जलीय पारितंत्र (Aquatic Ecosystem) |

जलीय पारितंत्र (AQUATIC ECOSYSTEM)

जलीय पारितंत्र का निर्माण जलनिकायों में पाये जाने वाले पादप और जन्तु समुदायों के द्वारा होता है।
Aquatic Ecosystem
जलीय पारितंत्रों का वर्गीकरण लवणता के आधार पर दो प्रकार से किया जाता है।
  1. अलवण जलीय
  2. समुद्री

(i) अलवण जलीय पारितंत्र

धरातल पर जल जिसका चक्र निरंतर चलता रहता है और जिसमें अल्प मात्रा में लवण पाए जाते हैं, अलवण जल कहलाता है तथा इसका अध्ययन सरोविज्ञान (Limmology) कहलाता है।
(i) स्थिर या रुका हुआ जल (सरोजल Lentic) उदाहरण तालाब, झील, दलदल और अनूप
(ii) बहता हुआ जल (सरित Lotic) उदाहरण- झरने, पर्वतीय जल स्रोत, धाराएं और नदियां

भौतिक विशेषताऐं: अलवणीय जल में घुलनशील लवणों की सान्द्रता बहुत कम होती है। तापमान दैनिक और मौसमी परिवर्तनों को प्रदर्शित करता है। उष्णकटिबंधीय झीलों में सतह का तापमान कभी भी 40°C से नीचे नहीं जाता है, समशीतोष्ण अलवणजल में कभी भी न बढ़ता है न ही 4°C से नीचे नहीं जाता तथा ध्रुवीय झीलों में यह तापमान कभी भी 4°C से अधिक नहीं होता।
  • समशीतोष्ण क्षेत्रों में जल की ऊपरी सतह जम जाती है परन्तु जीव इस हिमाच्छादित सतह के नीचे जीवित रहते हैं।
  • अलवणजलीय पारित्रों पर प्रकाश का गहरा प्रभाव पड़ता है। निलंबित पदार्थों की बहुत बड़ी संख्या जल में प्रकाश के भेदन को अवरुद्ध कर देती है।
  • कुछ जन्तु श्वसन के लिए आक्सीजन प्राप्त करने हेतु पानी की सतह पर तैरते हैं। जलीय पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए जल में घुलनशील कार्बनडाई ऑक्साइड का उपयोग करते हैं।
  • झीलें और तालाब ऐसे अन्तःस्थलीय अवनमन (depressions) हैं जिनमें स्थिर जल होता है। उत्तरी अमेरिका की लेक सुपीरियर संसार की सबसे बड़ी झील है। साईबेरिया की वेकल झील सबसे गहरी झील है। उड़ीसा की चिल्का झील भारत की सबसे बड़ी झील है।

झील के तीन विभेदित क्षेत्र होते हैं:
  1. परिधीय क्षेत्र (वेलांचली मंडल, littoral zone) जिसमें उथला पानी होता है।
  2. वेलांचली क्षेत्र के आगे मुक्त जल जहां पानी काफी गहरा होता है।
  3. नितलीय क्षेत्र (Bentic zone) या झील का तला
जलीय जीव जल में प्लवन करने वाले या स्वतंत्र रूप से तैरने वाले या गतिहीन (स्थिर) हो सकते हैं, यह इनके आकार और स्वभाव पर निर्भर करता है। शैवाल डायटम्स, प्रोटोजोआ तथा लारवा जैसे प्लवन करने वाले सूक्ष्मजीव प्लवक (Plankton) कहलाते है। जड़युक्त जलीय पादप, मछलियां, मोलस्क तथा इकाइनोडर्म तल में रहने वाले जीव है।

आर्द्रभूमि (Wetlands)
वह क्षेत्र है जो समय-समय पर पानी में डूबते रहते हैं तथा मेंढ़को और अन्य उभयचर प्राणियों सहित जलीय जीवों के समृद्ध समुदाय को सहारा देते हैं अनूप (Swamp). कच्छ (Marsh) और मैंग्रोव (Mangroves) आर्द्र भूमि के उदाहरण हैं।

(ii) समुद्री पारितंत्र

इनका संबंध समुद्र सागर के साथ-साथ समुद्री जीवों से है।

वितरण: समुद्री पारितंत्र पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग को घेरे हुए हैं। और इसकी औसत गहराई लगभग 4000 मीटर है। अलवणजलीय नदियां अंत में समुद्र में गिरती हैं। समुद्र या सागर की विभिन्न गहराइयों में विभिन्न प्रकार के जीव रहते हैं।
  • खुले समुद्र की लवणता लगभग 3.6 प्रतिशत होती है और यह लगभग नियत है।
  • समुद्र के ताप परिवर्तन स्थल की अपेक्षा अत्यधिक न्यून होता है। जल स्तम्भ (column) के कारण द्रवस्थैतिक दाब समुद्र में गहराई के साथ-साथ बढ़ता जाता है। यह मान सतह पर 1 वायुमण्डलीय दाब के बराबर होता है तथा सर्वाधिक गहराई में यह लगभग 1000 वायुमण्डलीय दाब के बराबर होता है। अधिक गहराई में रहने वाले जीव उच्च दाब के अनुकूल होते हैं। कुछ समुद्री जीव जैसे स्पर्म व्हेल (Sperm whale) तथा विशेष प्रकार की सील अधिक गहराइयों में गोता लगा सकती हैं तथा बिना किसी कठिनाई के वापस सतह पर तैरने लगती हैं। चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण के कारण समुद्री पारितंत्रों में ज्वार-भाटा सामान्य घटना है।

पादप और प्राणिजात (जीव प्रजातियां ) : स्थलीय पारितंत्र की अपेक्षा समुद्री पारितंत्रों की जैव विविधता अत्यधिक है। लगभग सभी मुख्य जन्तु समूह समुद्र में पाये जाते हैं। कीट और संवहनी पादप समुद्री पारितंत्रों में पूर्णतया अनुपस्थित रहते हैं। सर्वाधिक समुद्री जैव विविधता ज्वारीय क्षेत्रों में पायी जाती है जो तट के निकट होते हैं। डायएटम्स, शैवाल, डायनोफ्लेजलेट तथा जैली फिश स्वतन्त्र रूप से प्लवन करने वाले कुछ समुद्री जीव हैं। विशाल क्रस्टेशियन, मोलस्क, कछुए तथा सील, पॉरपाइज़ज़ (सूंस) डॉलफिन तथा व्हेल जैसे स्तनधारी स्वतंत्र रूप से तैरने वाले जन्तु हैं जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं। तल में रहने वाले जीव सामान्यतया गतिहीन होते हैं जैसे स्पंज, कोरल, केकड़े तथा स्टार फिश।

अनुकूलनः
  • कम भार वाले जन्तु और पादप पानी में तिरते रहते हैं तथा जलधाराओं के साथ गति करते हैं।
  • समुद्री पादप और जन्तु लवणों की उच्च सान्द्रता के प्रति सहनशील होते हैं (परासरण नियमन)। परासरण नियमन (osmoregulation) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा रुधिर में परासरण दाब नियत बनाए रखा जाता है।
  • तैरने वाले जन्तुओं का शरीर धारारेखित होता है। इनका शरीर पाश्वीय रूप से सम्पीडित होता है। समुद्र की अधिक गहराई में रहने वाले जीव जैवदीप्ति दर्शाते हैं अर्थात प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं।
  • ये अपने भोजन के लिए ऊपरी समुद्री क्षेत्रों पर निर्भर रहते हैं।
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