गृह व्यवस्था के उत्प्रेरक तत्व | grah vyavastha ke utprerak tatva

गृह व्यवस्था के उत्प्रेरक तत्व

गृह व्यवस्था किन-किन कारकों से प्रेरित होती है, इसका अध्ययन हम करेंगे। बचपन में आपने माता-पिता या शिक्षकों को कहानी, कविताओं, प्रेरक प्रसंगों अथवा महापुरूषों की जीवनी के माध्यम से बालकों को अच्छा कार्य करने को प्रेरित करते हुए देखा है। स्वयं आपने भी अनुभव किया होगा कि किस प्रकार गुरूजनों एवं बड़े बुजुर्गों के प्रेरणादयक शब्द आपका प्रत्येक क्षण उत्साह वर्धन करते हैं।
जीवन में निराशा, असफलता या अवसाद के क्षणों में किस प्रकार प्रेरणादायक शब्द, उदाहरण, घटनायें आप में नवीन उत्साह और स्फूर्ति भर देती हैं। मनुष्य अपनी निराशा त्याग कर एक बार पुन: अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ठान लेता है।
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सामान्यतया किसी नवीन कार्य को आरम्भ करने में यदि कोई प्रेरक शक्ति / स्त्रोत होता है तो असंभव कार्य भी सरलता से संभव हो जाते हैं। यह प्रेरक तत्त्व क्या हैं और किस प्रकार व्यक्ति को अपनी क्षमता से ऊपर कार्य करने को उत्साहित कर सुखद अनुभव कराते हैं?

उद्देश्य

एक सुखद एवं संतुष्ट जीवन प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है। गृह व्यवस्था भी इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए की जाती है। गृह व्यवस्था को भली-भाँति बनाए रखने के लिए प्रायः कई निर्णय लेने पड़ते हैं। ये निर्णय प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ विशिष्ट तत्वों द्वारा निर्देशित होते हैं। ये विशिष्ट तत्त्व ही प्रेरक तत्त्व (Motivating Factor) कहलाते हैं।
  1. गृह व्यवस्था को प्रेरित करने वाले तत्वों के बारे में जान पाएंगे
  2. विभिन्न प्रेरक तत्वों के अंतर्संबंध की जानकारी ले पाएंगे; तथा
  3. पारिवारिक जीवन चक्र में संसाधनों की माँग के बारे में जान पाएंगे।
आइए, प्रेरक तत्वों को व्यवहारिकता के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयत्न करें।

जीवन दर्शन

गृह व्यवस्था में प्रेरक तत्त्व क्या हैं, इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि इन प्रेरक तत्वों का मूल क्या है? ये तत्त्व जीवन में कहाँ से आते हैं? ये प्रेरक तत्त्व हमें जीवन दर्शन से प्राप्त होते हैं। आइए, अब जीवन दर्शन को समझें। 
प्रत्येक व्यक्ति/परिवार की कुछ मान्यतायें, विश्वास, धारणायें, विचार एवं दृष्टिकोण होते हैं जो या तो वे स्वयं विकसित करते हैं अथवा ये उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होते हैं। ये विचार, मान्यतायें आदि दैनिक जीवन में सही या गलत निर्णय लेने में सहायता करते हैं और दुविधा से बाहर निकालते हैं। ये मान्यतायें, विश्वास मनुष्य की सोच बन जाते हैं जिसे जीवन दर्शन कहा जाता है। जीवन दर्शन जन्मजात स्वभाव, अनुभव, संस्कृति, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा, समाज एवं परम्परा के प्रभाव में विकसित हो सकता है या इसे अपनाया भी जा सकता है। जीवन दर्शन को समझने के पश्चात् आइए अब देखें कि पारिवारिक जीवन में इसका क्या महत्व है। जीवन दर्शन के महत्व को संक्षेप में निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।
  • जीवन दर्शन व्यक्ति एवं पारिवारिक लक्ष्यों का निर्माण करते हैं।
  • जीवन दर्शन पारिवारिक एकता, प्रेम और सौहार्द का द्योतक हैं।
  • जीवन दर्शन व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहायक सिद्ध होते हैं।
विकल्पों के सर्वोतम चयन अथवा दुविधा की स्थिति में जीवन दर्शन मार्गदर्शक का कार्य करते हैं।

गृह व्यवस्था में प्रेरक तत्त्व

आपने देखा किस प्रकार जीवन दर्शन प्रेरक तत्त्वों से जुड़े हैं। गृह व्यवस्था के प्रेरक तत्त्व मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर एक दूसरे के पूरक हैं। मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर एक त्रिकोण के तीन बिन्दुओं की भाँति हैं जिसके केन्द्र में मूल्य निहित है। मूल्य से ही लक्ष्य एवं स्तरों का जन्म होता है परन्तु एक स्वतन्त्र इकाई के रूप में मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अब हम इन प्रेरक तत्त्वों का पृथक-पृथक अध्ययन करेंगे। शुरुआत मूल्य से करते हैं।

