आर्थिक विकास क्या है? (What is economic development) | arthik vikas

आर्थिक विकास

वर्तमान आर्थिक जगत में आर्थिक विकास के विचार का महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किये गये समग्र आर्थिक चिन्तन में यह एक केन्द्र-बिन्दु बना हुआ है। आर्थिक विकास एक ऐसी सतत् प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी भी देश में उपलब्ध साधनों का अधिक से अधिक निपुणता के साथ उपयोग किया जाता है। आर्थिक विकास का अर्थ, "अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में उत्पादकता के स्तर में वृद्धि करना है।" व्यापक अर्थ में आर्थिक विकास से आशय राष्ट्रीय आय में वृद्धि करके निर्धनता को दूर करना तथा सामान्यजन के जीवन स्तर में सुधार करना है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि जिस प्रक्रिया से देश के सामान्यजन की आय में वृद्धि एवं उपभोग के स्तर में उन्नति सम्भव हो सके,वही आर्थिक विकास है। विकास से देश की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में परिवर्तन होते हैं और आर्थिक विकास को इन्हीं परिवर्तनों का परिणाम कहा जा सकता है। आज विश्व के सभी देश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना चाहते हैं और उन्हें वह सभी आधुनिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराना चाहते हैं जो सामान्यजन के जीवन के लिए आवश्यक हैं।
आर्थिक विकास एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप वास्तविक राष्ट्रीय आय (उत्पादन) अथवा प्रतिव्यक्ति वास्तविक आय अथवा जनसामान्य के आर्थिक कल्याण में दीर्घकालीन वृद्धि होती है। तार्किक दृष्टि से आर्थिक विकास के निम्न तीन रूप माने जा सकते हैं
  1. सकारात्मक (Positive)
  2. नकारात्मक (Negative)
  3. शून्य (Zero)
राष्ट्रीय आय में निरन्तर वृद्धि को सकारात्मक आर्थिक विकास' कहा जाता है जबकि राष्ट्रीय आय में निरन्तर होने वाले हास को नकारात्मक आर्थिक विकास के नाम से पुकारा जाता है। किन्तु जब राष्ट्रीय आय में न तो वृद्धि ही होती है और न हास होता है तब आर्थिक विकास 'शून्य' माना जाता है। आधुनिक अर्थशास्त्री आर्थिक विकास शब्द का प्रयोग सकारात्मक आर्थिक विकास के रूप में ही करते हैं और इसे राष्ट्रीय आय में निरन्तर वृद्धि के सन्दर्भ में ही प्रस्तुत करते हैं।

आर्थिक विकास की परिभाषाएँ

आर्थिक विकास की एक सर्वमान्य परिभाषा देना अत्यधिक कठिन कार्य है। विभिन्न विचारकों ने इस शब्द की परिभाषा भिन्न-भिन्न आधारों को दृष्टि में रखकर देने का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों ने आर्थिक विकास की परिभाषा 'कुल राष्ट्रीय वास्तविक आय' में वृद्धि के दृष्टिकोण को सम्मुख रखकर दी है तो दूसरी विचारधारा के विद्वानों ने 'प्रति व्यक्ति वास्तविक आय' में होने वाली वृद्धि को आर्थिक विकास को संज्ञा दी है। तीसरे वर्ग के विद्वानों ने आर्थिक विकास को 'आर्थिक कल्याण' के दृष्टिकोण से परिभाषित किया है।
परिभाषा सम्बन्धी उपर्युक्त दृष्टिकोणों का विस्तृत विवेचन निम्नानुसार है-

