मानव पर पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact on Human)।

मानव पर पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact on Human)।
भौतिक पर्यावरण मानव को निम्न माध्यमों से प्रभावित करता है-
  • जैव-भौतिक सीमाएँ (Bio-physical Limitations) द्वारा
  • आचारपरक नियंत्रणों (Behavioural Controls) द्वारा
  • संसाधनों की सुलभता (Availability of Resources) द्वारा
जैव-भौतिक सीमाएँ-
मौसम और जलवायु के कारक मनुष्यों, पौधों और पशुओं के जीवन पर विशेष प्रभाव डालते हैं। जैविक दृष्टि से मानव का शरीर कुछ निश्चित पर्यावरणीय दशाओं में ही अच्छी तरह से कार्य करने हेतु सक्षम हो पाता है। मानव के क्रियाकलापों को ऊष्मा, प्रकाश, आर्द्रता, वर्षण, वायु, बादल इत्यादि भौतिक कारक विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। अत्यधिक ऊँचाई, अधिक तापमान तथा आर्द्रता मनुष्य के विकास एवं उत्तरजीविता में बाधा उत्पन्न करते हैं।
शीत ऋतु में आर्कटिक वृत्त के निकटवर्ती क्षेत्र में सिर्फ एक घंटे के लिये ही सूर्य क्षितिज पर रहता है। कई महीनों तक इस क्षेत्र में निरंतर अंधेरा रहने के कारण लोगों के शरीर और मस्तिष्क पर इसका विपरीत मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इस क्षेत्र में न्यून तापमान तथा न्यूनतम वर्षा खाद्यान्न की उपलब्धता को प्रभावित करती है क्योंकि अति शीत प्रदेशों में बीज का अंकुरण नहीं हो पाता।
सूक्ष्म जलवायु मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है। ध्यातव्य है कि कुछ रोगों तथा बीमारियों की मौसमी प्रवृत्ति होती है यानी वे कुछ खास मौसमों में होती हैं। जैसे भारत में वर्षा के मौसम में डेंगू जैसी बीमारियाँ तेज़ी से फैलती हैं जो शीत ऋतु के आते-आते समाप्त होने लगती हैं।

आचारपरक नियंत्रण-
विभिन्न पर्यावरणीय कारक मनुष्य की जातीय विशेषताओं को प्रभावित करने के साथ-साथ उन्हें निर्धारित भी करते हैं। यह मनुष्य की चिन्तन, विचारधाराओं, संस्कृति तथा आचार व व्यवहार को भी प्रभावित करता है।
उत्तरी ध्रुव क्षेत्रों में रहने वाले एस्कीमो में शीत ऋतु की लंबी रातें निराशाजनक प्रभाव उत्पन्न करती हैं। इनके साथ अनुकूलन करने के बावजूद उनके स्वभाव तथा मनोबल को यह स्थिति दुर्बल बनाती है। साथ ही यह अनिद्रा, अवसाद, आलस्य, मस्तिष्क-विकार को जन्म देती है। बाढ़, सूखा, भूकंप, सुनामी, भूस्खलन, बादल फटना आदि चरम प्राकृतिक घटनाएँ भी मनुष्यों की सामाजिक-आर्थिक मानसिक स्थिति एवं स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करती हैं।

संसाधनों की सुलभता-
प्राकृतिक संसाधनों की सुलभता मनुष्य को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करती है। यह उसके क्रियाकलापों को प्रमुखता से निर्धारित करती है। साथ ही मनुष्य की आर्थिक क्षमता, सामाजिक संगठन, राजनीतिक स्थिरता एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध को भी निर्धारित करती है।
विभिन्न महाद्वीपों के राष्ट्रों के बीच विभिन्न तरह के प्राकृतिक संसाधनों की अनियमित प्राकृतिक उपलब्धता, उनके राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की रूपरेखा का निर्धारण करती है। वर्तमान परिदृश्य में भौतिक रूप से विश्व काफी प्रबल एवं चेतन हो गया है, जिससे संसाधनों की सुलभता का महत्त्व और बढ़ गया है। मध्य-पूर्व के देशों में खनिज तेल के अपार भण्डार का पाया जाना, अफ्रीकी देशों में प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों के भण्डार का होना, विश्व के साथ उनके संबंधों को निर्धारित करता है।

नदी के जल का अलग-अलग देशों, राज्यों से होकर प्रवाहित होने के कारण नदी के जल के वितरण तथा उपभोग के संबंध में अन्तर्देशीय एवं अन्तर्राज्यीय विवाद उत्पन्न हो जाते हैं क्योंकि किसी भी देश का आर्थिक विकास बहुत हद तक प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है।