ऊतक (Tissues) किसे कहते हैं।


  • एककोशिकीय जीवों के शरीर में एक ही कोशिका के अंदर जीवन की सभी क्रियाएँ संपन्न होती हैं परंतु उच्च जीवों में कोशिकाएँ गुणन करके बहुकोशिकीय अवस्था में आ जाती हैं । बहुकोशिकीय अवस्था में कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों को करने के लिए अनुकूलित हो जाती हैं। एक ही ऊतक की सभी कोशिकाएँ लगभग समान प्रकार की होती हैं। कुछ ऊतक विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं। यदि ईंट को कोशिका के समान माना जाए तो ईंट के एक समूह को जिससे दीवारों का निर्माण होता है एक प्रकार का ऊतक, दूसरे समहू को जिससे गुम्बद का निर्माण होता है दूसरे प्रकार का ऊतक और इसी प्रकार जिससे खंभे का निर्माण होता, तीसरे प्रकार का ऊतक कहा जा सकता है, इसी प्रकार विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ आपस में संयोजित होकर जीवों के शरीर में विभिन्न प्रकार के ऊतकों का निर्माण करती है। इसकेअंतर्गत पादपों तथा जंतुओं के शरीर में पाये जाने वाले विभिन्न ऊतकों, उनकी संरचनात्मक एवं क्रियात्मक विशेषताओं तथा उनके कार्यों का वर्णन निम्नलिखित है।

ऊतक (Tissue)
  • समान आकार-प्रकार की कोशिकाओं का समूह ऊतक (Tissue) कहलाता है, जो मिलकर किसी एक कार्य को संपन्न करता है।
  • एककोशिकीय जीवों, एवं कुछ निम्न वर्गों के जीवों के अलावा संपूर्ण जीव-जगत में कोशिकाएँ आपस में संयोजित होकर ऊतकों का निर्माण करती है, जो किसी विशेष प्रकार के कार्य को करने में निर्गुण होते हैं। ऊतकों को बनाने वाली कोशिकाओं की संरचना, प्रकार एवं उतकों द्वारा संपन्न होने वाले विभिन्न कार्यों के आधार पर विभिन्न प्रकार के ऊतकों की संरचना भिन्न-भिन्न होती है। कुछ कोशिकाओं के बीच अंर्तकोशिकीय अवकाश पाया जाता है, कुछ में नहीं, और कुछ में पाया जाता है, लेकिन बहुत कम। ये अंतर्कोशीकीय अवकाश एवं इनमें भरा हुआ अंर्तकोशिकीय द्रव्य भी ऊतकों की प्रवृत्त का निर्धारण करता है।
  • जैसा कि हम जानते हैं कि पादप भी जीवित होते हैं, और जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ उनको भी होती हैं, जिनकी पूर्ति के लिए उनमें अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। किंतु पादपों का शरीर और शरीर में होने वाली क्रियाएँ जंतुओं से पूर्णतः भिन्न होती हैं। अतः पादप ऊतक भी जंतु ऊतकों से भिन्न होते हैं जो अपने शरीर में होने वाली क्रिया-विधियों के लिए अनुकूलित होते हैं।
                                  
पादप तथा जंतु ऊतक (Plant and Animal Tissues)

पादपों में मुख्य रूप से दो प्रकार के ऊतक पाये जाते हैं-
  1.  विभज्योतक (Meristematic Tissue)- इनमें विभाजन की अपार क्षमता पाई जाती है।
  2.  स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) - ये विभाजन की क्षमता खो कर विभिन्न प्रकार के कार्यों को संपादित करते हैं। स्थायी ऊतक को पुनः उनकी संरचना की जटिलता के आधार पर दो प्रकारों में बाँटा जाता है-
  1. सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
  2. जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)।
  • सरल स्थायी ऊतकों को पुनः उनकी कोशिकाओं की प्रवृत्यिों एवं अंतराकोशिकीय अवकाश के आधार पर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. पैरेनकाईमा (Parenchyma)
  2. कोलेनकाईमा (Cholenchyma)
  3. स्केलेरेनकाईमा (Schalerenchyma)
  • इसी प्रकार जटिल स्थायी ऊतक भी उनके द्वारा संपादित कार्यों के आधार पर दो प्रकार के होते हैं-
  1.  जाइलम (Xylem)
  2.  फ्लोएम (Pholem)
  • इसी प्रकार जंतु ऊतकों को भी मोटे तौर पर चार भागों में बाँटा जा सकता है-
  1.  उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
  2.  संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
  3.  पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
  4.  तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)
पादप ऊतक (Plant tissues)
  • पादपों को सूक्ष्म अवलोकन करने पर हमें मालूम चलता है पादपों में वृद्धि कैसी होती है? उनमें भोजन का संग्रह कहाँ और कैसे होता है? पादप के कौन से अंग मजबूत होते हैं कौन-से नाजुक होते हैं? पादपों में शाखाएँ, पत्तियाँ कहाँ से निकलती हैं? आदि। पादपों के विभिन्न अंगों में संपन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की क्रियाओं तथा इनकी वृद्धि का विशिष्ट प्रारूप विभिन्न प्रकार के पादप ऊतकों का विभिन्न स्थलों पर उपस्थित रहकर अपना विशिष्ट कार्य संपादित करता है।
  • पादप ऊतकों को निम्न प्रकार से विभेदित किया जा सकता है-