मूल्य
आपने दैनिक बोलचाल में मूल्य शब्द का बहुत बार प्रयोग किया होगा। उदाहरण के लिए किसी वस्तु का मूल्य पूछने पर आपको उस वस्तु का मूल्य पता चलता है जिसका भुगतान करने पर वह वस्तु आप की होती है। जैसे कि कॉपी का मूल्य 10 रुपये अर्थात दस रुपये देने पर वह कॉपी आपकी हो जाएगी। परन्तु जीवन मूल्य अथवा गृह व्यवस्था के उत्प्रेरक तत्त्व के रूप में मूल्य की बात करें तो यह पूर्णतया भिन्न है। यहाँ मूल्य अनिश्चित एवं अमूर्त रूप में विद्यमान होते हैं। मूल्य वास्तव में मानवीय व्यवहार को प्रेरणा देते हैं। मूल्य व्यक्तिगत, सामुदायिक एवं सामाजिक हो सकते हैं। मूल्य जीवन में रीढ़ की हड्डी के समान हैं जो जीवन को दिशा प्रदान करते हैं तथा जिनके अभाव में समाज का अस्तित्व नहीं है। मूल्यों के द्वारा हमारी मनोवृत्तियों एवं विचारों का निमाण होता है। मूल्य भौतिक और सामाजिक तथ्य हैं जो हमारे समाज में प्रत्येक व्यक्ति के लिए महत्व रखते हैं। ये मूल्य ही हैं जिसके अनुपालन में रामचन्द्र जी ने पिता की आज्ञापालन करने हेतु 14 वर्ष का वनवास लिया और उनके प्रिय भ्राता भरत ने उनके वनवास से वापस आने तक उनकी चरण पादुकाओं को राजा मानकर अयोध्या में प्रजा की सेवा की। जरा सोचिये यदि ये मल्य न होते तो इतिहास में हमें प्रेरणा कहाँ से मिलती?

मूल्य का अर्थ
मूल्य को विभिन्न अर्थों में लिया जा सकता है। अर्थशास्त्र में किसी वस्तु की कीमत को मूल्य कहा जाता है। उदाहरण के लिए चीनी का मूल्य 40 रू0 प्रति किलो है। इसी प्रकार कुम्हार द्वारा एक मिट्टी का घड़ा बनाया गया, उसके लिए इस घड़े का एक आर्थिक मूल्य (Economic value) है। एक चित्रकार द्वारा इस घड़े पर सुन्दर चित्र बना कर रंग भर दिए गए, यह इसका सौन्दर्यात्मक मूल्य (Aesthetic value) है। इस घड़े में ठंडा पानी पीकर एक व्यक्ति अपनी प्यास बुझाता है, उसके लिए यह तृप्ति प्रदान करने वाला मूल्य (Satisfying value) है। मूल्य का अर्थ सभी के लिए भिन्न हो सकता है परन्तु इसकी महत्ता सभी के लिए समान और संतुष्टि प्रदान करने वाली होती है। मूल्य मानवीय व्यवहार, मनोवृत्तियों और सोच का आधार हैं।

मूल्यों की उत्पत्ति/उदगम् और विकास
मूल्य जीवन को सार्थकता प्रदान करते हैं। व्यक्ति स्वयं मूल्यों का निर्माण करता है। मूल्य मानवीय व्यवहार, रुचियों और अभिवृत्तियों को प्रेरित करते हैं। इनका औचित्य समाज की भलाई एवं कल्याण से है, यदि मूल्यों में कल्याण एवं सुख की भावना निहित नहीं है तो मूल्य प्राणहीन हैं। मूल्यों का निर्माण व्यक्ति की रुचि एवं अभिवृत्तियों से होता है। अभिवृत्तियां मानव के दृष्टिकोण को तय करती हैं। पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषमताओं के कारण मूल्यों में भिन्नता होती है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मूल्य भिन्न होता है। एक परिवार में पले-बढ़े भाई बहनों के जीवन मूल्यों में भी भिन्नता पायी जा सकती है। अत: मूल्यों को नितान्त निजी कहा जाना गलत नहीं होगा। व्यक्ति न केवल मूल्यों का निर्माणकर्ता है अपितु स्वयं के लिए मूल्यों का चयन करना भी पूर्णतः उसका स्वयं का अधिकार है।

मूल्य समाज और परिवार का आधार होते हैं। यद्यपि यह कथन सत्य है परन्तु प्रत्येक मूल्य समाज द्वारा स्वीकार किया जाए, यह आवश्यक नहीं। सभी मूल्यों को समान रूप से ग्राहयता प्राप्त हो यह भी आवश्यक नहीं है। प्रत्येक समाज, संस्कृति, समुदाय में भिन्नता होती है जो उनके मूल्यों में भी दृष्टिगत होती है। अतः जिन मूल्यों को समाज की स्वीकृति/संस्तुति प्राप्त हो जाती है, उन्हें स्वीकृत/सकारात्मक मूल्य कहते है एवं जो मूल्य समाज द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते है, वह अस्वीकृत या नकारात्मक मूल्य होते हैं जिससे टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। अन्तर्जातीय विवाह इसका एक उदाहारण है। ठीक इसी प्रकार गाय की पूजा करना, बड़ों के पांव छूना, तुलसी के पौधे की पूजा करना आदि भारतीय सांस्कृतिक मूल्य हैं जो अन्य संस्कृतियों में संभवतः अस्वीकृत या नकारात्मक मूल्य हो सकते हैं। अतः मूल्यों में भिन्नता होना स्वाभविक है।

