जलीय पारितंत्र (Aquatic Ecosystem) -
स्थलीय पारितंत्र के समान ही जलीय पारितंत्र का भी एक स्वरूप होता है। जलीय पारितंत्र तापमान, पोषक तत्वों की उपलब्धता, प्रकाश की तीव्रता, जलधारा, लवणता आदि से प्रभावित होता है।



जलीय पारितंत्र को प्रभावित करने वाले कारक -
तापमान (Temperature) - स्थलीय भाग की तुलना में जल में तापमान परिवर्तन धीमी गति से होता है। तापमान में बदलाव जलीय जीवन को प्रभावित करते हैं। तापमान के द्वारा यह निर्धारित होता है कि किस जीव की संख्या में बढ़ोतरी होगी तथा किसका आकार कम होगा। औसत तापमान में थोड़ा-सा परिवर्तन भी जलीय पारितंत्र का विनाश कर सकता है क्योंकि जलीय जीव ताप के प्रति कम सह्य होते हैं।

सूर्य प्रकाश (Sun light) - सूर्य प्रकाश का जलीय पारितंत्र में महत्वपूर्ण योगदान होता है। जैसे-जैसे जलीय तंत्र की गहराई में जाते हैं, सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है और 200 मीटर के बाद प्रकाश बिल्कुल समाप्त हो जाता है। इसलिये इसे प्रकाशीय क्षेत्र व अप्रकाशीय क्षेत्र (Aphotic Zone) में बाँटा जाता है। प्रकाशीय क्षेत्र (Photic Zone) में प्रकाश संश्लेषण व श्वसन क्रिया दोनों सम्पन्न होती है। अप्रकाशीय क्षेत्र गहराई वाला क्षेत्र होता है इस क्षेत्र में रहने वाले प्राणी अवसादों पर ही निर्भर रहते हैं। इस क्षेत्र में केवल श्वसन प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

लवणता (Salinity) -
जलीय पारितंत्र को प्रभावित करने वाले कारकों में लवणता प्रमुख कारक है। जलीय पारितंत्र को लवणता के आधार पर भी विभाजित किया जाता है। लवणता का प्रभाव उस पारितंत्र के प्राणिजात व पादपजात पर पड़ता है। विभिन्न जलीय पारितंत्रों में पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं व पादपों में भिन्नता होती है।

जल में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) -
स्वच्छ पानी में घुलित ऑक्सीजन की सान्द्रता 0.0010 प्रतिशत होती है जिसे 10 भाग प्रति दस लाख या 10 PPM से भी निरूपित किया जाता है। स्थलीय पारितंत्र की तुलना में जलीय पारितंत्र में लगभग 150 गुना कम ऑक्सीजन उपलब्धता होती है। जलीय पारितंत्र में ऑक्सीजन वायु द्वारा एवं पौधों द्वारा प्रकाशसंश्लेषण की प्रक्रिया से पहुँचती है। गर्म पानी में ऑक्सीजन कम घुलनशील होती है। यदि जलीय पारितंत्र में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा में कमी होती है तो जलीय जीव-जन्तु मरने लगते हैं।

पोषक तत्व (Nutrients) -
जलीय पारितंत्र पर पोषक तत्वों का गहरा प्रभाव होता है। जलीय पारितंत्र के लिये पोषक तत्वों की एक संतुलित मात्रा का होना आवश्यक है। अत्यधिक पोषक तत्वों की वृद्धि से सुपोषण की समस्या उत्पन्न होती है।
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