी मरम्मत ब्रिटिश सरकार ने कराई
  5. 22-23 दिसंबर, 1949 - बाबरी मस्जिद के केंद्रीय गुम्बद के भीतर अवैध रूप से भगवान राम की मूर्तियां रख दी गईं।
  6. 29 दिसंबर, 1949 - मस्जिद में मूर्तियां रख दिए जाने के बाद जिला मजिस्ट्रेट के.के. नायर ने मूर्तियों को नहीं हटवाया। मस्जिद पर ताला जड़ अयोध्या नगरपालिका के तत्कालीन अध्यक्ष बाबू प्रियदत्त राम को मस्जिद का रिसीवर' नियुक्त कर दिया।
  7. 16 जनवरी, 1950 - गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर कर ढांचे के केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्तियों की पूजा करने की अनुमति मांगी।
  8. 17 दिसंबर, 1959 - रामानंद संप्रदाय की ओर से निर्मोही अखाड़े के छह व्यक्तियों ने मुकदमा दायर कर विवादित स्थान पर अपना दावा किया, साथ ही 'रिसीवर' प्रियदत्त राम को हटाकर स्वंम पूजा की अनुमति मांगी।
  9. 18 दिसंबर, 1961 - उत्तर प्रदेश के केंद्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मुकदमा दायर कर कहा कि विवादित ढांचा प्रार्थना की जगह मुसलमानों की है, जिसे उन्हें दे दिया जाए। मुकदमे में यह भी था कि मूर्तियां मस्जिद के अंदर से हटा दी जाएं।
  10. 8 अप्रैल, 1984 - विश्व हिंदू परिषद ने दिल्ली में सम्मेलन कर अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि स्थल की मुक्ति और मस्जिद का ताला खुलवाने के लिए आंदोलन करने का निर्णय लिया।
  11. 1 फरवरी, 1986 - फैजाबाद के जिला न्यायाधीश के.एम. पाण्डेय ने स्थानीय अधिवक्ता उमेश पाण्डेय की अर्जी पर बाबरी मस्जिद का ताला | खोलने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ बाबरी मस्जिद एक्शन समिति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में एक याचिका दाखिल की।
  12. 1 जुलाई, 1989 - इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दायर किया।
  13. 10 जुलाई, 1989 - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर इस संबंध में सभी मामले अपनी लखनऊ खंडपीठ में स्थानांतरित कर दिए।
  14. 9 नवंबर, 1989 - श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर शिलान्यास किया गया।
  15. 24 मई, 1990 - विश्व हिंदू परिषद ने हरिद्वार में विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें देवोत्थान एकादशी (30 अक्टूबर,1990) के दिन मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा की घोषणा की गई।
  16. 25 सितंबर, 1990 - भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने कारसेवा में हिस्सेदारी के लिए गुजरात के सोमनाथ से लेकर अयोध्या के लिए रथ यात्रा शुरू की। उन्हें बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।
  17. 30 अक्टूबर, 1990 - अयोध्या में कारसेवा के लिए इकट्ठे स्वयंसेवकों और सुरक्षा बलों के मध्य हिंसक संघर्ष। अशोक सिंघल घायल हुए एवं कोठारी बंधुओं सहित कई कारसेवकों की मृत्यु हो गई।
  18. 30 अक्टूबर, 1992 - दिल्ली में हुई धर्म संसद की बैठक में 6 दिसंबर, 1992 को मंदिर निर्माण के लिए दूसरी बार कारसेवा का निर्णय लिया गया।
  19. 6 दिसंबर, 1992 - अयोध्या पहुंचे तकरीबन ढाई लाख कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद के तीनों गुम्बद गिरा दिए और वहां भगवा झंडा फहरा दिया।
  20. 16 दिसंबर, 1992 - केंद्र सरकार ने लिब्रहान आयोग का गठन किया।
  21. जनवरी, 2002 - तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में एक अयोध्या विभाग खुलवाया।
  22. जनवरी-फरवरी, 2002 - शिलादान और श्रीराम महायज्ञ की घोषणा की गई।
  23. अप्रैल, 2002 - इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विवादित स्थल का मालिकाना हक तय करने के लिए सुनवाई शुरू की।
  24. 5 अप्रैल, 2003 - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया।
