पुनर्जागरण के कारण |


पुनर्जागरण किसी एक व्यक्ति, स्थान, विचारधारा अथवा आन्दोलन के कारण सम्भव नहीं हो पाया था। इसके उदय एवं विकास में असंख्य व्यक्तियों के सामूहिक ज्ञान एवं विविध देशों की विभिन्न परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अतः पुनर्जागरण अकस्मात् न होकर घटनाओं के एकजूट हो जाने पर हुआ फिर भी, निम्न कारणों को इसके लिए उत्तरदायी माना जा सकता है।

पुनर्जागरण के कारण
1.      धर्म युद्ध (क्रसेड)
2.      व्यापारिक समृद्धि
3.      धनी-मध्यम वर्ग का उदय
4.      अरब एवं मंगोल की भूमिका
5.      स्कालिस्टिक विचारधारा
6.      कागज एवं छापाखाना
7.      कुस्तुनतुनिया पर तुर्की का अधिकार
8.       मंगोल साम्राज्य का उदय

1. धर्मयुद्ध (क्रूसेड) - ईसाई धर्म के पवित्र तीर्थ स्थान जेरूसलम के अधिकार को लेकर ईसाइयों और मुसलमानों ( सैल्जुक तुर्क) के के बीच लड़े गये युद्ध इतिहास में 'धर्मयुद्ध' के नाम से विख्यात हैं ये युद्ध लगभग दो सदियों तक चलते रहे हैं। इन धर्मयुद्धों के परिणामस्वरूप यूरोपवासी पूर्वी रोमन साम्राज्य (जो इन दिनों में बाइजेन्टाइन साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध था) तथा पूर्वी देशों के संपर्क  में आये। इस समय में जहां यूरोप अज्ञान एवं अन्धकार में डूबा हुआ था, वहीं पूर्वी देश ज्ञान के प्रकाश से आलोकित थे। पूर्वी देशों में अरब लोगो ने यूनान तथा भारतीय सभ्यताओं के सम्पर्क से अपनी एक नई समस सभ्यता का विकास कर लिया था। इस नवीन सभ्यता के संपर्क में आने पर यूरोपवासियों ने अनेक चीजें देखी तथा उन्हें बनाने की पद्धति भी सीखी। इससे पहले वे लोग अरबों से कुतुबनुमा, वस्त्र बनाने की विधि, कागज और छापाखाने की जानकारी प्राप्त कर चुके थे। अब इन्होने पूर्वी देशों की तर्कशक्ति, प्रयोग-पद्धति तथा वैज्ञानिक खोजों के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल की। मुस्लिम देश के खान-पान, रहन-सहन तथा सार्वजनिक स्वच्छता का भी युरोपवासियों पर गम्भीर प्रभाव पड़ा।
धर्मयुद्धों के परिणामस्वरूप यूरोवासियों को नवीन मार्गों को जानकारी मिली और यूरोप के कई साहसिक लोग। पूर्वी देशों की यात्रा के लिए चल पड़े उनमें से कुछ ने पूर्वी देशों की यात्राओं के दिलचस्प वर्णन लिखें, जिन्हें पढ़कर यूरोपवासियों की कूप-मंडूकता दूर हुई।
मध्ययुग में लोग अपने सर्वोच्च शिकारी पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि मानने लगे थे। परन्तु जब धर्मयुद्धों में पोप की सम्पूर्ण शुभकामनाओं एवं आशीर्वाद के बाद भी ईसाइयों की पराजय हुई तो लाखों लोगों की धार्मिक आस्था डगमगा गई और वे सोचने लगे की पोप भी हमारी तरह एक साधारण मनुष्य मात्र है। पोप की गिरती प्रतिष्ठा से धर्म का शिकंजा कुछ ढीला पड़ गया और एक नया तार्किक दृष्टिकोण उदित हुआ जिसने पुनर्जागरण को आहूत करने में भारी योगदान दिया।

