अलंकार - अलंकार की परिभाषा | भेद | उदाहरण | alankar hindi

अलंकार - अलंकार की परिभाषा | भेद | उदाहरण | alankar hindi

alankar

अलंकार (Figure of speech) की परिभाषा

काव्य की शोभा में वृद्धि करने वाले साधनों को अलंकार कहते हैं। अलंकार से काव्य में रोचकता, चमत्कार और सुन्दरता उत्पन्न होती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अलंकार.को काव्य की आत्मा ठहराया है।
अलंकार–काव्य की शोभा बढ़ानेवाले तत्त्वों को ‘अलंकार’ कहते हैं।

अलंकार के भेद–प्रधान रूप से अलंकार के दो भेद माने जाते हैं–
  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
इन दोनों भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है

अलंकार का महत्त्व – Alankar Ka Mahatva

काव्य में अलंकार की महत्ता सिद्ध करने वालों में आचार्य भामह, उद्भट, दंडी और रुद्रट के नाम विशेष प्रख्यात हैं। इन आचार्यों ने काव्य में रस को प्रधानता न दे कर अलंकार की मान्यता दी है। अलंकार की परिपाटी बहुत पुरानी है। काव्य-शास्त्र के प्रारम्भिक काल में अलंकारों पर ही विशेष बल दिया गया था। हिन्दी के आचार्यों ने भी काव्य में अलंकारों को विशेष स्थान दिया है।

अलंकार कवि को सामान्य व्यक्ति से अलग करता है। जो कलाकार होगा वह जाने या अनजाने में अलंकारों का प्रयोग करेगा ही। इनका प्रयोग केवल कविता तक सीमित नहीं वरन् इनका विस्तार गद्य में भी देखा जा सकता है। इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि अलंकार कविता की शोभा और सौन्दर्य है, जो शरीर के साथ भाव को भी रूप की मादकता प्रदान करता है।

अलंकार के भेद -
अलंकार के तीन भेद होते है:-
  1. शब्दालंकार – Shabd Alankar
  2. अर्थालंकार – Arthalankar
  3. उभयालंकार – Ubhaya Alankar


(1) शब्दालंकार

“जब कुछ विशेष शब्दों के कारण काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है तो वह ‘शब्दालंकार’ कहलाता है।” यदि इन शब्दों के स्थान पर उनके ही अर्थ को व्यक्त करनेवाला कोई दूसरा शब्द रख दिया जाए तो वह चमत्कार समाप्त हो जाता है।

उदाहरणार्थ-
कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
वा खाए बौराय जग, या पाए ही बौराय॥

बिहारी यहाँ ‘कनक’ शब्द के कारण जो चमत्कार है, वह पर्यायवाची शब्द रखते ही समाप्त हो जाएगा।
(अ) शब्दालंकार

(1) अनुप्रास
परिभाषा- वर्णों की आवृत्ति को ‘अनुप्रास’ कहते हैं; अर्थात् “जहाँ समान वर्गों की बार–बार आवृत्ति होती है वहाँ ‘अनुप्रास’ अलंकार होता है।”.

उदाहरण–
(क) तरनि–तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
(ख) रघुपति राघव राजा राम। स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरणों के अन्तर्गत प्रथम में ‘त’ तथा द्वितीय में ‘र’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास के भेद–अनुप्रास के पाँच प्रकार हैं–
  1. छेकानुप्रास,
  2. वृत्यनुप्रास,
  3. श्रुत्यनुप्रास,
  4. लाटानुप्रास,
  5. अन्त्यानुप्रास।

इन भेदों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -

(1) छेकानुप्रास – जब एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है, तब ‘छेकानुप्रास’ अलंकार होता है।

उदाहरण –
  • कहत कत परदेसी की बात।
  • पीरी परी देह, छीनी राजत सनेह भीनी।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरणों में, प्रथम में ‘क’ वर्ण की तथा द्वितीय में ‘प’ वर्ण की आवृत्ति एक बार हुई है, अत: यहाँ ‘छेकानुप्रास’ अलंकार है।