(1) विभज्योतक (Meristematic tissue)
  • विभज्योतक ऊतक की कोशिकाओं में विभाजन की अपार क्षमता होती है। यदि हमने किसी पौधे को ध्यान से देखा होगा तो हमको मालूम होगा कि पादपों में विकास पूरे शरीर में नहीं होता बल्कि कुछ विशेष भागों में सिमित होता है, जैसे पादपों की लंबाई बढ़ती है, उनके जड़ की लंबाई बढ़ती है, पर्वसंधियों से नयी शाखाएँ और नयी पत्तियाँ निकलती हैं आदि। पौधे के वे भाग जहाँ नयी कोशिकाएँ बनती हैं, वहाँ ये विभज्योतक बड़ी संख्या में पाये जाते हैं। वास्तव में विभज्योतक ऊतकों की कोशिकाओं में विभाजित होने की अपार क्षमता होती है, इसलिए वे कोई और कार्य न कर निरंतर विभाजित होती रहती हैं, जिनसे पादप की लंबाई और चौड़ाई बढ़ती है।
  • निरंतर विभाजन करने के लिए इन कोशिकाओं में अनेक गुण होते हैं जो इनके विभाजन की दर को बनाए रखते हैं। इन्हें विभज्योतक ऊतकों की कोशिकाओं के विशिष्ट लक्षण (Specific characterstics) कहा जा सकता है।
ये निम्न हैं-
  1.  इनमें कोशिकाद्रव्य की मात्रा बहुत अधिक होती है।
  2.  इनकी कोशिका भित्ती बहुत पतली होती है, जिससे विभाजन के समय नयी कोशिकाओं के उत्पन्न होने की प्रक्रिया आसान होती है।
  3.  स्पष्ट केन्द्रक होते हैं, क्योंकि कोशिका विभाजन के समय केन्द्रक स्पष्ट हो जाता है।
  4.  इनमें रसधानी अनुपस्थित होती है, या अत्यंत ह्रषित होती है, क्योंकि अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण इन ऊतकों की कोशिकाओं को ऊर्जा की अत्यधिक आवश्यकता होती है इसलिए इनमें जमा करने के लिए भोजन उपलब्ध नहीं होता, इसलिए रसधानियों की आवश्यकता नहीं होती।
  • विभज्योतक ऊतक को उसके पाये जाने वाले स्थान के आधर पर तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
(1) शीर्षस्थ विभज्योत्क (Apex Meristematic tissue) :
  • यह विभज्योतक प्ररोह और जड़ के शीर्ष भाग पर पाया जाता है और निरंतर विभाजित होकर पौधे की लंबाई बढ़ाने में योगदान देता है।
(2) पार्श्व विभज्योतक (Cambium meristematic tissue) :
  • यह ऊतक मुख्यतः तने एवं जड़ों के आधार पर पाया जाता है, और पौधे की चौड़ाई बढ़ाने का कार्य करता है।
(3) अंतर्विष्ट विभज्योतक :
  • ये विभज्योतक पत्तियों के आधार तथा तनों की पर्वसंधियों पर पाये जाते हैं, और नयी पत्तियों तथा शाखा के उद्भव में सक्रिय योगदान निभाते हैं।
विभज्योतक ऊतकों का कार्य तब समाप्त हो जाता है, जब वे विभाजित होकर नयी कोशिकाओं का निर्माण कर देते हैं। अब सवाल यह उठता है, कि विभाजन कर लेने के बाद इन ऊतकों का क्या होता है? इन ऊतकों की कोशिकाएँ विभाजन कर लेने के पश्चात ये कोशिकाएँ विभाजन की क्षमता खोकर विभिन्न प्रकार की स्थायी ऊतकों मे विभेदित हो जाती हैं।

(2) स्थायी ऊतक (Permanent tissues)
  • विभज्योतक ऊतक की कोशिकाओं के निरंतर विभाजन से पौधे का आकार एवं आयतन तो बढ़ने लगता है परंतु पौध में वृद्धि के अलावा अन्य सभी प्रकार के कार्य
जैसे-
  • जल एवं भोजन का संवहन, भोजन का संग्रह, पादपों की सुरक्षा आदि सभी प्रकार के कार्य स्थायी ऊतकों द्वारा संपन्न किये जाते हैं। इन ऊतकों को स्थायी ऊतक कहा जाता है क्योंकि इनमें विभाजन की क्षमता नहीं होती। स्थायी ऊतकों को पुनः दो भागों में बाँटा जाता है-
  1.  सरल स्थायी ऊतक (Simple permanent tissue)
  2.  जटिल स्थायी ऊतक (Complex permanent tissue)
  • जो विभज्योतक विभाजन की क्षमता खो देते हैं, वे ही स्थायी ऊतकों में विभेदित हो जाते हैं। विभेदन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत सामान्य कोशिका किसी विशिष्ट कार्य को करने के लिए रूपान्तरित एवं अनुकूलित होकर विशिष्ट लक्षण ग्रहण करती है।

