संविधान संशोधन (Constitutional Amendment in hindi) | samvidhan sanshodhan

परिचय

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि कोई भी संविधान बगैर संशोधनों के जीवित नहीं रह सकता। संशोधन के तरीके भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। यदि किसी संविधान में संशोधन उसी प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है जिस प्रकार उस देश में साधारण कानून बनाए जाते हैं तो उस संविधान को लचीला संविधान कहा जाता है। किन्तु यदि संविधान में संशोधन के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है जो उस प्रक्रिया से भिन्न है जिससे साधारण कानून बनाए जाते हैं तो यह संविधान कठोर संविधान कहलाएगा।
संविधान में संशोधन करने और संसद द्वारा साधारण कानूनों के बनाने की प्रक्रिया एक होने के कारण ही इंग्लैण्ड के संविधान को 'लचीला संविधान' कहा जाता है। इंग्लैंड के विपरीत अमेरिका का संविधान कठोर है। वहां साधारण विधेयक तो विधानमण्डल में उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत से पारित होते हैं, किन्तु संविधान में संशोधन करने वाले विधेयकों को विधानमण्डल के दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत तथा 3/4 राज्यों के अनुमोदन से ही पारित किया जा सकता है। संशोधन की जटिल प्रक्रिया के कारण ही अमेरिका के संविधान में विगत दो सौ वर्षों से अधिक समय में केवल 26 संशोधन किए जा सके हैं।
भारत के संविधान में संशोधन करने का तरीका न तो इंग्लैंड की तरह बिल्कुल आसान है और न ही अमेरिका की तरह बहुत मुश्किल। इसीलिए भारतीय संविधान को लचीलेपन और कठोरता का सम्मिश्रण कहा जाता है।

संविधान संशोधन

भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान में उन सभी प्रावधानों का समावेश कर दिया था, जिनकी व्यवहार में आवश्यकता थी या भविष्य में हो सकती थी। लेकिन संविधान निर्माता इस तथ्य से परिचित थे कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता के कारण संविधान को परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए रखने के लिए संशोधन की आवश्यकता होगी। अत: संविधान के भाग-20 के अनुच्छेद-368 में संसद को संविधान संशोधन की शक्ति दी गई।
अनुच्छेद 368 - संविधान संशोधन करने की संसद की शक्ति और संशोधन की प्रक्रिया
  • संसद संविधान के किसी उपबंध का परिवर्तन या निरसन इस अनुच्छेद में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार कर सकेगी।
  • संविधान संशोधन का प्रारम्भ संसद के किसी भी सदन में विधेयक पुरःस्थापित करके किया जा सकता है। उस विधेयक को प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उस सदन में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। राष्ट्रपति की अनुमति के बाद संविधान उस निबंधनों के अनुसार संशोधित हो जाएगा।
लेकिन कुछ प्रावधानों को जो निम्नलिखित है :-
  • अनुच्छेद 54 : राष्ट्रपति का निर्वाचन
  • अनुच्छेद 55 : राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया
  • अनुच्छेद 73 और 162 : संघ और राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
  • उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 124-147) एवं उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 214 तथा 241)
  • सातवीं अनुसूची से सम्बंधित विषय
  • संविधान संशोधन करने की संसद की शक्ति
  • विधायी शक्तियों का वितरण (अनुच्छेद 245-255)
  • संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व के उपबंधों में, परिवर्तन करने के उपबंध वाला विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने से पहले कम से कम आधे राज्य विधानमंडलों की साधारण बहुमत के माध्यम से स्वीकृति आवश्यक है।
  • अनुच्छेद 13 की कोई बात इस अनुच्छेद के अधीन किए गए किसी संशोधन में लागू नहीं होगी।
  • इस अनुच्छेद के अंतर्गत किया गया संविधान संशोधन किसी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।
  • संविधान के उपबंधों का संशोधन करने के लिए संसद की संविधायी शक्ति पर किसी प्रकार का निबंधन नहीं होगा।

भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया

साधारण बहुमत द्वारा संशोधन
इसे 'कामचलाऊ बहुमत' (working majority) भी कहते हैं। यह सदन में उपस्थिति तथा सदन में मतदान करने वाले सदस्यों के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का बहुमत होता है, जिसमें किसी भी कारण से मतदान न करने वाले सदस्यों को सम्मिलित नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, यदि संसद में उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या 500 है तो 251 या उससे अधिक की संख्या साधारण बहुमत होगी। विश्वास प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, धन विधेयक, वित्त विधेयक या साधारण विधेयक, राज्य विधायिका द्वारा संसद के किसी संशोधन का सत्यापन आदि साधारण बहुमत से ही पारित किए जाते हैं।

पूर्ण बहुमत (Absolute majority)
यह सदन की कुल सदस्य संख्या के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का बहुमत होता है, जिन्होनें मतदान नहीं किया है। उदाहरण के लिए, राज्यसभा, जिसकी कुल सदस्य संख्या 245 है, के संबंध में 123 या उससे अधिक की संख्या पूर्ण बहुमत होगी।

वास्तविक बहुमत (Effective Majority)
यह सदन की वास्तविक सदस्य संख्या (जिसमें रिक्त स्थानों को सम्मिलित नहीं किया जाता) के 50 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का बहुमत है। दूसरे शब्दों में सदन की कुल सदस्य संख्या में से रिक्त स्थानों की संख्या को घटाकर वास्तविक सदस्य संख्या प्राप्त की जाती है। राज्यसभा (कुल सदस्य संख्या 245) के संदर्भ में, यदि रिक्त स्थानों की संख्या 15 है, तो वास्तविक सदस्य संख्या 230 होगी और इसके 50 प्रतिशत से अधिक अर्थात् 116 या उससे अधिक सदस्यों का बहुमत 'वास्तविक बहुमत' कहलाता है। भारत के उपराष्ट्रपति को पद से हटाए जाने के आशय का प्रस्ताव (जिसे केवल राज्यसभा में लाया जा सकता है) पारित किए जाने के लिए वास्तविक बहुमत की आवश्यकता पड़ती है।

