प्रजातंत्र | प्रजातंत्र का अर्थ, परिभाषा, प्रकार एवं विशेषताएं | prajatantra

प्रजातंत्र : प्रजातंत्र की अवधारणा, अर्थ एवं परिभाषा

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मानव जाति के राजनीतिक विकास में जो विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ रहीं उनमें प्रजातंत्र विश्व की प्रमुख शासन प्रणाली मानी गयी है। इसकी मुख्य अवधारणा यह है कि, राज्य की सम्पूर्ण शक्ति की स्वामी जनता है, कोई व्यक्ति, समूह या कोई वंश नहीं। अतः जनता की सहभागिता प्रजातंत्र का मूल आधार है। जिन निर्णयों या कार्यों का प्रभाव सभी पर पड़ता है- उन निर्णयों में सभी की भूमिका होनी चाहिए।
प्रजातंत्र के आरंभिक काल में सीमित जनसंख्या एवं सीमित क्षेत्रफल वाले छोटे राज्य होने से सारी जनता शासन संचालन संबंधी निर्णयों में सहभागी होती थी। अतः सीमित क्षेत्रफल एवं सीमित जनसंख्या वाले छोटे राज्यों में इसका व्यवहार होने लगा। यूनान के नगर राज्यों से प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की शुरुआत मानी जाती है। वर्तमान राज्य उनके विस्तार एवं जनसंख्या की दृष्टि से बड़े होने से जनता द्वारा प्रत्यक्ष शासन संभव नहीं था। अतः जनता अप्रत्यक्ष रूप से अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन की शक्ति का उपयोग करती है। वर्तमान में प्रजातंत्र अप्रत्यक्ष रूप से जन प्रतिनिधियों के माध्यम से संचालित प्रजातंत्र कहलाता है।
'प्रजातंत्र' का अर्थ एक ऐसी शासन प्रणाली से है जिसमें जनहित सर्वोपरी है। प्रजातंत्र का अर्थ केवल एक शासन प्रणाली तक सीमित नहीं है। यह राज्य व समाज का रूप भी है। अतः यह राज्य, समाज व शासन तीनों का मिश्रण है। राज्य के प्रकार के रूप में प्रजातंत्र, जनता को शासन करने. उस पर नियंत्रण करने एवं उसे हटाने की शक्ति है। समाज के रूप में प्रजातंत्र एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें समानता का विचार और व्यवहार प्रबल हो। व्यक्तित्व की गरिमा का समान मूल्य हो एवं विकास के समान अवसर सभी को प्राप्त हो। यह सम्पूर्ण जीवन का एक मार्ग या ढंग है। यह मूल्यों की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति साध्य है और व्यक्तित्व का विकास इसका लक्ष्य है। यह स्वतंत्रता सामंजस्य एवं समरसता की पूर्वकल्पना पर आधारित है।
'प्रजातंत्र' शब्द अंग्रेजी भाषा के Democracy शब्द का पर्यायवाची है। यह यूनानी भाषा के दो शब्दों 'Demos' और 'cratia' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ क्रमशः 'जनता' और 'शक्ति' है। इसका अभिप्राय एक ऐसी शासन प्रणाली से है जिसमें शासन की शक्ति जनता के पास होती है और शासन संचालन जनता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से करती है। इसे लोकतंत्र या जनतंत्र भी कहा जाता है।
  • अरस्तु ने प्रजातंत्र को 'बहुतों का शासन' कहा है।
  • अब्राहम लिंकन ने प्रजातंत्र को 'जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन' कहा है।
  • डायसो के अनुसार 'प्रजातंत्र वह शासन है जिसमें शासक समुदाय, संपूर्ण राष्ट्र का अपेक्षाकृत बड़ा भाग हो।'
तात्पर्य यह है कि प्रजातंत्रात्मक शासन व्यवस्था लोक कल्याणकारी राज्य से सम्बन्धित है। इसमें व्यक्ति की महत्ता और उसकी स्वतंत्रता पर बल दिया गया है तथा संप्रभुता जनता में निहित होना माना गया है।

प्रजातंत्र के आधारभूत सिद्धान्त

प्रजातंत्र के निम्नलिखित सिद्धांत हैं-

प्रजातंत्र का शास्त्रीय सिद्धान्त : इस सिद्धान्त के अनुसार शासन का आधार जनता की सहमति है, लेकिन सरकार यदि जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है, तो जनता निर्वाचन के माध्यम से सरकार को हटा सकती है। जनहित साधना उसका लक्ष्य है। यह प्रजातंत्र का उदारवादी सिद्धान्त भी कहलाता है। क्योंकि व्यक्ति को स्वतंत्रता एवं समाज की सर्वोपरिता पर इसमें बल दिया गया है।