मूल्य की परिभाषाएँ
विभिन्न विद्वानों द्वारा मूल्य की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं दी गई हैं।

निकिल एवं डार्सी के अनुसार
“मूल्य मानवीय व्यवहार को प्रेरणा प्रदान करने वाले तत्त्व हैं। यह न्याय करने, व्याख्या करने और विश्लेषण करने हेतु आधार प्रदान करते हैं तथा विभिन्न विकल्पों के मध्य बुद्विमत्तापूर्ण चयन को संभव बनाते हैं।

फ्रांसिस एम. मागरबी के अनुसार
“मूल्य वह आदर्श स्तर है जिससे मनुष्य किसी कार्य के दौरान विभिन्न विकल्पों के चुनाव की क्रिया में प्रभावित होता है।

अर्थात मूल्य समाज द्वारा मान्यता प्राप्त इच्छाएं तथा लक्ष्य हैं, जिनका अन्तर्देशीयत्व सीखने अथवा सामाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से होता है और जो प्रतीकात्मक अधिमान्यताएं, मान और महत्वकांक्षाएं बन जाते हैं।

मूल्यों की विशेषताएं
मूल्यों की विशेषताएं निम्नवत हैं।
  • मुल्य सामान्य परिस्थितियों में उत्पन्न होते हैं तथा समय, स्थान और परिस्थितियों से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। एक कामकाजी स्त्री का पत्नी, मां तथा कर्मचारी के रूप में समाज में विभिन्न स्थानों में अलग-अलग मूल्य होता है। यही विभिन्न मुल्य उसके उत्तरदायित्वों का निर्धारण करते हैं।
  • मल्य भौतिक रूप से तो नहीं मापे जा सकते परन्तु गुणात्मक रूप में उनका मापन अवश्य किया जा सकता है, जैसे उत्तम, अति उत्तम, हीन इत्यादि।
  • सामाजिक एवं वैचारिक मतभेद के चलते मूल्यों को स्पष्ट रूप से धनात्मक एवं ऋणात्मक रूप में बाँटा गया है जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है। यह कहना तार्किक होगा कि धनात्मक अथवा ऋणात्मक मूल्यों का चयन करने के लिए व्यक्ति स्वतन्त्र होता है।
  • मूल्यों  की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह सामाजिक तथा पारिवारिक होने के साथ-साथ व्यक्तिगत भी होते हैं।
  • मूल्य हमारी संस्कृति का प्रतिबिम्ब हैं। मूल्यों से किसी भी परिवार, इतिहास, समय काल आदि को पहचाना जा सकता है।
  • मूल्य व्यक्तित्व निर्माण में योगदान देते हैं। मूल्य किसी कार्य को करने की प्रेरणा तो देते ही हैं, साथ ही साथ पथ प्रदर्शक और निर्देशक का भी कार्य करते हैं।
  • मल्य स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार के होते हैं। स्थायी मल्यों में परिवर्तन नहीं होता है। यदि कोई परिवर्तन होता भी है तो वह स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जैसे धन, संपत्ति और प्रतिष्ठा
  • में परिवर्तन। अस्थायी मूल्यों में परिवर्तन धीमी गति से होता है और स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता है। जैसे खान-पान में, घर खर्च आदि की आदतों में परिवर्तन।
  • समस्त मूल्यों का उद्देश्य सतुष्टि प्रदान करना होता है।
  • मूल्य स्वयं विकसित किए जा सकते हैं।
  • मूल्यों में तीव्रता भी पाई जाती है, जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती है।

मूल्यों का वर्गीकरण
जैसा कि पहले बताया जा चुका है मूल्य नितान्त व्यक्तिगत होते हैं। यह आवश्यक नहीं कि दो व्यक्तियों के मूल्यों में समानता पायी जाए। मूल्यों की ऐच्छिक प्रवृति के कारण व्यक्ति मूल्यों के समूह में से कोई भी मूल्य चुन सकने के लिए स्वतन्त्र होता है। मूल्यों को वर्गीकृत करने कि लिए कई प्रणालियां बनायी गई हैं।

प्रभुत्व के आधार पर मूल्यों का वर्गीकरण
प्रभुत्व के आधार पर मूल्यों को दो वर्गों में बाँटा गया है।
  1. आन्तरिक: व्यक्ति में पाये जाने वाले प्राकृतिक गृण आन्तरिक मूल्य कहलाते हैं। जैसे कला के प्रति रुचि, पारिवारिक सदस्यों के मध्य सौहार्द।
  2. आदर्शात्मक मूल्यः ये आदर्शों पर आधारित होते हैं, जैसे सही-गलत, ईमानदारी, सत्य, निष्ठा आदि का पालन।

प्रसिद्ध समाजशात्री पार्कर के अनुसार मूल्य दो प्रकार के होते हैं।
  1. क्रियात्मक मूल्य : ये मूल्य वातावरण के साथ क्रिया करना सिखाते हैं और अन्ततः समायोजन की ओर प्रेरित करते हैं।
  2. कल्पनात्मक मूल्य : यह मूल्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति से संतुष्टि पर आधारित होते हैं। इसमें रचनात्मकता, सौंदर्य बोध से प्राप्त संतोष निहित रहता है।