विशेष बहुमत (Special Majority)
उपर्युक्त तीनों प्रकार से भिन्न शेष सभी प्रकार के बहुमतों को 'विशेष बहुमत' कहा जाता है। इनके निम्नलिखित प्रकार हैं-
अनुच्छेद 312 (एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का निर्माण ) तथा अनुच्छेद 249 (राज्य-सूची के विषय पर विधि बनाने की संसद् की शक्ति) के अन्तर्गत विशेष बहुमत-
  • यह वस्तुतः सदन में उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या का दो तिहाई सदस्यों का बहुमत होता है, जिसमें भाग न लेने वाले सदस्यों को सम्मिलित नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि राज्यसभा (सदस्य संख्या 245) के उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या 200 है, तो अनुच्छेद 249 के अंतर्गत इस 200 की दो तिहाई सदस्य संख्या ही विशेष बहुमत होगी। इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए एक अन्य उदाहरण द्रष्टव्य है। यदि सदन के 100 सदस्य उपस्थित है, जिसमें से 10 सदस्य मतदान में भाग नहीं लेते, तो ऐसी स्थिति में इस (100-10=90) का केवल दो तिहाई अर्थात् 60 से अधिक की संख्या अनुच्छेद 249 के अंतर्गत विशेष बहुमत मानी जाएगी।
  • अनुच्छेद 61 (भारत के राष्ट्रपति पर महाभियोग) के अंतर्गत विशेष बहुमत अनुच्छेद 61 के अंतर्गत किसी प्रस्ताव को सदन की कुल सदस्य संख्या के दो तिहाई या उससे अधिक सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित किया जाना चाहिए, जिसमें रिक्त स्थानों की संख्या को भी सम्मिलित किया जाता है। उदाहरण के लिए, भारत के राष्ट्रपति के महाभियोग प्रस्ताव पारित किए जाने के लिए उच्च सदन (राज्यसभा) के सदस्यों की कुल संख्या के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन की आवश्यकता है। राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 के दो तिहाई, अर्थात् 164 या अधिक सदस्यों का बहुमत ही अनुच्छेद 61 के अंतर्गत विशेष बहुमत कहलाएगा।
  • अनुच्छेद 368 (संविधान संशोधन) के अंतर्गत विशेष बहुमत संविधान संशोधन विधेयक को पारित किए जाने के लिए सदन में उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई या अधिक सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता है। इसके लिए संसद् के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक का कोई प्रावधान नहीं है। दोनों सदनों में ऐसे विधेयकों को पृथक्-पृथक् रूप से पारित किया जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, यह बहुमत वास्तविक बहुमत भी होना चाहिए। संविधान संशोधन विधेयक, सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रकमहालेखापरीक्षक इत्यादि को पद से हटाए जाने के संकल्प (resolution) अनुच्छेद 368 के अंतर्गत विशेष बहुमत द्वारा पारित किए जाते हैं। ध्यातव्य है कि जहाँ कहीं भी संविधान में बहुमत के प्रकार का उल्लेख न हो, वहाँ साधारण बहुमत से अभिप्राय माना जाता है।

संविधान संशोधन-प्रक्रिया की विलक्षणताएँ

भारतीय संविधान में संशोधन की जो प्रक्रिया निर्धारित की गई है वह ब्रिटिश ओर अमेरिका संविधानों से निम्नलिखित रूप में भिन्न हैं:-
  • इंग्लैण्ड में संसद प्रभुत्वसंपन्न है इसलिए वह पूरी सांविधानिक व्यवस्था को साधारण विधायी प्रक्रिया से बदल सकती है। भारत में संसद संविधान के कुछ ही उपबंधों को साधारण विधायी प्रक्रिया से संशोधित कर सकती है, शेष संविधान में संशोधन के लिए विशेष बहुमत अथवा विशेष प्रक्रिया अपनानी होगी। अमेरिकी संविधान में वहाँ की काँगेस अकेले कोई संशोधन नहीं कर सकती।
  • भारत में संविधान संशोधन के मामले में राज्यों को पहल करने का अधिकार नहीं दिया गया है। संशोधन का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में ही पेश किया जा सकता है राज्यों या राज्य-विधानमण्डलों की तरफ से यह प्रस्ताव नहीं आ सकता। अमेरिका में राज्यों को भी संविधान में संशोधन के लिए प्रस्ताव करने का सांविधानिक अधिकार प्रदान किया गया है।
  • अमेरिका में कोई भी संशोधन बिना राज्यों के अनुमोदन के नहीं किया जा सकता जबकि भारत में संविधान का एक बड़ा भाग केवल संसद के विशेष बहुमत से बिना राज्यों की स्वीकृति के संशोधित किया जा सकता है।
  • भारत में केवल आधे राज्य-विधान-मण्डलों की स्वीकृति से संविधान में संशोधन किया जा सकता है जबकि अमेरिका में 3/4 राज्यों द्वारा अनुमोदन आवश्यक ठहराया गया है।
  • अमेरिका में संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं ली जाती है। भारत में साधारण विधेयकों की तरह ही संशोधन विधेयक भी राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है और राष्ट्रपति के लिए उस पर अपनी स्वीकृति देना अनिवार्य है। इस प्रावधान के कारण संसद की संशोधन-शक्ति स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है।
  • अमेरिका की तरह भारत में भी समस्त सांविधानिक न्यायिक पुनरावलोकन की परिधि में आते हैं। केशवानंद भारती के मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार किसी भी संशोधन को न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह संविधान के आधारिक या मूल ढाँचे के प्रतिकूल है।
  • भारतीय संविधान में उन प्रावधानों के संशोधन के लिए राज्य-विधानमण्डलों के अनुमोदन की आवश्यकता है जिन उपबंधों का संबंध राज्य सरकारों के गठन और शक्तियों से है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अनुच्छेद 2-4 के प्रावधानों (नए राज्यों का निर्माण: राज्यों के नाम और सीमाओं में परिवर्तन आदि) में संशोधन संसद केवल साधारण बहुमत से कर सकती है। अपनी इस शक्ति का प्रयोग करके संसद राज्यों के स्वरूप को ही बदल सकती है। अमेरिका में ऐसा करना संभव नहीं है।