(1) कुल वास्तविक राष्ट्रीय आय में दीर्घकालीन वृद्धि के रूप में प्रस्तुत की गई आर्थिक विकास की परिभाषाएँ
मेयर और बॉल्डविन, साइमन कुजनेट्स, पॉल एल्बर्ट और यंगसन आदि विद्वानों ने आर्थिक विकास को कुल वास्तविक राष्ट्रीय आय (अर्थात् वस्तुओं और सेवाओं का राष्ट्रीय उत्पादन) में दीर्घकालीन वृद्धि के रूप में परिभाषित किया है।
इन विद्वानों की परिभाषाएँ अग्रानुसार हैं-
  • मेयर एवं बॉल्डविन के मतानुसार, “आर्थिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दीर्घकाल में किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है।
  • प्रो. यंगसन के शब्दों में, “आर्थिक प्रगति से आशय किसी समाज से सम्बन्धित आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने की शक्ति में वृद्धि करना है।
  • प्रो. कुजनेट्स के शब्दों में, “आर्थिक विकास का अर्थ देश की राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि से है।"
  • पॉल एल्वर्ट के शब्दों में, आर्थिक विकास को सर्वोत्तम रूप से इसके प्रमुख उद्देश्य-एक देश द्वारा अपनी वास्तविक आय का विस्तार करने के लिए समस्त उत्पादक साधनों का विदोहन करने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।''
उपर्युक्त सभी विद्वानों को परिभाषाओं से स्पष्ट है कि जहाँ मेयर एवं बॉल्डविन ने आर्थिक विकास में वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि करने की बात कही है वहाँ विलियमसन तथा लुईस द्वारा प्रति व्यक्ति उत्पादन अथवा आय में वृद्धि का समर्थन किया गया है।
उपर्युक्त परिभाषाओं में निम्न तीन बातें उल्लेखनीय हैं-
  1. प्रक्रिया (Process)
  2. वास्तविक राष्ट्रीय आय (Real National Income)
  3. दीर्घकालीन या निरन्तर वृद्धि (Long-term or Continuous Increase)

(1) प्रक्रिया (Process)
आर्थिक विकास एक सतत प्रक्रिया है। इसका अर्थ कुछ विशेष प्रकार की शक्तियों के कार्यशील रहने के रूप में लगाया जाता है। इन शक्तियों के एक अवधि तक सतत् कार्यशील रहने के कारण आर्थिक चर मूल्यों में सदैव परिवर्तन व विवर्तन होते रहते हैं। यद्यपि इस प्रक्रिया के फलस्वरूप किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन तो होता है किन्तु इस प्रक्रिया का सामान्य परिणाम राष्ट्रीय आय में वृद्धि होना है। राष्ट्रीय आय अथवा उत्पादन में वृद्धि के अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में होने वाले अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तनों को निम्न दो भागों में विभाजित किया जा सकता है
(अ) साधनों की पूर्ति में परिवर्तन-
  • जनसंख्या में वृद्धि
  • अतिरिक्त साधनों की खोज
  • पूँजी संचयन
  • उत्पादन की नवीनतम विधियों का प्रयोग
  • कुशलता व तकनीकी स्तर में परिवर्तन, तथा अन्य संस्थागत परिवर्तन।

(ब) साधनों की मांग में परिवर्तन-
  • जनसंख्या के आकार में परिवर्तन
  • आय स्तर व उसके वितरण के स्वरूप में परिवर्तन
  • उपभोक्ताओं के अधिमान व रुचियों में परिवर्तन, तथा
  • अन्य संस्थागत एवं संगठनात्मक परिवर्तन

(2) वास्तविक राष्ट्रीय आय (Real National Income)
आर्थिक विकास वास्तविक राष्ट्रीय आय की वृद्धि से सम्बन्धित है। वास्तविक राष्ट्रीय आय की वृद्धि से आशय देश या राष्ट्र द्वारा एक निश्चित समयावधि में उत्पादित होने वाली सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के शुद्ध मूल्य में होने वाली वृद्धि से है। मात्र मौद्रिक आय की वृद्धि से इसे सम्बन्धित करना गलत है। चूँकि आर्थिक विकास को मापने के लिए राष्ट्रीय आय को ही आधार माना जाता है, अत: किसी भी देश का आर्थिक विकास होना तभी स्वीकार किया जाएगा जब उस देश में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि होती रहे । कुल राष्ट्रीय उत्पादन में से मूल्य ह्रास अथवा मूल्य स्तर में हुए परिवर्तनों को समायोजित करने पर जो प्राप्त होता है वही विशुद्ध राष्ट्रीय उत्पादन है।