(2) वृत्यनुप्रास – जहाँ एक वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हो, वहाँ ‘वृत्यनुप्रास’ अलंकार होता है।

उदाहरण –
  • तरनि–तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
  • रघुपति राघव राजा राम।
  • कारी कूर कोकिल कहाँ का बैर काढ़ति री।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरणों में, प्रथम में ‘त’ वर्ण की, द्वितीय में ‘र’ वर्ण की तथा तृतीय उदाहरण में ‘क’ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति हुई है; अतः यहाँ ‘वृत्यनुप्रास’ अलंकार है।

(3) श्रुत्यनुप्रास – जब कण्ठ, तालु, दन्त आदि किसी एक ही स्थान से उच्चरित होनेवाले वर्गों की आवृत्ति होती है, तब वहाँ ‘श्रुत्यनुप्रास’ अलंकार होता है।

उदाहरण –
  • तुलसीदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में दन्त्य वर्गों त, द, कण्ठ वर्ण र तथा तालु वर्ण न की आवृत्ति हुई है। अतः यहाँ ‘श्रुत्यनुप्रास’ अलंकार है।

(4) लाटानुप्रास – जहाँ शब्द और अर्थ की आवृत्ति हो; अर्थात् जहाँ एकार्थक शब्दों की आवृत्ति तो हो, परन्तु अन्वय करने पर अर्थ भिन्न हो जाए; वहाँ ‘लाटानुप्रास’ अलंकार होता है।

उदाहरण –
  • पूत सपूत तो क्यों धन संचै? पूत कपूत तो क्यों धन संचै?
स्पष्टीकरण – यहाँ एक ही अर्थवाले शब्द की आवृत्ति हो रही है, किन्तु अन्वय के कारण अर्थ बदल रहा है; जैसे–पुत्र यदि सपूत हो तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही कमा लेगा और यदि पुत्र कपूत है तो भी धन संचय की आवश्यकता नहीं; क्योंकि वह सारे धन को नष्ट कर देगा।

(5) अन्त्यानुप्रास – जब छन्द के शब्दों के अन्त में समान स्वर या व्यंजन की आवृत्ति हो, वहाँ ‘अन्त्यानुप्रास’ अलंकार होता है।

उदाहरण –
  • कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
  • भरे भौन में करतु हैं, नैननु हीं सौं बात॥
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में, छन्द के शब्दों के अन्त में ‘त’ व्यंजन की आवृत्ति हुई है, अतः यहाँ ‘अन्त्यानुप्रास’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण –
  • प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि,

(2) यमक
परिभाषा–’यमक’ का अर्थ है–’युग्म’ या ‘जोड़ा’। इस प्रकार “जहाँ एक शब्द अथवा शब्द–समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो, किन्तु उसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, वहाँ ‘यमक’ अलंकार होता है।”

उदाहरण
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी,
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में ‘ऊँचे घोर मंदर’ के दो भिन्न–भिन्न अर्थ हैं–’महल’ और ‘पर्वत कन्दराएँ’; अतः यहाँ ‘यमक’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण
(क) ऊधौ जोग जोग हम नाहीं।
(ख) दानिन के शील, पर दान ………….. सुभाय के।
(ग) थारा पर पारा पारावार यों हलत हैं।
(घ) भुज भुजगेस की ………….. दलन के।
(ङ) पच्छी पर छीने …………. खलन के।

(3) श्लेष
परिभाषा–जिस शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, उसे ‘श्लिष्ट’ कहते हैं। इस प्रकार “जहाँ किसी शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर एक से अधिक अर्थ होते हों, वहाँ ‘श्लेष’ अलंकार होता है।”