प्रजातंत्र का विशिष्टवर्गीय या अभिजनवादी सिद्धान्त : बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्रतिपादित यह सिद्धान्त मानव की प्राकृतिक असमानता के सिद्धान्त पर बल देते हुए यह मानता है, कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था में शासक और शासित दो वर्ग होते हैं। शासक वर्ग हमेशा अल्पसंख्यक होते हुए भी सत्ता के केन्द्र में विशिष्ट वर्ग होता है। शासन को शक्ति इसी विशिष्ट वर्ग के हाथ में केन्द्रित होती है। सामान्यतः व्यक्ति यह सोचते हैं कि वे राजनीतिक प्रक्रिया में भाग ले रहें हैं, लेकिन वास्तव में उनका प्रभाव चुनाव तक सीमित होता है। अभिजन का आधार है श्रेष्ठता के आधार पर चयन। प्रकृति, विचार, आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक पृष्ठभूमि आदि किसी भी आधार पर इनकी श्रेष्ठता निर्भर हो सकती है, जो इन्हें आम लोगों से भिन्न बनाती है।
अभिजन भी स्वयं को आम लोगों से भिन्न एवं श्रेष्ठ समझते हैं, परन्तु आम लोगों के साथ इनकी क्रिया प्रतिक्रिया होती रहती है। इस तरह जन संप्रभुता का समन्वय हो जाता है। समाज की धन संपदा एवं नीति निर्धारण में अभिजन की प्रभावशाली भूमिका होती है, परन्तु प्रजातंत्र में इस वर्ग में प्रवेश के सभी को समान अवसर प्राप्त होते हैं। दूसरी ओर नियमित एवं खुली निर्वाचन प्रक्रिया अभिजन को जनहित में कार्य करने हेतु बाध्य करती है।

बहुलवादी सिद्धान्त : इस सिद्धांत की मान्यता है कि प्रजातंत्र में व्यक्ति को अपने विभिन्न हितों की पूर्ति के लिये समूह में संगठित होने की स्वतंत्रता है। ये समूह अपने-अपने क्षेत्र में स्वायत्त भी होते हैं और अपनी हितपूर्ति के लिय शासन पर दबाव भी डालते हैं। इस तरह सभी समूहों को अपनी हितपूर्ति की सीमा तक सत्ता में भागीदारी मिलती है। बहुलवादी सिद्धांत की यह मान्यता है कि वास्तव में सत्ता इन समूहों में बँटी रहती है। अतः सत्ता का विकेन्द्रीकरण इस सिद्धांत की मूल धारणा है। इसके अनुसार राज्य ही सर्वोच्च सत्ता का अधिकारी नहीं अपितु प्रजातंत्र में समाज के सभी समूहों की राजनीतिक शक्ति एवं शासन की सत्ता में भागीदारी होती है।

मार्क्सवादी सिद्धान्त : उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में साम्यवाद की विचारधारा के आधुनिक प्रवर्तक कार्ल मार्क्स व लेनिन के विचारों पर आधारित प्रजातंत्र का एक नवीन सिद्धांत सामने आया । इसके अनुसार शास्त्रीय प्रजातंत्र या उदारवादी प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं में वास्तविक प्रजातंत्र सम्भव नहीं है, क्योंकि इसमें शासन पर एक छोटे साधन संपन्न वर्ग का नियंत्रण हो जाता है, जबकि वास्तव में प्रजातंत्र सभी का कल्याण व उनकी समानता पर आधारित है। इस सिद्धांत के अनुसार सच्चे प्रजातंत्र के लिये एक वर्ग विहीन तथा राज्य विहीन समाज की स्थापना होनी चाहिये। साधन संपन्न वर्ग राजनीतिक सत्तायुक्त होता है। अतः राज्य स्वयं शोषणकर्ताओं का एक समूह हो जाता है। मार्क्सवादी सिद्धांत की यह मान्यता है कि राजनीतिक शक्ति संपूर्ण समाज में निहित हो इस हेतु यह आवश्यक है कि आर्थिक सत्ता संपूर्ण समाज में निहित हो। ऐसी स्थिति में ही शासन सबके द्वारा सभी के हित के लिये संचालित हो पाएगा। प्रजातंत्र का यह सिद्धांत राजनीतिक एवं नागरिक समानताओं की अपेक्षा आर्थिक समानता पर अधिक बल देता है। इसकी मान्यता है कि यदि व्यक्ति के पास रोटी, कपड़ा, मकान नहीं है तो उसे मतदान या निर्वाचित होने का अधिकार कोई अर्थ नहीं रखता है।

वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना हेतु मार्क्सवाद निम्न सुझाव देता है
  • (i) उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व होना।
  • (ii) संपत्ति का समान वितरण तथा सभी की मूलभूत आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना।
  • (iii) सभी के आर्थिक हित समान होने से इनके प्रतिनिधित्व के लिए एक दल साम्यवाद दल के हाथ में शासन संचालन की संपूर्ण शक्ति होना। मार्क्सवाद ऐसे प्रजातंत्र को ही वास्तविक व श्रेष्ठ प्रजातंत्र मानता है।

प्रथम महायुद्ध पश्चात 1990 तक सोवियत संघ में इसका प्रयोग हुआ। वर्तमान में चीन इस सिद्धांत की आंशिक मान्यता पर आधारित गणराज्य है।

प्रजातंत्र के प्रकार

साधारणतः प्रजातंत्र दो प्रकार का होता है-
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  1. प्रत्यक्ष प्रजातंत्र
  2. अप्रत्यक्ष या प्रतिनिधि मूलक प्रजातंत्र।