(3) दीर्घकालीन अथवा निरन्तर वृद्धि (Long-term or Continuous Increase)
आर्थिक विकास का सम्बन्ध दीर्घकाल से होता है क्योंकि अल्पकाल में आर्थिक विकास सम्भव ही नहीं है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया का मूल्यांकन मात्र एक या दो वर्षों में होने वाले विकास परिवर्तनों से नहीं आंका जा सकता वरन् 15-20 वर्षों के बीच हुए दीर्घकालीन परिवर्तनों से आंका जा सकता है।
आर्थिक विकास एक नदी के प्रवाह के समान है। जो नियमित तथा निरन्तर क्रम से चलता रहता है।
पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि "आर्थिक विकास एक अनवरत प्रक्रिया है।" अतः यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था में किन्हीं अस्थायी कारणों से कुछ सुधार हो जाता है तो इसे आर्थिक विकास नही समझा जाना चाहिए, क्योंकि आर्थिक विकास सामान्य घटकों से प्रभावित होने वाला नियमित व अनवरत विकास है।

आलोचना 
आर्थिक विकास की उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्न आधारों पर आलोचना की जाती है
  • (i) वास्तविक राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए अन्तिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन को मूल्य स्तर में हुए परिवर्तनों से समायोजित करना आवश्यक होता है किन्तु अल्पविकसित देशों में जहाँ मूल्य सम्बन्धी परिवर्तन अनिवाय हैं, यह कार्य अत्यधिक कठिन है।
  • (ii) राष्ट्रीय आय में अनवरत वृद्धि को आर्थिक विकास के रूप में स्वीकार करने वाली परिभाषाओं में जनसंख्या के आकार में होने वाले परिवर्तनों की उपेक्षा की गई है। यदि किसी देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में होने वाली वृद्धि की तुलना में वहाँ की जनसंख्या का आकार अधिक तेजी से बढ़ता है तो वास्तविक अर्थों में उसे आर्थिक विकास के स्थान पर आर्थिक अवनति माना जाएगा।
  • (iii) अल्पविकसित देशों में राष्ट्रीय आय की सही-सही गणना करना अत्यधिक कठिन कार्य है क्योंकि इसमें अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं। इन्हीं कठिनाइयों के कारण राष्ट्रीय आय में होने वाले परिवर्तनों की सही-सही जानकारी प्राप्त करना सम्भव नहीं हो पाता।