सरल स्थायी ऊतक (Simple permanent tissue) :
  • ये ऊतक एक ही प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिकाओं की संरचना, एवं विशिष्ट कार्यों के लिए उनके विशिष्ट लक्षणों के आधार पर सरल स्थायी ऊतकों को पुनः तीन प्रकारों में विभक्त किया जाता है।
(1) पैरेन्काईमा ऊतक (Paranchyma tissue)
  • पैरेनकाईमा पतली कोशिका भित्ती वाली जीवित कोशिकाओं से बना ऊतक होता है। पैरेनकाईमा में कोशिकाओं के बीच का अंतर्कोशिकीय अवकाश अत्यधिक होता है। यह ऊतक अत्यधिक मात्रा में पादप ऊतकों में उपस्थित रहता है, और ऊतकों का मुख्य आधार बनाता है। इसके अतिरिक्ति पैरेनकाईमा पौधे को सहायता प्रदान करने के साथ-साथ भोजन संचय जल संग्रह का कार्य भी करता है।
  • कुछ विशिष्ट पादपों में विशिष्ट परिस्थितयों में पैरेन्काईमा में अनेक रूपान्तरण भी हो जाते हैं, जिससे यह अपने स्वभाविक कार्य के साथ-साथ कुछ विशिष्ट कार्यों को भी संपन्न करता है।
  • हरित लवक युक्त पैरेन्काईमा (क्लोरेनकाईमा) (हरित ऊतक) प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया करके भोजन का निर्माण भी करते हैं। जलीय पादपों में पैरेन्काईमा (ऐरेन्काइमा) की कोशिकाओं के बीच अत्यधिक अंतर्कोशीकीय अवकाश पाया जाता है जिसमें हवा भरी भरी होती है इन्हें गुहिकाएँ (Air cavitiies) कहते हैं। यह जलीय पौधों को तैरने में सहायता प्रदान करती है।

(2) कोलेनकाईमा (Cholenchyma) :
पैरेनकाईमा की तरह कोलेनकाईमा भी जीवित कोशिकाओं से बना ऊतक है। कोलेनकाईमा अनियमित रूप से कोनों पर मोटी होती है तथा इसमें अंतर्कोशिकीय अवकाश अत्यंत कम होता है, मोटी कोशिका भित्ती एवं कम अंतर्कोशकीय अवकाश के कारण ये ऊतक बहुत ही मजबूत होते हैं। इन उतकों का मुख्य कार्य पौधों को यांत्रिक सहायता प्रदान करना, पौधों में लचीलापन लाना तथा पौधे को तेज हवा एवं अन्य विपरित परिस्थितयों में टूटने से बचाना है। पौधे की पत्तियों के कोनों पर उपस्थित कोलेनकाइमा ऊतक पत्त्यिों को हवा में फटने से बचाता है।

(3) स्केलेरेनकाईमा (Schlaranchyma) :
  • पैरेनकाईमा एवं कोलेनकाईमा के विपरीत स्केलेरेनकाईमा की कोशिकाएँ मृत होती है। ये कोशिकाएँ लंबी तथा पतली होती हैं, जिनकी कोशिका भित्ती पर लिग्निन (सीमेंट जैसा एक रासायनिक पदार्थ) की मोटी पर्त होती है, जो इसे कठोर कर देती है तथा जल के आवागमन के लिए कोशिका को अपारगम्य बना देती है। स्केलेरेनकाईमा की कोशिकाओं के बीच अंतर्कोशकीय अवकाश अनुपस्थित होता है, जिससे ये अत्यंत ही सख्त ऊतक होता है। यह ऊतक मुख्य रूप से तने में संवहन ऊतकों में बीजों तथा फलों आदि में उपस्थित होता इन स्थानों पर इसका कार्य पौधे को कठोरता एवं मजबूती प्रदान करना है। नारियल के छिलकों तथा जूट के रेशों में इसकी उपस्थिति के कारण ये अत्यंत सख्त हो जाते हैं। नासपाती में उपस्थित दाने जैसी संरचनाएँ (नासपाती का खुरदुरापन) भी स्केलेरनकाईमा के कारण होता है।

(2) जटिल स्थायी ऊतक (Complex permanent tissues) :
  • वे स्थायी ऊतक, जो दो या दो से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं जटिल स्थायी ऊतक कहलाते हैं। इनकी जटिल संरचना के कारण ही इनको जटिल स्थायी ऊतक कहा जाता है। पौधों के दोनों संवहनी ऊतक जाइमल और फ्लोएम जटिल स्थायी ऊतक की श्रेणी में आते हैं।

जाइलम (Xylem)
  • जाइलम पौधों में जड़ से जल तथा खनिज लवणों को ग्रहण कर इसे पत्तियों तक पहुँचाने का कार्य करता है। इस कार्य के लिए एक प्रकार की कोशिकाएँ पर्याप्त नहीं हो सकती अतः जाइलम इस कार्य के लिए विशिष्ट रूप से अनुकूलित चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट कार्य होता है।

जाइलम का निर्माण करने वाली कोशिकाएँ-
  1.  जाइलम ट्रैकिड्स (वाहिनिका) (Xylem Tracheids)
  2.  वाहिका (Vessels)
  3.  जाइलम पैरेनकाइमा (Xylem Parenchyma)
  4.  जाइलम फाइबर (Xylem Fiber)
  • जाइलम जड़ों से पानी एवं खनिज लवणों को पत्तियों तक पहुँचाने में गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध कार्य करना पड़ता है, अर्थात् इस ऊतक को अत्यंत मजबूत एवं सक्षम होना चाहिए जिससे यह गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध अपना कार्य संपन्न कर सके।
जाइलम को इसमे समर्थ बनाने के लिए इसकी इसकी अधिकांश कोशिकाओं में मोटी कोशिका भित्ती होती है, और इसकी अधिकांश कोशिकाएँ मृत रहती हैं।
  • इनमें से वाहिनिकाएँ एवं वाहिकाएँ मुख्य संवहन कोशिकाएँ होती हैं, जो नली के आकार की लंबी कोशिकाएँ होती हैं। जल एवं खनिज लवण इन्हीं नलिकाकार वाहिकाओं एवं वाहिनिकाओं में संवहित होती हैं। भोजन का संग्रह करता है, यहाँ भी यह यही कार्य करता है यह जाइलम की जीवित कोशिका होती है। जाइलम फाइबर इस ऊतक को सहारा देने का कार्य करते हैं।