प्रत्यक्ष प्रजातंत्र : जब किसी राज्य के निवासी सार्वजनिक विषयों पर प्रत्यक्ष रूप से स्वयं विचार विमर्श करते हैं और इसके आधार पर नीतियों का निर्धारण और विधिनिर्माण होता है, तो ऐसे शासन को प्रत्यक्ष प्रजातंत्र कहते हैं।
प्रत्यक्ष प्रजातंत्र कम जनसंख्या वाले एवं छोटे आकार वाले राज्यों में ही संभव है। वर्तमान में बड़े आकार वाले राष्ट्रों में जहाँ नागरिकों की संख्या करोड़ों में होती है प्रत्यक्ष प्रजातंत्र संभव नहीं है। वर्तमान में स्विट्जरलैंड के कुछ कैंटनों एवं भारत में पंचायत राज व्यवस्था के अन्तर्गत ग्रामसभाओं में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की व्यवस्था है।

अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र : जब जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से विधि निर्माण तथा शासन के कार्यों पर नियंत्रण रखने का कार्य करती है तो उसे अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र कहते हैं। वर्तमान समय में अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र ही प्रचलित है। इसमें जनता निश्चित अवधि के लिए अपने प्रतिनिधि चुनती है, जो व्यवस्थापिका का गठन करते हैं और कानूनों का निर्माण करते हैं। इस प्रणाली में जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होती है।

प्रजातंत्र की विशेषताएँ

प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य स्वयं का विकास होता है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को कुछ अवसरों को आवश्यकता होती है। प्रजातंत्र एकमात्र ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें सभी को अपने सर्वांगीण विकास के लिए बिना किसी भेदभाव के, समान अवसर प्राप्त होते हैं। प्रजातांत्रिक व्यवस्था नागरिकों की गरिमा तथा समानता, स्वतंत्रता, भ्रातृत्व और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।

प्रजातंत्र की आधारभूत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं :

प्रजातंत्र की विशेषताएँ

  • उत्तरदायी शासन व्यवस्था
  • समानता पर आधारित शासन
  • स्वतंत्रता की पोषक प्रणाली
  • कानून का शासन
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव
  • लिखित संविधान का होना।
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका

उत्तरदायी शासन व्यवस्था : प्रजातंत्र में जनता प्रत्यक्ष अथवा अपने निर्वाचिन प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन करती है। इसमें जनता का शासक वर्ग पर निरंतर प्रभाव रहता है। शासन से प्रश्न पूछने एवं उसकी आलोचना के माध्यम से जनता शासन से उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार करा सकती है। यहाँ शासन की सत्ता मूलतः जनता की होती है, जो नियत अवधि के लिए ही प्रतिनिधियों को सौंपी जाती है। अतः शासन का जनता के प्रति उत्तरदायित्व अनिवार्य होता है अन्यथा अगले चुनाव में जनता के पास किसी अन्य को सत्ता सौंपने का विकल्प होता है।

समानता पर आधारित शासन : प्रजातंत्र समानता के सिद्धांत पर आधारित शासन प्रणाली है। इस शासन प्रणाली में सभी नागरिकों को बिना भेदभाव के समान नागरिक व राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। प्रजातंत्र में निश्चित समय अवधि में चुनाव आवश्यक होते हैं। इन चुनावों में प्रत्येक वयस्क नागरिक को मत (वोट) देने व
चुनावों में प्रत्याशी बनकर भाग लेने का समान अधिकार प्राप्त होता हैं। सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर भी वर्तमान प्रजातंत्र में बल दिया जाता है। धर्म, जाति, लिंग, सामाजिक स्तर आदि के आधार पर भेदभाव न होना तथा आर्थिक दृष्टि से सभी की न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन समानरूप से उपलब्ध होना,
प्रजातंत्र का लक्ष्य माना गया है। अर्थात सामाजिक और आर्थिक अवसरों की समानता तथा व्यक्ति के व्यक्तित्व का समान महत्व भी प्रजातंत्र का मूल लक्षण है। इसीलिए एक व्यक्ति एक मत प्रजातंत्र की धुरी है।

स्वतंत्रता की पोषक प्रणाली : प्रजातंत्र में नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए अनेक प्रकार की स्वतंत्रताएँ प्राप्त होती है। राजनैतिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त नागरिकों को अनेक प्रकार की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रताओं के अधिकार भी प्राप्त होते हैं। प्रजातंत्र में नागरिकों को मत देने, निर्वाचित होने, सार्वजनिक पद ग्रहण करने, भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सूचना प्राप्त करने का अधिकार, सम्मेलन सभा करने, समूह बनाने, व्यापार व्यवसाय करने आदि की स्वतंत्रताएँ प्राप्त होती है। नागरिक यदि शासन की नीतियों से असहमत हो तो संयमित विरोध की स्वतंत्रता भी उन्हें प्राप्त है। स्वतंत्रता प्रजातंत्र की आत्मा है। बिना स्वतंत्रता प्रजातंत्र सम्भव नहीं है।