उदाहरण
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में तीसरी बार प्रयुक्त ‘पानी’ शब्द श्लिष्ट है और यहाँ इसके तीन अर्थ हैं–चमक (मोती के पक्ष में), प्रतिष्ठा (मनुष्य के पक्ष में) तथा जल (आटे के पक्ष में); अत: यहाँ ‘श्लेष’ अलंकार है।
अन्य उदाहरण
(क) अजौं तयौना ही रह्यौ ………………. मुकतनु के संग।।
(ख) जोग–जुगति सिखए ……………… काननु सेवत नैन।।
(ग) खेलन सिखए ……………. नरनु सिकार।।

(2) अर्थालंकार

“जहाँ काव्य में अर्थगत चमत्कार होता है, वहाँ ‘अर्थालंकार’ माना जाता है।” इस अलंकार पर आधारित शब्दों के स्थान पर उनका कोई पर्यायवाची रख देने से भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

उदाहरणार्थ–
  • चरण–कमल बन्दौं हरिराई।
यहाँ पर ‘कमल’ के स्थान पर ‘जलज’ रखने पर भी अर्थगत सौन्दर्य में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।
काव्य में अलंकारों का स्थान–काव्य को सुन्दरतम बनाने के लिए अनेक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इन उपकरणों में एक अलंकार भी है। जिस प्रकार मानव अपने शरीर को अलंकृत करने के लिए विभिन्न वस्त्राभूषणादि को धारण करके समाज में गौरवान्वित होता है, उसी प्रकार कवि भी कवितारूपी नारी को अलंकारों से अलंकृत करके गौरव प्राप्त करता है।

आचार्य दण्डी ने कहा भी है – ”काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलङ्कारान् प्रचक्षते।” अर्थात् काव्य के शोभाकार धर्म, अलंकार होते हैं। अलंकारों के बिना कवितारूपी नारी विधवा–सी लगती है। अलंकारों के महत्त्व का कारण यह भी है कि इनके आधार पर भावाभिव्यक्ति में सहायता मिलती है तथा काव्य रोचक और प्रभावशाली बनता है। इससे अर्थ में भी चमत्कार पैदा होता है तथा अर्थ को समझना सुगम हो जाता है।
(ब) अर्थालंकार

(4) उपमा
परिभाषा–’उपमा’ का अर्थ है–सादृश्य, समानता तथा तुल्यता। “जहाँ पर उपमेय की उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर समानता या तुलना की जाए, वहाँ ‘उपमा’ अलंकार होता है।”

उपमा अलंकार के अंग–उपमा अलंकार के चार अंग हैं-
  1. उपमेय–जिसकी उपमा दी जाए।
  2. उपमान–जिससे उपमा दी जाए।
  3. समान (साधारण) धर्म–उपमेय और उपमान दोनों से समानता रखनेवाले धर्म।
  4. वाचक शब्द–उपमेय और उपमान की समानता प्रदर्शित करनेवाला सादृश्यवाचक शब्द।

उदाहरण–
  • मुख मयंक सम मंजु मनोहर।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘मुख’ उपमेय, ‘मयंक’ उपमान, ‘मंजु और मनोहर’ साधारण धर्म तथा ‘सम’ वाचक शब्द है; अत: यहाँ ‘उपमा’ अलंकार का पूर्ण परिपाक हुआ है।

उपमा अलंकार के भेद–उपमा अलंकार के प्राय: चार भेद किए जाते हैं–
  1. पूर्णोपमा,
  2. लुप्तोपमा,
  3. रसनोपमा,
  4. मालोपमा

इनका संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है -

(क) पूर्णोपमा – पूर्णोपमा अलंकार में उपमा के चारों अंग उपमान, उपमेय, साधारण धर्म और वाचक शब्द स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होते हैं।

उदाहरण –
  • पीपर पात सरिस मन डोला।
स्पष्टीकरण –  उपर्युक्त उदाहरण में उपमा के चारों अंग उपमान (पीपर पात), उपमेय (मन), साधारण धर्म (डोला) तथा वाचक शब्द (सम) स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हैं; अत: यहाँ ‘पूर्णोपमा’ अलंकार है।