(2) प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में दीर्घकालीन वृद्धि के रूप में प्रस्तुत की गई आर्थिक विकास की परिभाषाएँ
अनेक अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास को प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में दीर्घकालीन वृद्धि के रूप में परिभाषित किया है। इन अर्थशास्त्रियों में ऑर्थर लुईस, विलियमसन, बेरन, बुकानन, एलिस, रोस्टोव, क्राउज प्रमुख हैं। इन अर्थशास्त्रियों का मत है कि आर्थिक विकास हेतु वास्तविक आय में वृद्धि की दर जनसंख्या वृद्धि की दर से ऊंची होनी चाहिए।
इन विद्वानों की परिभाषाएँ निम्नांकित हैं-
  • आर्थर लुईस के शब्दों में, "आर्थिक विकास का अर्थ प्रति व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि से है।"
  • पॉल बेरन के मतानुसार, "आर्थिक वृद्धि (अथवा विकास) को निश्चित समय के भीतर प्रति व्यक्ति भौतिक वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए।"
  • बुकानन और एलिस के शब्दों में, "विकास का अर्थ है-विनियोग द्वारा ऐसे परिवर्तन लाना तथा उन उत्पादक साधनों में वृद्धि करना जिनसे प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि फलित हो तथा इस प्रकार, अल्प-विकसित क्षेत्रों की वास्तविक आय क्षमता को विकसित किया जा सके।"
  • विलियमसन और बट्रिक के अनुसार, “आर्थिक विकास या वृद्धि से अभिप्राय उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा किसी देश या क्षेत्र के व्यक्ति उपलब्ध साधनों का प्रयोग वस्तुओं और सेवाओं के प्रति व्यक्ति उत्पादन में स्थिर वृद्धि लाने के लिए करते हैं।"
  • वाल्टर क्राउज के शब्दों में, “आर्थिक विकास का अभिप्राय अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि की उस प्रक्रिया से है जिसका केन्द्रीय उद्देश्य ऊँची और बढ़ती हुई प्रति व्यक्ति वास्तविक आय प्राप्त करना होता है।"
  • प्रो. इरमा एडेलमैन के मतानुसार, “आर्थिक विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें प्रति व्यक्ति आय वृद्धि की दर नीची या ऋणात्मक हो, ऐसी अर्थव्यवस्था में बदल जाती है जिसमें प्रति व्यक्ति आय में ऊँची दर से वृद्धि होना एक स्थायी और दीर्घकालीन विशेषता बन जाती है।"
  • जैकब वाइनर के शब्दों में, "आर्थिक विकास प्रति व्यक्ति आय के स्तरों में वृद्धि से अथवा आय के विद्यमान ऊँचे स्तरों के अनुरक्षण से सम्बन्धित है।"
  • हर्बे लिबेन्स्टीन के मतानुसार, “विकास किसी अर्थव्यवस्था की प्रति व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने की शक्ति में वृद्धि करना है, क्योंकि ऐसी वृद्धि रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाने के पूर्व आवश्यक होती है।"
  • रोस्टोव के मतानुसार, “आर्थिक विकास एक ओर पूँजी व कार्यशील शक्ति में वृद्धि की दरों के बीच तथा दूसरी ओर जनसंख्या वृद्धि की दर के बीच ऐसा सम्बन्ध है जिससे प्रति व्यक्ति उत्पादन में वृद्धि होती है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर निम्न तीन निष्कर्ष सम्मुख आते हैं-
  • (i) आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति आय एवं प्रति व्यक्ति उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है।
  • (ii) उत्पादन वृद्धि का यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यदि इस क्रम की गति में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित हो जाती है तो इसे विकास नहीं कहा जा सकेगा।
  • (iii) आर्थिक विकास की प्रक्रिया में उपलब्ध समस्त प्राकृतिक साधनों का विदोहन संभव हो जाता है।
आलोचना
आर्थिक विकास की उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्न आधारों पर आलोचना की जाती है
  • (i) अल्पविकसित देशों में जनसंख्या से सम्बन्धित आँकड़े सही-सही उपलब्ध नहीं होते, अतः प्रति व्यक्ति आय की गणना भी सही-सही ज्ञात नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में या तो प्रति व्यक्ति आय बहुत अधिक बतायी जाती है या बहुत कम बतायी जाती है।
  • (ii) अल्पविकसित देशों में उपस्थित विशाल गैर-मौद्रिक क्षेत्र तथा सामान्यजन द्वारा अपने आय-व्यय का लेखा हिसाब-किताब न रखे जाने के कारण भी राष्ट्रीय और प्रति व्यक्ति आय की गणना सही-सही नहीं हो पाती है।
  • (iii) यह भी सम्भव है कि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के बाद भी जनसामान्य के रहन-सहन के स्तर में कोई सुधार न हो अथवा प्रति व्यक्ति उपभोग का स्तर और भी निम्न स्तरीय हो जाय। ऐसा व्यक्तियों द्वारा बचत की दर में वृद्धि करने अथवा सरकार द्वारा बढ़ी हुई आय को सेना अथवा अन्य ऐसे ही उद्देश्यों पर व्यय करने से सम्भव हो सकता है।
  • (iv) यदि बढ़ी हुई आय मात्र आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न कुछ व्यक्तियों को प्राप्त होती है तो वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि के बाद भी जनसामान्य की निर्धनता में कोई कमी नहीं आयेगी। .
  • (v) प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में दीर्घकालीन वृद्धि को आर्थिक विकास स्वीकार करने वाली परिभाषाओं में समाज की संरचना, इसकी जनसंख्या का आकार और रचना, इसकी संस्थाएँ एवं संस्कृति,संसाधन प्रतिरूप, समाज के सदस्यों में उत्पादन का समान वितरण आदि प्रश्नों की उपेक्षा की गई है।

