आर्थिक विकास क्या है? (What is economic development)

आर्थिक विकास (ECONOMIC DEVELOPMENT)

अर्थव्यवस्थाओं की शुरुआत के लंबे समय के बाद अर्थशास्त्रियों ने परिमाणात्मक उत्पादन बढ़ाने और देश की अर्थव्यवस्था में आमदनी बढ़ाने पर ध्यान देना शुरू किया। अर्थशास्त्री जिन मुद्दों की सबसे ज्यादा चर्चा करते थे-वह उत्पादन का परिमाण बढ़ाना और किसी देश की आमदनी बढ़ाने का मुद्दा होता था। यह मान्यता थी कि जो अर्थव्यवस्था अपनी उत्पादन को परिमाण में बढ़ाने में कामयाब हो जाता है उसकी आदमनी अपने आप बढ़ जाती है और इससे लोगों के जीवन स्तर में गुणात्मक बदलाव आ जाता है। लेकिन उस वक्त लोगों के जीवन में गुणात्मक बदलाव की बात नहीं होती थी। यही वजह है कि 1950 के दशक तक लोग वृद्धि और विकास की अलग-अलग पहचान करने में नाकाम रहे थे हालांकि वे इनके अंतरों के बारे में जानते थे।
1960 के दशक और उसके बाद के दशक में कई देशों के अर्थशास्त्रियों की राय थी कि अपेक्षाकृत वृद्धि दर ज्यादा है लेकिन जीवनस्तर में गुणात्मक बदलाव कम हो रहा था। समय आ गया था जब आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि को अलग-अलग परिभाषित करने की जरूरत थी। अर्थशास्त्रियों के लिए, विकास का असर लोगों के जीवन की गुणवत्ता के स्तर पर दिखना चाहिए।

यह जाहिर करने के निम्न घटक हैं:
  • पोषण का स्तर;
  • स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और विस्तार, अस्पताल, दवाईयां, सुरक्षित पेय जल, टीकाकरण और साफ-सफाई;
  • लोगों में शिक्षा का स्तर, तथा;
  • दूसरे मानक, जिन पर जीवन की गुणवत्ता निर्भर करती है।

यहां एक मूल बात ध्यान में रखने की जरूरत है, जिसके मुताबिक आम लोगों को न्यूनतम सुविधाएं मिलनी (जिसमें खाना, स्वास्थ्य और शिक्षा इत्यादि) शामिल है। इसके अलावा एक न्यूनतम आमदनी की भी गारंटी होनी चाहिए। आमदनी उत्पादक गतिविधियों से होती है। इसका मतलब है कि विकास सुनिश्चित करने से पहले हमें आर्थिक
वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी।
उच्च आर्थिक विकास उच्च आर्थिक वृद्धि की मांग करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उच्च आर्थिक वृद्धि दर से उच्च आर्थिक विकास हासिल किया जा सकता है। यह ऐसी उलझन थी, जिसे पुराने समय के अर्थशास्त्री के स्पष्ट नहीं कर पा रहे थे। इस उलझन को समझने के लिए एक उदाहरण है-दो परिवारों की एक जैसी आमदनी है, लेकिन विकास के मापकों पर उनके खर्चे अलग-अलग हैं।
एक परिवार स्वास्थ्य, शिक्षा और बचत पर खर्च करता है जबकि दूसरा परिवार कोई बचत नहीं करता, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करता है। ऐसे में दूसरा परिवार निश्चित तौर पर पहले परिवार की तुलना में ज्यादा विकसित होगा। ऐसे में निश्चित तौर पर वृद्धि और विकास के अलग-अलग मामले हो सकते हैं:
  1. उच्च वृद्धि और उच्च विकास
  2. उच्च वृद्धि और कम विकास
  3. कम वृद्धि और उच्च विकास
ऊपर दिए गए संयोजन की प्रकृति विस्तार में ले जाती है, लेकिन एक चीज स्पष्ट है कि उच्च आमदनी और वृद्धि के लिए लगातार प्रयास की जरूरत है। यही बात आर्थिक विकास और उच्च आर्थिक विकास के लिए भी लागू होती है।
बिना सतत् सार्वजनिक नीतियों के दुनिया भर में कहीं भी विकास नहीं हो सकता। उसी तरह से, हम कह सकते हैं कि वृद्धि के बिना भी विकास नहीं हो सकता।

हालांकि बिना विकास के वृद्धि का पहला उदाहरण खाडी देशों में अर्थशास्त्रियों को दिखा। इन अर्थव्यवस्थाओं में आमदनी और आर्थिक वृद्धि उच्चतर स्तर पर होती है। ऐसे में अर्थशास्त्र की नई शाखा डेवलपमेंट इकॉनामिक्स (विकास अर्थशास्त्र) का जन्म हुआ। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आने के बाद नियमित तौर पर आर्थिक नीतियां तय होने लगीं और इससे कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि और विकास पर नजर रखना संभव हुआ।
हम कह सकते हैं कि किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास, मात्रात्मक और गुणात्मक प्रगति ही है। इसका मतलब यह है कि जब हम वृद्धि का इस्तेमाल करते हैं तो मात्रात्मक प्रगति की बात कर रहे हैं और जब हम विकास की बात करते हैं तब मात्रात्मक के साथ गुणात्मक प्रगति की भी बात हो रही है।
जब आर्थिक वृद्धि का इस्तेमाल विकास के लिए होता है तो वृद्धि की तेज रफ्तार का पता चलता है और इसके दायरे में बड़ी आबादी आ जाती है। उसी तरह से उच्च वृद्धि दर और कम विकास या फिर बीमारू विकास का असर यह होता है कि वृद्धि में गिरावट आ जाती है। यानी वृद्धि और विकास में एक सर्कुलर रिश्ता है। जब आर्थिक महामंदी का दौर आता है तो यह रिश्ता टूट जाता है।
जब कल्याणकारी राज्य यानी वेलफेयर स्टेट का कांसेप्ट स्थापित हुआ तब दुनिया भर की सरकारों, नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस विषय पर गया। इसके बाद अर्थशास्त्र की नई शाखा-वेलफेयर इकॉनामिक्स की शुरुआत हुई, जिसमें कल्याणकारी राज्य और उसके विकास की बातें शामिल होती हैं।

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