कानून का शासन : इस शासन व्यवस्था में जनता की इच्छाओं पर आधारित सरकार कानून के अनुसार कार्य करती है, इसलिए इसे कानून का शासन भी कहा जाता है। कानून के शासन का आशय है कि कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान है। एक सा अपराध करने पर व्यक्ति को एकसा दण्ड दिया जाता है चाहे उसका मान अथवा पद कोई भी क्यों न हो। यह किसी व्यक्ति विशेष एवं समूहों का शासन न होकर कानून पर आधारित शासन है, इसलिए इसमें संविधान का होना भी आवश्यक है, जिसमें मूलभूत कानूनों का उल्लेख होता है। नागरिकों के अधिकारों व कानूनों के पालन कराने का दायित्व स्वतंत्र न्यायपालिका का होता है। अतः न्यायपालिका, सरकार के ऐसे कार्यों के विरुद्ध आदेश दे सकती है जिससे किसी कानून का उल्लंघन हुआ है। प्रजातांत्रिक देशों में मूलभूत कानूनों का वर्णन संविधान में होता है। समय की आवश्यकतानुसार और परिस्थितिजन्य कानूनों का निर्माण सरकार करती है। ये समस्त कानून सर्वोपरि होते हैं।

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव : प्रजातंत्र में चुनाव कराना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होने चाहिए ताकि सत्ता में बैठे लोगों के लिए भी जीत-हार की समान संभावना हो। चुनाव के समय मतदाता पर किसी भी प्रकार का दबाव न हो एवं चुनाव व्यवस्था पक्षपातरहित हो। प्रजातंत्र में जनता की इच्छा ही सर्वोपरि होती है। इस शासन व्यवस्था में सरकार के गठन के लिए समय-समय पर चुनाव होते हैं। इन चुनावों में विभिन्न राजनैतिक दलों और निर्दलीय स्वतंत्र प्रत्याशियों को भी चुनाव में भाग लेने की स्वतंत्रता होती है। भारत सहित विश्व के अधिकांश प्रजातांत्रिक देशों में खुली चुनावी प्रतियोगिता होती है। मतदाता अपनी पसंद के प्रत्याशी का निर्भीकता से गुप्त मतदान द्वारा चुनाव कर सकें इसी पर प्रजातंत्र का व्यवहारिक स्वरूप निर्भर है।

लिखित संविधान का होना : शासन संगठन के मूलभूत सिद्धांत तथा प्रक्रिया निश्चित होना प्रजातंत्र का महत्वपूर्ण लक्षण है, जिससे कोई भी सत्तारूढ़ दल अपने बहुमत के आधार पर इसे जैसा चाहे वैसा परिभाषित या परिवर्तित न कर सके। शासन के अंगों का गठन, शासन की शक्तियाँ एवं कार्य, प्रक्रिया आदि संविधान में स्पष्ट हों, इसलिए लिखित संविधान का होना आवश्यक माना गया है। प्रजातंत्र नागरिकों की समानता एवं स्वतंत्रता पर आधारित है। अतः संविधान के मूलभूत कानूनों में ये भी परिभाषित होना आवश्यक है।

स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका : संविधान की समस्त व्यवस्थाएँ व्यवहार में लागू की जा सके, इसलिए प्रजातंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना उसका महत्वपूर्ण लक्षण है। शासन के व्यवहार संविधान के अनुकूल हों, नागरिक अधिकार सुरक्षित हों, कानून के उल्लंघनकर्ता दण्डित हों, इस हेतु न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था को व्यवहार में बनाए रखने के लिये स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका आवश्यक है।

प्रजातंत्र के गुण एवं दोष

प्रजातंत्र के गुण

  • मानवता के उच्च मूल्यों पर आधारित
  • लोक कल्याण
  • राजनीतिक शिक्षण
  • राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास
  • हिंसक क्रांति की न्यूनतम सम्भावना

प्रजातंत्र के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं -

मानवता के उच्च मूल्यों पर आधारित : प्रजातंत्र समानता, न्याय और भ्रातृत्व जैसे उच्च मूल्यों पर आधारित है तथा इसमें प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करते हुए सभी को समान माना जाता है। जनता की सम्प्रभुता एवं सहभागिता पर आधारित होने से प्रजातंत्र में व्यक्ति में आत्मसम्मान व आत्मनिर्भरता के उच्च गुण विकसित होते हैं।

लोक कल्याण : प्रजातंत्र में जन प्रतिनिधियों के द्वारा शासन किया जाता है जिनका चुनाव जनता एक निश्चित समय के लिए करती है। उन्हें हमेशा यह भय रहता है कि, जनता की इच्छाओं, भावनाओं और आवश्यकता के अनुसार यदि वे कार्य नहीं करेंगे तो जनता उन्हें भविष्य में होने वाले चुनावों में पराजित कर देगी। इसलिए प्रजातंत्र में शासक जनता के प्रति उत्तरदायी है, और उनके हितों के प्रति सजग रहता है। अतः प्रजातंत्र में लोक कल्याण का पूरा ध्यान रखा जाता है।

