विधुत (Electricity) |

विधुत (Electricity)
काँच की छड़ को रेशम से या एबोनाइट की छड़ को बिल्ली की खाल से रगड़ने पर इनमें कागज के छोटे टुकड़ों को आकर्षित करने का गुण आ जाता है। पदार्थों में यह गुण विद्युतमयता (समवजाप मापक) के कारण आता है। वह कारण जिससे कोई पदार्थ विद्युतमय हो जाता विद्युत कहलाता है। पदार्थों में घर्षण से जो आवेश की मात्रा संचित होती है उसे स्थिर विद्युत कहते है। वह आवेश जो किसी चालक पदार्थ में प्रवाहित होता है उसे विद्युत धारा कहते है।
आवेश (Charge) : सर्वप्रथम बेंजामिन फेंकलिन ने धनात्मक व ऋणात्मक आवेश नाम दिया। वह आवेश जो कॉच को रेशम से रगड़ने पर छड पर संचित होता है धनावेश तथा जो आवेश एबोनाइट पर बिल्ली की खाल से रगड़ने पर संचित होता है ऋणावेश कहा गया। वस्तुओं में आवेश इलेक्ट्रानों के स्थानान्तरण से आता है इसमें प्रोट्रान आग नहीं लेते है। जब किसी वस्तु पर इलेक्ट्रानों की कमी होती है तो उस धनावेश और जब इलेक्ट्रानों की अधिकता होती है जो उस पर ऋण आवेश आता है।
चालक, अचालक व अर्ध चालक : ऐसे पदार्थ जिनसे विद्युत आवेश प्रवाहित होते हैं चालक कहलाते है जैसे अधिकांश धातुएं, अम्ल, क्षार व लवणों का जलीय विलयन, मानव शरीर आदि। ऐसे पदार्थ जिनसे आवेश प्रवाहित नहीं होता है अचालक कहलाते है जैसे रबर, लकड़ी, अभ्रक शुद्ध आसुत जल आदि। कुछ पदार्थ सामान्य अवस्था में आवेशों के अचालक होते हैं इनका ताप बढाने या कुछ अशुद्धियां मिलाने पर इनसे आवेश प्रवाहित होने लगता है अर्द्धचालक कहलाते हैं जैसे कार्बन, जर्मेनियत सिलिकान आदि। चालक पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रान होते हैं जबकि आचालकों में इनकी अनुपस्थिति होती है और अर्द्धचालकों में ताप बढ़ा कर या अशुद्धियां मिलाकर मुक्त इलेक्ट्रानों को प्राप्त किया जा सकता है। पदार्थ की चालकता या अचालकता इन्हीं मुक्त इलेक्ट्रानों पर निर्भर करती है।
किसी खोखले गोल चालक पर सम्पूर्ण आवेश उसके बाहरी पृष्ठ पर ही होता है कि बन्द कार पर बिजली गिरने पर अन्दर बैठे यात्री सुरक्षित रहते हैं। इसी प्रकार चालक के नुकीले भाग पर भी आवेश का धनत्व सर्वाधिक होता है।
तड़ित चालक (स्पहीजदपदह ब्वदकनबजवत) : इसका प्रयोग भवनों की सुरक्षा हेतु किया जाता है। इसका ऊपरी नुकीला सिरा बादलों से प्राप्त आवेश को ग्रहण कर पृथ्वी में भेजकर भवनों को सुरक्षित कर देता है।

विद्युत धारा (Electric Current) : आवेश के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। ठोस चालकों में विद्युत धारा का प्रवाह इलेक्ट्रानों के स्थानान्तरण के कारण, जबकि द्रवों में व गैसों में आयनों की गति के कारण होता है। विद्युत धारा की दिशा धनावेश के गति की ओर तथा ऋणावेश के गति की विपरीत दिशा में मानी जाती है। विद्युतधारा का मात्रक एम्पियर है। जब किसी परिपथ में धारा एक ही दिशा में बहती तो उसे दिष्ट धारा (Direct Current) और यदि धारा की दिशा लगातार बदलती है तो उसे प्रत्यावर्ती धारा (Atternative Current) कहते है।
विभवान्तर (Potentia; Defference) : किसी तार में धारा प्रवाहित करने पर मुक्त इलेक्ट्रान गति करते हुए चालक के परमाणुओं से टकराते रहते है। इससे इनकी गति में अवरोध उत्पन्न होता है और इलेक्ट्रान इस अवरोध के विरुद्ध अपनी गति को बनाये रखने हेतु जो कार्य करता है उसे विभवान्तर कहते है। इसका मात्रक वोल्ट है।