(3) आर्थिक कल्याण की दृष्टि से प्रस्तुत की गई आर्थिक विकास की परिभाषाएँ
कुछ अर्थशास्त्रियों ने 'आर्थिक कल्याण' को दृष्टिगत रखते हुए आर्थिक विकास को परिभाषित किया है। इन विद्वानों ने आर्थिक विकास को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया है जिसके द्वारा प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि के साथ-साथ आय और सन्तुष्टि की असमानतायें घटती जाती हैं। भारतीय विचारक डॉ. बी. के. आर. वी. राव के मतानुसार, “यदि राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति औसत आय में वृद्धि के बाद भी निर्धन वर्ग के परिवारों की आय में वृद्धि नहीं होती है तो इसे आर्थिक विकास की संज्ञा नहीं दी जा सकती।"
जिन प्रमुख आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक विकास को 'आर्थिक कल्याण' की दृष्टि से परिभाषित किया है उनकी परिभाषायें निम्नांकित हैं-
  • ओकुन और रिचर्डसन के शब्दों में, “आर्थिक विकास भौतिक कल्याण में एक स्थिर और अनन्त वृद्धि है, जो वस्तुओं और सेवाओं के बढ़ते हुए प्रवाह के रूप में परिलक्षित होती है।"
  • एम. एफ. जुसावाला के मतानुसार, “आर्थिक विकास एक देश की जनसंख्या में न्यूनाधिक समान रूप से वितरित आर्थिक कल्याण के उच्चतर सारों से सम्बन्धित है।"
  • डी. ब्राइट सिंह के अनुसार, आर्थिक विकास एक बहुमुखी प्रवृत्ति है। इसमें केवल मौद्रिक आय की वृद्धि ही सम्मिलित नहीं है अपितु वास्तविक आदतों, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अधिक आराम और वास्तव में उन समस्त सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में वृद्धि भी सम्मिलित है, जो एक पूर्ण एवं सुखी जीवन का निर्माण करती है।"
संयुक्त राष्ट्र संघ के एक प्रतिवेदन के अनुसार, “विकास मानव को केवल भौतिक आवश्यकताओं से ही नहीं, बल्कि उसके जीवन की सामाजिक दशाओं की उन्नति से भी सम्बन्धित होना चाहिए। अतः विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक, संस्थागत तथा आर्थिक परिवर्तन भी सम्मिलित हैं।"
उपर्युक्त विद्वानों का मत है कि आर्थिक विकास में आय की वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक कल्याण का उद्देश्य भी निहित रहना चाहिए जिसके लिए आवश्यक है कि समाज में जहाँ एक ओर मात्रात्मक विकास बढ़े, वहीं दूसरी ओर वितरण में समानता भी बनी रहे । वितरण की असमानता से आर्थिक विकास नकारात्मक दर से प्रभावित होता है।