राजनीतिक शिक्षण : प्रजातंत्र राजनीतिक प्रशिक्षण का उत्तम साधन है। मताधिकार और राजनीतिक पद प्राप्त करने की स्वतंत्रता के कारण जनता स्वाभाविक रूप से राजनीतिक क्षेत्र में रूचि लेने लगती है। भाषण, विचारों की अभिव्यक्ति, संचार माध्यमों के उपयोग की स्वतंत्रता जनता में विचारों के आदान-प्रदान करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है। सभी राजनीतिक दल निरंतर प्रचार द्वारा जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करते रहते हैं। अतः प्रजातंत्र में नागरिकों को प्रशासनिक, राजनीतिक व सामाजिक सभी प्रकार का शिक्षण प्राप्त होता है।

राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास : प्रजातंत्र जनता द्वारा लोकहित की प्राप्ति के लिए जनता का शासन है। जनता राजनीतिक दृष्टि से सजग हो जाने के कारण सरकार व राज्य के प्रति एक प्रकार का लगाव अनुभव करती है और इस लगाव के कारण राष्ट्र के प्रति प्रेम व प्रतिबद्धता की भावना जागृत होती है। इसी से राष्ट्रभक्ति उपजती है। नागरिक यह अनुभव करते हैं कि शासन उन्हीं की बनायी हुई व्यवस्था है तथा सार्वभौम सत्ता के अधिकारी एवं स्वामी वे स्वयं हैं। उदाहरणार्थ सन् 1789 की क्रांति के बाद फ्रांसीसी जनता अपने देश से प्रेम करने लगी क्योंकि इस क्रांति के बाद फ्रांस की शासन व्यवस्था में उन्हें स्वतंत्र एवं समान भागीदारी मिली।

हिंसात्मक क्रांति की न्यूनतम सम्भावना : प्रजातंत्र शांति और सहिष्णुता का दर्शन है। यह सहमति और समझ पर आधारित है। इसमें विपक्ष को भी अपनी बात कहने का पूरा अवसर प्राप्त होता है। विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना और निन्दा भी की जाती है। बहुसंख्यक जनता यदि शासक वर्ग से असंतुष्ट है तो वह उसे सरलतापूर्वक संवैधानिक उपायों से हटा सकती है। इसलिये प्रजातंत्र में हिंसक क्रांति को सम्भावना न्यूनतम होती है।
सैद्धांतिक धरातल पर तो जनता के शासन के रूप में प्रजातंत्र श्रेष्ठ प्रणाली है, परन्तु प्रजातांत्रिक प्रणाली के कार्य को क्रियात्मक रूप देने में व्यवहारिक कठिनाइयाँ भी हैं। अतः इसमें कुछ दोष भी आ जाते हैं।

प्रजातंत्र के प्रमुख दोष इस प्रकार हैं:

प्रजातंत्र के दोष

  • गुणों की अपेक्षा संख्या को महत्व
  • अयोग्यों का शासन
  • सार्वजनिक समय व धन का अपव्यय धनिकों का वर्चस्व
  • दलीय गुटबन्दी
  • युद्ध व संकट के समय निर्बल

गुणों की अपेक्षा संख्या को महत्व : प्रजातंत्र में गुणों की अपेक्षा संख्या को अधिक महत्व दिया जाता है। इसमें मात्र मतों की गणना की जाती है। प्रत्येक मतदाता चाहे योग्य हो या अयोग्य उसके मत का मूल्य एक
ही होता है। प्रजातंत्र का आधार यह अवधारणा है कि सभी व्यक्ति समान है, जबकि समाज के सभी सदस्यों की बौद्धिक क्षमता समान नहीं हैं। प्रजातंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को एक मत देने का अधिकार है अर्थात् वह सबको समान मानता है। अतः अधिक गुणी व्यक्तियों की महत्ता का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता।

अयोग्यों का शासन : शासन एक कला भी है। इस हेतु विशेष ज्ञान और क्षमता की आवश्यकता होती है। यदि शासक को इस कला का ज्ञान नहीं है तो पूरे समाज के कल्याण का लक्ष्य
प्राप्त नहीं किया जा सकता। शासन करने की कला, योग्यता और क्षमता केवल कुछ लोगों में रहती है। किंतु प्रजातंत्र में बहुमत का शासन होता है और योग्य व्यक्ति का मूल्य भी अयोग्य के समान ही आँका जाता है। विकासशील देशों में तो यह स्थिति और भी चिंतनीय है। इसलिए आलोचक प्रजातंत्र को अयोग्यों का शासन भी कहते हैं।

सार्वजनिक समय व धन का अपव्यय : प्रजातंत्र में चुनावों की लम्बी और जटिल प्रक्रिया के पश्चात ही व्यवस्थापिका का गठन हो पाता है। अत्यावश्यक कानूनों के निर्माण में भी कई बार वर्षों लग जाते हैं। चुनावों की प्रक्रिया में काफी धन खर्च होता है। सांसदों, विधायकों, मंत्रियों एवं व्यवस्थापिका से जुड़े अधिकारियों आदि पर भी बड़ी मात्रा में धन खर्च होता है। अतः प्रजातंत्र में धन व समय दोनों का अपव्यय होता है।