2. व्यापारिक समृद्धि - यूरोप के बढ़ते हुए व्यापार-वाणिज्य से उसकी व्यापारिक समृद्धि बढ़ती गई। इस धन-सम्पदा ने पुनर्जागरण की आर्थिक पृष्ठभूमि तैयार कर दी। मध्ययुग के पूर्वार्द्ध में धन-सम्पत्ति का संग्रह केवल थोड़े से सामन्तों के पास और चर्च के पास ही हो पाया था और इन दोनों को वैज्ञानिक प्रगति, खोज तथा अनुसंधान में रूचि नहीं थी। अतः जिज्ञासु वैज्ञानिकों, अन्वेषकों, कलाकारों साहित्यकारों को प्रोत्साहन एवं संरक्षण नहीं मिल पाया। इस कमी को व्यापारिक वर्ग ने पूरा किया ।


3. धनी मध्यम वर्ग का उदय - व्यापार वाणिज्य को विकास ने नगरों में अनी मध्यम वर्ग को जन्म दिया। धनिक वर्ग ने अपने लिए भव्य एवं विशाल भवन बनवाये समाज में अपनी शान-शौकत तथा प्रतिष्ठा बढाने के लिए इस वर्ग ने मुक्त हाथ से धन खर्च किया भविष्य में अपनी ख्याति को चिरस्थायी बनाने के लिए विद्वानों और कलाकारों को आश्रय प्रदान किया।
इसमें फ्लोरेन्स के मैडीसी परिवार का नाम उल्लेखनीय है। धनिक वर्ग के लोग गोष्ठियों का आयोजन करवाया करते थे। इन गोष्ठियों में वाद-विवाद होता, तर्क-विर्तक होता और प्रत्येक वस्तु की अच्छाई-बुराई की चर्चा की जाती इससे चिन्तन शक्ति का विकास हुआ। चिन्तन शक्ति के विकास से पुरानी। मान्यताएँ टूटने लगी और नई मान्यताओं की प्रष्ठभूमि तैयार होती गई जिससे पुनर्जागरण को बल प्राप्त हुआ। नगरों में आने वाले विदेशी व्यापारियों से भी नगरवासी विचारों का आदान-प्रदान किया करते थे। देश-विदेश की बातों पर चिन्तन मनन होता था जिससे नगरवासियों की चिन्तन शक्ति बढ़ने लगी।

4. अरब और मंगोल - पूर्वी देशों के संचित ज्ञान से यूरोपवासियों को परिचित कराने में अरबों और मंगोलों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। युरोप के बहुत से क्षेत्रों में अरब लोग बस चुके थे। अरब विद्वान स्वतंत्र चिन्तक थे। वे लोग प्लेटो तथा अरस्तु के विचारों में रूचि रखते थे उन्होने आरोप विद्वानों की रूचि को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप तेरहवीं सदी में पेरिस ऑक्सफोर्ड तथा बोलीन विश्वविद्यालयों ने इस बौद्धिक आन्दोलन को जोरों से चलाया। इससे यूरोपवासियों में तर्कशास्त्र के प्रति विश्वास कायम हुआ। तेरहवीं सदी के मध्य में कुबलाई खाँ ने एक विशाल मंगोल साम्राज्य स्थापित किया और उसने अपने ढंग से यूरोप और एशिया को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। उसके दरबार में जहां पोप के दूत, पेरिस तथा इटली के व्यापारी रहते थे, वहीं एशियाई  देशों के विद्वान तथा साहित्यकारी भी रहते थे। कुबलाई खां के दरबार के माध्यम से यूरोपवासियों को पूर्वी ज्ञान-विज्ञान की जानकारी मिली। अरबों और मंगोलों के माध्यम से यूरोप में चीन के आविष्कारों-कागज, छापाखाना, कुतुबनुमा और बारूद की जानकारी पहुंची। इन अविष्कारों की जानकारी ने यूरोप को गतिशील बना दिया।