समाजशात्री प्रो. पी एस. नायडू के अनुसार
भारतीय संस्कृति एवं परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए जीवन मूल्यों को निम्न छ: भागों में बांटा गया है।
शारीरिक मूल्य
मनोवैज्ञानिक मूल्य
आर्थिक मूल्य
सामाजिक मूल्य
दार्शनिक मूल्य
आध्यात्मिक मूल्य

मूल्य अधिग्रहण
मूल्य के विषय में अब तक आप जान चुके हैं कि मूल्य, मानव जीवन के आधार हैं। जीवन में कई बार ऐसी स्थिति आती है जब हमें मूल्यों का चयन उन्हें भली-भाँति समझ कर करना पड़ता है। आइए जानें कि मूल्य अधिग्रहण के समय किन बातों को दृष्टिगत रखना चाहिए।

विकल्पों का चयन
सर्वोतम विकल्प का चयन करते समय सदैव उसकी दीर्घकालीन प्रासंगिकता को ध्यान में रखना चाहिए। अल्पावधि के लिए किया गया चयन संतुष्टि प्रदान करने में असमर्थ हो सकता है।

व्यक्तिगत स्वतन्त्रता
मूल्यों के चयन का सर्वाधिक प्रभाव उस व्यक्ति पर ही पड़ता है जिसने उस विशेष मूल्य को चुना है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर कि व्यक्ति किसी भी मूल्य का चयन करने के लिए स्वतन्त्र है, बिना दवाब के मूल्य चयन किया जाना चाहिए।

मूल्यों का समर्थन
स्वयं द्वारा सोच समझकर चुने गए मूल्यों का समर्थन व्यक्ति को स्वयं करना होता है तभी व्यक्ति का स्वयं पर विश्वास बन पाता है।

मूल्यों का निष्पादन
मूल्यों का चयन मात्र ही सफलता की गारंटी नहीं है। मूल्यों का क्रियान्वयन भी अवश्य किया जाना चाहिए। व्यक्ति के कार्य एवं व्यवहार में मूल्य के दर्शन हो जाते हैं।

लक्ष्य
पारिवारिक जीवन में सुख, संतोष एवं सफलता पाने के लिए लक्ष्यों को प्राप्त करना आवश्यक है। लक्ष्य चाहे छोटे हों अथवा बड़े, प्रत्येक परिवार उन्हें पाने की चेष्टा करता है। लक्ष्य मूल्यों की अपेक्षा अधिक निश्चित होते हैं क्योंकि इन्हें प्राप्त किया जा सकता है। लक्ष्य इच्छाओं, दार्शनिकताओं, अभिवृत्तियों और मूल्यों से उत्पन्न होते हैं। लक्ष्य प्राप्ति पर व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

अर्थ
लक्ष्य एक उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के लिए हम तत्पर रहते हैं तथा नई सूचनाओं, तकनीकों का सहारा लेते हैं। सामान्य अर्थों में लक्ष्य जीवन के साध्य होते हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति प्रयत्नशील रहता है।

परिभाषाएँ
  • निकिल एवं डार्सी के अनुसार : “सामान्य अर्थों में लक्ष्य वह बिन्दु होता है जहाँ तक व्यक्ति या परिवारों द्वारा कार्य करने की इच्छा रखी जाती है।
लक्ष्य निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है जो जीवनपर्यन्त चलती रहती है। यह मानव का स्वभाव है कि एक लक्ष्य की प्राप्ति होने पर वह दसरा लक्ष्य बना लेता है। इच्छित लक्ष्य प्राप्त न हो पाने की स्थिति में वह अपने कार्यक्रम, इच्छाओं और रूचियों में परिवर्तन/सुधार करता है ताकि वह लक्ष्य प्राप्त कर सुख की अनुभूति प्राप्त कर सके।

लक्ष्यों की विशेषताएं
लक्ष्यों की निम्न विशेषताएं हैं।
  • लक्ष्य सतत् चलने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे ही एक लक्ष्य की पूर्ति होती है, मनुष्य द्वारा दूसरे लक्ष्य का निर्माण किया जाता है।
  • लक्ष्य समय बाध्य होते हैं। कुछ लक्ष्य तात्कालिक एवं अल्पकालिक होते हैं जिन्हें समय पर पूरा करना आवश्यक होता है अन्यथा उनकी वैधता समाप्त हो जाती है। जबकि कुछ लक्ष्य जीवन पर्यन्त चलते रहते हैं।
  • लक्ष्य सदैव एक समान नहीं होते अर्थात लक्ष्य बदलते रहते हैं।
  • लक्ष्यों की उत्पत्ति मूल्यों से होती है।
  • लक्ष्यों से व्यक्तित्व का विकास होता है।
  • लक्ष्य व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के होते हैं।
  • लक्ष्य व्यवहारवादी एवं यर्थाथवादी होते हैं।
  • लक्ष्य सामाजिक मूल्यों से प्रभावित होते हैं।
  • लक्ष्य पारिवारिक जीवन चक्र को प्रभावित करते हैं।
  • लक्ष्य मनुष्य की आशाओं का प्रतिबिम्ब हैं।