फ्लोएम (Phloem)
  • यह ऊतक पत्तियों में निर्मित भोजन के पादप के विभिन्न अंगों तक पहुँचाने का कार्य करता है। अत: यह ऊतक पूरे पादप में प्रत्येक दिशा में (गुरुत्वाकर्षण के विपरीत तथा गुरुत्वाकर्षण की ओर) कार्य करता है।

जाइलम की तरह फ्लोएम भी चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है-
  1.  चालनी नलिका (Sieve Tube Cells)
  2.  साथी कोशिकाएँ (Companion Cells)
  3.  फ्लोएम पैरेन्काइमा (Phloem Parenchyma)
  4.  फ्लोएम रेशे (Phloem Fiber)
  • जाइलम के विपरीत इस ऊतक की लगभग सभी कोशिकाएँ जीवित होती हैं। इसमें मात्र फ्लोएम रेशे मृत होते हैं, जिनका कार्य है, इस ऊतक को मजबूती प्रदान करना एवं सहारा देना होता है। पैरेन्काइमा हमेशा की तरह यहाँ भी भोजन संग्रह का कार्य करती है। इसमें चालनी नलिका एवं साथी कोशिकाएँ मुख्य संवहन ऊतक होते हैं। चालनी नलिका छिद्रित भित्ति वाली नलिकाकार कोशिका होती है।

जंतु ऊतक (Animal tissues)
  • जन्तुओं के ऊतक पादपों के ऊतक से पूर्णतः भिन्न होते हैं. और इनका कार्य भी भिन्न प्रकार से होता है। जन्तुओं में कुछ कार्य पादपों से अतिरिक्त होते हैं,
जैसे- प्रचलन (Locomotion) तंत्रिकीय नियंत्रण (Nervous control) आदि।
  • इनके अतिरिक्त भी पादपों तथा जन्तुओं में जो समान कार्य होते हैं, जैसे पोषण, श्वसन, उत्सर्जन आदि, उनकी क्रिया-विधि अलग-अलग होती है। जंतुओं में इन भिन्न प्रकार की क्रियायों को संपन्न करने के लिए भिन्न प्रकार के ऊतकों की आवश्यकता होती है।

जन्तुओं में में पाये जाने वाले ऊतकों को मुख्य रूप से चार वर्गों में बाँटा जाता है-
  1.  उपकला ऊतक (Edithelial Tissues)
  2.  सयाजी कतक Connective Tissues)
  3.  पेशी ऊतक (Muscular Tissues)
  4.  तत्रिका ऊतक (Nervous Tissues)

1. उपकला ऊतक (Epithelial Tissues)
  • यह जन्तुओं के शरीर में पाया जाने वाला सबसे सामान्य ऊतक है, जो लगभग सभी अंगों के ऊपर एक पर्त के रूप में उपस्थित होता है। इस ऊतक की कोशिकाएँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, और अनवरत सतह का निर्माण करती हैं जिसके कारण इन्हें पेवमेन्ट ऊतक भी कहा जाता है। इन ऊतकों में अंतर्कोशिकीय अवकाश बहुत कम होता है।
  • इन ऊतकों को कोशिकाओं के आकार एवं आकृति तथा उनकी व्यवस्था के आधार पर निम्न प्रकारों में बाँटा जा सकता है। इन प्रकारों के अतिरिक्त भी कुछ उपकला ऊतकों में सिलिया पाये जाते हैं, इस स्थिति में इन्हें सिलिया युक्त उपकला ऊतक (Ciliated epithelial tissue) कहते हैं। कुछ उपकला ऊतकों में स्त्रावण का विशिष्ट गुण होता है, इन उपकला ऊतकों को ग्रंथिल उपकला ऊतक (Glandular epethilial tissue) कहते हैं। ये उपकला ऊतक विशेष रूप से स्त्रावी अंगों जैसे यकृत, अग्नाशय तथा सभरी अंत:स्त्रावी ग्रंथियों में उपस्थित रह कर विभिन्न प्रकार के स्त्रावण करते हैं।
आकार, आकृति एवं व्यवस्था के आधार पर उपकला ऊतक के प्रकार

  • सरल शल्की उपकला ऊतक (Simple squamous epithelial tissue)
  • स्तंभाकार उपकला ऊतक (Simple columner epithelial tissue)
  • घनाकार उपकला ऊतक (Simple cuboidal epithelial tissue)
  • स्तरित शल्की ऊतक (Stratified Squamous epithelial tissue)
  • स्तरित घनाकार ऊतक (Stratified cuboidal epithelial tissue)
  • कूटस्तरित उपकला ऊतक (Pseudostratified epithelial tissue)