  25. 22 अगस्त, 2003 - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने उच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
  26. 30 जून, 2009 - जस्टिस लिबहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। उल्लेखनीय है कि इस आयोग को 16 मार्च, 1993 को अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन कुल 48 बार इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया।
  27. 30 सितंबर, 2010 - इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने विवादित स्थल को श्रीरामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा एवं सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया।
  28. 9 मई, 2011 - इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सभी पक्षकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी।
  29. 8 मार्च, 2019 - सर्वोच्च न्यायालय ने सुलह-समझौते से इस विवाद का हल निकालने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल गठित किया। इसमें अन्य दो सदस्य आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर एवं वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू थे। यह पैनल भी इस विवाद को कोई तर्कपूर्ण समाधान नहीं दे सका।
  30. 6 अगस्त, 2019 - सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिदिन के हिसाब से मामले की सुनवाई शुरू की।
  31. 16 अक्टूबर, 2019 - लगातार 41 दिन की सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा लिया।
  32. 9 नवंबर, 2019 - अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या विवाद का एक तर्कपूर्ण समाधान प्रस्तुत करते हुए अपना फैसला सुनाया।
  • अखाड़ा ने विवादित स्थल पर दावे और खुद को स्थल का संरक्षक घोषित किए जाने के लिए और तीसरी याचिका सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दाखिल की थी। इस पर दो-एक के बहुमत से फैसला देते हुए न्यायमूर्ति एस. यू. खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने हिंदू एवं मुस्लिम पक्षों को विवादित परिसरों का संयुक्त धारक (JointHolders) घोषित किया और विवादित स्थल का तीन हिस्सों में बंटवारा कर दिया। रामलला मूर्ति का स्थल उस बादी को दिया गया जो 'रामलला विराजमान' का प्रतिनिधित्व कर रहा था, निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरे और सीता रसोई का स्थान देने का आदेश दिया गया और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बाकी बची हुई जमीन पर अधिकार दिया गया। इस तरह मूल परिसर की 2.77 एकड़ जमीन कुल तीन हिस्सों में बंटी।
  • इस फैसले में न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने दो अन्य न्यायाधीशों से इतर अपना मत रखा था, उन्होंने कहा था कि मुगल बादशाह बाबर की तरफ से बनवाई गई विवादित इमारत इस्लामी कानून के खिलाफ और इस्लामी सिद्धांतों के विपरीत थी, इसलिए इसे मस्जिद नहीं माना जा सकता न्यायालय ने तीन महीने तक यथास्थिति बनाए रखने का भी आदेश दिया हालांकि बाद में सभी पक्षों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला
  • सर्वोच्च न्यायालय में लगातार 41 दिनों तक (कार्यदिवसों पर) सुनवाई के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय पीठ ने सर्वमत से इस मसले पर अपना फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश के अलावा पीठ के सदस्यों में न्यायमूर्ति (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश) एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर शामिल थे। सबसे पहले इस पांच सदस्यीय पीठ ने इस संबंध में पहले दिए गए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को गलत ठहराते हुए विवादित स्थल को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटने को तर्कसंगत नहीं माना, सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि समाज में शांति और सौहार्द बने रहने के लिहाज से भी वह फैसला व्यावहारिक नहीं है, उस फैसले के अनुप्रयोग में कई स्तर पर चुनौतियां आ सकती थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित जमीन के तीन हिस्सों में विभाजन से किसी भी पक्ष का हित न सधने की बात कही, माननीय न्यायालय ने निर्मोही अखाड़े का मुकदमा समयबाधित घोषित कर निरस्त कर दिया, जबकि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का मुकदमा समय भीतर दाखिल मानते हुए उस पर फैसला सुनाया।