धनिकों का वर्चस्व : यह केवल कहने की बात है कि प्रजातंत्र में सभी को समान रूप से राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी मिलती हैं, लेकिन यह केवल सैद्धांतिक बात हैं। व्यवहार में प्रजातंत्र में चुनाव इतने खर्चीले हो गये हैं कि सामान्य जन तो चुनावों में किसी पद हेतु प्रत्याशी के रूप में भाग लेने की बात भी नहीं सोच सकते। धन के आधार पर चुनाव लड़ना प्रजातांत्रिक प्रणालियों में एक आम बात हो गई है। चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी प्रचार-प्रसार में अत्यधिक धन व्यय करते हैं। इससे 'जनता का शासन' सहज ही 'धनिकों के शासन' में परिवर्तित होता जा रहा है।

दलीय गुटबन्दी : वर्तमान प्रजातंत्र के संचालन के लिए राजनीतिक दल अनिवार्य हो गये हैं। राजनीतिक दलों का गठन तो विचारों के आधार पर होता है किंतु सत्ता प्राप्ति ही इनका मुख्य लक्ष्य बन जाता है। जनता को प्रभावित करने व लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दल परस्पर एक दूसरे के विरुद्ध अर्नगल प्रलाप करते रहते हैं। विरोध के लिये' विरोध न कि 'मूल्य या सिद्धांतों के आधार पर विरोध राजनीतिक दलों का लक्ष्य बन जाता है। राजनीतिक दल ऐसे लोगों का अखाड़ा बन जाते हैं जो गहन प्रचार द्वारा लोगों की भावनाओं को प्रभावित करके अपना वर्चस्व व स्वार्थ सिद्ध करने के उपाय खोजते रहते हैं। चुनाव के दौरान इनके अमर्यादित प्रचार-प्रसार के कारण संपूर्ण देश का वातावरण दूषित हो जाता है। लोक कल्याण के स्थान पर गुटीय हितपूर्ति महत्वपूर्ण हो जाती है तथा सत्ता का प्रयोग भी वे अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु करने लगते हैं।

युद्ध व संकट के समय निर्बल : युद्ध और संकट के समय अधिक शीघ्रतापूर्वक निर्णय लेने की आवश्यकता होती है किंतु प्रजातांत्रिक प्रणाली ऐसे समय में प्रभावहीन सिद्ध होती है। प्रजातंत्र में सत्ता के फैलाव के कारण निर्णय लेने तथा उसे क्रियान्वित करने में बहुत अधिक समय लगता है।

प्रजातंत्र का महत्व

प्रजातंत्र न केवल शासन का एक विशेष प्रकार है बल्कि यह जीवन के प्रति एक विशिष्ट दृष्टिकोण है। प्रजातंत्र स्वतंत्रता समानता, सहभागिता और बंधुत्व की भावना पर आधारित एक शासन व्यवस्था हैं। इसे हम एक सामाजिक व्यवस्था भी कह सकते हैं। इसके अन्तर्गत मनुष्य का संपूर्ण जीवन इस लोकतंत्रीय मान्यता पर आधारित होता है कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज में समान महत्व एवं व्यक्तित्व की गरिमा प्राप्त है। व्यक्ति के महत्व की यह स्थिति जीवन के केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही हो तो प्रजातंत्र अधूरा रहता है। प्रजातंत्र की पूर्णता के लिए यह आवश्यक है कि जीवन के राजनीतिक सामाजिक व आर्थिक तीनों ही क्षेत्रों में सभी व्यक्तियों को अपने विकास के समान अवसर प्राप्त हों।
मानव जीवन के राजनीतिक क्षेत्र में प्रजातंत्र से आशय ऐसी राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमें निर्णय लेने की शक्ति किसी एक व्यक्ति में न होकर जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित होती है। अतः शासन जन भावना पर आधारित होता है।
मानव जीवन के सामाजिक क्षेत्र में प्रजातंत्र से आशय ऐसे समाज से हैं, जिसमें जाति, धर्म, रंग, लिंग, नस्ल, मूलवंश व सम्पत्ति आदि के आधार पर भेदभाव न हो। सभी को अपना जीवन उन्नत बनाने के अधिकार व अवसर बिना भेदभाव के समान रूप से प्राप्त हो तथा समाज में बंधुत्व तथा पारस्परिक सहयोग की भावना निहित हो।
मानव जीवन के आर्थिक क्षेत्र में प्रजातंत्र से आशय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आजीविका चुनने अथवा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। सभी को अपना आर्थिक विकास करने की स्वतंत्रता व समान अवसर प्राप्त होते हैं। एक व्यक्ति का किसी अन्य द्वारा शोषण न हो ऐसी व्यवस्था के प्रयास होते हैं। सभी को वे सामान्य सुविधाएँ प्रदान करने का प्रयास भी किया जाता है जिससे वे अपनी न्यूनतम आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण कर सके एवं गरिमामय जीवन जी सके, अर्थात व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि की सुविधाएँ प्रजातंत्र के आधार हैं।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था शासकों के व्यवस्थित एवं नियमित परिवर्तन में विश्वास करती हैं। प्रजातंत्र की यह मान्यता भी है कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में जो भी परिवर्तन किए जाने हो, उन सभी परिवर्तन को शांतिपूर्ण तरीकों से किया जा सकता है। राजनीतिक प्रक्रिया में जनता की भागीदारी अथवा सहभागिता सुनिश्चित करने वाली यही एक मात्र शासन प्रणाली है। अतः इसका महत्व अन्य शासन प्रणालियों से ज्यादा आँका जाता है।

