आनुवंशिक रोग (Genetic Disorder)।

आनुवंशिक रोग (Genetic Disorder)।

वर्णान्धता (Colour Blindness)-
इसके रोगी 'लाल' एवं 'हरे रंग में भेद नहीं कर पाते हैं। यह रोग 'X गुणसूत्र पर उपस्थित रहता है। यदि वर्णान्ध पुरुष की शादी सामान्य महिला से होती है तो उसके बच्चों में लड़की वर्णान्ध होगी तथा लड़के सामान्य। यदि वर्णान्ध महिला कसी शादी सामान्य पुरुष से होती है तो उनकी सन्तानों में आधे वर्णान्ध एवं आधे सामान्य होंगे।

हीमोफिलिया (Heamophilia)-
यह रोग केवल पुरुषों में पाया जाता है। महिलाएं इस रोग के जीन की वाहक (Carrier) होती हैं। महिलाएं भी इस रोग से ग्रस्त हो सकती हैं, किन्तु ऐसा तभी होगा, जबकि हीमोफीलिक पुरुष हीमोफीलिया वाहक स्त्री से विवाह करे। चूँकि हीमोफीलिक जीन घातक होते हैं जिसके कारण हीमोफीलिक पुरुष युवा होने से पूर्व मर जाते हैं और शादी की स्थिति ही नहीं बन पाती। अतः यह रोग महिलाओं में प्रायः नहीं होता। हीमोफिलिया की स्थिति में चोट लग जाने पर रक्त का थक्का नहीं बन पाता। और अत्यधिक रक्त श्राव होने पर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।


रतौंधी (Night Blindness)-
इसके रोगी को शाम एवं रात्रि के समय स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता।

उाउन सिन्ड्रोम (Down Syndrome)-
इसे मंगोलायड रोग भी कहते हैं, इस रोग की स्थिति में गुणसूत्रों की संख्या  46 के स्थान पर 47 हो जाती है। परिणामतः चेहरा बाहर की ओर उभर आता है, ओठ फट जाते हैं, त्वचाएं शुष्क हो जाती हैं, लम्बाई छोटी हो जाती है।

हसिया कार एनीमिया (Sickle Cell Anaemia)-
इस रोग की स्थिति में लाल रक्त  कणिकाएं ऑक्सीजन की अनुपस्थिति  में हसिया कार हो जाती हैं। परिणामतः लाल रक्त-कणिकाओं की संख्या घट जाती हैं।

फेनिलकीटोनूरिया (Phynylke tonuria)-
इसके रोगी के शरीर में अमीनों अम्ल  का निर्माण नहीं हो पाता, जिससे शरीर में विष एकत्र हो जाता है और मस्तिश्क एवं शरीर का समुचित विकास अवरुद्ध हो जाता है।

एल्बिनिज्म (Alibinism)-
इस रोग की स्थिति में त्वचा की रोग कणिकाओं का निर्माण नहीं हो पाता,परिणामतः व्यक्ति रंगहीन हो जाता है।

थैलेसेमिया (Thalassemia)-
इसे कूलीएनीमिया भी कहते हैं। यह  रोग हीमोग्लोबिन को प्रभावित करता है।

संक्षिप्त टिप्पणियाँ:
• एलर्जी, • एण्टीजन, • एण्टीबाडी, • एण्टीपाय रेटिक्स, •एनेस्थेटिक्स, • एनलजेसिक, . एण्टीहिस्टामिन, •ट्रानक्वैलाइजर • वैक्सीन, • कैंसर।

एलर्जी (Allergy) : एलर्जी कोई बीमारी नहीं है, अपितु यह असंक्रामक अवस्था है, जिसमें कुछ बस्तुओं, जैसे- औषधि, धूलकण, परागकण, पौधे, जन्तु उष्णता, ठंडक आदि के प्रति व्यक्ति आन्तरिक उत्तेजनात्मक प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है। प्रतिक्रिया के लक्षण त्वचा तथा म्युकस झिल्ली में परिलक्षित होते हैं। प्रतिक्रिया के लक्षण त्वचा तथा म्युकस झिल्ली में परिलक्षित होते हैं। हे बुखार (Hay Fever), अस्थामा (Asthma), एक्जिमा (Eczema) एलर्जी हैं। जब एलर्जी पदार्थ प्रोटीन होते हैं, तब ये एण्टीजन (Antizen) कहलाते हैं।

एण्टीजन (Antizen) : ये एक प्रकार के बाह्य सूक्ष्म जीव या पदार्थ होते हैं, जो स्वभावतः प्रोटीन होते हैं और व्यक्ति के रक्त पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। जीवाणु विषाणु (Foreign Agent) एण्टीजन हैं। एण्टीजन हमारे शरीर में एण्टीबाडी के निर्माण को प्रेरित करते हैं।