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में विवादित स्थल का मालिकाना हक रामलला विराजमान को दे दिया। आदेश में न्यायालय ने यह कहा है कि तीन महीने के भीतर केंद्र सरकार एक न्यास (ट्रस्ट) या बोर्ड का गठन करे, इस ट्रस्ट को मंदिर निर्माण से लेकर अन्य गतिविधियों को संचालित करने के अधिकार होंगे न्यायालय के आदेश में यह भी है कि जब तक संपत्ति ट्रस्ट को नहीं सौंप दी जाती तब तक संपत्ति केंद्र के रिसीवर' के पास रहेगी। इस फैसले में गोपाल सिंह विशारद को उनकी मृत्यु के 33 साल बाद विवादित स्थल पर उनके पूजा करने के अधिकार को मान्यता दी। न्यायालय ने उन्हें पूजा करने का अधिकार शांति और व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित अथॉरिटी के नियंत्रण और निर्देशन के अधीन दिया है। फैसले के सबसे अहम हिस्से में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए मुसलमानों को अयोध्या में ही किसी विशेष जगह पर पांच एकड़ की जमीन आवंटित किए जाने का आदेश दिया है, जिस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने की छूट होगी।
  • न्यायालय ने निर्मोही अखाड़ा को केंद्र सरकार द्वारा गठित किए जाने बाले ट्रस्ट में उचित प्रतिनिधित्व देने का आदेश दिया। इसके अलावा शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की याचिका भी न्यायालय ने खारिज कर दी। न्यायालय ने इसका कारण याचिका दायर करने में देरी बताया तथा देर का उचित कारण भी वादी द्वारा नहीं बताया जाना माना। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जो कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की उन पर बात किए जाने से इस फैसले का महत्व और इसमें शामिल विसंगति दोनों स्पष्ट हो सकती है। न्यायालय अपने फैसले के पैरा संख्या 652 में कहता है कि यह न्यायालय आज की तारीख में मुगल शासकों के हिंदू पूजा स्थलों के खिलाफ की गई कार्रवाइयों पर कोई विचार नहीं कर सकता, और यदि कोई व्यक्ति प्राचीन शासकों की किन्हीं कार्रवाईयों के संबंध में किसी तरह का आश्वासन या राहत चाहता है, तो कानून के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
  • हमारा इतिहास ऐसे कामों से भरा पड़ा है, जो आज नैतिक तौर पर गलत माने जाते हैं, यहां तक कि वे कार्य आज विवादपूर्ण वैचारिक बहसों को जन्म दे सकते हैं, फिर भी जब से हमने अपने संविधान को अपनाया है तब से कानून के शासन का एक स्पष्ट युग शुरू होता है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने यहां एक अहम बात कही कि इतिहास में घटी हुई किसी घटना के आधार पर हम वर्तमान नहीं तय कर सकते हैं। न्यायालय इस तथ्य से वाकिफ है कि हमारे देश में संविधान लागू होने के बाद ही कानून के शासन की स्थापना हुई, उसके पहले के राजशाही में हमारे पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी।
  • राजाओं के लिए पड़ोसी राजाओं के धार्मिक स्थलों को नष्ट करना बेहद आम बात थी। भारत के इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं, जब बौद्ध स्तूपों को तोड़कर मंदिर बनाया गया है, आज भी दक्षिण भारत में तमाम मंदिर ऐसे हैं, जो स्तूप शैली के हैं। राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारों के मंदिर तोड़े, चालुक्यों ने पल्लव के मंदिरो में लूटपाट की। राजेन्द्र चोल ने अपने शहर को सजाने के लिए चालुक्यों से दुर्गा और गणेश की मूर्ति लूटी, भैरव और भैरवी की मूर्ति कलिंग से लूटी, नंदी की मूर्ति