उपकला ऊतकों के पाये जाने का स्थल तथा उनके विशिष्ट कार्य-
ऊतक का प्रकार
शरीर में उसका स्थान
मुख्य कार्य
सरल शल्की उपकला ऊतक
फेफड़ों के वायुकोश में, हृदय, रक्त वाहिनियों, लसीका वाहिनियों के दीवार में
विभिन्न पदार्थों का विसरण एवं छनन द्वारा आवागमन संभव बनाता है और चिकनाहट पैदा करने वाले पदार्थों
का स्त्राव करता है।
सरल घनाकार ऊतक
ग्रंथियों के स्त्रावी भाग की नलियों में तथा वृक्क नलिकाओ में
स्त्रावण एवं अवशोषण।
सरल स्तंभाकार ऊतक
सिलिया युक्त सरल स्तंभाकार ऊतकब्रोंकी, गर्भाशय नली, गर्भाशय आदि  में पाया जाता है। बिना सिलिया युक्त सरल घनाकार ऊतक पाचन
नली एवं मूत्राशय में पाया जाता है।  
अवशोषण एवं म्यूकस तथा एन्जाईम संश्लेषण का कार्य करता है।
स्तरित शल्की उपकला
इसोफैगस, मुख एवं योनि में पायाजाता है।
घर्षण को कम करके इनकी क्षति को कम करता है।
स्तरित घनाकार ऊतक
पसीने की ग्रंथियाँ, लार ग्रंथियाँ, एवं स्तन ग्रंथियों में पाया जाता है।  
यह इनकी सुरक्षा का कार्य करता है।
स्तरित स्तंभाकार ऊतक
पुरूष की मूत्र उत्सर्जन नली में, तथा अन्य ग्रंथियों की नली में पाया जाता है।
स्त्रावण एवं सुरक्षा का कार्य करता है।
ट्रांजिसनल उपकला ऊतक
मनुष्य के मूत्र उत्सर्जन तंत्र में पाया
जाता है।
इन अंगों को प्रसारण में सहायता
करता है।

इस प्रकार विभिन्न प्रकार के उपकला ऊतकों द्वारा निम्न कार्य संपन्न किये जाते हैं-
  1. जंतुओं के शरीर को आच्छादित करना।
  2. शरीर की सुरक्षा
  3. शरीर के विभिन्न अंगों को एक-दूसरे से पृथक करते हैं।
  4. शरीर के विभिन्न अंगों का बाह्य स्तर बनाना (त्वचा, मुँह, आहारनली आदि)
  5. ग्रोथ कोशिकाओं के रूप में रूपान्तरित होकर अनेक प्रकार के स्त्रावण करती हैं।
  6. त्वचा को कटने-फटने से बचाती है।
  7. पदार्थों का अवशोषण एवं पारगमन
  8. श्लेष्मा का स्त्रावण तथा श्लेष्मा को निर्माण स्थल से हटाना
2. संयोजी ऊतक (Connective tissue)
  • जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इन ऊतकों का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न अंगों ऊतकों को एक-दूसरे से जोड़ना हैं।
अंतर्कोशिकीय अवकाश, मैट्रिक्स का प्रकार, कार्य आदि के आधार पर इस ऊतक के निम्न प्रकार होते हैं-
  1. रक्त
  2. अस्थियाँ
  3. उपास्थियाँ
  4.  टेण्डन और लिगामेण्ट
  5.  वसा ऊतक
  6.  एरिओलर ऊतक
रक्त तीन प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है, जो प्लाज्मा (जो कि इसका मैट्रिक्स है) में बिखरे होते हैं। ये तीन प्रकार की कोशिकाएँ हैं,लाल रक्त कणिकाएँ,श्वेत रक्त कणिकाएँऔर प्लेटलेट्स लाल रक्त कणिकाएँ ऑक्सीजन का वाहन करती है, श्वेत रक्त कणिकाएँ रोगाणुओं से लड़ने का कार्य करती है। इसी प्रकार एक पूर्ण ऊतक के रूप में रक्त पचित भोजन, उत्सर्जी पदार्थों, हॉर्मोन आदि का भी संवहन करता है।


अस्थि एवं उपास्थि भी संयोजी ऊतक के उदाहरण हैं, जो शरीर को मजबूती प्रदान करने में सहायक होते हैं, ये मॉसपेशियों को जुड़ने का स्थान प्रदान करते हैं, और शरीर को सीधा रखने का काम करते हैं। अस्थि एवं उपास्थि की कठोरता का कारण इनकी कठोर आधात्री (matrix) होती है। लिगामेण्ट और टेण्डन क्रमशः अस्थियों को अस्थियों से और अस्थियों को मॉसपेशियों से जोड़ने का कार्य करते हैं। लिगामेण्ट बहुत ही लचीले ऊतक होते हैं, जो हड्डियों को जोड़ के स्थान को चिकनी बनाती है। लिगामेण्ट में बहुत कम मैटिक्स होता है। अपेक्षाकृत टेंडन में लचीलापन कम होता है और ये रेशेदार ऊतक होते हैं।

  • वसा ऊतक हमारे शरीर में मुख्यतः त्वचा के नीचे पाये जाते हैं, वसा की छोटी-बड़ी गोलिकाएँ इस ऊतक को ऊष्मा का कुचालक बना देती है।
एरिओलर ऊतक त्वचा और मॉसपेशियों के बीच, रक्त नलिका के चारों ओत तथा नसों और अस्थि मज्जा (Bone marrow) में पाया जाता है। शरीर के अंदर के खाली स्थान को भरते हुए यह ऊतक शरीर को सहारा देने का कार्य करता है। यह ऊतक अन्य ऊतकों की मरम्मत का भी कार्य करता है।