मूल ढांचा

  • मूल अधिकारों में संशोधन के विषय पर न्यायपालिका का दृष्टिकोण परिवर्तित होता रहा है। 'शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ वाद' में उच्चतम न्यायालय का मत था कि संसद मूल अधिकारों को परिवर्तित या संशोधित कर सकती है। लेकिन 1967 में गोलकनाथ वाद में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व मत को उलटते हुए यह दृष्टिकोण प्रतिपादित किया कि संसद मूल अधिकारों में कोई संशोधन नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करना अनुच्छेद 13(3) के उपबंधों के प्रतिकूल है।
  • 1973 में 'केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य' के वाद में उच्चतम न्यायालय ने पूर्व निर्णय को पुनः उलटते हुए कहा कि संसद मूल अधिकारों सहित पूरे संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे को परिवर्तित नहीं कर सकती। इस प्रकार इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने मूल ढांचे की अवधारणा को प्रतिपादित किया।
  • संसद ने 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा अनुच्छेद 368 का संशोधन कर घोषित किया कि किसी भी संशोधन को मूल अधिकारों से जोड़ने के आधार पर किसी भी न्यायालय में प्रश्न नहीं किया जा सकता। लेकिन मिनरवा मिल्स मामले, 1980 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मूल ढांचे को न्यायिक समीक्षा से बाहर करना अवैध है। वामनराव बनाम भारत संघ (1981) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मूल ढांचे में संशोधन नहीं हो सकता। उच्चतम न्यायालय ने मूल ढांचे को परिभाषित तो नहीं किया है लेकिन समय-समय पर अपने निर्णयों में निम्नलिखित को मूल ढांचे में शामिल किया है:-
  1. विधि का शासन
  2. संविधान की सर्वोच्चता
  3. संविधान की पंथनिरपेक्ष प्रकृति
  4. भारतीय राजव्यवस्था की सम्प्रभु, लोकतांत्रिक प्रकृति
  5. विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियों में पृथक्कता
  6. राष्ट्र की एकता और अखंडता
  7. न्यायिक समीक्षा
  8. व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं सम्मान
  9. संसदीय प्रणाली
  10. कल्याणकारी राज्य
  11. मूल अधिकारों और नीति-निदेशक तत्त्वों के बीच सहमति और संतुलन
  12. समानता का सिद्धांत
  13. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन
  14. संविधान संशोधन के सम्बंध में संसद की सीमित शक्तियां
  15. न्यायपालिका की स्वतंत्रता इत्यादि।

भारतीय संविधान के प्रमुख संशोधन

विगत 70 वर्षों में भारतीय संविधान में 124+ संशोधन किए गए हैं। इन संशोधनों के द्वारा संविधान में नए अध्याय और अनुच्छेद जोड़े गए, पुराने अनुच्छेदों का संशोधन, परिवर्द्धन तथा निरसन किया गया और वर्तमान उपबंधों के स्पष्टीकरण हेतु उनमें भाषायी परिवर्तन किए गए। कुछ संशोधन प्रकृति के थे और कुछ संशोधनों का उद्देश्य देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था मे आमूल परिवर्तन लाना था। संक्षेप में, सांविधानिक संशोधनों का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक और उनके लक्ष्य बहुआयामी रहे।
संविधान में अब तक किए गए संशोधनों में से कुछ संशोधन अत्यधिक महत्वपूर्ण और मौलिक प्रकृति के हैं जिनका उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है।

प्रथम संविधान संशोधन, 1951
अपने लक्ष्य की दृष्टि से संविधान का पहला संशोधन सामाजिक और आर्थिक न्याय स्थापित करने की दिशा में पहला कदम था। इस संशोधन के द्वारा समानता के मूल अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 15 में खण्ड 4 जोड़कर सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष सुविधाएँ दिए जाने का प्रावधान किया गया और यह स्पष्ट कर दिया गया कि इस प्रकार के विशेष उपबंध अथवा आरक्षण को समानता के अधिकार (अनुच्छेद-15) का उल्लंघन नहीं समझा जाएगा। इसी संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 31 में अनुच्छेद 31 क और ख जोड़कर, तथा विभिन्न राज्यों द्वारा पारित भूमि सुधार अधिनियमों को नवीं अनुसूची के रूप में संविधान में सम्मिलित करके उन्हें न्यायपालिका की परिधि से बाहर कर दिया गया और इस प्रकार जमींदारी उन्मूलन की नीति को कार्यान्वित किया गया।

दूसरा संविधान संशोधन, 1952
इसके अंतर्गत 1951 ई. की जनगणना के आधार पर लोकसभा में प्रतिनिधित्व को पुनर्व्यवस्थित किया गया।

तीसरा संविधान संशोधन, 1954
इसके अंतर्गत सातवीं अनुसूची को समवर्ती सूची की तैंतीसवीं प्रविष्टि के स्थान पर खाद्यान्न, पशुओं के लिए चारा, कच्चा कपास, जूट आदि को रखा गया, जिसके उत्पादन एवं आपूर्ति को लोकहित में समझने पर सरकार उस पर नियंत्रण लगा सकती है।

चौथा संविधान संशोधन, 1955
इसके अंतर्गत व्यक्तिगत संपत्ति को लोकहित में राज्य द्वारा हस्तगत किये जाने की स्थिति में, न्यायालय इसकी क्षतिपूर्ति के संबंध में परीक्षा नहीं कर सकती।

पांचवां संविधान संशोधन, 1955
राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई कि वह राज्यों के क्षेत्र, सीमा और नामों को प्रभावित करने वाले प्रस्तावित केंद्रीय विधान पर अपने मत देने के लिए राज्यमंडलों हेतु समय-सीमा का निर्धारण करें।

छठा संविधान संशोधन, 1956
इस संशोधन द्वारा सातवीं अनुसूची के संघ सूची में परिवर्तन कर अंतरराज्यीय बिक्री कर के अंतर्गत कुछ वस्तुओं पर केंन्द्र को कर लगाने का अधिकार दिया गया।

7वां संविधान संशोधन, 1956
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और पारिणामिक परिवर्तनों को शामिल करने के उद्देश्य से यह संशोधन किया गया। राज्यों और राज्य क्षेत्रों को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के रूप में वर्गीकरण किया गया। संशोधन में लोकसभा का गठन, प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन, नए उच्च न्यायालयों की स्थापना और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों आदि के बारे में उपबंधों की भी व्यवस्था की गई है।

8वां संविधान संशोधन, 1959
इसके अंतर्गत केन्द्र एवं राज्यों के निम्न सदनों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं आंग्ल-भारतीय समुदायों के आरक्षण संबंधी प्रावधानों को दस वर्षों के लिए अर्थात् 1970 ई. तक बढ़ा दिया गया।