लक्ष्यों का वर्गीकरण

दीर्घकालीन लक्ष्य
जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह एक बहुत लम्बी समयावधि तक चलने वाले लक्ष्य हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए बहुत अधिक प्रयास करना पड़ता है। दीर्घकालीन लक्ष्य परिवार को वास्तविक अर्थ प्रदान करते हैं और संपूर्ण परिवार इन्हें अनुभव करता है। दीर्घकालीन लक्ष्यों को प्राप्त करना अत्यधिक कठिन होता है। बहुत बार छोटे-छोटे अल्पकालीन लक्ष्य मिलकर दीर्घकालीन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। दीर्घकालीन लक्ष्यों को अन्तिम महत्व बिन्दु लक्ष्य भी कहा जाता है क्योंकि इन्हें प्राप्त करना मनुष्य का जीवन लक्ष्य भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए अपना मकान बनाना, बच्चों की शिक्षा, विवाह आदि।

मध्यकालीन लक्ष्य
ये लक्ष्य अल्पकालीन लक्ष्यों की प्राप्ति का एक साधन होते हैं और कम प्रयत्न द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। वास्तव में ये लक्ष्य निर्णय लेने वाले अथवा मध्यवर्ती लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक चरण के रूप में रहते हैं।

अल्पकालीन लक्ष्य
ये लक्ष्य कम समय हेतु निर्धारित किए जाते हैं। ये तुलनात्मक रूप से अधिक स्पष्ट होते हैं तथा इसके परिणाम कम समय में दृष्टिगोचर हो जाते हैं। कई बार अल्पकालीन लक्ष्य असंख्य होते हैं और कई अल्पकालीन लक्ष्य अधिक महत्व वाले नहीं होते। जैसे दैनिक जीवन के छोटे मोटे कार्य।

उपरोक्त सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति एवं परिवार को जीवन पर्यन्त संघर्षरत रहना पड़ता है, साधनों का एकीकरण करना पड़ता है एवं कठोर परिश्रम करना पड़ता है।

स्तर
स्तर गृह व्यवस्था के प्रेरक तत्त्वों के रूप में तीसरा प्रमुख तत्त्व है। स्तर, मूल्य एवं लक्ष्य की अपेक्षा अधिक स्पष्ट होते हैं। किसी व्यक्ति के मूल्य एवं लक्ष्य के विषय में केवल अनुमान लगाया जा सकता है जबकि स्तर को स्पष्ट रूप से निरीक्षित किया जा सकता है। व्यक्ति परम्परागत स्तर को ग्रहण करते हुए अधिक सोच विचार नहीं करता परंतु आवास, भोजन, रहन-सहन, शिक्षा आदि के स्तर निर्धारण में बहुत अधिक विचार करता है।

अर्थ
स्तर की व्याख्या उन मानकों के माध्यम से की जा सकती है जिनसे हमें संतुष्टि प्राप्त होती है। स्तर हमारे जीवन को रहने योग्य बनाते हैं। प्रायः व्यक्ति अपने मन मस्ष्तिक में एक निश्चित स्तर की कल्पना करता है एवं यथार्थ में उस स्तर को पाने के लिए परिश्रम करता है। स्तर के उदारण हैं, रहन सहन का स्तर, शिक्षा का स्तर, खान-पान का स्तर आदि।

स्तर की परिभाषा

कूपर के अनुसार
"हम प्रत्येक कार्य के लिए स्तर को निर्धारित करते हैं। हम आन्तरिक रूप से सोचते हैं कि हमें इससे अधिकतम कितनी संतुष्टि मिलेगी तथा बाह्य रूप में इसके अधिकतम सहयोग द्वारा हम अपने जीवन की योजनाओं को समझते हैं।

ग्रॉस एवं क्रेण्डल के शब्दों में
“गृह व्यवस्था से संबंधित अधिकतम स्तरों को जीवन के रहने योग्य बनाने हेतु आवश्यक समझी जाने वाले स्थितियों के मानसिक चित्र के रूप में परिभाषित किया जा सकता है”।

निकिल एवं डार्सी के अनुसार
“स्तर मूल्य के मापक होते हैं जिनकी उत्पत्ति हमारे मूल्यों से होती है। यह हमारी किसी वस्तु में रुचियों की मात्रा एवं उनके प्रकार को निर्धारित करती है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषाओं से आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि स्तर एक स्वतंत्र रूप से सोचा गया जीवन मानक है। व्यक्ति अपने स्तर को कितना उच्च या निम्न बना सकता है, यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। व्यक्ति स्तर को चित्र कल्पनाओं या अदृश्य, अलिखित रूप में अपने मानस पटल पर अंकित करता है तथा यथार्थ में उस स्तर तक पहुँचने हेतु संसाधनों एवं प्रयत्नों द्वारा ध्यान केन्द्रित करता है। इच्छित स्तर को प्राप्त करने में प्रसन्नता, संतुष्टि एवं आत्म तृप्ति का अनुभव होता है। ऐसा न होने पर व्यक्ति को निराशा और कुंठा घेर लेती है। 

