अर्थव्यवस्था के प्रकार (TYPES OF ECONOMY)

अर्थव्यवस्था के प्रकार (TYPES OF ECONOMY)
अर्थव्यवस्था के प्रकार (TYPES OF ECONOMY)

किसी अर्थव्यवस्था में उनके क्षेत्रकों का सकल आय में क्या योगदान है और कितने लोग उन पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं, इन बातों के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं का नामकरण भी होता है:

1. कृषक अर्थव्यवस्था (Agrarian Economy)
अगर किसी अर्थव्यवस्था के सकल उत्पादन (सकल घरेलू उत्पाद) में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत या इसके अधिक हो तो वह कृषक अर्थव्यवस्था कही जाती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत एक ऐसी ही अर्थव्यवस्था था; लेकिन आज इसकी सकल आय में हिस्सा घटकर 18 प्रतिशत के आस-पास रह गया है। इस दृष्टिकोण से भारत एक कृषक अर्थव्यवस्था नहीं लगता, लेकिन आज भी इस क्षेत्र पर भारत के लगभग 49 प्रतिशत लोग अपनी आजीविका (Livelihood) के लिए निर्भर हैं। यह एक विशेष परिस्थिति है, जहां सकल आय में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान जिस अनुपात में घटा है। आजीविका के लिए इस पर लोगों की निर्भरता उस अनुपात में नहीं घटी है-
जनसंख्या का एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की ओर स्थानांतरण नहीं हुआ है।

2. औद्योगिक अर्थव्यवस्था (Industrial Economy)
ऐसी अर्थव्यवस्था में उसकी सकल आय में द्वितीयक क्षेत्र का हिस्सा 50 प्रतिशत या इससे अधिक रहता है तथा इसी अनुपात में इस क्षेत्रक पर लोगों की निर्भरता भी रहती है। पूरा-का-पूरा यूरोप-अमेरिका इस स्थिति में रहा था, जब उन्हें औद्योगीकृत अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया था। यह स्थिति भारत में अभी तक नहीं आयी-न तो द्वितीयक क्षेत्र का योगदान इस स्तर तक बढ़ा न ही इस पर जनसंख्या की निर्भरता ही बढ़ी।

3. सेवा अर्थव्यवस्था (Service Economy)
ऐसी अर्थव्यवस्था जिसके अंतर्गत सकल आय में तृतीयक क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा होता है, उसे सेवा अर्थव्यवस्था कहते हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था को अपनाने वाले पहले पहल वह देश थे, जो पहले पहल औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अपना चुके थे। इस अर्थव्यवस्था में ज्यादातर लोगों की आजीविका तृतीयक क्षेत्र से पूरा होता है। बीते एक दशक के दौरान (2003-04 से लेकर 2012-13) सेवा क्षेत्र में ही ज्यादा वृद्धि देखने को मिली है।" इस दौरान पूरी अर्थव्यवस्था में हुई वृद्धि में 65 प्रतिशत हिस्सेदारी सेवा क्षेत्र की रही है जबकि 27 प्रतिशत उद्योग-धंधों और 8 प्रतिशत कृषि क्षेत्र का योगदान रहा है।

19वीं सदी के अंत तक, कम से कम पश्चिमी देशों में तो यह सत्यापित हो चुका था कि औद्यौगिक गतिविधियां कृषिगत गतिविधियों की तुलना में आय अर्जित करने का बेहतर और तेज तरीका है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह मान्यता पूरी दुनिया में मान्य हो गई और सभी देशों में औद्योगीकरण की होड़ शुरू हो गई। जब कई देशों ने औद्योगीकरण की कामयाबी के साथ अपना लिया तो आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र से उद्योग धंधों की तरफ आया।
इस बदलाव की प्रक्रिया को ही वृद्धि के चरण (Stages of Growth) के रूप में परिभाषित किया गया।
औद्योगीकरण के बढ़ने से, कृषिगत क्षेत्रों पर लोगों की निर्भरता कम होती गई और उद्योग-धंधों पर निर्भरता बढ़ती गई। ठीक इसी तरह का बदलाव, उद्योग-धंधों से सेवा के क्षेत्र में बदलाव करने के दौरान नजर आया। सर्विस सेक्टर पर निर्भर आबादी को औद्योगीकरण के बाद के दौर की आबादी माना गया और इसे सर्विस सोसायटीज के रुप में भी मान्यता मिली। पूरे यूरोप और अमेरिका में कुल उत्पादन का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा सेवा क्षेत्र से आ रहा था और लगभग आधी आबादी की आजीविका भी इस पर निर्भर थी। यानी किसी क्षेत्र की उसकी आय में योगदान और उस पर निर्भर जनसंख्या में साम्यता थी, लेकिन कुछ देशों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। भारत में उन देशों में शामिल था, जहां यह साम्यता नहीं थी।

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