9वां संविधान संशोधन, 1960
इसके द्वारा संविधान की प्रथम अनुसूची में परिवर्तन करके भारत और पाकिस्तान के बीच 1958 की संधि की शर्तों के अनुसार बेरुबारी, खुलना आदि क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिये गये।

10वां संविधान संशोधन, 1961
इसके अंतर्गत भूतपूर्व पुर्तगाली अंतःक्षेत्रों-दादर एवं नगर हवेली को भारत में शामिल कर उन्हें केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया।

11वां संविधान संशोधन, 1961
इसके अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रावधानों में परिवर्तन कर, इस संदर्भ में दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को बुलाया गया। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि निर्वाचकमंडल में पद की रिक्तता के आधार पर राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को चुनौती नहीं दी जा सकती।

12वां संविधान संशोधन, 1962
इसके अंतर्गत संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन कर गोवा, दमण एवं दीव को भारत में केंद्रशासित प्रदेश के रूप में शामिल कर लिया गया।

13वां संविधान संशोधन, 1962
इसके अंतर्गत नगालैंड के संबंध में विशेष प्रावधान अपनाकर उसे एक राज्य का दर्जा दे दिया गया।

14वां संविधान संशोधन, 1963
इसके द्वारा केंद्रशासित प्रदेश के रूप में पुदुचेरी को भारत में शामिल किया गया। साथ ही, इसके द्वारा हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, गोवा, दमन और दीव तथा पुदुचेरी केंद्रशासित प्रदेशों में विधानपालिका एवं मंत्रिपरिषद् की स्थापना की गई।

15वां संविधान संशोधन, 1963
इसके अंतर्गत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवामुक्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई तथा अवकाश प्राप्त न्यायाधीशों की उच्च न्यायालय में नियुक्ति से संबंधित प्रावधान बनाये गये।

16वां संविधान संशोधन, 1963
इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 19 में यह उपबंध कर दिया गया कि राष्ट्र की प्रभुता और अखण्डता के हित में वाक् स्वतंत्रता, विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सम्मेलन करने और संघ बनाने की स्वतंत्रता पर कानून द्वारा तर्कसंगत प्रतिबंध लगाया जा सकता है। किसी भी राज्य द्वारा भारतीय संघ से पृथक होने तथा संघ को भंग करने के प्रयास को अवैध घोषित किया गया।

17वां संविधान संशोधन, 1964
इसमें संपत्ति के अधिकारों में और भी संशोधन करते हुए कुछ अन्य भूमि सुधार प्रावधानों को नौवीं अनुसूची में रखा गया, जिनकी वैधता की परीक्षा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती थी।

18वां संविधान संशोधन, 1966
इसके अंतर्गत पंजाब का भाषायी आधार पर पुनर्गठन करते हुए पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब एवं हिन्दी भाषी क्षेत्र को हरियाणा के रूप में गठित किया गया। पर्वतीय क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को दे दिये गये तथा चंडीगढ़ को केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया।

19वां संविधान संशोधन, 1966
इसके अंतर्गत चुनाव आयोग के अधिकारों में परिवर्तन किया गया एवं उच्च न्यायालयों को चुनावयाचिकाएँ सुनने का अधिकार दिया गया।

20वां संविधान संशोधन, 1966
इसके अंतर्गत अनियमितता के आधार पर नियुक्त कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति को वैधता प्रदान की गई।

21वां संविधान संशोधन, 1967
इसके द्वारा सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची के अंतर्गत पंद्रहवीं भाषा के रूप में शामिल किया गया।

22वां संविधान संशोधन, 1969
इसके द्वारा असम से अलग करके एक नया राज्य मेघालय बनाया गया।

23वां संविधान संशोधन, 1969
इसके अंतर्गत विधान पालिकाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के आरक्षण एवं आंग्लभारतीय समुदाय के लोगों का मनोनयन और दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।

24वां संविधान संशोधन, 1971
इस संशोधन के द्वारा अनुच्छेद 368 में संशोधन करके संसद को मूल अधिकारों सहित पूरे संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान की गई। 25वां संशोधन, 1971 संविधान के अनुच्छेद 31 में एक नया अनुच्छेद 31(ग) को समाहित करके अनुच्छेद 39 बी.सी. (नीति-निदेशक सिद्धान्त) को मूल अधिकारों पर प्रधानता दी गई। देश में आर्थिक न्याय को स्थापित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रयास था। इस संशोधन के बाद से सरकार और विशेषकर न्यायपालिका नीति-निदेशक सिद्धान्तों के कार्यान्वयन के प्रति ज्यादा गंभीर और सक्रिय हो गई।

25वां संविधान संशोधन, 1971
संपत्ति के मूल अधिकार में कटौती। अनुच्छेद-39 (ख) या (ग) में वर्णित निदेशक तत्वों को प्रभावी करने के लिए बनाई गई किसी भी विधि को अनुच्छेद-14, 19 और 31 द्वारा अभिनिश्चित अधिकारों के उल्लंखन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

26वां संविधान संशोधन, 1971
देशी रियासतों के पूर्व नरेशों को मिलने वाली प्रिवी पर्सेज़ को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 291 तथा 362 को निरस्त कर दिया गया।

27वां संविधान संशोधन, 1971
इसके अंतर्गत मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश को केन्द्रशासित प्रदेशों के रूप में स्थापित किया गया।

29वां संविधान संशोधन, 1972
इसके अंतर्गत केरल भू-सुधार (संशोधन) अधिनियम, 1969 तथा केरल भू-सुधार (संशोधन)अधिनियम, 1971 को संविधान की नौवीं अनुसूची में रख दिया गया, जिससे इसकी संवैधानिक वैधता को न्यायालय में चुनौती न दी जा सके। 

31वां संविधान संशोधन, 1973
इसके द्वारा लोकसभा के सदस्यों की संख्या 525 से 545 कर दी गई तथा केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व 25 से घटाकर 20 कर दिया गया।

32वां संविधान संशोधन, 1974
इसके द्वारा संसद एवं विधान पालिकाओं के सदस्यों द्वारा दबाव में या जबरदस्ती किये जाने पर इस्तीफा देना अवैध घोषित किया गया एवं अध्यक्ष को यह अधिकार दिया गया कि वह सिर्फ स्वेच्छा से दिये गये एवं उचित त्यागपत्र को ही स्वीकार करे। 