  • पूर्वी चालुक्यों से तो कांस्य शिवा की मूर्ति पाल शासको से छीनी थी, शैब और वैष्णव ने तो एक-दूसरे के मंदिरों पर कई बार हमले बोले, गुजरात में बौद्धों ने जैन मंदिर को ध्वस्त किया। यानी हमारे यहां यह परंपरा मुसलमानों के आने के बहुत पहले से थी कि जिस राजा को हराओ, उसके साथ ही उसके देवताओं को भी ध्वस्त करो, क्योंकि इससे अमुक राजा की पूरी संप्रभुता नष्ट हो जाती थी। मुसलमान मोहम्मद साहब के ही समय में सातवीं सदी ईस्वी में व्यापारी के रूप में मालाबार तट पर आ गए थे, मौलिक रूप से वे हमलावर नहीं थे।
  • भारत के इतिहास में मंदिरों को हिंदू और मुसलमान दोनों शासकों ने तोड़ा है, लेकिन दोनों शासकों ने कभी आम जनता को परेशान नहीं किया, न ही आम जनता ने कभी इस कारण कोई विद्रोह किया, कारण यह था कि बड़े-बड़े मंदिर राजाओं के संरक्षण में होते थे और राज्य संप्रभुता के प्रतीक के इस तरह न्यायालय के उक्त बर्णित पैराग्राफ में कही गई बात भारतीय इतिहास के तथ्यों के हवाले से न्यायोचित साबित होती है।
  • एक ओर जहां अपने निर्णय में न्यायालय ने पूरी जमीन का मालिकाना हक 'देवता' को न्यायिक व्यक्ति मानते हुए उसे रामलला विराजमान को दे दिया, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अयोध्या में ही अलग से जमीन देने की बात कही। इस तरह न्यायालय ने एक सेकुलर राष्ट्र में किसी धर्म को विशेष वरीयता न देकर सभी को मान्यता देने की कोशिश की, जिससे सहिष्णुता और सहअस्तित्व बना रहे और राष्ट्र धार्मिक विवादों के साए से निकलकर अन्य मोर्चों पर, जहां हम पिछड़ते जा रहे हैं, आगे बढ़ सके। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट) के अनुसार 15 अगस्त, 1947 को किसी भी धार्मिक स्थल की जो अवस्था थी, वह उसी पर निश्चित हो गई, अब वह अवस्था नहीं बदली जा सकती। उल्लेखनीय है कि बाबरी मस्जिद को इस अधिनियम से अलग रखा गया था।
  • इस फैसले को प्रथम द्रष्टया न स्वीकार कर पाने वाले लोग भी इसके व्यावहारिक समाधान से थोड़ी असंतुष्टिपूर्वक ही सही सहमत नजर आए, विशेषकर आम मुसलमान समुदाय। इस सहमति के कारणों की पड़ताल की जा सकती है, जो यहां पर विषयेतर होगा फिर भी इतना कहा जा सकता है कि दो धर्मों के बीच चल रही लड़ाई से दोनों समुदाय आजिज आ चुके थे, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय। दोनों समुदाय के बीच अयोध्या विवाद की आड़ में राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने वाले दल, संगठन और लोग हिंदू और मुसलमान दोनों धड़ों से रहे।
  • इन सबके बीच यदि सबसे अधिक किसी का नुकसान हुआ तो दोनों समुदाय की आम जनता का, जिसे दो वक्त की रोटी-रोजी की जुगत करनी पड़ती है। यहां उदय प्रकाश की एक कविता 'दो हाथियों की लड़ाई' की पक्तिया उदृत करना मंजूर हैं। दो हाथियों का लड़ना/ सिर्फ दो हाथियों के समुदाय से/ संबंध नही रखता/ दो हाथियों की लड़ाई में/ सबसे ज्यादा कुचली जाती हैं/ घास, जिसका/ हाशियों के समूचे कुनबे से/ कुछ भी लेना-देना नहीं होता/ जंगल से भूखी लौट आती है। गाय/ और भूखा सो जाता है। घर में बच्चा/ चार दांतो और आठ पैरों द्वारा/ सबसे ज्यादा घायल होती है। बच्चे की नींद/ सबसे अधिक असुरक्षित होता है। हमारा भविष्य/ दो हाथियों की लड़ाई में सबसे ज्यादा/ टूटते हैं पेज/ सबसे ज्यादा मरती हैं। चिड़िया/ जिनका हाथियों के पूरे कबीले से कुछ भी/ लेना-देना नहीं/ दो हाथियों की लड़ाई को/ हाथियों से ज्यादा/ सहता है जंगल/ और इस लड़ाई में| जितने घाब बनते हैं। हाथियों के उन्मत शरीरों पर/ उससे कहीं ज्यादा गहरे घाब/ बनते हैं जंगल और सनय की छाती पर/ जैसे भी हो दो हाथियों को/ लड़ने से रोकना चाहिए।
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