 5. स्कालिष्टिक विचारधारा - मध्ययुगीन यूरोपीय दर्शन में विचारधारा चल पड़ी थी जिसे स्कालिष्टिक' अथवा विद्वतावाद (पण्डितपन्थ) कहा जाता है। यह अरस्तु के तर्कशास्त्र से प्रभावित थी। अरस्तू के तर्क के साथ सेण्ट आगस्टाइन के तत्त्व ज्ञान को भी जोड़ा दिया गया। इस प्रकार इस विचारधारा में धार्मिक विश्वास और तर्क दोनों का समन्वय किया गया। इस प्रकार इस विचारधारा में धार्मिक विश्वास और तर्क दोनों का समन्वय किया गया विश्वविद्यालय ने विद्वतावाद के आन्दोलन को को तेजी से आगे बढाया जिससे विद्याध्ययन एवं वाद-विवाद को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप अब उसी बात को सही माना जाने लगा जो तर्क की सहायता से सही ठहराई जा सके।

6. कागज और छापाखाना - चीन ने प्राचीन युग में ही कागज और छापाखानों का आविष्कार कर लिया था। मध्ययुग में अरबों के माध्यम से युरोपवासियों को भी इन दोनों की जानकारी मिली। कागज और छापाखाना न पुनर्जागरण को आगे बढ़ाने में महत्त्वपर्ण योगदान दिया। इसके पूर्व हस्तलिखित पुस्तकों का प्रचलन था जो काका मूल्यवान होती थी और जिनकी संख्या भी काफी कम होती थी। अत: ज्ञान-विज्ञान के इन साधनों पर कुछ धनी लोगों का ही एकाधिकार था। परन्त कागज और छापाखाना के कारण अब तक पुस्तकों की कमी न रही और वे अब काफी सस्ती भी मिलने लगी। अब सामान्य लोग भी पुस्तकों को पढ़ने रूचि लेने लगे। इससे जनता में ज्ञान का प्रसार हुआ। विज्ञान और तकनीकी की प्रगति का रास्ता खुल गया। यही कारण है कि इन दोनों को इतना अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है।

कुस्तुनतुनिया पर तुर्की का अधिकार - 1453 ई. में पूर्वी रोमन साम्राज्य जो इन दिनों में बाइजेन्टाइन साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध था, की राजधानी कुस्तुनतुनिया पर उस्मानी तुकों ने अधिकार जमा लिया। कुस्तुनतुनिया यूनानी ज्ञान, दर्शन, कला और कारीगरी का विख्यात केन्द्र था। परन्तु इस्लाम में नवदीक्षित बर्बर एवं असभ्य उस्मानी तुर्को के लिए इसका कोई महत्व नहीं था परिणामस्वरूप बहुत से यूनानी विद्वान अपने साथ प्राचीन यूनानी एवं रोमन पाण्डुलिपियाँ लेकर आजीविका की खोज में इटली, फ्रांस, जर्मनी आदि देशो में आये। उनके आगमन से यूरोपीय देशों के बौद्धिक वातावरण में उथल-पुथल मच गई। यूरोपवासियों की यूनानी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में रूचि बढ़ी।
कुस्तुनतुनिया पर तुर्की की विजय का एक और परिणाम निकला। युरोप से पूर्वी देशों को जाने वाले स्थल मार्ग पर अब तुकों का अधिकार हो गया। तुर्क लोग व्यापारियों को संरक्षण देने के स्थान पर उन्हें लूट लिया करते थे। फलस्वरूप यूरोप का पूर्वी देशों के साथ व्यापार ठप्प हो गया। अतः यूरोपवासियों ने पूर्वी देशों के जलमार्ग को खोज निकालने का प्रयत्न शुरू किया। इसी प्रयास के कारण अमेरिका की खोज सम्भव हो पायी और इसी के कारण भारत आदि देशों का जलमार्ग ढूंढा जा सका। उपर्युक्त कारणों के सामूहिक परिणामस्वरूप पुनर्जागरण संभव हो पाया।