34वां संविधान संशोधन, 1974
इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों द्वारा पारित बीस भू-सुधार अधिनियमों को नौवीं अनुसूची में प्रवेश देते हुए उन्हें न्यायालय द्वारा संवैधानिक वैधता के परीक्षण से मुक्त किया गया।

35वां संविधान संशोधन 1974
इसके अंतर्गत सिक्किम का संरक्षित राज्यों का दर्जा समाप्त कर उसे सम्बद्ध राज्य के रूप में भारत में प्रवेश दिया गया।

36वां संविधान संशोधन, 1975
इसके अंतर्गत सिक्किम को भारत का बाईसवां राज्य बनाया गया।

37वां संविधान संशोधन, 1975
इसके तहत आपात स्थिति की घोषणा और राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रशासनिक प्रधानों द्वारा अध्यादेश जारी किये जाने को अविवादित बनाते हुए न्यायिक पुनर्विचार से उन्हें मुक्त रखा गया।

39वां संविधान संशोधन, 1975
यह संशोधन विशेषकर श्रीमती गांधी को राजनैतिक लाभ देने के लिए किया गया था। लोक सभा की सदस्यता के लिए उनका निर्वाचन उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया था और उन्हें छ: वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अनर्ह घोषित कर दिया गया था। इस संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 329 क जोड़कर यह उपबन्ध किया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन को तथा लोकसभा के सदस्य के रूप में प्रधानमंत्री और लोकसभा के स्पीकर के निर्वाचन को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। उसे केवल ऐसे प्राधिकारी के समक्ष चुनौती दी जाएगी जो संसद विधि द्वारा नियुक्त करे। इस संशोधन को भूतलक्षी प्रभाव देकर श्रीमती गांधी के विरूद्ध दिए गए उच्च न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी बना दिया गया। बाद में 1978 में 44वें संशोधन द्वारा उपर्युक्त अनुच्छेद 329क निरस्त कर दिया गया।

41वां संविधान संशोधन, 1976
इसके द्वारा राज्य लोकसेवा आयोग के सदस्यों की सेवा मुक्ति की आयु सीमा 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई, पर संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की सेवा-निवृत्ति की अधिकतम आयु 65 वर्ष रहने दी गई।

42वां संविधान संशोधन, 1976
इस संशोधन द्वारा संविधान में अनेक महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। ये संशोधन मुख्यतः स्वर्णसिंह आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए थे।
कुछ महत्वपूर्ण संशोधन समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और राष्ट की अखंडता के उच्चादर्शों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने, नीति निदेशक सिद्धांतों को अधिक व्यापक बनाने और उन्हें उन मूल अधिकारों, जिनकी आड़ लेकर सामाजिक-आर्थिक सुधारों को निष्फल बनाया जाता रहा है, पर वरीयता देने के उद्देश्य से किए गए। इस संशोधन द्वारा नागरिकों के मूल कर्त्तव्यों के संबंध में एक नया अध्याय जोड़ा गया और समाज विरोधी गतिविधियों से, चाहे वे व्यक्तियों द्वारा हों या संस्थाओं द्वारा, निपटने के लिए विशेज उपबंध किए गए। कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेने के लिए न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करने तथा किसी कानून को संवैधानिक दृष्टि से अवैध घोषित करने के लिए कम-से-कम दो तिहाई न्यायाधीशों की विशेष बहुमत व्यवस्था करके न्यायपालिका संबंधी उपबंधों का भी संशोधन किया गया।
उच्च न्यायालयों में अनिर्णित मामलों की बढ़ती हुई संख्या को कम करने के लिए और सेवा, राजस्व, सामाजिक-आर्थिक विकास और प्रगति के संदर्भ में कतिपय अन्य मामलों के शीघ्र निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए इस संशोधनकारी अधिनियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन ऐसे मामलों में उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को सुरक्षित रखते हुए प्रशासनिक और अन्य न्यायाधिकरणों के गठन के लिए उपबंध किया गया। अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालयों के रिट अधिकार क्षेत्र में भी कुछ संशोधन किया गया।

43वां संविधान संशोधन, 1978
1977 में जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने के बाद 42वें संशोधन के कुछ प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया।
संविधान के 43वें संशोधन के अनुच्छेद 31 (घ) को निरस्त कर दिया जिसके द्वारा संसद को राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को रोकने और राष्ट्र-विरोधी संस्थाओं को प्रतिबंधित करने के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया था और यह प्रावधान किया गया था कि ऐसे कानून को मल अधिकारों के प्रतिकूल होने के बाद भी असंवैधानिक घोषित न किया जा सकेगा। 42वें संशोधन द्वारा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय की पुनरावलोकन की शक्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों को समाप्त करके उनके अधिकारों को पूर्ववत् कर दिया गया।

44वां संविधान संशोधन, 1978
संपत्ति के अधिकार को, जिसके कारण संविधान में कई संशोधन करने पड़े, मूल अधिकार के रूप में हटाकर केवल विधिक अधिकार बना दिया गया। फिर भी यह सुनिश्चित किया गया कि संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटाने से अल्पसंख्यकों के अपनी पसंद के शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने और संचालन संबंधी अधिकारों पर कोई प्रभाव न पड़े। संविधान के अनुच्छेद 352 का संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि आपात स्थिति की घोषणा के लिए एक कारण 'सशस्त्र विद्रोह' होगा। आंतरिक अशांति, यदि यह सशस्त्र विद्रोह नहीं है तो आपात स्थिति की घोषणा के लिए आधार नहीं होगा।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को, जैसा कि अनुच्छेद 21 और 22 में दिया गया है, इस उपबंध द्वारा और अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। इसके अनुसार निवारक निरोध कानून के अधीन व्यक्ति को किसी भी स्थिति में दो महीने से अधिक अवधि के लिए नजरबंद नहीं रखा जा सकता, जब तक कि सलाहकार बोर्ड यह रिपोर्ट नहीं देता कि ऐसी नजरबंदी के पर्याप्त कारण हैं। इसके लिए अतिरिक्त संरक्षण की व्यवस्था इस अपेक्षा से की गई कि सलाहकार बोर्ड का अध्यक्ष किसी समचित उच्च न्यायालय का सेवारत न्यायाधीश होगा और बोर्ड का गठन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों के अनुसार किया जाएगा।

