वस्तु और सेवा कर (GOODS AND SERVICES TAX)

वस्तु और सेवा कर (GOODS AND SERVICES TAX)

राज्यों में वैट लागू करने के बाद भारत सरकार प्रस्तावित जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज ऐक्ट) लागू करना चाहती है। इसके पीछे मंशा केंद्र और राज्यों के अप्रत्यक्ष कर को मिलाकर एक राष्ट्रीय कर लागू करने की है, जिसे आमतौर पर भारत का सिंगल वैट कहा जाता है। पूरे भारत में एक सिंगल मार्केट तैयार करने से व्यवसाय और उद्योगों को काफी फायदा होगा।
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इस टैक्स के जरिए जीडीपी को 2 फीसदी (कुछ रूढ़िवादी विशेषज्ञों का अनुमान) तक बढ़ाया जा सकता है। राज्यों में वैट लागू होने से बाजार और अर्थव्यवस्था को हुए फायदे जीएसटी में भी एक जैसे ही हैं। जीएसटी के पहले प्रस्ताव में टैक्स व्यवस्था का जो सुझाव था, उसके अनुसारः
  • (i) वैट के तरीके से ही वसूला जाए (वैट की ही सारी विशेषताएं होंगी)।
  • (ii) टैक्स में समानता के साथ पूरे भारत में लागू हो। ये कहना सही होगा कि केंद्र और राज्यों के कई अप्रत्यक्ष करों के बदले एक ही अप्रत्यक्ष कर लागू हो।
  • (iii) केंद्र के चार टैक्स (सेनवैट, सर्विस टैक्स, स्टैंप ड्यूटी और सेंट्रल सेल्स टैक्स) और राज्यों के नौ टैक्स (एक्साइज ड्यूटी, सेल्स टैक्स/वैट, एंट्री टैक्स, लीज टैक्स, वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट टैक्स, लग्जरी टैक्स, टर्नओवर टैक्स, ऑक्टरॉय टैक्स और सेस) को जीएसटी में शामिल किया जाए।
  • (iv) 20 फीसदी टैक्स की एक ही दर (12 फीसदी केंद्र को मिलेगा और 8 फीसदी राज्यों को)।

कार्यान्वयन प्रक्रिया (Implementation Process)

केलकर कमिटी की रिपोर्ट के अध्ययन के पश्चात् वर्ष 2006 में सरकार ने वर्ष 2010-11 से इस नये कर जारी करने का निर्णय लिया। केंद्र एवं राज्य की सरकारों के बीच आम सहमति नहीं बन पाने के कारण प्रक्रिया में देर होती चली गई। विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए एक के बाद एक दो स्वतंत्र विशेषज्ञ समितियों ने सरकार को अपनी सलाह सुपुर्द की। अंततः अगस्त 2016 के आरंभ में संविधान संशोधन (101वां संशोधन) विधेयक को संसद की मंजूरी मिल गई और इसके कार्यान्वयन का रास्ता साफ हो गया। सितंबर 2016 के आखिर में सरकार द्वारा जीएसटी परिषद् (जीएसटीसी) सृजित कर दी गई। परिषद् में केंद्र एवं राज्य सरकार को जीएसटी से संबंधित विभिन्न मुद्दों, जैसे-दर, फ्लोर रेट, एक्जेंप्शन आदि के संबंध में सिफारिश करने की शक्ति प्रदान की गई है।
अंतत: जुलाई 1, 2017 को भारत के ऐतिहासिक संघीय अप्रत्यक्ष कर, जी.एस.टी. को सरकार द्वारा लागू किया गया 