विद्युत सेल (Electric Cell) : विद्युत सेल में रासायनिक क्रियाओं से रासायनिक ऊजो को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है। इनमें धातु की दो छड़े हैं धनावेश को एनोड़ व ऋणावेश को कैथोड़ कहते है। ये दो प्रकार के होते हैं प्राथमिक एवं द्वितीयक सेल।
प्राथमिक सेल रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। जैसे वोल्टीय, लेक्लांशे एवं डेनियल सेल।
द्वितीयक सेल पहले विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में फिर रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इस प्रकार प्रयोग कार, ट्रक, ट्रक्टर आदि में किया जाता है।
प्राथमिक सेल में संचित रासायनिक ऊर्जा का एक बार प्रयोग कर लेने के पश्चात् वे बेकार हो जाते हैं जबकि द्वितीयक सेलों में संचित रासायनिक ऊर्जा समाप्त होने पर इन्हें पुनः आवेशित (Charg) कर लिया जाता है।
बोल्टीय सेल : आविष्कार 1799 में एलिजाण्ड वोल्टा ने किया था कांच के बर्तन में सल्फ्यूरिक अम्ल भरा रहता है जिसमें एक जस्ते की (कैथोड़) तथा एक ताँबे (एनोड़) की छड़ डूबी रहती है।
लेक्लांशी सेल : कांच के बर्तन में अमोनियम क्लोराइड़ (नौसादर) का संतश्प्त विलयन भरा रहता है। इसमें डूबा जस्ता (कैथोड़) डूबा रहता है। कार्बन की छड़ (एनोड़) मैगनीज डाइआक्साइड व कार्बन के मिश्रण के बीच रखी रहती है। इसका प्रयोग वहाँ किया जाता है जहां रुक रुक कर विद्युत धारा की आवश्यकता होती है जैसे विद्युत घंटी, टेलीफोन | आदि।
शुष्क सेल (Dry Cell) : इस सेल में जस्ते के बर्तन में मैगनीज डाइआक्साइड़ नौसादर व कार्बन का मिश्रण भरा होता है। जिसके बीच रखी कार्बन की छड़ एनोड़ का कार्य करती है और जस्ते का बर्तन कैथोड़ का कार्य करता है। इस सेल का विद्युत वाहक बल 1.5 वोल्ट होता है। प्रयोग टार्च, रेडियो, टेपरिकार्डर आदि में होता है।
विद्युत धारा के प्रभाव : इसके तीन प्रभाव ऊष्मीय, रासायनिक एवं चुम्बकीय देखने को मिलते है।
विद्युत धारा के प्रवाहित करने पर गतिमान इलेक्ट्रान चालक के परमाणुओं से टकराते रहते हैं और ऊर्जा का रुपानान्तरण करते हुए चालक के ताप को बढ़ा देते हैं इसे ही विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहते हैं। इसका प्रयोग विद्युत हीटर, प्रेस, बल्ब, ट्यूलाइट आदि में देखने को मिलता है।
विद्युत हीटर में प्लास्टर ऑफ पेरिस पर मिश्रधातु नाइक्रोम का तार उच्च प्रतिरोध वाला प्रयुक्त होता है। विद्युत प्रेस में भी नाइक्रोम का तार अभ्रक की प्लेट पर लिपटा रहता है।
विद्युत बल्ब में टंगस्टन धातु का पतला तन्तुनुमा कुण्डलीय तार लगा होता है क्योकि टंगस्टन का गलनांक अतिक (3500) होता है। बल्ब में आक्सीकरण रोकने हेतु निर्वातित कर दिया जाता है। कभी कभी निर्वातित करने के बजाय अक्रिय गैसे जैसे अर्गन भी भर दिया जाता है।
ट्यूबलाइट कांच की नली होती है जिसके भीतरी सतह पर फास्टर का लेप चढ़ा होता है और अन्दर अक्रिय गैस (आर्गन पारे के साथ) भरी होती है। दोनों किनारों पर बेरियम आक्साइड़ की परत चढ़ी तन्तु लगी होती है। तन्तुओं में धारा प्रवाहित करने पर इलेक्ट्रान उत्सर्जित होते है ये ट्यूब में भरी गैस को आयनीकृत देते है। गर्मी पाकर पारा वाष्पीकृत होता | है पराबैगनी किरणें उत्सर्जित होती हैं। और फास्फर पर पड़ कर निम्न आवृत्ति का प्रकाश उत्पन्न करती है। ट्यूब में फास्फर के कारण सफेद दूधिया प्रकाश उत्पन्न होता है।
