मानव वृद्धि और विकास | manav vriddhi avn vikas

मानव वृद्धि और विकास

विकास मनोविज्ञान के अन्तर्गत गर्भाधान से लेकर जीवन के अन्त तक अर्थात् जीवनपर्यन्त होने वाले शारीरिक, मानसिक एवं व्यवहारपरक विकास का अध्ययन किया जाता है। विकास की प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक किसी-न-किसी रूप में चलती रहती है।
manav vriddhi avn vikas
साधारण भाषा में विकास का अर्थ शरीर में होने वाले गुणात्मक परिवर्तनों से है। वहीं वृद्धि का अर्थ शरीर में होने वाले मात्रात्मक परिवर्तनों से हैं, जैसेवजन का बढ़ना, लम्बाई में वृद्धि, शरीर के आयामों में परिवर्तन आदि।

वृद्धि की परिभाषा (Growth)

वृद्धि का सामान्य अर्थ होता है 'बढ़ना' या फैलना।वृद्धि का तात्पर्य उन संरचनात्मक शारीरिक परिवर्तनों से है जो एक व्यक्ति में परिपक्वता के दौरान चलने वाले क्रम में होते हैं। अर्थात् जिनमें ऊर्ध्वमुखी बढ़वार होती है, उसे वृद्धि' कहते हैं। अत: यह व्यक्ति की लम्बाई,आकार एवं वजन में वृद्धि को दर्शाता है।

विकास की परिभाषा (Development)

मानव विकास के अंतर्गत गर्भाधान से लेकर मृत्युपर्यंत व्यक्ति के विकास का 'अंतरअनुशासनात्मक परिप्रेक्ष्य' से अध्ययन किया जाता है।
इस प्रकार मानव विकास की उपरोक्त परिभाषा में तीन तत्त्व महत्त्वपूर्ण हैं-
  1. मानव विकास एक वैयक्तिक अनुभव है।
  2. यह जीवनपर्यन्त निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।
  3. यह अन्तर-अन्तर विषयक अध्ययन है।
विकास से केवल शारीरिक वृद्धि में होने वाले परिवर्तनों का ही संकेत नहीं मिलता बल्कि इसके अन्तर्गत वे सभी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक और संवेगात्मक परिवर्तन भी सम्मिलित रहते हैं जो गर्भकाल से लेकर मृत्युपर्यन्त तक व्यक्ति में प्रकट होते रहते हैं। उदाहरणार्थ-शैशवावस्था में वजन में वृद्धि, तंत्रिकाओं, ग्रंथियों (Glands) और पेशियों (Muscles) के ऊतकों में वृद्धि के कारण होती है।

वृद्धि और विकास में अन्तर

वृद्धि और विकास में मूलभूत अन्तर है, जो निम्नानुसार है-
वृद्धि (Growth) विकास (Development)
1. वृद्धि में मात्रात्मक परिवर्तन होता है। अर्थात् वृद्धि ऊर्ध्वाधर बढ़वार को दर्शाती है। 1. विकास में गुणात्मक परिवर्तन होता है।
2. वृद्धि मूर्त होती है। इसे देख सकते हैं। 2. विकास अमूर्त होता है।
3. वृद्धि को मापा जा सकता है। आकार, वजन, लम्बाई को माप सकते हैं। 3. विकास को मापा नहीं जा सकता केवल अनुभव कर सकते हैं।
4. वृद्धि में केवल आन्तरिक व बाह्य शारीरिक परिवर्तन होते हैं। 4. विकास व्यक्ति के विभिन्न क्षेत्रों में होता है जैसे- शारीरिक, मानसिक ,सामाजिक, बौद्धिक, संवेगात्मक,संज्ञानात्मक आदि।
5. वृद्धि भ्रूणावस्था से प्रारंभ होती है तथा परिपक्वावस्था प्राप्त करते-करते रुक जाती है। 5. विकास भ्रूणावस्था से प्रारंभ होकर जीवनपर्यन्त चलता है।

विकास की अवस्थाएँ ( Stages of Development)

जीवनकालिक उपागम के अन्तर्गत मानव विकास की विस्तृत व्याख्या के उद्देश्य से, विकास को विविध चरणों में विभाजित किया गया है। विकास की प्रमुख अवस्थाएं एवं उनकी अवधि -
अवस्थाएं अवधि
1. गर्भकालीन अवस्था गर्भाधान से जन्म तक
2. शैशवावस्था
(अ) नवजात शैशवावस्था
(ब) शैशवावस्था
जन्म से 2 वर्ष तक
जन्म से 1 माह तक
तीसरे सप्ताह से 2 वर्ष तक
3. बाल्यावस्था
(अ) पूर्व बाल्यावस्था
(ब) उत्तर बाल्यावस्था
3-12 वर्ष
3-6 वर्ष तक
6-12 वर्ष तक
4. किशोरावस्था
(अ) वय:संधि (नव किशोरावस्था)
(ब) किशोरावस्था
(स) उत्तर किशोरावस्था