(ख) लुप्तोपमा – “उपमेय, उपमान, साधारण धर्म तथा वाचक शब्द में से किसी एक या अनेक अंगों के लुप्त होने पर ‘लुप्तोपमा’ अलंकार होता है।” लुप्तोपमा अलंकार में उपमा के तीन अंगों तक के लोप की कल्पना की गई है।

उदाहरण –
  • नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘नयन’ उपमेय, ‘सरोरुह और बारिज’ उपमान तथा ‘नील और अरुण’ साधारण धर्म हैं। ‘समान’ आदिवाचक शब्द का लोप हुआ है; अतः यहाँ ‘लुप्तोपमा’ अलंकार है।

(ग) रसनोपमा – जिस प्रकार एक कड़ी दूसरी कड़ी से क्रमशः जुड़ी रहती है, उसी प्रकार ‘रसनोपमा’ अलंकार में उपमेय–उपमान एक–दूसरे से जुड़े रहते हैं।

उदाहरण –
  • सगुन ज्ञान सम उद्यम, उद्यम सम फल जान।
  • फल समान पुनि दान है, दान सरिस सनमान॥
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में ‘उद्यम’, ‘फल’, ‘दान’ और ‘सनमान’ उपमेय अपने उपमानों के साथ शृंखलाबद्ध रूप में प्रस्तुत किए गए हैं; अतः यहाँ ‘रसनोपमा’ अलंकार है।

(घ) मालोपमा – मालोपमा का तात्पर्य है–माला के रूप में उपमानों की श्रृंखला। “एक ही उपमेय के लिए जब अनेक उपमानों का गुम्फन किया जाता है, तब ‘मालोपमा’ अलंकार होता है।”

उदाहरण
  • पछतावे की परछाँही–सी, तुम उदास छाई हो कौन?
  • दुर्बलता की अंगड़ाई–सी, अपराधी–सी भय से मौन।
स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में एक उपमेय के लिए अनेक उपमान प्रस्तुत किए गए हैं; अत: यहाँ ‘मालोपमा’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण
(क) रेगि चली जस बीर बहूटी।
(ख) नैन चुवहिं जस महवट नीरू।
(ग) सहज सेत …………………… तन जोति।
(घ) नील घन–शावक–से ………………… पास।

(5) रूपक
परिभाषा–“जहाँ उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।” ‘रूपक’ अलंकार में उपमेय और उपमान में कोई भेद नहीं रहता।

उदाहरण
ओ चिंता की पहली रेखा,
अरे विश्व–वन की व्याली।
ज्वालामुखी स्फोट के भीषण,
प्रथम कम्प–सी मतवाली।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में चिन्ता उपमेय में विश्व–वन की व्याली आदि उपमानों का आरोप किया गया है, अत: यहाँ ‘रूपक’ अलंकार है।

रूपक के भेद–आचार्यों ने रूपक के अनगिनत भेद–उपभेद किए हैं; किन्तु इसके तीन प्रधान भेद इस प्रकार हैं–
  1. सांगरूपक
  2. निरंग रूपक
  3. परम्परित रूपक
इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है -

(क) सांगरूपक – जहाँ अवयवोंसहित उपमान का आरोप होता है, वहाँ ‘सांगरूपक’ अलंकार होता है।

उदाहरण
रनित भंग–घंटावली, झरति दान मधु–नीर।
मंद–मंद आवत चल्यो, कुंजर कुंज–समीर।।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में समीर में हाथी का, भृग में घण्टे का और मकरन्द में दान (मद–जल) का आरोप किया गया है। इस प्रकार वायु के अवयवों पर हाथी का आरोप होने के कारण यहाँ ‘सांगरूपक’ अलंकार है।