इस कर की प्रमुख विशेषताएं निम्न प्रकार हैं:-
  • (i) इसमें समाहित होने वाले अन्य केन्द्रीय कर हैं- केंद्रीय उत्पाद कर, अतिरिक्त उत्पाद कर, सेवा कर, अतिरिक्त सीमा शुल्क (सामान्य तौर पर इसे काउंटरवैलिंग शुल्क के रूप में जाना जाता है), और सीमा का विशेष अतिरिक्त शुल्क (कुल पांच कर)।
  • (ii) इसमें समाहित होने वाले अन्य कर हैं-राज्य का वैट (राज्य का वेल्यू एडेड टैक्स), मनोरंजन कर (स्थानीय निकायों द्वारा आरोपित कर के अतिरिक्त), केंद्रीय बिक्री कर (केंद्र द्वारा आरोपित एवं राज्य द्वारा संगृहीत), ऑक्टोरी एवं प्रवेश शुल्क, खरीद पर कर, विलासिता कर, और लॉटरी, सट्टेबाजी और जुए पर कर (कुल आठ कर)।
  • (iii) 'विशेष महत्व के घोषित सामान' की अवधारणा को त्याग दिया गया।
  • (iv) माल और सेवाओं के अंतरराज्यीय लेनदेन पर एक एकीकृत जीएसटी आरोपित किया जाएगा।
  • (v) मानव उपभोग के लिए शराब, पेट्रोल एवं पेट्रोलियम उत्पादों पर जीएसटी से छूट (कालांतर में पेट्रोलियम पर यह कर लागू होगा।
  • (vi) जीएसटी की लेवी से छूट की सीमा सामान्य राज्यों के लिए 10 लाख रुपये एवं विशेष दर्जा प्राप्त राज्यों के लिए 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
  • (vii) कम्पोजिशन स्कीम का लाभ उठाने के लिए सीमा 50 लाख रुपये निर्धारित की गई है। सेवा प्रदाताओं को इससे बाहर रखा गया है।
  • (viii) राज्यों को जीएसटी के कार्यान्वयन के कारण होने वाले राजस्व नुकसान के लिए 5 वर्षों तक क्षतिपूर्ति (इसके लिए वर्ष 2015 16 को 14 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ आधार वर्ष माना जाएगा) दी जाएगी।
  • (ix) अध्यक्ष से प्राप्त स्वीकृति के आधार पर नियमों और विनियमों में मामूली बदलावों की अनुमति हो सकती है (हितधारकों या विधि विभाग से प्राप्त सुझावों के कारण), यदि आवश्यकता हो तो
  • (x) अप्रत्यक्ष करों पर सभी छूट प्रोत्साहन जीएसटी को भुगतान करने के दायित्व के साथ आहरित किए जा सकेंगे। अगर उनमें से कोई भी जारी रखता है तो इसे प्रतिपूर्ति तंत्र के माध्यम से प्रशासित किया जाएगा।
  • (xi) जीएसटी के तहत वस्तुओं का 'बैंड रेट' (प्रतिशत में) 5, 12, 18 और 28 होगा और इसके अतिरिक्त छूट (exempt) चाली वस्तुओं की भी एक श्रेणी होगी। इसके अलावा कुछ वस्तुओं जैसे कि लक्जरी कार, एरियेटेड ड्रिंक्स, पान मसाला और तम्बाकू उत्पादों पर 28 प्रतिशत तक या इससे कहीं ज्यादा की दर पर उपकर लगाया जाएगा (इस रकम से राज्यों को क्षतिपूर्ति
  • का भुगतान किया जा सकेगा)।
  • (xii) भारत के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए. जीएसटी के दो घटक होंगे-पहला, केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) और दूसरा, राज्य जीएसटी (एसजीएसटी)। वस्तु एवं सेवा की प्रत्येक आपूर्ति की मूल्य श्रृंखला पर केंद्र और राज्य दोनों जीएसटी वसूली कर सकेंगे। राज्य 1.5 करोड़ रुपये से नीचे के टर्नओवर के लिए 90 प्रतिशत वस्तुओं व सेवाओं का आकलन करेंगे, जबकि शेष 10 प्रतिशत केंद्र के जिम्मे होंगे। वे करदाता जिनका वार्षिक टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है, उनका राज्य और केंद्र के बीच आधा-आधा बंटावारा होगा।
जी.एस.टी. को लागू किए जाने के बाद कई मुद्दों को लेकर अर्थव्यवस्झथा में एक भ्रम की स्थिति बनी रही - कर की दरों, कर जमा करने की जटिल व्यवस्था, व्यापारिक निकायों की संबद्ध शिकायतें, इत्यादि। चूंकि कर भुगतान की पूरी व्यवस्था इंटरनेट-आधारित रखी जाने के कारण कुछ भ्रम इसकी तकनीकी जानकारी के अभाव. इंटरनेट की विश्वसनीयता आदि से भी जुड़े रहे। विशेषज्ञों की राय में आने वाले समय में इससे जुड़े भ्रमों का समाधान हो जाएगा तथा इस संघीय अप्रत्यक्ष कर की सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा।