11-12 से 12-14 वर्ष तक
13 वर्ष से 17 वर्ष तक
17 वर्ष से 21 वर्ष तक
5. प्रौढ़ावस्था (पूर्व प्रौढ़ावस्था) 21 से 40 वर्ष तक
6. मध्यावस्था 40 से 60 वर्ष तक
7. उत्तर प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था 60 वर्ष के बाद
8. मृत्यु एवं वियोग जीवन का अन्त

विकास के नियम

1. विकास में परिवर्तन होते हैं : विकास परिवर्तनों का लम्बा सिलसिला है जो गर्भाधान से लेकर जीवनपर्यन्त तक बिना टूटे लगातार चलता रहता है। विकास के क्रम में शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन होते रहते हैं।

2. विकास का एक निश्चित क्रम होता है : प्रत्येक प्राणी में चाहे वह पशु हो या मानव, विकास का अपना एक निश्चित प्रारूप होता है।
व्यक्ति का शारीरिक विकास दो दिशाओं में होता है-

(अ) मस्तकाधोमुखी दिशा (क्रम) : विकास के इस क्रम में शारीरिक विकास 'सिर से पैर की तरफ' होता है। अर्थात् पहले विकास सिर वाले भाग में होता है फिर धड़, पेट, पीठ की ओर। सबसे अन्त में पैर वाला भाग विकसित होता है।

(ब) निकट-दूर दिशा (क्रम) : विकास का क्रम सुषुम्ना नाड़ी के पास के क्षेत्रों में पहले और सुषुम्ना नाड़ी से दूर के क्षेत्रों में देर (बाद) में होता है; उदाहरण के लिये, जैसे-हाथों का विकास पहले और हाथ की उंगलियों का विकास देर से होता है।

3. विकास, परिपक्वता एवं अधिगम का परिणाम है : बालक का शारीरिक एवं मानसिक विकास, अधिगम (सीखना) एवं परिपक्वता, दोनों ही कारणों से होता है। परिपक्वता सीखने के लिए नींव तैयार करता है, जिसके कारण सीखने की क्रिया संभव हो पाती है।

4. आरम्भिक विकास, पश्चात् विकास की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होता है : विकासात्मक अध्ययनों के आधार पर यह पूर्णतया स्थापित तथ्य है कि बाद में होने वाले विकास की तुलना में, जीवन के आरंभिक काल के विकास अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। आरंभिक दशाएं, विकास की नींव को प्रभावित करती हैं। बच्चा जिस परिवेश में रहता है उसका प्रभाव उसकी आनुवांशिक क्षमताओं के विकास पर पड़ता है। ये प्रमुख दशाएं हैं-अनुकूल अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्ध, धनात्मक सांवेगिक दशाएं, बालक को प्रशिक्षित करने का ढंग, भूमिका निर्वहन का अवसर, पारिवारिक संरचना एवं परिवेशीय उद्दीपन इत्यादि।

5. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर अग्रसर होता है : विकासात्मक अनुक्रियाएं सामान्य से विशिष्ट की ओर अग्रसर होती है। गर्भस्थ शिशु का पूरा शरीर तो गतिशील होता है, परन्तु वह किसी एक अंग को गतिशील नहीं कर सकता है। शिशु किसी चीज को पकड़ने की अनुक्रिया के पूर्व अपनी भुजाओं को ऊपर उठाने या गतिमान करने की अनेक अनुक्रियाएं करता है।

6. विकास में निरन्तरता होती है : विकास गर्भाधान से लेकर मृत्युपर्यन्त निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें कभी तीव्र तो कभी धीमी गति से परिवर्तन आते रहते हैं। पीकोवस्की (1968) के अनुसार, विकास सदैव एक-सा नहीं होता बल्कि इस प्रक्रिया में कभी तीव्र असंतुलन की अवधि तो कभी सन्तुलन की अवधि पायी जाती है। विकास में पठार भी आता है। ये स्वरूप किसी एक स्तर पर या विभिन्न स्तरों पर भी पाये जाते हैं।

7. विकासक्रम में विभिन्न अंग भिन्न-भिन्न गति से विकसित होते हैं : यद्यपि विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का विकास निरन्तर जारी रहता है, तथापि सभी अंगों का विकास एक समान गति से कभी नहीं होता है। शरीर के विभिन्न अंगों के विकास में परिपक्वता अलग-अलग अवधि में आती है। जैसे किशोरावस्था के प्रारम्भ तक हाथ-पैर एवं नाक पूर्णतः विकसित हो जाते हैं परन्तु चेहरे के नीचे का भाग एवं कंधे का विकास धीमी गति से होता है।