(ख) निरंग रूपक – जहाँ अवयवों से रहित केवल उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप होता है, वहाँ ‘निरंग रूपक’ अलंकार होता है।

उदाहरण
इस हृदय–कमल का घिरना, अलि–अलकों की उलझन में।
आँसू मरन्द का गिरना, मिलना निःश्वास पवन में।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में हृदय (उपमेय) पर कमल (उपमान) का; अलकों (उपमेय) पर अलि (उपमान) का; आँसू (उ. प्रेय) पर मरन्द (उपमान) का तथा नि:श्वास (उपमेय) पर पवन (उपमान) का आरोप किया गया है; अतः यहाँ ‘निरंग रूपक’ अलंकार है।

(ग) परम्परित रूपक – जहाँ उपमेय पर एक आरोप दूसरे आरोप का कारण होता है, वहाँ ‘परम्परित . रूपक’ अलंकार है।

उदाहरण -
बाड़व–ज्वाला सोती थी, इस प्रणय–सिन्धु के तल में।
प्यासी मछली–सी आँखें, थीं विकल रूप के जल में।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में आँखों (उपमेय) पर मछली (उपमान) का आरोप, रूप (उपमेय) पर जल (उपमान) के आरोप के कारण किया गया है; अतः यहाँ ‘परम्परित रूपक’ अलंकार है।

अन्य उदाहरण-
(क) सेज नागिनी फिरि फिरि डसी।
(ख) बिरह क आगि कठिन अति मन्दी।
(ग) कमल–नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
(घ) आपुन पौढ़ि अधर सज्जा पर, कर–पल्लव पलुटावति।
(ङ) बिधि कुलाल कीन्हे काँचे घट।
(च) महिमा मृगी कौन सुकृती की खल–बच बिसिखन बाँची?

(6) उत्प्रेक्षा
परिभाषा–“जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना की जाती है, वहाँ ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार होता है।” उत्प्रेक्षा को व्यक्त करने के लिए प्रायः मनु, मनहुँ, मानो, जानेहुँ, जानो आदि वाचक शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण-
सोहत ओदै पीतु पटु, स्याम सलोने गाता
मनौ नीलमनि–सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में श्रीकृष्ण के श्याम शरीर (उपमेय) पर नीलमणियों के पर्वत (उपमान) की तथा पीत–पट (उपमेय) पर प्रभात की धूप (उपमान) की सम्भावना की गई है; अत: यहाँ ‘उत्प्रेक्षा’ अलंकार है।

उत्प्रेक्षा के भेद–उत्प्रेक्षा के तीन प्रधान भेद हैं–
  1. वस्तूत्प्रेक्षा,
  2. हेतूत्प्रेक्षा,
  3. फलोत्प्रेक्षा
इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

(क) वस्तूत्प्रेक्षा – वस्तूत्प्रेक्षा में एक वस्तु की दूसरी वस्तु के रूप में सम्भावना की जाती है। (संकेत–उत्प्रेक्षा के प्रसंग में दिया गया उपर्युक्त उदाहरण वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार पर ही आधारित है।)

(ख) हेतूत्प्रेक्षा – जहाँ अहेतु में हेतु मानकर सम्भावना की जाती है. वहाँ ‘हेतूत्प्रेक्षा’ अलंकार होता है।

उदाहरण–
मानहुँ बिधि तन–अच्छ छबि, स्वच्छ राखिबै काज।
दृग–पग पौंछन कौं करे, भूषन पायन्दाज॥

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में हेतु ‘आभूषण’ न होने पर भी उसकी पायदान के रूप में उत्प्रेक्षा की गई है, अतः यहाँ ‘हेतूत्प्रेक्षा’ अलंकार है।

(ग) फलोत्प्रेक्षा – जहाँ अफल में फल की सम्भावना का वर्णन हो, वहाँ ‘फलोत्प्रेक्षा’ अलंकार होता है।