प्रजातंत्र के लिए संविधान की आवश्यकता एवं महत्व

वर्तमान प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सरकार का निर्माण जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि करते हैं। प्रजातंत्र की मूल मान्यता है कि शासन की शक्तियों पर जनता का नियंत्रण हो जिससे शासन जनता के हितों के अनुकूल हो सके। जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों का होना अनिवार्य है। प्रजातंत्र में सामान्य व्यक्तियों को सरकार के गठन की प्रक्रिया व शक्तियों तथा नागरिकों के अधिकारों व कर्त्तव्यों का ज्ञान संविधान के द्वारा सरलता से प्राप्त हो सकता है। संविधान को आसानी से बदला ना जा सके, ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए। इस प्रकार प्रजातंत्र की रक्षा के लिए लिखित संविधान का होना आवश्यक है। प्रजातंत्र को इसीलिए विधि का शासन कहा जाता है। इसमें व्यक्ति या व्यक्ति समूह नहीं वरन् कानून सर्वोपरि है, जो लिखित संविधान में स्पष्ट होता है। अतः प्रजातंत्र के लिए संविधान का अत्यधिक महत्व है। प्रजातंत्र की सुदृढ़ता के लिए प्रजातांत्रिक परंपराओं का भी महत्व है जो लिखित संविधान को लचीलापन देती हैं।

भारत में प्रजातंत्र

प्राचीन भारत में प्रजातंत्र का स्वरूप : प्रजातंत्र व प्रजातांत्रिक संस्थाओं के विचार भारत के लिए नए नहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1000 ईसा पूर्व के वैदिक काल में भारत की जनता के बीच प्रतिनिधिक विचार विमर्श की परंपरा विद्यमान थी। उत्तरवैदिक काल में शासन का गणतांत्रिक रूप एवं स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ विद्यमान थीं। ऋग्वेद व अथर्ववेद में सभा और समिति का उल्लेख मिलता है। महाभारत के युद्ध के बाद बड़े साम्राज्य लुप्त होने लगे और कई गणतांत्रिक राज्यों का उदय हुआ। महाजनपद काल में सोलह महाजनपद जन्मे जिनमें काशी, कोशल, मगध, कुरू, अंग, अवंति, गंधार, वैशाली, मत्स्य इत्यादि सम्मिलित थे। इनमें से कुछ महाजनपदों में राजतंत्र व अन्यों में गणतंत्र थे। महावीर और गौतम बुद्ध दोनों ही गणतंत्र से आए थे। तत्कालीन बौद्ध भिक्षु संघ के कई नियम आधुनिक संसदीय शासन प्रणाली के नियमों से बहुत अधिक मिलते हैं। जैसे बैठक व्यवस्था, विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण, गणपूर्ति (कोरम), व्हिप, वोटों की गिनती, रोक प्रस्ताव, न्याय संबंधी विचार आदि। वज्जि संघ में तो सभी लोग एक साथ एकत्रित होकर अपनी सभाएँ करते थे। यह प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का रूप था। बज्जि संघ छः गणराज्यों से मिलकर बना था। मौर्यकालीन भारत में ग्रामों और नगरों में स्वशासन की व्यापक व्यवस्था थी। भारतीय समाज कृषि प्रधान था जिसकी मूल इकाई स्वशासित एवं स्वतंत्र ग्राम थे। राजनीतिक ढाँचा इन्हीं ग्राम समुदायों की ईकाइयों पर आधारित था। गाँवों का शासन चुनी गई पंचायत चलाती थी । गाँव के केन्द्र में पंचायत घर हुआ करता था, जहाँ बड़े-बूढ़े मिला करते थे। प्रत्येक वर्ष गाँव के सभी सदस्य मिलकर पंचायत का चुनाव किया करते थे। इन निर्वाचित ग्राम पंचायतों को गाँव के मामलों में पूरा अधिकार तथा न्याय करने का अधिकार भी प्राप्त था। पंचायतें ही जमीन का बँटवारा करती और कर एकत्रित करके गाँव की ओर से सरकार को भी देती थी। पंचायत के चुने हुए सदस्यों से कुछ समितियों का निर्माण किया जाता और प्रत्येक समिति एक वर्ष के लिए बनाई जाती थी। यदि कोई सदस्य दुर्व्यवहार करे तो उसे तुरंत हटाया जा सकता था। यदि कोई सदस्य जन कोष का उचित लेखा-जोखा पेश न करें तो उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता था। केन्द्रीय स्तर पर राजा का शासन था। राजा को यूरोप की भांति दैवी शक्ति का निरंकुश अधिकार नहीं था और यदि राजा दुर्व्यवहार करें तो प्रजा को उसे हटाने का भी अधिकार था। राजा को सलाह देने के लिए राज्य परिषद् हुआ करती थी। राजा प्रजा की इच्छा के अनुसार ही कार्य करता था और राजा के सलाहकार (मंत्री/ अधिकारो) स्थानीय स्तर के पंचों का सम्मान करते थे । अतः प्राचीन भारत में राजा के शासन का उद्देश्य प्रजा की सेवा करना था।