स्तरों की विशेषताएं
स्तरों की निम्न विशेषताएं हैं-
  • स्तर कार्य करने का ढंग स्पष्ट करते हैं तथा यह बताते हैं कि व्यक्ति किस प्रकार अपना जीवन व्यतीत करेगा।
  • स्तर सदैव मूल्यों और लक्ष्यों से अधिक स्पष्ट होते हैं क्योंकि स्तरों को सदैव निरीक्षित किया जा सकता है।
  • स्तर व्यक्ति और समूहों के मध्य सदैव गतिशील रहते हैं।
  • व्यक्ति स्तरों को मानने के लिए बाध्य नहीं होते हैं, वह स्तर का निर्धारण स्वयं करते हैं।

स्तरों का वर्गीकरण
स्तरों को दो भागों में वर्गीकत किया गया है।
  1. परम्परागत स्तर
  2. परिवर्तनशील स्तर

परम्परागत स्तर
परम्परागत स्तर प्राचीन और स्थिर होते हैं। इन्हें समाज के बड़े समूह द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तथा यह सर्व स्वीकार्य होते हैं। ये पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः ही हस्तान्तरित होते हैं। इस संबंध मे निकिल एवं डार्सी ने अपनी पुस्तक “Management in Family Living” में लिखा है कि व्यक्ति समाज में रहता है। वह समाज द्वारा निर्धारित नियमों, मूल्यों एवं स्तरों का पालन न चाहते हुए भी करता है। उसे समाज द्वारा निर्धारित स्तर को प्राप्त करने के लिए आवश्यकतानुसार स्वयं को बदलना पड़ता है तथा समाज के साथ सामंजस्य बैठाना पड़ता है, भले ही इसके लिए उसे कुछ कष्ट उठाना पड़े। परम्परागत स्तर उच्च स्तर है जिनको बनाए रखने के लिए अधिक श्रम एवं प्रयास की आवश्यकता होती है।

परिवर्तनशील स्तर
यह स्तर अधिकांश व्यक्तियों द्वारा अस्वीकार्य होते हैं। ये स्थिति समय और व्यक्ति के अनुसार बदलते रहते हैं। इन स्तरों में धन, समय और प्रयत्नों को मूल्य के रूप में महत्व दिया जाता है। ये स्तर परम्परागत स्तरों के विपरीत होते हैं जिन्हें व्यक्ति अपनी इच्छा, रूचि, आवश्यकता एवं सुविधानुसार बदल देते हैं। यह आवश्यक नही हैं कि इन स्तरों को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त हो क्योंकि इनका निर्धारण व्यक्तिगत स्तर पर होता है। वर्तमान के समय में कामकाजी लोगों के लिए ये स्तर सर्वाधिक उपयुक्त माने गए हैं। ये स्तर विशेषकर उन लोगों के लिए भी कारगर हैं जिनके पास धन, समय या श्रम का अभाव है। उदाहरण के लिए समय पर्याप्त होने पर खाने के लिए हम स्वयं विविध पकवान तैयार करते हैं परन्तु समय न होने पर हम भोजन में विविधता न देखकर मात्र पेट भर जाने पर जोर देते हैं।

स्तर चाहे परम्परागत हो या परिवर्तनशील, दोनों में आपसी संबंध होता है। परिवार में हंसी-खुशी बनाए रखने के लिए इन दोनों स्तरों के मध्य संतुलन बनाना अति आवश्यक है।

आइए निम्न तालिका के माध्यम से दोनों का तलनात्मक अध्ययन करें।

परम्परागत स्तर परिवर्तनशील स्तर
1. इसमें समाज द्वारा स्वीकृति को मान्यता दी जाती है। 1. इसमें व्यक्तिगत सुख, आनन्द, मित्रता, साधनों के मध्य संतुलन को महत्व दिया जाता है।
2. इसमें समय, धन, प्रयत्नों को मूल्यों के रूप में कम मान्यता प्राप्त होती है। 2. इसमें समय, धन, मूल्यों को विशेष रूप से मान्यता दी जाती है।
3. यह स्तर, समय एवं स्थान के अनुसार चलते हैं। 3. यह समय, स्थान, परिस्थितियों आदि के अनुसार बदलते रहते हैं।
4. ये परम्परागत होते हैं तथा ये पीढ़ी दर पीढ़ी स्वीकार्य होते हैं। 4. इन्हें व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार करते हैं। ये पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित हों, यह आवश्यक नहीं होता।
5. इन स्तरों को अपनाने के लिए स्वयं के भीतर परिवर्तन लाया जाता है। 5. यहां स्तरों में परिवर्तन किया जाता है, स्वयं व्यक्ति के भीतर नहीं।
6. इन्हें बनाए रखने में अधिक प्रयत्न और समय लगता है। 6. इन्हें कम प्रयास के द्वारा ही प्राप्त कर लिया जाता है।

आपने जाना कि परम्परागत एवं परिवर्तनशील स्तरों की प्रकृति क्या है और किस प्रकार गृहस्थ जीवन में दोनों प्रकारों के स्तरों का अपना महत्व है। इन दोनों स्तरों को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं, आइए इसका अध्ययन करें।