46वां संविधान संशोधन, 1982
इसके द्वारा अनुच्छेद 269 का संशोधन किया गया, ताकि अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य के दौरान भेजे जाने वाले सामान पर लगाया गया कर राज्यों को सौंप दिया जाए। इस अनुच्छेद का संशोधन इस दृष्टि से भी किया गया, ताकि संसद कानून द्वारा यह निर्धारित कर सके कि किस स्थिति में भेजा जाने वाला प्रविष्टि 92ख भी शामिल की गई, ताकि ऐसी स्थिति में जब माल अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान भेजा जाए तो उस माल पर कर लगाया जा सके। अनुच्छेद 286 के खंड (3) का संशोधन किया गया, ताकि संसद कानून द्वारा कार्य-संविदा के निष्पादन के दौरान वस्तुओं के हस्तांतरण में, किराया-खरीद अथवा किस्तों में अदायगी के आधार पर माल की सुपुर्दगी पर कर लगाने की प्रणाली, दरों और अन्य बातों के संबंध में प्रतिबंध और शर्ते विनिर्दिष्ट कर सकें। 'माल के क्रय और विक्रय पर कर' की परिभाषा में यह जोड़ने के लिए अनुच्छेद 366 का यथोचित संशोधन किया गया कि उसमें नियंत्रित वस्तुओं के प्रतिफलार्थ अंतरण, कार्य-संविदा के निष्पादन से संबंधित वस्तुओं के रूप में संपत्ति का अंतरण, किराया-खरीद अथवा किस्तों में अदायगी आदि की प्रणाली में माल की सुपुर्दगी को भी शामिल किया जा सके।

50वां संविधान संशोधन, 1984
इसके द्वारा अनुच्छेद-33 में संशोधन कर सैन्य सेवाओं की पूरक सेवाओं में कार्य करने वालों के लिए आवश्यक सूचनाएँ एकत्रित करने, देश की संपत्ति की रक्षा करने और कानून तथा व्यवस्था से संबंधित दायित्व भी दिये गये। साथ ही, इन सेवाओं द्वारा उचित कर्तव्य-पालन हेतु संसद को कानून बनाने के अधिकार भी दिये गये।

52वां संविधान संशोधन, 1985
इस संशोधन के द्वारा दल-बदल पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई, इसीलिए इसे 'दल-बदल विरोधी अधिनियम' कहा जाता है। इस अधिनियम द्वारा यह प्रावधान किया गया कि संसद या राज्य-विधानसभा के सदस्य की सदस्यता समाप्त हो जाएगी यदि-
  • वह स्वेच्छा से अपने दल से त्यागपत्र दे
  • यदि वह अपने दल के ह्विप के विरूद्ध सदन में मतदान करने या मतदान में अनुपस्थित रहे
  • यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनैतिक दल में सम्मिलित हो जाए
  • यदि कोई मनोनीति सदस्य शपथ लेने के छः महीने बाद किसी राजनैतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले।
अधिनियम में उपर्युक्त प्रावधान के दो अपवाद बताए गए थे:-
  1. यदि किसी दल के 1/3 या उससे अधिक सदस्य मूल पार्टी से अलग हो जाएँ तो इसे दल-विभाजन (Split) माना जाएगा और ऐसी दशा में पार्टी छोड़ने वालो की सदस्यता समाप्त नहीं होगी।
  2. यदि दो या उससे अधिक राजनीतिक दल अलग-अलग अपने 2/3 बहुमत से किसी दूसरी पार्टी में विलय होने का निर्णय लें तो इसे दल-विलयन कहा जाएगा और ऐसे सदस्यों की सदस्यता का अन्त नहीं होगा।

53वां संविधान संशोधन, 1986
इसके अंतर्गत अनुच्छेद-371 में खंड 'जी' जोड़कर मिजोरम को राज्य का दर्जा दिया गया।

54वां संविधान संशोधन, 1986
इसके द्वारा संविधान की दूसरी अनुसूची के भाग 'डी' में संशोधन कर न्यायाधीशों के वेतन में वृद्धि का अधिकार संसद को दिया गया।

55वां संविधान संशोधन, 1986
इसके अंतर्गत अरुणाचल प्रदेश को राज्य बनाया गया।

56वां संविधान संशोधन, 1987
इसके अंतर्गत गोवा को एक राज्य का दर्जा दिया गया तथा दमन और दीव को केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में ही रहने दिया गया।

57वां संविधान संशोधन, 1987
इसके अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के संबंध में मेघालय, मिजोरम, नगालैंड एवं अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा सीटों का परिसीमन इस शताब्दी के अंत तक के लिए किया गया।

58वां संविधान संशोधन, 1987
इसके द्वारा राष्ट्रपति को संविधान का प्रामाणिक हिन्दी संस्करण प्रकाशित करने के लिए अधिकृत किया गया।

60वां संविधान संशोधन, 1988
इसके अंतर्गत व्यवसाय-कर की सीमा। 250 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष कर दी गई।

61वां संविधान संशोधन, 1989
इसके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 326 का संशोधन करके मताधिकार की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई है। ताकि देश के उस युवा-वर्ग को जिसे अभी तक कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया था, अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिल सके और वे राजनीतिक प्रक्रिया का अंग बन सकें।

65वां संविधान संशोधन, 1990
संविधान के अनुच्छेद 338 में एक विशेष अधिकारी का प्रावधान है, जो संविधान के तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के हितों से संबंधित मामलों की जांच करेगा और इस संबंध में राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेजेगा। यह अनुच्छेद संशोधित कर दिया गया है। जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा पांच अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति अपनी मुहर से नियुक्त करेंगे। संशोधित अनुच्छेद में आयोग के कार्यों के बारे में विस्तार से बताया गया है और उसके उन कदमों के बारे में भी बताया गया है, जो उसे केंद्र अथवा राज्य सरकार को कमीशन की रिपोर्ट के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उठाने होंगे। इसमें यह भी व्यवस्था की गई है कि आयोग के पास शिकायत पर की जाने वाली जांच के दौरान वे सभी अधिकार होंगे, जो एक न्यायिक अदालत को होते हैं और आयोग की रिपोर्ट संसद और राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखी जाएगी।

69वां संविधान संशोधन, 1991
दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाया गया तथा दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद् का उपबंध किया गया।