रासायनिक प्रभाव : विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव के कारण किसी लवण के जलीय विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर उसका अपघटन हो जाता है। विलयन के लवणों का दो प्रकार के आयनों में टूट जाना विद्युत अपघटन कहलाता है। अपघटन के पश्चात् धनायन कैथोड़ की ओर तथा ऋणायन एनोड़ की ओर प्रवाहित होने लगते है। इसका प्रयोग विद्युत लेपन, धातु शोधन तथा विद्युत मुद्रण में होता है।
तांबे पर चांदी की परत सिल्वर नाइट्रेड (Ag Co2) का जलीय विलयन लेकर तांबे की प्लेट का कैथोड़ व चांदी की प्लेट का एनोड बताते है। जलीय विलयन में सिल्वर नाइट्रेड सिल्वर व नाइट्रेड में टूट जाता है सिल्वर आयन के रुप में तांबे की प्लेट की ओर प्रवाहित होने लगता है और तांबे पर परत जमने लगती है। जिस धातु पर लेपन करना होता है उसे कैथोड़ बनाते है।
विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव पर आधारित उपकरण टेलीफोन, टेलीग्राफ, विद्युत घंटी, पंखा मोटर आदि है।
कूलॉम का नियम : समान प्रकार के आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्णित करते हैं तथा विपरीत प्रकार के आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। दो आवेशों के मध्य लगने वाले बल को वैद्युत बल कहते है। दो स्थिर आवेशों के बीच लगने वाला बल, उनकी मात्रा के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती व उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
प्रतिरोध : किसी चालक में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर गतिशील इलेक्ट्रान रास्ते में आने वाले परमाणुओं से टकराते रहते हैं जिससे ऊर्जा का ह्रास होता है। धारा प्रवाह में उत्पन्न इस व्यवधान को ही प्रतिरोध कहते है। इसका मात्रक ओम है।
प्रतिरोधों का संयोजन दो प्रकार से होता है। समानान्तर क्रम व श्रेणी क्रम श्रेणी क्रम में संयोजित प्रतिरोधों का तुल्य प्रतिरोध समस्त प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है।
R= R1 + R2 + R3 +..............
समानान्तर क्रम में संयोजित प्रतिरोधों के समतुल्य प्रतिरोध का व्युत्क्रम उनके प्रतिरोधों के व्युत्क्रमों के योग के बराबर होता है। 1/R = 1/R1 + 1/R2 + 1/R3..................
विद्युत सामर्थ्य : कार्य करने की दर को सामर्थ्य कहते हैं।
विद्युत सामर्थ = व्यय ऊर्जा/लगा समय 'इसका मात्रक 'वाट' है।
1 किलोवाट = 103 वाट
1 मेगावाट = 106 वाट
1 अश्वशक्ति = 746 वाट
घरों में प्रयुक्त विद्युत उपकरणों द्वारा खर्च की गई कुल ऊर्जा के मापन हेतु किलोवाट घंटा मीटर (मी.) नामक यंत्र प्रयोग होता है। व्यय ऊर्जा को वाट घंटा या किलोवाट घण्टा में मापते है। एक 'वाट घण्टा' ऊर्जा की वह मात्रा है जो 1 वाट की क्षमता का उपकरण एक घंटे में व्यय करता है यह 3600 जूल के बराबर होता है।
अमीटर (Ammeter) : विद्युत धारा को एम्पियर में मापने वाला यंत्र है इसे परिपंथ में श्रेणीक्रम में जोड़ते है। आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होता है।
वोल्टमीटर (Voltmeter) : इसका प्रयोग परिपथ में दो बिन्दुओं के बीच विभवान्तर मापने हेतु किया जाता है इसे भी श्रेणीक्रम में ही लगाते हैं आदर्श वोल्टमीटर का प्रतिरोध अन्नत होना चाहिए जिससे परिपथ में प्रवाहित धारा में कोई परिवर्तन न हो।
विद्युत फ्यूज : परिपथ में लगे उपकरणों की सुरक्षा हेतु प्रयुक्त होता हैं यह तांबा, टिन एवं सीसा की मिश्र धातु से बना होता है यह कम गलनांक का एवं निश्चित क्षमता एवं मोटाइ को होना चाहिए। तार की मोटाई जितनी अधिक ही उसमें प्रवाहित धारा का मान उतना ही अधिक होगा। परिपथ में इसे श्रेणी क्रम में लगाया जाता हैं।

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