स्तरों को प्रभावित करने वाले कारक
परम्परागत स्तर को चुना जाए या बदलते समय के तौर तरीके अपना कर परिवर्तनशील स्तरों को अपनाया जाए। कौन-सा स्तर आप पर अपना अधिक प्रभाव छोड़ेगा, यह कुछ कारकों पर निर्भर करता है जिनके विषय में हम विस्तार पूर्वक पढ़ेंगे।
परन्तु उससे पहले यह जानना आवश्यक है कि-
  • इन स्तरों का समय, शक्ति, धन तथा प्रयत्नों की दृष्टि से कितना महत्व है?
  • इन स्तरों का पारिवारिक मूल्यों से क्या संबध है?
  • स्तरों का इतिहास, उद्भव और वर्तमान में इसकी क्या प्रासंगिकता है?
  • क्या परिवर्तनशील स्तरों को अपनाए जाने की कोई सीमा है? यदि हाँ तो उसका निर्धारण कब और किन परिस्थितियों में किया जाता है?
  • व्यक्ति के द्वारा उस विशेष स्तर का अपनाया जाना क्या परिवार, मित्रों या समाज में किसी अन्य व्यक्ति को प्रभावित करेगा?
आइए, इन बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा करें।

मूल्य
स्तर निर्धारित करते समय अपने पास उपलब्ध संसाधनों को अवश्य देख लेना चाहिए । किसी भी स्तर का व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव कुंठा, निराशा, अवसाद और आत्मघात से परिपूर्ण होता है। उपलब्ध संसाधनों, मूल्यों की सीमा के भीतर ही स्तरों का निर्धारण होना चाहिए। जैसा कि इस कहावत से स्पष्ट है, “तेते पांव पसारिए, जेते लांबी सौर”, अर्थात अपनी सामर्थ्य अनुसार ही अपनी आवश्यकताओं की सीमा तय करनी चाहिए।

सामाजिक स्वीकार्यता
आधुनिक समय में परिवर्तनशील स्तर परम्परागत स्तरों से अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुए हैं क्योंकि व्यक्ति इसमें व्यक्तिगत स्वतन्त्रा, उदारता एवं लोचमयता का अनुभव करता है, परन्तु परिवर्तनशील स्तर भी कहीं न कहीं समाज की स्वीकृति की अपेक्षा करते हैं। समाज द्वारा स्वीकार्य होने पर अधिकांश संख्या में लोग इसे अपनाने लगते हैं, उदाहरण के लिए समाज में प्रेम विवाह की स्वीकृति, स्त्रियों का उचित स्थान, उनकी शिक्षा, विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों को काम करने की स्वतंत्रता आदि।

स्तरों का अन्य व्यक्तियों पर प्रभाव
यदि किसी व्यक्ति द्वारा अपनाया गया स्तर परिवार, समुदाय एवं समाज में किसी अन्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा हो, तो उस स्तर में तत्काल परिवर्तन किया जाना आवश्यक है।

स्तर की उत्पत्ति
स्तर की उत्पत्ति इस प्रश्न का उत्तर खोजने में सहायक है कि क्या कोई विशेष स्तर अब भी महत्वपूर्ण है। यदि नहीं तो इसमें किस सीमा तक परिवर्तन किया जा सकता है।

मूल्य, लक्ष्य और स्तर का अंन्तर्संबंध

जैसा कि के आरम्भ में बताया जा चुका है कि मूल्य, लक्ष्य और स्तर का आपस में घनिष्ठ संबंध है। मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर हमारे ज्ञान, विचार, सोच, अभिवृत्तियों को सार्थकता प्रदान करते हैं। यह तीनों एक दूसरे से अन्तर्संबंधित होते हैं तथा परिवार के सदस्यों को अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु निर्देशित करते हैं। मूल्य, लक्ष्य और स्तर से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, परन्तु देखा जाए तो मूल्य अधिक अस्पष्ट, अनिश्चित एवं आत्मगत होते हैं। मूल्य ही लक्ष्य एवं स्तर को जन्म देते हैं। मूल्य संख्या में अधिक होते हैं। भौतिक रूप से मूल्य नहीं मापे जा सकते परन्तु गुणात्मक रूप में इन्हें मापा जा सकता है।

लक्ष्यों की उत्पत्ति मूल्यों द्वारा होती है और यह मूल्यों से अधिक विशिष्ट और परिभाषित होते हैं। लक्ष्य प्राप्ति सदैव सुखद होती है और व्यक्ति के ही नहीं अपितु राष्ट्र विकास में भी सहायक होती है। लक्ष्यों का वर्गीकरण दीर्घकालीन, मध्यकालीन और अल्पकालीन रूप में किया गया है। लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा हमें उत्तरदायित्व लेना और क्रियान्वयन करना सिखाती है। लक्ष्य, स्तर और मूल्य दोनों से संबंधित होते हैं। स्तर, मूल्य के दिखाई देने वाले भाग होते हैं। अतः जब परिवार स्तरों के प्रभाव में आ जाते हैं तो वह लक्ष्य प्राप्ति के लिए पूर्ण प्रयास करते हैं।

स्तर की उत्पत्ति भी मूल्यों से होती है, किन्तु इसके मध्य संबंध को खोजना सामान्यतः आसान नहीं होता है। स्तरों को सर्वाधिक स्पष्ट प्रेरक तत्त्व के रूप में जाना जाता है। जीवन दर्शन से हमारी अभिवृतियों, मूल्य एवं स्तर का जन्म होता है जो हमें लक्ष्य प्राप्त करने को प्रेरित करतें है। मूल्य पारिवारिक एकता का भी प्रतीक है। मूल्यों के अभाव में परिवार दिशाहीन हो जाता है। यह लक्ष्य प्राप्ति में सहायक सिद्ध होते हैं। मूल्य से लक्ष्यों एवं स्तरों की उत्पत्ति होती है। कोई गह व्यवस्था कितनी सफल है, यह एक सीमा तक इन्हीं तीन प्रेरक शक्तियों पर निर्भर करता है।