उदाहरण
पुहुप सुगन्ध करहिं एहि आसा।
मकु हिरकाइ लेइ हम्ह पासा॥

स्पष्टीकरण– पुष्पों में स्वाभाविक रूप से सुगन्ध होती है, परन्तु यहाँ जायसी ने पुष्पों की सुगन्ध विकीर्ण होने का ‘फल’ बताया है। कवि का तात्पर्य यह है कि पुष्प इसलिए सुगन्ध विकीर्ण करते हैं कि सम्भवत: पद्मावती उन्हें अपनी नासिका से लगा ले। इस प्रकार उपर्युक्त उदाहरण में अफल में फल की सम्भावना की गई है; अत: यहाँ ‘फलोत्प्रेक्षा’ अलंकार है।

(7) भ्रान्तिमान्
परिभाषा–जहाँ समानता के कारण एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो, वहाँ ‘भ्रान्तिमान्’ अलंकार होता है।

उदाहरण–
(क) पांय महावर देन को, नाइन बैठी आय।
फिरि–फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाय।

(ख) नाक का मोती अधर की कान्ति से,
बीज दाडिम का समझकर भ्रान्ति से।

देख उसको ही हुआ शुक मौन है,
सोचता है अन्य शुक यह कौन है?

स्पष्टीकरण– उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में लाल एड़ी (उपमेय) और महावर (उपमान) में लाल रंग की समानता के कारण नाइन को भ्रम उत्पन्न हो गया है तथा द्वितीय उदाहरण में तोता उर्मिला की नाक के मोती को भ्रमवश अनार का दाना और उसकी नाक को दूसरा तोता समझकर भ्रमित हो जाता है; अत: यहाँ ‘भ्रान्तिमान्’ अलंकार है।

(8) सन्देह
परिभाषा–जहाँ एक वस्तु के सम्बन्ध में अनेक वस्तुओं का सन्देह हो और समानता के कारण अनिश्चय की मनोदशा बनी रहे, वहाँ ‘सन्देह’ अलंकार होता है।

उदाहरण
कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीर–रस बीर तरवारि सी उघारी है।
तुलसी सुरेस चाप, कैंधौं दामिनी कलाप,
कैंधों चली मेरु तें कृसानु–सरि भारी है।

स्पष्टीकरण–उपर्युक्त उदाहरण में लंका–दहन के वर्णन में हनुमानजी की जलती पूँछ को देखकर लंकावासियों को यह निश्चित ज्ञान नहीं हो पाता कि यह हनुमान्जी की जलती हुई पूँछ है या आकाश–मार्ग में अनेक पुच्छल तारे भरे हैं अथवा वीर रसरूपी वीर ने तलवार निकाली है, या यह इन्द्रधनुष है अथवा यह बिजली की तड़क है, या यह सुमेरु पर्वत से अग्नि की सरिता बह चली है; अत: यहाँ ‘सन्देह’ अलंकार है।

प्रमुख अलंकार–युग्मों में अन्तर-

(1) यमक और श्लेष - ‘यमक’ में एक शब्द एक से अधिक बार प्रयुक्त होता है और प्रत्येक स्थान पर उसका अलग अर्थ होता है;

जैसे -
नगन जड़ाती थीं वे नगन जड़ाती हैं।

(यहाँ दोनों स्थान पर ‘नगन’ शब्द के अलग–अलग अर्थ हैं–नग (रत्न) और नग्न।) किन्तु ‘श्लेष’ में एक शब्द के एक बार प्रयुक्त होने पर भी अनेक अर्थ होते हैं;

जैसे
को घटि ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर।
यहाँ वृषभानुजा के अर्थ हैं–वृषभानु + जा अर्थात् वृषभानु की पुत्री राधा तथा वृषभ + अनुजा अर्थात् वृषभ की बहन गाया हलधर के अर्थ हैं–हल को धारण करनेवाला बलराम तथा बैल।