70वां संविधान संशोधन, 1992
दिल्ली और पुदुचेरी संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के सदस्यों को राष्ट्रपति के लिए निर्वाचक मंडल में सम्मिलित किया गया।

71वां संविधान संशोधन, 1992
आठवीं अनुसूची में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषा को सम्मिलित किया गया।

73वां संविधान संशोधन, 1992
संविधान के 73वें संशोधन द्वारा पंचायती राज व्यवस्था को सांविधानिक दर्जा प्रदान किया गया। संविधान में एक नया भाग (भाग-9) तथा एक नई अनुसूची (11वीं अनुसूची) जोड़ी गई जिसके द्वारा पंचायतों के संगठन तथा शक्तियों आदि का संविधान में उल्लेख किया गया। इस संशोधन बाद पंचायती राज भारतीय शासन व्यवस्था का अटूट अंग बन गया।

74वां संविधान संशोधन, 1993
संविधान में नगर पालिकाओं के संबंध में एक नया भाग 9ए शामिल किया गया है, ताकि अन्य चीजों के अलावा निम्नलिखित प्रावधान किए जा सकें: तीन तरह की पालिकाओं का गठन जैसे कि ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे क्षेत्रों के लिए नगर पंचायतें, छोटे शहरी क्षेत्रों के लिए नगर परिषदें और बड़े शहरी क्षेत्रों के लिए नगर निगम।

76वां संविधान संशोधन, 1994
तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्य के पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सरकारी नौकरियों में कुल 69 प्रतिशत आरक्षण देने वाले अधिनियम को संविधान की नवीं अनुसूची में शामिल करके उसे सांविधानिक मान्यता दे दी गई।

77वां संविधान संशोधन, 1995
संविधान के अनुच्छेद 16 में एक नई धारा (4ए) जोड़कर उसमें संशोधन किया जाए, ताकि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पदोन्नतियों में आरक्षण प्रदान किया जा सके। यह कानून उपरोक्त उद्देश्य पूरा करने के लिए हैं।

78वां संविधान संशोधन, 1995
इसके द्वारा नौवीं अनुसूची में विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 27 भूमि सुधार विधियों को समाविष्ट किया गया है। इस प्रकार नौवीं अनुसूची में सम्मिलित अधिनियमों की कुल संख्या 284 हो गयी है।

79वां संविधान संशोधन, 1999
अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि 25 जनवरी 2010 ई. तक के लिए बढ़ा दी गई है। इस संशोधन के माध्यम से व्यवस्था की गई कि अब राज्यों को प्रत्यक्ष केन्द्रीय करों से प्राप्त कुल धनराशि का 29% हिस्सा मिलेगा।

81वां संविधान संशोधन, 2000
इस संशोधन के द्वारा व्यवस्था की गई है कि संविधान के अनुच्छेद 16 की किसी भी व्यवस्था के अधीन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए वर्ष में जितने खाली सरकारी पद आरक्षित हैं यदि वे पद उस वर्ष नहीं भरे जाते हैं तो उन पर आगामी वर्ष में या वर्गों में जो नियुक्तियां की जाएंगी उन्हें पृथक वर्ग की नियुक्ति समझा जाएगा तथा उस वर्ग की नियुक्तियों को सम्बद्ध नियुक्ति वर्ष के कुल पदों के पचास प्रतिशत आरक्षित पदों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने के लिए शामिल नहीं किया जाएगा।

82वां संविधान संशोधन, 2000
इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 355 में संशोधन करके केन्द्र और राज्यो के अधीन सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रिक्त स्थानों की भर्ती के लिए न्यूनतम अर्हताओं में छुट तथा पदोन्नति मानदंडों मे छुट देने के प्रावधान किए गए।

83वां संविधान संशोधन, 2000
इस संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का प्रावधान न करने की छूट प्रदान की गई है। अरुणाचल प्रदेश में कोई भी अनुसूचित जाति न होने के कारण उसे यह छूट प्रदान की गई है।

84वां संविधान संशोधन, 2001
इस संशोधन अधिनियम द्वारा लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों की संख्या में वर्ष 2026 ई. तक कोई परिवर्तन न करने का प्रावधान किया गया है।

85वां संविधान संशोधन, 2001
सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए पदोन्नतियों में आरक्षण की व्यवस्था।

86वां संविधान संशोधन, 2002
इसका संबंध अनुच्छेद 21 के पश्चात् जोड़े गए नए अनुच्छेद 21ए से है। नया अनुच्छेद 21ए, शिक्षा के अधिकार से संबंधित है - "राज्य को छह से 14 साल तक के सभी बच्चों को निशल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करानी होगी। यह संबंधित राज्य द्वारा निर्धारित कानून के तहत होगी।"
संविधान के अनुच्छेद 45 में निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा गया है जिसमें छह साल से कम उम्र के बच्चों की शुरुआती देखभाल और उनकी शिक्षा की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 45 "राज्य को तब तक सभी बच्चों को शुरुआती देखभाल और शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए प्रयास करना होगा जब तक वह छह साल की आयु का नहीं हो जाता है।"
संविधान के अनुच्छेद 51ए में संशोधन करके एक नया मूल कर्त्तव्य जोडा गया है, "इसमें छह साल से 14 साल की आयु के बच्चे के माता-पिता या अभिभावक अथवा संरक्षक को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने के लिए अवसर उपलब्ध कराने का प्रावधान है।"

87वां संविधान संशोधन, 2003
परिसीमन में जनसंख्या का आधार 1991 ई. की जनगणना के स्थान पर 2001 ई. कर दी गई है।

88वां संविधान संशोधन, 2003
सेवाओं पर कर का प्रावधान।

89वां संविधान संशोधन, 2003
इसके द्वारा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के दो भागों में विभाजित कर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338ए) अलग अलग बनाए गए। दोनों ही आयोगों में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष तथा 3 अन्य सदस्य होंगे, जो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाएंगे।

90वां संविधान संशोधन, 2003
असम विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों और गैर अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व बरकरार रखते हुए बोडोलैंड, टेरीटोरियल कौंसिल क्षेत्र, गैर-जनजाति के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा।