एण्टीबाडी (Antibody) : एण्टीजन के विरूद्ध हमारे रक्त में प्रोटीन का निर्माण होता है जिसे 'एण्टीबाडी कहते हैं। एण्टीबाडी हमारे शरीर में, रोग रोधक का कार्य करत हैं। पेन्सिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसीन, टेरामाईसीन आदि एण्टीबाडी हैं।

एण्टीपायरेटिक्स (Antipyratics) : यह शरीर के ताप बुखार) का नियंत्रण करने वाली एक प्रकार की औषधि है।

एनेस्थेटिक्स (Anaesthetics) : इसका प्रयोग आपरेशन के समय व्यक्ति को मूर्छित (बेहोश) करने के लिए किया जाता है। क्लोरोफार्म, ईथर, सोडियम पेन्टाथाल और नाइट्रस ऑक्साइड (हंसाने वाली गैस) एनेस्थेटिक्स के उदाहरण हैं।

एनलजेसिक्स (Analgesics) : ये दर्द निवारक औषधियाँ हैं। एस्प्रीन, (Acetylsalicyclin Acid) मारफीन और हीरोइन एनलजेसिक्स के उदाहरण हैं।

एन्टीहिस्टामिन (Antihistamin) : एलर्जी की स्थिति में औषधि के रूप में, अर्थात् अस्थमा, हे बुखार के उपचार हेतु "प्रयुक्त औषधियाँ एण्टीहिस्टामिन कहलाती हैं।

ट्रानक्वैलाइजन (Tranquilizer) : ये अत्यधिक उत्तेजना की स्थिति में तन्त्रिकाओं को शिथिल एवं शान्त (Calm) करने के लिए प्रयुक्त की जाने वाली औषधियाँ हैं। अर्थात ये अत्यधिक उत्तेजना की स्थिति में शारीरिक व मानसिक गतिविधियों को शिथिल करती है।

वैक्सीन (Vaccine) : इसका प्रयोग शरीर के अन्दर बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। "वैक्सीन (टीका) में कमजोर एवं मृत जर्म्स होते हैं, जो शरीर में इंजेक्शन, स्कैच और मुख के माध्यम से प्रवेश कराये जाते हैं। डिप्थीरिया, चेचक, पोलियो, टिटनेस, काली खांसी, आदि के वैक्सीन तैयार किये गये हैं। वैक्सीन का सर्व प्रथम प्रयोग 'एडवर्ड जेनर' ने 1796 में चेचक पर विजय प्राप्त करने के लिए किया था।
  • बच्चे के जन्म के समय BCG का टीका दिया जाता है।
  • 4 माह के बच्चे को ट्रिपुल एण्टीजन (DPT) का टीका लगाया जाता है।
  • 5 वें और 6ठे महीने में भी DPT का टीका लगाया जाता है।
  • 18वें माह में बूस्टर खुराक (Booster Dose) और ट्रिपुल एण्टीजन (DPT) दिये जाते हैं। DPT- डिप्थीरिया, पोलियो एवं टिटनेस के लिए दिया जाता है।
  • चेचक, टिटनेस और टाइफाइड के टीके जीवन में कभी भी दिये जा सकते हैं।
  • बच्चों में दूसरे, तीसरे महीने में चेचक के टीके तीसरे तथा पाँचवें महीने में डिप्थीरिया के तीसरे महीने में टिटनेस, 2.5 महीने में पोलियों के साल्क वैक्सीन, तीसरे में सबिन (Sabin) टीके दिये जाते हैं।
  • कालरा, प्लेग और टाइफाइड के वैक्सीन बच्चों में 1 साल का होने पर दिया जाता है।
कैन्सर (Cancer) :
यह एक घातक बीमारी है. जिसमें शरीर की कोशिकाएं अत्यधिक वृद्धि करने लगती हैं, परिणामतः गाँठे बन जाती हैं, जो अन्ततः फूट कर घाव में परिवर्तित हो जाती हैं। ये घाव कभी भी ठीक नहीं होते और मृत्यु का कारण बनते हैं। इससे शरीर का कोई भी भाग या अंग प्रभावित हो सकता है। इसका कारण पराबैगनी किरणें, रासायनिक पदार्थ, नशीले पदार्थ, विषाणु आदि हो सकते हैं। ब्लड के कैंसर को 'ल्यूकेमिया' (Leukemia), त्वचा के कैंसर को- 'कार्सिनोमास (Carcinomas), आन्तरिक अंगों के कैंसर को 'सार्कोमास (Sarcomas), तन्त्रिका तन्त्र के कैंसर को 'ग्लिओमास (Gliomas), लिम्फ के कैंसर को 'लिम्फोमास (Limphomas), आँख के कैंसर को "रेटिनोब्लास्टोमा (Retino-Blastoma- यह आनुवंशिक कैंसर है), मस्तिष्क के कैंसर को मस्तिष्क ट्यूमर (Brain Tumour) कहते हैं। कुल 14 प्रकार के कैंसर आनुवंशिक हैं। रोडेन्ट अल्सर (Rodent Ulcer) एक प्रकार का त्वचा कैंसर है, जो चेहरे (Face) को प्रभावित करता है।