ब्रिटिश शासन काल में प्रजातांत्रिक संस्थाएँ : ब्रिटिश शासन द्वारा समय-समय पर भारतीयों को सीमित शक्तियाँ देने के प्रयास किए गए। इस हेतु ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम एवं भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा बनाए गए कानून वर्तमान भारतीय प्रजातंत्र की आंशिक पूर्वपीठिका कही जा सकती है। भारतीय समाज की प्राचीन ऐतिहासिक विरासत, एवं संस्कृति में प्रजातांत्रिक मूल्यों का पूर्व से ही व्यवहार था अतः ब्रिटिश शासन काल की वैधानिक व्यवस्थाएं भारतीय जनता द्वारा आसानी से मान्य की गई। यद्यपि उनमें प्रजातंत्र का औपचारिक रूप ही विद्यमान था, तथापि वह वर्तमान प्रजातंत्र का आरंभिक रूप कहा जा सकता है। सन् 1858, 1861 एवं 1892 में उपर्युक्त व्यवस्थाऐं स्थानीय शासन तक सीमित थी। सन् 1909, 1919 एवं 1935 के अधिनियमों का वर्तमान प्रजातंत्र की संसदीय प्रणाली के विकास में प्रमुख योगदान रहा।

वर्तमान में भारतीय प्रजातंत्र

वर्तमान में भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। संविधान लागू होते ही भारत एक सार्वभौम प्रजातांत्रिक गणतंत्र बन गया। संविधान द्वारा प्रजातंत्र के आधारभूत सिद्धांत के अनुरूप नागरिकों को सार्वभौम वयस्क मताधिकार दिया गया। समस्त वयस्क भारतीय नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मताधिकार प्रदान किया गया जिसके आधार पर जनता अपनी इच्छानुसार प्रतिनिधियों का चुनाव कर लोकप्रिय सरकार का निर्माण कर सके।
आज तक संपन्न हुए विभिन्न लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भारतीय नागरिकों के द्वारा सक्रिय सहभागिता एवं परिपक्वता का परिचय दिया गया है। आपातकाल (1975-1977) के अपवाद को छोड़कर समयबद्ध व निष्पक्ष चुनावों का संपन्न होना, भारतीय प्रजातंत्र की निरतंरता का सूचक है। इसके अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में संपन्न होने वाले पंचायतों, एवं नगरीय क्षेत्रों में नगरीय निकायों के चुनाव भी भारतीय प्रजातंत्र की व्यापकता का प्रमाण है।
भारत में प्रजातंत्र के मार्ग में कुछ चुनौतियाँ भी है। भारतीय प्रजातंत्र आज अशिक्षा, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, पृथकतावाद, सांप्रदायिकता, राजनीतिक हिंसा, सामाजिक-आर्थिक असमानता, धन व बाहुबल के वर्चस्व, भ्रष्टाचार और वोट बैंक की राजनीति की समस्याओं से प्रभावित हो रहा है।
सामाजिक- आर्थिक असमानता को दूर कर शिक्षा का प्रसार व नैतिक मूल्यों की स्थापना द्वारा इन समस्याओं से भारतीय प्रजातंत्र को मुक्त कराया जा सकता है। भारतीय जनमानस की प्रजातंत्र के प्रति प्रतिबद्धता है, यह विभिन्न समयबद्ध निर्वाचन व समय- समय पर संवैधानिक साधनों द्वारा आसानी से होने वाले सत्ता परिवर्तनों से स्पष्ट है। अतः भारत में प्रजातंत्र शासन को निरंतरता एवं सफलता की आशा की जा सकती है।

शब्दाबली

सम्प्रभुता : राज्य की सर्वोच्च सत्ता।
सम्प्रभू : समाज के समस्त लोग चाहे वे किसी भी जाति, सम्प्रदाय, लिंग, भाषा व क्षेत्र के हों, सर्वोच्च सत्ता के स्वामी हैं।
राज्य : निश्चित भू-भाग, जनसंख्या, सरकार और संप्रभुता से निर्मित समूह राज्य कहलाता है।
कैंटन : स्विट्जरलैण्ड के राजनैतिक या प्रशासनिक प्रान्त/ईकाई।
साम्यवाद : यह एक विचारधारा है, जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में आर्थिक समानता स्थापित करना है, जिससे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
अभिजन : लोगों का ऐसा समूह, जो समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। इस शब्द का प्रयोग विभिन्न क्षेत्रों के नेतृत्वों के लिए भी किया जाता है, जैसे राजनीतिक अभिजन।
गणराज्य : शासन का प्रमुख, लोगों द्वारा चुना हुआ व्यक्ति होगा न कि किसी वंश या राजवंश का।
पूर्व पीठिका : आरंभिक पृष्ठभूमि।
साध्य : उद्देश्य, जैसे राज्य का उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना।

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