 अस्थि एवं उपास्थि में अंतर
अस्थि
उपास्थि
(1) अस्थि अपेक्षाकृत अधिक कठोर होते हैं।
(1) उपास्थि अपेक्षाकृत कोमल होते हैं।
(2) अस्थि की मैट्रिक्स कैल्सियम की बनी होती है।
(2) उपास्थि की मैट्रिक्स प्रोटीन और शर्करा की
बनी होती है।
(3) अस्थि शरीर का पूरा अंत:कंकाल बनाता है।
(3) उपास्थियों का इतना अधिक विस्तार शरीर में
नहीं है।
(4) इसमें कोशिकाओं के बीच स्थान ना के बराबर होता है।
(4) कोशिकाओं के बीच पर्याप्त स्थान होता है।
(5) ये अंत:कंकाल बनाती है।
(5) यह अस्थियों के जोड़ों को चिकना बनाकर उसे
अंत:कंकाल बनाने में सहायता करती है।
(6) अस्थियों में बिल्कुल भी लचीलापन नहीं होता
(6) यह अपेक्षाकृत लचीली होती हैं।
(7) उपस्थिति- पूरे शरीर में इनका विस्तार होता है।
(7)  अस्थियों के जोड़ों पर, कर्ण पल्लव, बाह्य नाक
कंठ आदि।

टेण्डन तथा लिगामेण्ट में अंतर
टेण्डन
लिगामेण्ट
(1) यह अस्थियों को मांसपेशियों से जोड़ता है।
(1) यह एक अस्थि को दूसरी अस्थि से जोड़ता है।
(2) यह कम लचीला होता है।
(2) यह अपेक्षाकृत अधिक लचीला होता है।
(3) इसमें रेशेदार ऊतक है।
(3) यह रेशेदार नहीं होता है।

3. पेशी ऊतक (Muscular Tissues)

  • ये भिन्न संरचना वाले ऊतक हैं। इनकी लंबी कोशिकाओं के कारण इन्हें पेशीय रेशा (muscular fibre) भी कहा जाता है। इन ऊतकों को दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
  1.  मसृण पेशी ऊतक (Smooth Muscular tissues)
  2.  रेखित पेशी ऊतक (Straited Muscular Tissues)
  • इन ऊतकों में संकुचन की अपार क्षमता होती है। ये दोनों प्रकार के ऊतक शरीर के विभिन्न हिस्सों में पाये जाते हैं। जैसे मसृण पेशी ऊतक आँत, मूत्राशय, गर्भाशय आदि शरीर के भीतरी अंगों, रक्त वाहिकाओं की दीवारों तथा त्वचा में पाये जाते हैं।
  • जबकि रेखित पेशी अस्थि-पेशियों तथा हृदय, ग्रसनी (Pharynx) जीभ और कोमल तालु जैसे शरीर के भीतरी अंगों में उपस्थित होते हैं। ये ऊतक कंकाल तंत्र से जुड़कर शरीर को आकार देने का कार्य करते हैं। ये ऊतक शरीर की गति के लिए जिम्मेदार होते हैं। इन ऊतकों के संकुचन के गुण के कारण हमारे शरीर में अनेक क्रियाएँ संपन्न होती हैं,
जैसे- विष्ठा का शरीर से बाहर निकलना, स्त्रियों के जननांगों के पेशी ऊतकों में संकचन की अत्यधिक क्षमता पाई जाती है। पेशियों को शरीर के प्रेरक तन्त्र (Motor apparatus) का सक्रिय अंग माना जाता है। इनके संकुचन और प्रसरण से शरीर में विभिन्न प्रकार की गति उत्पन्न होती है।


पेशीय ऊतक के कार्य करने की प्रक्रिया के अनुसार इन्हें दो वर्गों में बाँटा जाता है-
  • ऐच्छिक पेशियाँ (Voluntary muscles)
  • अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscles)

ऐच्छिक पेशियाँ (Voluntary muscles) :
  • ऐच्छिक पेशियाँ वे पेशियाँ होती हैं, जिनके संकुचन और शिथिलन पर हमारा नियंत्रण होता है। यह पेशियाँ रेखित पेशी ऊतक (Striated muscles tissue) की बनी होती हैं। ये पेशियाँ मुख्यतः सिर, धड़ और अग्रांगों कंकाल पेशियों, जीभ, स्वरयंत्र आदि में पायी जाती हैं। ये जटिल बनावट वाले ऊतक होते हैं।

अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscles) :
  • इन पेशियों में हम हमारी इच्छानुसार संकुचन और शिथिलन नहीं कर सकते। ये पेशियाँ कोमल और अरेखित (Not- striated) पेशी ऊतक की बनी होती हैं और भीतर के अंगों, रक्तवाहिकाओं की दीवारों और त्वचा में पाई जाती हैं। हृदय की पेशियों, रेखित पेशी ऊतक की बनी रहने पर भी, व्यक्ति के इच्छानुसार आंकुचित नहीं होती हैं।

पेशियों का पोषण :
  • रक्त रक्तवाहिकाओं के माध्यम से पेशियों को पोषक तत्व प्राप्त होता है और रक्त ही इनमें उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों (Waste products) को अपने साथ लेकर विभिन्न उत्सर्गी अवयवों के माध्यम से बाहर निकाल देता है।