8. विकास के विविध प्रकार्यों में सहसम्बन्ध पाया जाता है : यह सामान्य विश्वास है कि विकास के एक पक्ष की कमी की क्षतिपूर्ति स्वाभाविक रूप से अन्य क्षमता के उच्चतर विकास द्वारा होती है। जैसे कुशाग्र बुद्धि का बालक शारीरिक रूप से कमजोर हो सकता है। जब शारीरिक विकास तीव्र गति से होता है, तो मानसिक विकास भी तीव्रगति से होता है।

9. विकास में वैयक्तिक भिन्नताएं पायी जाती हैं : यद्यपि विकास स्वरूप सभी बच्चों में समान पाया जाता है तथापि प्रत्येक बच्चों का विकास अपने ढंग एवं गति से होता है। कुछ बच्चों का विकास धीरे-धीरे एवं एक चरण से दूसरे चरण की ओर अग्रसर होता है तो कुछ बच्चों में विकास तीव्र गति से होता है। इस प्रकार सभी बच्चे विकास की उत्कृष्टता को एक ही आयु में नहीं प्राप्त कर पाते हैं। विकास में भिन्नता कई कारणों से पायी जाती है। जैसे-शारीरिक विकास, आंशिक रूप से आनुवंशिक क्षमताओं एवं कुछ अंश तक अन्य परिवेशीय कारकों जैसे भोजन, स्वास्थ्य, शुद्ध हवा व प्रकाश, संवेग एवं शारीरिक थकान इत्यादि द्वारा निर्धारित होता है। इसी प्रकार बौद्धिक विकास आन्तरिक क्षमताओं के अतिरिक्त सांवेगिक दशाओं, प्रोत्साहन, सीखने का अवसर, तीव्र अभिप्रेरणा इत्यादि से निर्धारित होता है।

10. विकासात्मक स्वरूपों की निश्चित अवधि होती है : यद्यपि विकास सतत रूप से होता है तथापि किसी अवधि में विकास तीव्र तो किसी अवधि में धीमी गति में पाया जाता है। विजॉय का सुझाव है कि इन समयावधियों को न केवल आयु के आधार पर बल्कि अन्य जैविकीय घटनाओं एवं व्यक्ति के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर रेखांकित किया जा सकता है।

11. विकास की प्रत्येक अवधि से कुछ सामाजिक अपेक्षाएं होती हैं : प्रायः यह देखा जाता है कि कुछ सामाजिक व्यवहार एवं कौशल आयु की किसी अवधि में दूसरी अवधि की अपेक्षा अधिक सफलतापूर्वक सीखे जाते हैं। अतः समाज, व्यक्ति से इसी समयसारिणी के अनुसार विकास की प्रत्याशा रखता है। इन सामाजिक अपेक्षाओं को 'विकासात्मक कार्य' (Developmental task) भी कहा जाता है। हेविगहस्ट (1995) ने विकासात्मक कार्यों को इस प्रकार परिभाषित किया है, 'विकासात्मक कार्य वे कार्य हैं जो व्यक्ति के जीवन की किसी निश्चित अवधि में उत्पन्न होते हैं, इनकी सुलभ उपलब्धि उनके लिए प्रसन्नतादायक होती है एवं बाद में कार्यों की सफलता की ओर ले जाती है। इसके विपरीत, इन कार्यों में जटिलता एवं कठिनाई उत्पन्न करती है।' इनमें से कुछ कार्य परिपक्वता के कारण होते हैं, तो अन्य प्रकार के कार्यों का विकास सामाजिक, सांस्कृतिक दबाव से होता है, जैसे उपयुक्त यौन भूमिकाओं को सीखना या पढ़नेलिखने की शैली को सीखना।

महत्त्वपूर्ण बिन्दु :
  1. वृद्धि का तात्पर्य संरचनात्मक शारीरिक परिवर्तनों से है, जैसे-व्यक्ति की लम्बाई, आकार एवं वजन में वृद्धि को दर्शाता है।
  2. विकास के अन्तर्गत गुणात्मक परिवर्तन आते हैं, जैसे-सामाजिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास।
  3. वृद्धि एवं विकास में प्रमुखता से अन्तर पाया जाता है, जैसे-वृद्धि मूर्त होती है इसे देख सकते हैं, किन्तु विकास अमूर्त होता है इसे देखा नहीं जा सकता।
  4. विकास की प्रमुखतः आठ अवस्थाएं पायी जाती हैं।
  5. विकास के नियमों में कई नियम सम्मिलित किये जाते हैं, जैसे-ये परिवर्तनशील होते हैं, निश्चित क्रम में होते हैं, परिपक्वता और अधिगम का परिणाम होते हैं। इनमें आरम्भिक विकास बाद के विकास की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होते हैं। इनमें निरन्तरता पायी जाती है इत्यादि।

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