पारिवारिक जीवन चक्र एवं संसाधनों की मांग

आपने देखा कि प्रस्तुत इकाई में पारिवारिक जीवन चक्र का कई बार उल्लेख हुआ है। पारिवारिक जीवन चक्र वास्तव में क्या है? आइए जानें।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, नैतिक एवं चारित्रिक विकास के लिए परिवार में ही उचित परिवेश पाता है। पारिवारिक जीवन चक्र को ग्रॉस एवं क्रेण्डल ने परिभाषित किया है: “परिवार का आरम्भ दो संबंधित युवा व्यक्तियों से होता है, अपनी विस्तृत अवस्था में यह वृद्धि करता है जिसे उचित प्रबंधन हेतु समझना अति आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त पारिवारिक जीवन निम्न हेतु भी सहायक है-
  • परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं को समझने में।
  • पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन के परिप्रेक्ष्य में।
  • संसाधनों के उचित प्रबन्धन हेतु।
  • लक्ष्यों के निर्धारण हेतु।

आइए, अब निम्न दी गई तालिका की सहायता से पारिवारिक जीवन चक्र की अवस्थाओं एवं उपअवस्थाओं के विषय में जानें।
अवस्था उपअवस्थाएं
प्रारम्भिक अवस्था स्थापित होने की अवस्था
विस्तृत अवस्था शिशु जन्म, पालन पोषण, प्ले/नर्सरी स्कूल
प्राथमिक शिक्षा
उच्च शिक्षा (महाविद्यालय)
संकुचित अवस्था बच्चों का व्यवसायिक समायोजन
बच्चों का विवाह इत्यादि
आर्थिक स्थिरता का समय
सेवा निवति

सारांश

पारिवारिक सदस्यों के मध्य प्रेम, एकता, सौहार्द तथा पारिवारिक जीवन में सफलता पाने जैसे उद्देश्यों की पूर्ति हेतु गृह प्रबन्धन किया जाता है। सफल गृह प्रबन्ध के पीछे कुछ विशिष्ट शक्तियां जिन्हें हम प्रेरक तत्त्व कहते हैं, विद्यमान रहती हैं। इन प्रेरक शक्तियों को मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर कहा गया है। ये तीनों प्रेरक तत्त्व आपस में संबंधित होते हैं। मूल्यों का क्या महत्व है, यह हमें अपने गौरवशाली इतिहास से ज्ञात होता है। मूल्य, लक्ष्य एवं स्तर को जन्म देते हैं। लक्ष्य, मूल्यों से अधिक स्पष्ट होते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए लक्ष्यों को दीर्घकालीन, मध्यकालीन एवं अल्पकालीन लक्ष्यों के रूप में विभक्त किया गया है। लक्ष्य उत्तरदायित्व लेने एवं कार्य योजना के वास्तविक क्रियान्वयन को सिखाते हैं। स्तर सर्वाधिक स्पष्ट प्रेरक तत्त्व हैं जिन्हें देखा एवं अवलोकित किया जा सकता है। स्तर व्यक्ति को सिखाते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाएगा। सामान्यतः व्यक्ति जिस स्तर को प्राप्त करना चाहता है, उसका चित्रण वह अपने मन मस्तिष्क में कर लेता है और यथार्थ में योजना बनाकर साधनों को एकत्र कर इन्हें पाने का प्रयास करता है। स्तर प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति सुखद और सफल अनुभव करता है। परन्तु स्तर प्राप्त न कर पाने की स्थिति में निराशा, अवसाद एवं कंठाग्रस्त हो जाता है। अतः स्तरों के निर्धारण/चयन करते समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। स्तरों का वर्गीकरण परम्परागत एवं परिवर्तनशील स्तरों के रूप में किया गया है जिनका निर्धारण व्यक्ति स्वेच्छा से करता है।

पारिभाषिक शब्दावली
  • मूल्य : मानवीय व्यवहार को प्रेरणा प्रदान करने वाले तत्त्व जो न्याय करने, व्याख्या करने और विश्लेषण करने हेतु आधार प्रदान करते हैं तथा विभिन्न विकल्पों के मध्य बुद्धिमत्तापूर्ण चयन को संभव बनाते हैं।
  • अल्पकालीन लक्ष्य : ये लक्ष्य कम समय हेतु निर्धारित किए जाते हैं। ये तुलनात्मक रूप से अधिक स्पष्ट होते हैं तथा इसके परिणाम कम समय में दृष्टिगोचर हो जाते हैं।
  • स्तर : ये मूल्यों के मापक होते हैं जिनकी उत्पत्ति हमारे मूल्यों से होती है। यह हमारी किसी वस्तु में रुचि की मात्रा एवं प्रकार को निर्धारित करते हैं।
  • अस्वीकृत या नकारात्मक मूल्य : जो मूल्य समाज द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाते हैं तथा जिनसे टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।

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