आलोचनाएँ
उपर्युक्त परिभाषाओं को निम्न आधारों पर आलोचनाएँ की जाती हैं
  • राष्ट्रीय आय अथवा प्रति व्यक्ति औसत आय में वृद्धि के बाद भी आय के असमान वितरण के कारण आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति अधिक सम्पन्न तथा निर्धन व्यक्ति और अधिक निर्धन हो जाये यह भी सम्भव है। अतः जब तक राष्ट्रीय आय की वृद्धि के वितरण की न्यायपूर्ण व्यवस्था न की जाये तब तक राष्ट्रीय आय में वृद्धि मात्र से आर्थिक कल्याण सम्भव नहीं हो सकता।
  • आर्थिक कल्याण की माप करते समय कुल उत्पादन की मात्रा और उसके भौतिक मूल्यांकन पर विचार करने की आवश्यकता होती है। उल्लेखनीय है कि कुल उत्पादन की रचना प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में वृद्धि करती है। यह भी सम्भव है कि पूंजीगत वस्तुओं में वृद्धि के कारण कुल उत्पादन के आकार में वृद्धि हुई हो अथवा पूँजीगत वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि उपभोक्ता पदार्थों की कीमत पर हुई हो क्योंकि उत्पादन का मूल्यांकन सामान्यतः बाजार मूल्य पर किया जाता है।
  • कल्याण के दृष्टिकोण से यह विचार करना आवश्यक नहीं है कि 'क्या उत्पादित किया गया है' वरन् इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि 'कैसे उत्पादित किया गया है' क्योंकि यह सम्भव है कि राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ वास्तविक लागतों और सामाजिक लागतों में भी वृद्धि हो गई हो। उदाहरणार्थ, बढ़ा हुआ उत्पादन श्रमिकों द्वारा लम्बे समय तक कार्य करने अथवा उनकी कार्य दशाओं में हास का परिणाम हो।
  • मेयर और बॉल्डविन के मतानुसार, “विकास की अनुकूलतम दर का वर्णन करते समय आय के वितरण, उत्पादन की रचना, आस्वादों, वास्तविक लागतों तथा अन्य विशिष्ट परिवर्तनों के विषय में भी निर्णय करने होंगे क्योंकि यह सभी वास्तविक आय में वृद्धि से सम्बद्ध हैं।
उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन एवं विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सैद्धान्तिक दृष्टि से 'आर्थिक कल्याण' को आर्थिक विकास का सूचक स्वीकार करने के पक्ष में अनेक ठोस तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं, तथापि मूल्य निर्णयों से बचने तथा विश्लेषण में सरलता लाने की दृष्टि से अधिकांश अर्थशास्त्री प्रति व्यक्ति वास्तविक राष्ट्रीय आय को ही विकास का सूचक स्वीकार करते हैं।
चूँकि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य जन सामान्य के जीवन स्तर को ऊँचा उठाना है अतः यह कहा जा सकता है कि “आर्थिक विकास वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक अर्थव्यवस्था की प्रति व्यक्ति शुद्ध आय दीर्घकाल में बढ़ती है।" संक्षेप में यह भी कहा जा सकता है कि "मानव का सर्वागीण विकास ही आर्थिक विकास है।"

अर्थव्यवस्थाओं की शुरुआत के लंबे समय के बाद अर्थशास्त्रियों ने परिमाणात्मक उत्पादन बढ़ाने और देश की अर्थव्यवस्था में आमदनी बढ़ाने पर ध्यान देना शुरू किया। अर्थशास्त्री जिन मुद्दों की सबसे ज्यादा चर्चा करते थे-वह उत्पादन का परिमाण बढ़ाना और किसी देश की आमदनी बढ़ाने का मुद्दा होता था। यह मान्यता थी कि जो अर्थव्यवस्था अपनी उत्पादन को परिमाण में बढ़ाने में कामयाब हो जाता है उसकी आदमनी अपने आप बढ़ जाती है और इससे लोगों के जीवन स्तर में गुणात्मक बदलाव आ जाता है। लेकिन उस वक्त लोगों के जीवन में गुणात्मक बदलाव की बात नहीं होती थी। यही वजह है कि 1950 के दशक तक लोग वृद्धि और विकास की अलग-अलग पहचान करने में नाकाम रहे थे हालांकि वे इनके अंतरों के बारे में जानते थे।
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1960 के दशक और उसके बाद के दशक में कई देशों के अर्थशास्त्रियों की राय थी कि अपेक्षाकृत वृद्धि दर ज्यादा है लेकिन जीवनस्तर में गुणात्मक बदलाव कम हो रहा था। समय आ गया था जब आर्थिक विकास और आर्थिक वृद्धि को अलग-अलग परिभाषित करने की जरूरत थी। अर्थशास्त्रियों के लिए, विकास का असर लोगों के जीवन की गुणवत्ता के स्तर पर दिखना चाहिए।