पेशी ऊतकों के मुख्य गुण :
  • इन ऊतकों में उत्तेजनशीलता अर्थात उद्दीपन के प्रत्युत्तर में कार्य करने का गुण होता है। इनकी संकुचन की अपार क्षमता इसे अन्य ऊतकों से कई विषयों में पश्थक करती है। पेशी संकचित अवस्था में छोटी और मोटी हो जाती है। यह अपना कार्य संकुचन की अवस्था में ही करती है। पेशी ऊतकों को संकुचन एवं शिथिलन का आदेश केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र प्रेरक तंत्रिकाओं के माध्यम से देता है। केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के आदेश के फलस्वरूप पेशियाँ सक्रिय हो जाती हैं, और अपना कार्य करने लगती हैं।
  • पेशियों में लोचकता (प्रत्यास्थता) का गुण होता है। इनमें एक निश्चित सीमा तक ही फैलाव होता है। पेशियों में जिस कारण से प्रसार होता है, उसके समाप्त होते ही, पेशियाँ पूर्व अवस्था में आ जाती हैं।

4. तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissues):
यह तंत्रिका कोशिकाओं (दमनतवदे) से बना ऊतक है जो केन्द्रीय तथा परिधीय तंत्रिका तंत्र का महत्वपूर्ण भाग है।

 तंत्रिका कोशिकाएँ अत्यधिक विशिष्ट कोशिकाएँ होती हैं, और कोशिकाकाय तथा एक्सोन में बटी होती है। इस ऊतक का मुख्य गुण इनकी संवेदनशीलता एवं संचालन-शक्ति है। विभिन्न प्रकार के उद्दीपन के उत्तर में तंत्रिका तंत्र अंगों में उत्तेजना उत्पन्न करता है। उत्तेजना का संप्रेषण तंत्रिका ऊतक ही करते हैं।



  • ऊतक समान आकार-प्रकार की कोशिकाओं का समूह ऊतक कहलाता है, जो मिलकर किसी एक कार्य को संपन्न करता है।
  • पादपों में विभज्योतक ऊतक की कोशिकाओं में विभाजन की अपार क्षमता होती है और ये पौधे की लंबाई एवं चौड़ाई बढ़ाने में सहायक होते हैं।
  • विभज्योतक ऊतकों की कोशिकाओं में कोशिकाद्रव्य की मात्रा बहुत अधिक, कोशिका भित्ती बहुत पतली, स्पष्ट केन्द्रक, रसधानी अनुपस्थित होती है।

स्थायी ऊतकों को दो भागों में बाँटा जाता है-
  1.  सरल स्थायी ऊतक (Simple permanent tissue)
  2.  जटिल स्थायी ऊतक (Complex permanent tissue)
  • हरित लवक युक्त पैरेन्काईमा (क्लोरेनकाईमा) (हरित ऊतक) प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया करके भोजन का निर्माण भी करते हैं।
  • जलीय पादपों में पैरेन्काईमा (ऐरेन्काइमा) की कोशिकाओं के बीच अत्यधिक अंतर्कोशीकीय अवकाश पाया जाता है जिसमें हवा भरी भरी होती है इन्हें गुहिकाएँ (Air cavitiies) कहते हैं। यह जलीय पौधों को तैरने में सहायता प्रदान करती है।
  • कोलेनकाईमा अनियमित रूप से कोनों पर मोटी जीवित कोशिकाएँ होती हैं जिनके बीच अंतर्कोशिकीय अवकाश अत्यंत कम होता है। यह पौधों को यांत्रिक सहायता प्रदान करती हैं, पौधों में लचीलापन लाती हैं तथा पौधे को तेज हवा एवं अन्य विपरित परिस्थितयों में टूटने से बचाती हैं।
  • स्केलेरेनकाईमा मृत लंबी तथा पतली कोशिकाएँ होती हैं, जिनकी कोशिका भित्ती पर लिग्निन (सीमेंट जैसा एक रासायनिक पदार्थ) की मोटी पर्त होती है। इनमें अंतर्कोकिशकीय अवकाश अनुपस्थित होता है, तथा ये तने में, संवहन ऊतकों में, बीजों तथा फलों आदि में उपस्थित होती हैं। यह पौधे को कठोरता एवं मजबूती प्रदान करती हैं। पौधों के दोनों संवहनी ऊतक जाइलम और फ्लोएम जटिल स्थायी ऊतक की श्रेणी में आते हैं।

जाइलम में चार घटक होते हैं-
  1.  जाइलम ट्रैकिड्स (वाहिनिका)
  2.  वाहिका
  3.  जाइलम पैरेनकाइमा
  4.  जाइलम फाइबर
इसकी अधिकांश कोशिकाओं में मोटी कोशिका भित्ती होती है, और इसकी अधिकांश कोशिकाएँ मृत रहती हैं। फ्लोएम (Pholem) के चार घटक होते हैं-
  1.  चालनी नलिका
  2.  साथी कोशिकाएँ
  3.  फ्लोएम पैरेन्काइमा
  4.  फ्लोएम रेशे
  • इस ऊतक की अधिकांश कोशिकाएँ जीवित होती हैं, मात्र फ्लोएम रेशे मृत होते हैं, जिनका कार्य है, इस ऊतक को मजबूती प्रदान करना एवं सहारा देना।
  • चालनी नलिका छिद्रित भित्ति वाली नलिकाकार कोशिका होती है।
जन्तुओं में मुख्यतः चार प्रकार के ऊतक पाये जाते हैं। इनको इनकी संरचना एवं कार्य के आधार पर विभेदित किया गया है।
  1.  उपकला ऊतक (Epithelial Tissues)
  2.  संयोजी ऊतक (Connective Tissues)
  3.  पेशी ऊतक (डनेबनसंत ज्पेनमे)
  4.  तंत्रिका ऊतक(छमतअवने ज्पेनमे)।
  • उपकला ऊतक (Epithelial Tissues) की कोशिकाएँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, और अनवरत सतह का निर्माण करती हैं जिसके कारण इन्हें पेवमेन्ट ऊतक भी कहा जाता है। इनमें अंतर्कोशिकीय अवकाश बहुत कम होता है।