(2) उपमा और उत्प्रेक्षा - ‘उपमा’ में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है;

जैसे
पीपर पात सरिस मन डोला।

(यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।) किन्तु ‘उत्प्रेक्षा’ में उपमेय में उपमान की सम्भावना प्रकट की जाती है;
जैसे
सोहत ओदै पीतु पटु , स्याम सलोने गात।।
मनौ नीलमनि–सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात॥

(यहाँ पर ‘पीतु पटु’ में प्रभात की धूप की तथा श्रीकृष्ण के सलोने शरीर में नीलमणि के पर्वत की सम्भावना की गई है।)

(3) उपमा और रूपक - ‘उपमा’ में उपमेय की उपमान से समानता बताई जाती है;

जैसे–
पीपर पात सरिस मन डोला।
(यहाँ मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।)
किन्तु ‘रूपक’ में उपमेय में उपमान का भेदरहित आरोप किया जाता है;

जैसे–
चरन–कमल बंदी हरिराई।
(यहाँ पर चरणों पर कमल का भेदरहित आरोप किया गया है।)

(4) सन्देह और भ्रान्तिमान - ‘सन्देह’ में उपमेय में उपमान का सन्देह रहता है;

जैसे-
रस्सी है या साँप।

किन्तु ‘भ्रान्तिमान्’ में उपमेय का ज्ञान नहीं रहता और भ्रमवश एक को दूसरा समझ लिया जाता है;

जैसे-
रस्सी नहीं, साँप है।

इसके अतिरिक्त ‘सन्देह’ में निरन्तर सन्देह बना रहता है और निश्चय नहीं हो पाता, किन्तु ‘भ्रान्तिमान्’ में भ्रम निश्चय में बदल जाता है।

(3) उभयालंकार

जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते है, वे ‘उभयालंकार’ कहलाते है।

उदाहरण-
‘कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।’
इस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों है।

उभयालंकार दो प्रकार के होते हैं-

(1) संसृष्टि (Combinationof Figures of Speech) - तिल-तंडुल-न्याय से परस्पर-निरपेक्ष अनेक अलंकारों की स्थिति ‘संसृष्टि’ अलंकार है (एषां तिलतंडुल न्यायेन मिश्रत्वे संसृष्टि:- रुय्यक : अलंकारसर्वस्व)। जैसे- तिल और तंडुल (चावल) मिलकर भी पृथक् दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार संसृष्टि अलंकार में कई अलंकार मिले रहते हैं, किंतु उनकी पहचान में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। संसृष्टि में कई शब्दालंकार, कई अर्थालंकार अथवा कई शब्दालंकार और अर्थालंकार एक साथ रह सकते हैं।

दो अर्थालंकारों की संसृष्टि का उदाहरण लें-
भूपति भवनु सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न परतर पावा।
मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।

प्रथम दो चरणों में प्रतीप अलंकार है तथा बाद के दो चरणों में उत्प्रेक्षा अलंकार। अतः यहाँ प्रतीप और उत्प्रेक्षा की संसृष्टि है।

(2) संकर (Fusion of Figures of Speech) - नीर-क्षीर-न्याय से परस्पर मिश्रित अलंकार ‘संकर’ अलंकार कहलाता है। (क्षीर-नीर न्यायेन तु संकर:- रुय्यक : अलंकारसर्वस्व)। जैसे- नीर-क्षीर अर्थात पानी और दूध मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही संकर अलंकार में कई अलंकार इस प्रकार मिल जाते हैं जिनका पृथक्क़रण संभव नहीं होता।

उदाहरण-
सठ सुधरहिं सत संगति पाई। पारस-परस कुधातु सुहाई। -तुलसीदास
‘पारस-परस’ में अनुप्रास तथा यमक- दोनों अलंकार इस प्रकार मिले हैं कि पृथक करना संभव नहीं है, इसलिए यहाँ ‘संकर’ अलंकार है।

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