यह जाहिर करने के निम्न घटक हैं:
  • पोषण का स्तर;
  • स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच और विस्तार, अस्पताल, दवाईयां, सुरक्षित पेय जल, टीकाकरण और साफ-सफाई;
  • लोगों में शिक्षा का स्तर, तथा;
  • दूसरे मानक, जिन पर जीवन की गुणवत्ता निर्भर करती है।
यहां एक मूल बात ध्यान में रखने की जरूरत है, जिसके मुताबिक आम लोगों को न्यूनतम सुविधाएं मिलनी (जिसमें खाना, स्वास्थ्य और शिक्षा इत्यादि) शामिल है। इसके अलावा एक न्यूनतम आमदनी की भी गारंटी होनी चाहिए। आमदनी उत्पादक गतिविधियों से होती है। इसका मतलब है कि विकास सुनिश्चित करने से पहले हमें आर्थिक
वृद्धि सुनिश्चित करनी होगी।
उच्च आर्थिक विकास उच्च आर्थिक वृद्धि की मांग करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उच्च आर्थिक वृद्धि दर से उच्च आर्थिक विकास हासिल किया जा सकता है। यह ऐसी उलझन थी, जिसे पुराने समय के अर्थशास्त्री के स्पष्ट नहीं कर पा रहे थे। इस उलझन को समझने के लिए एक उदाहरण है-दो परिवारों की एक जैसी आमदनी है, लेकिन विकास के मापकों पर उनके खर्चे अलग-अलग हैं।
एक परिवार स्वास्थ्य, शिक्षा और बचत पर खर्च करता है जबकि दूसरा परिवार कोई बचत नहीं करता, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करता है। ऐसे में दूसरा परिवार निश्चित तौर पर पहले परिवार की तुलना में ज्यादा विकसित होगा। ऐसे में निश्चित तौर पर वृद्धि और विकास के अलग-अलग मामले हो सकते हैं:
  • उच्च वृद्धि और उच्च विकास
  • उच्च वृद्धि और कम विकास
  • कम वृद्धि और उच्च विकास
ऊपर दिए गए संयोजन की प्रकृति विस्तार में ले जाती है, लेकिन एक चीज स्पष्ट है कि उच्च आमदनी और वृद्धि के लिए लगातार प्रयास की जरूरत है। यही बात आर्थिक विकास और उच्च आर्थिक विकास के लिए भी लागू होती है।
बिना सतत् सार्वजनिक नीतियों के दुनिया भर में कहीं भी विकास नहीं हो सकता। उसी तरह से, हम कह सकते हैं कि वृद्धि के बिना भी विकास नहीं हो सकता।
हालांकि बिना विकास के वृद्धि का पहला उदाहरण खाडी देशों में अर्थशास्त्रियों को दिखा। इन अर्थव्यवस्थाओं में आमदनी और आर्थिक वृद्धि उच्चतर स्तर पर होती है। ऐसे में अर्थशास्त्र की नई शाखा डेवलपमेंट इकॉनामिक्स (विकास अर्थशास्त्र) का जन्म हुआ। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आने के बाद नियमित तौर पर आर्थिक नीतियां तय होने लगीं और इससे कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि और विकास पर नजर रखना संभव हुआ।
हम कह सकते हैं कि किसी अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास, मात्रात्मक और गुणात्मक प्रगति ही है। इसका मतलब यह है कि जब हम वृद्धि का इस्तेमाल करते हैं तो मात्रात्मक प्रगति की बात कर रहे हैं और जब हम विकास की बात करते हैं तब मात्रात्मक के साथ गुणात्मक प्रगति की भी बात हो रही है।
जब आर्थिक वृद्धि का इस्तेमाल विकास के लिए होता है तो वृद्धि की तेज रफ्तार का पता चलता है और इसके दायरे में बड़ी आबादी आ जाती है। उसी तरह से उच्च वृद्धि दर और कम विकास या फिर बीमारू विकास का असर यह होता है कि वृद्धि में गिरावट आ जाती है। यानी वृद्धि और विकास में एक सर्कुलर रिश्ता है। जब आर्थिक महामंदी का दौर आता है तो यह रिश्ता टूट जाता है।
जब कल्याणकारी राज्य यानी वेलफेयर स्टेट का कांसेप्ट स्थापित हुआ तब दुनिया भर की सरकारों, नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस विषय पर गया। इसके बाद अर्थशास्त्र की नई शाखा-वेलफेयर इकॉनामिक्स की शुरुआत हुई, जिसमें कल्याणकारी राज्य और उसके विकास की बातें शामिल होती हैं।

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