ये मुख्यतः सुरक्षा एवं स्त्रावण का कार्य करते हैं।
  • सरल शल्की उपकला ऊतक - आहारनली, मुँह
  • स्तंभाकार उपकला ऊतक - आँत, श्वासनली
  • घनाकार उपकला ऊतक - वृक्क नली, लार ग्रंथि की नली
  • स्तरित उपकला ऊतक - त्वचा
  • ग्रंथिल उपकला ऊतक - स्त्रावण ग्रंथियों में।
  • संयोजी ऊतक (Connective tissue) का मुख्य कार्य शरीर के विभिन्न अंगों ऊतकों को एक-दूसरे से जोड़ना है। अंतर्कोशिकीय अवकाश, मैट्रिक्स का प्रकार, कार्य आदि के आधार पर संयोजी ऊतक के निम्न प्रकार होते हैं-
  1.  रक्त
  2.  अस्थियाँ
  3.  उपास्थियाँ
  4.  टेण्डन और लिगामेण्ट
  5.  वसा ऊतक
  6.  एरिओलर ऊतक
  • श्वेत रक्त कणिकाएँ रोगाणुओं से लड़ने का कार्य करती है।
  • अस्थि एवं उपास्थि शरीर को मजबूती प्रदान करने में सहायक होते हैं, ये मॉसपेशियों को जुड़ने का स्थान प्रदान करते हैं, और शरीर को सीधा रखने का काम करते हैं।
  • अस्थि एवं उपास्थि की कठोरता का कारण इनकी कठोर आधात्री (matrix) होती है।
  • लिगामेण्ट और टेण्डन क्रमशः अस्थियों को अस्थियों से और अस्थियों को मॉसपेशियों से जोड़ने का कार्य करते हैं। वसा ऊतक हमारे शरीर में मुख्यतः त्वचा के नीचे पाये जाते हैं, वसा की छोटी-बड़ी गोलिकाएँ इस ऊतक को ऊष्मा का कुचालक बना देती है।
  • एरिओलर ऊतक त्वचा और मॉसपेशियों के बीच, रक्त नलिका के चारों ओत तथा नसों और अस्थि मज्जा (Bone marrow) में पाया जाता है। शरीर के अंदर के खाली स्थान को भरते हुए यह ऊतक शरीर को सहारा देने का कार्य करता है। यह ऊतक अन्य ऊतकों की मरम्मत का भी कार्य करता है।
  • पेशीय ऊतक की लंबी कोशिकाओं के कारण इन्हें पेशीय रेशा (muscular fibre) भी कहा जाता है।

पेशीय ऊतकों को दो प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
  1.  मसृण पेशी ऊतक (Smooth Muscular tissues)
  2.  रेखित पेशी ऊतक (Striated Muscular Tissues)
  • मसृण पेशी ऊतक आँत, मूत्राशय, गर्भाशय आदि शरीर के भीतरी अंगों, रक्त वाहिकाओं की दीवारों तथा त्वचा में पाये जाते हैं।
  • रेखित पेशी अस्थि-पेशियों तथा हृदय, ग्रसनी (Pharynx) जीभ और कोमल तालु जैसे शरीर के भीतरी अंगों में उपस्थित होते हैं।
  • पेशियों को शरीर के प्रेरक तन्त्र (Motor apparatus) का सक्रिय अंग माना जाता है।

पेशीय ऊतक के कार्य करने की प्रक्रिया के अनुसार इन्हें दो वर्गों में बाँटा जाता है
  1.  ऐच्छिक पेशिया (Voluntary muscles)
  2.  अनैच्छिक पेशियाँ (Involuntary muscles)
  • ऐच्छिक पेशियाँ वे पेशियाँ होती हैं, जिनके संकुचन और शिथिलन पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है। मुख्यतः सिर, धड़ और अग्रांगों कंकाल पेशियों, जीभ, स्वरयंत्र आदि में पायी जाने वाली यह पेशियाँ रेखित पेशी ऊतक (Striated muscles tissue) की बनी होती हैं।
  • अनैच्छिक पेशियों में हम हमारी इच्छानुसार संकुचन और शिथिलन नहीं कर सकते। ये पेशियाँ कोमल और अरेखित (Not- striated) पेशी ऊतक की बनी होती हैं और भीतर के अंगों, रक्तवाहिकाओं की दीवारों और त्वचा में पाई जाती हैं।
  • हृदय की पेशियों, रेखित पेशी ऊतक की बनी रहने पर भी, व्यक्ति के इच्छानुसार आंकुचित नहीं होती हैं।
  • तंत्रिका ऊतक तंत्रिका कोशिकाओं (neurons) से बना ऊतक है जो केन्द्रीय तथा परिधीय तंत्रिका तंत्र का महत्वपूर्ण भाग है। तंत्रिका कोशिकाएँ अत्यधिक विशिष्ट कोशिकाएँ होती हैं, और कोशिकाकाय तथा एक्सोन में बॅटी होती है। इस ऊतक का मुख्य गुण इनकी संवेदनशीलता एवं संचालन-शक्ति है।
  • विभिन्न प्रकार के उद्दीपन के उत्तर में तंत्रिका तंत्र अंगों में उत्तेजना उत्पन्न करता है।

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