जी.एस.टी. के माध्यम से अर्थव्यवस्था की समझ

जी.एस.टी. को लागू करने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण शामिल हैं, यथा-एक भारतीय बाजार का विकास, कर के आधार का विस्तार तथा सहकारी संघवाद को प्रोत्साहन। इससे प्राप्त होने वाला एक लाभ लगभग ध्यानाकर्षित नहीं कर सका है जो है-इसके माध्यम से प्राप्त होने वाली सूचनाओं का भंडार, जो निश्चित तौर पर हमारी अर्थव्यवस्था की समझ को बदल देगा। इसके माध्यम से प्राप्त आंकड़े हमारे कई दीर्घावधिक एवं मौलिक समझ को स्पष्ट कर सकते हैं। अब तक के आंकड़ों के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी कई उत्तेजक (exciting) बातें उजागर हुई हैं (आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार):
अप्रत्यक्ष कारदाताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जिसमें ज्यादातर ने स्वेच्छा से जी.एस. टी. को अपनाया है-विशेषकर छोटे उपक्रमों ने ऐसा किया जो बड़ी कंपनियों से खरीद करते हैं (ताकि उन्हें आगत कर क्रेडिट का लाभ प्राप्त हो सके। जी.एस.टी. के वितरण का आधार राज्यों के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) से जुड़ा है। इससे यह भय समाप्त हो चला है कि प्रमुख उत्पादक राज्यों के सकल कर में कमी आएगी। अंतर्राष्ट्रीय निर्यातों से जुड़े आंकड़ों से यह ज्ञात हुआ है कि राज्यों के निर्यात निष्पादन एवं उनके जीवन स्तर में एक मजबूत संबंध है।
भारत के मामले में एक विशेष बात है कि दूसरे देशों की तुलना में इसके बड़े कंपनियों का इसके निर्यात में काफी छोटा हिस्सा है।
देश के आंतरिक व्यापार (internal trade) का आकार इसके स.घ.उ. (GDP) का लगभग 60 प्रतिशत (आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 के अनुमान से भी अधिक) है, जो विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से तुलनीय स्तर का है।
भारत का औपचारिक क्षेत्र और गैर-कृषि वेतन (Payroll) हमारी वर्तमान जानकारी से अच्छा खासा बड़ा हैं जी.एस.टी. के अंग होने के दृष्टिकोण से औपचारिक क्षेत्र का वेतन भुगतान गैर-कृषिगत श्रमिकों का लगभग 53 प्रतिशत है। हालांकि, सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के मामले में यह सिर्फ 31 प्रतिशत है।
इसी प्रकार औपचारिक क्षेत्र का आकार (सामाजिक सुरक्षा के अंग होने का शुद्ध जी.एस.टी, की मात्रा के आधार पर) निजी गैर कृषि क्षेत्र में संलग्न सभी उपक्रमों का 13 प्रतिशत है लेकिन सकल टर्न-ओवर (turnover) का 93 प्रतिशत है।
सर्वेक्षण के अनुसार ऊपर चर्चित जानकारियां एक नमूना (sample) भर हैं, जिनसे आने वाले समय में ज्ञात हाने वाले तथ्यों एवं विश्लेषणों का अनुमान लगाया जा सकता है। आने वाले समय में इसके माध्यम से अनुसंधान के महत्वपूर्ण नये आयाम सामने आएंगे।

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