91वां संविधान संशोधन, 2003
91वें संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया गया कि केन्द्र और राज्यो में मंत्रिपरिषद् का अधिकतम आकार निचले सदन की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक न होगा। दल-बदल को रोकने के लिए इस प्रावधान को समाहित किया गया। अतीत में मंत्रिपद को प्रलोभन दल-परिवर्तन का एक बड़ा कारण रहा है।
देश में दल-परितर्वन की बढ़ती हुई घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में 91वें संशोधन द्वारा संविधान की दसवीं अनुसूची की धारा 3 में उल्लिखित दल-विभाजन के प्रावधान को निरस्त कर दिया गया। इसमें यह उपबंध था कि यदि किसी राजनैतिक दल के 1/3 या उससे अधिक सदस्य उस दल को छोड़ने का निर्णय लेते हैं तो इसे दल-विभाजन (Party Split) समझा जाएगा और उन की सदस्यता पर कोई आंच नहीं आएगी। अब यह प्रावधान समाप्त कर दिया गया है।

92वां संविधान संशोधन, 2003
इस संशोधन द्वारा डोगरी, मैथिली, संथाली और बोडो भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया। परिणामस्वरूप सरकारी भाषाओं (Official Languages) की संख्या 22 हो गई है।

93वां संविधान संशोधन, 2006
शिक्षा संस्थानों में, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के नागरिकों के दाखिले के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था, संविधान के अनुच्छेद 15 की धारा (4) के प्रावधानों के तहत की गई है। इस समय सहायता प्राप्त अथवा प्रशासन द्वारा संचालित संस्थानों में विशेष तौर पर व्यावसायिक शिक्षा के लिए जो सीटें उपलब्ध हैं वे गैर सहायता प्राप्त निजी संस्थानों की तुलना में सीमित हैं।

94वां संविधान संशोधन, 2006
संविधान के अनुच्छेद 164 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ राज्यों की मंत्रिपरिषदों में अनिवार्य रूप से अनुसूचित जनजातियों के मामलों से सम्बन्धित एक मंत्रालय होगा जिसका उद्देश्य इनके कल्याण करने के लिए कार्य करना होगा।

95वां संविधान संशोधन, 2009
इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद-334 में संशोधन कर लोकसभा में अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण एवं आंग्ल-भारतीयों को मनोनीत करने संबंधी प्रावधान को 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया है।

96वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2011
संविधान की 8वीं अनुसूची में 'उडिया' के स्थान पर ‘ओडिया' लिखा जाए।

97वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2011
इस संशोधन के द्वारा सहकारी समितियों को एक संवैधानिक स्थान एवं संरक्षण प्रदान किया गया। संशोधन द्वारा संविधान में निम्नलिखित तीन बदलाव किए गए-1. सहकारी समिति बनाने का अधिकार एक मौलिक अधिकार बन गया। [अनुच्छेद-19 (1) ग] 2. राज्य की नीति में सहकारी समितियों को बढ़ावा देने का एक नया नीति निदेशक सिद्धांत का समावेश । (अनुच्छेद-43 ख) 3. 'सहकारी समितियाँ' नाम से एक नया भाग-IX-ख संविधान में जोड़ा गया। [अनुच्छेद-243 यज से 243 यन]

98वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2012
संविधान में अनुच्छेद-371 (जे) शामिल किया गया। इसका उद्देश्य कर्नाटक के राज्यपाल को हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के विकास हेतु कदम उठने के लिए सशक्त करना था।

99वां संविधान संशोधन, 2014
दिसम्बर 2014 में पारित यह संशोधन अधिनियम सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानान्तरण का कार्य करने के लिए एक 'राष्ट्रीय न्याय आयोग' की स्थापना का प्रावधान करता है।

100वां संविधान संशोधन, 2015
इस संशोधन द्वारा भारत बांग्लादेश के मध्य सीमा विवाद को समाप्त करने संबंधी समझौता किया गया तथा गलियारो का आदान-प्रदान किया गया।

101वां संविधान संशोधन, 2016
वस्तु एवं सेवाकर अधिनियम, इस संशोधन में केंद्र एवं राज्य संबंध में वित्तीय विषयों से संदर्भित अनुच्छेदों के साथ-साथ 6वीं व 7वीं अनुसूची में संशोधन का प्रस्ताव है।

124वां संविधान संशोधन
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% आरक्षण राष्ट्रपति ने संविधान संशोधन (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 (124वां संविधान संशोधन विधेयक) को स्वीकृति रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को सरकारी नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण प्रदान करता है।

EWS की परिभाषा तथा कोटा का आबंटन
EWS अत्सयधिक व्यापक तथा जनसंख्या के एक वृहत भाग को सम्मिलित करेगी। इसके अतिरिक्त यह गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों और 8 लाख रुपये/वर्ष की आय वाले परिवारों को एक ही श्रेणी में शामिल करता है। अनुसूचित जातियों/ अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़ा वों (नॉन-क्रीमी लेयर) के लिए आरक्षण, देश में उनकी जनसंख्या से परस्पर संबंधित है जबकि EWS हेतु 10% कोटा पर इस प्रकार की कोई स्पष्टता प्रदान नहीं की गई है।

विशेषताएँ
  • “आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों" की प्रगति के लिए यह अधिनियम विशिष्ट उपाय करने हेतु सशक्त करने के लिए अनुच्छेद 15 को संशोधित करता है। इसके तहत इस प्रकार के वर्गों के शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश हेतु 10 प्रतिशत सीटों को आरक्षित किया जा सकता है जो कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर लागू नहीं होगा।
  • यह संशोधन अनुच्छेद 16(6) को अंतः स्थापित करता है, जो सरकार को नागरिकों के “आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों" हेतु सभी पदों में 10 प्रतिशत आरक्षण करने हेतु सक्षम बनाता है। यह 10% आरक्षण ECW को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) हेतु प्रदत्त 50% के वर्तमान आरक्षण सीमा के अतिरिक्त प्रदान किया जाएगा।
  • पारिवारिक आय एवं आर्थिक पिछडेपन के अन्य संकेतकों के आधार पर केंद्र सरकार नागरिकों के "आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों" को अधिसूचित करेगी।
  • ऐसा पहली बार हुआ है कि जब किसी आर्थिक वर्ग को संवैधानिक रूप से कमजोर वर्ग के रूप में मान्यता दी गई तथा यह वर्ग सकारात्मक कार्रवाही के निर्धारण हेतु पारंपरिक रूप से प्रयुक्त जाति संबंधी केंद्रीयता के प्रस्थान को इंगित करता है।

एक टिप्पणी भेजें

Post a Comment (0)

और नया पुराने