सामंतवाद | सामंतवाद का अर्थ | सामंतवाद क्या था | सामंतवादी व्यवस्था किसे कहते थे? | Samantvad

सामंतवाद का परिचय Samantvad

इतिहासकारों द्वारा 'सामंतवाद' (fuedalism) शब्द का प्रयोग मध्यकालीन यूरोप के आर्थिक, विधिक, राजनीतिक और सामाजिक संबंधों का वर्णन करने के लिए किया जाता रहा है। यह जर्मन शब्द 'फ़्यूड' से बना है जिसका अर्थ 'एक भूमि का टुकड़ा है' और यह एक ऐसे समाज को इंगित करता है जो मध्य फ्रांस और बाद में इंग्लैंड और दक्षिणी इटली में भी विकसित हुआ।
आर्थिक संदर्भ में, सामंतवाद एक तरह के कृषि उत्पादन को इंगित करता है जो सामंत (Lord और कृषकों (peasents) के संबंधों पर आधारित है। कृषक, अपने खेतों के साथ-साथ लॉर्ड के खेतों पर कार्य करते थे। कृषक लॉर्ड को श्रम-सेवा प्रदान करते थे और बदले में वे उन्हें सैनिक सुरक्षा देते थे। इसके साथ-साथ लॉर्ड के कृषकों पर व्यापक न्यायिक अधिकार भी थे। इसलिए सामंतवाद ने जीवन के न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक पहलओं पर भी अधिकार कर लिया।
यद्यपि इसकी जड़ें रोमन साम्राज्य में विद्यमान प्रथाओं और फ्रांस के राजा शॉर्लमेन (Charlemagne, 742-814) के काल में पाई गईं, तथापि ऐसा कहा जाता है कि जीवन के सुनिश्चित तरीके के रूप में सामंतवाद की उत्पत्ति यूरोप के अनेक भागों में ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में हुई।

सामंतवाद : राजनीतिक, सैन्य और सामाजिक-आर्थिक पहलू

पश्चिम में रोमन साम्राज्य के विघटन के बाद जर्मन लोगों के परवर्ती राज्यों ने एक हद तक राजनीतिक स्थिरता कायम की। दरअसल इनमें से एक राज्य ने तो एक महान राजा शार्लमेन के काल में एक बड़ा-सा साम्राज्य स्थापित कर लिया। यह कैरोलिंगयाई साम्राज्य था, जो नवीं सदी के मध्य में फिर से हो रहे बाहरी हमलों की वजह से बिखरने लगा। इससे हई राजनीतिक उथल-पुथल से एक नई किस्म की राजनीतिक व्यवस्था का जन्म हुआ जिसे सामंतवाद कहते हैं। सामंतवाद राजनीतिक प्रभुसत्ता का एक श्रेणीबद्ध संगठन था। अगर इसकी तुलना सीढ़ी से की जाए तो हम इस श्रेणीबद्ध ढांचे को आसानी से समझ सकेंगे।
इस व्यवस्था में शीर्ष पर राजा खड़ा था। उसके नीचे खड़े थे बड़े सामंत जो ड्यूक और अर्ल के नाम से जाने जाते थे। उनके नीचे खड़े थे छोटे सामंत जो बैरन के नाम से जाने जाते थे। उनके नीचे नाइट थे जो शायद सामतों की निम्नतम कोटि में आते थे। सिर्फ सामंत राजा से अपना प्राधिकार पाते थे। वे अपने छोटे सामंत को प्राधिकार प्रदान करते थे। और यह सिलसिला नीचे तक चलता जाता था। हर स्तर पर सामंत अपने से ऊपर वाले के प्रति निष्ठा जताते थे और उससे प्राधिकार पाते थे और अपने से बड़े के मातहत जागीरदार कहलाते थे। सामंत और मातहत अर्थात बड़े और छोटे सामंत के बीच के रिश्तों का यह स्वरूप पदाक्रम की सीढ़ी के शीर्ष से लेकर नीचे तक समान था। सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वशक्तिमान होते थे। जहां रोमन साम्राज्य में सारी शक्तियां राजा के हाथ में केन्द्रित थी, इस व्यवस्था में राजनीतिक सत्ता व्यापक रूप से विकेन्द्रित थी। नये सामाजिक-राजनीतिक ढांचे की एक अनूठी विशेषता यह थी कि सामंत और मातहत के बीच का संबंध निजी प्रकृति का था। सामंत और उसके मातहत के बीच रिश्ता बनाने के लिए एक लंबा चौड़ा अनुष्ठान होता था। इस अनुष्ठान में मातहत जागीरदार जिंदगी भर सामंत की सेवा करने की कसमें खाता था। इसकी के साथ वह सामंत का संरक्षण कबूल करता था। संरक्षण महत्वपूर्ण था क्योंकि वह उथल-पुथल और अस्थिरता का दौर था।

संरक्षण के बदले मातहत जागीरदार को अपने सामंत को कई तरह की सेवाएं देनी पड़ती थीं। इसमें मुख्यतः सैनिक सेवा शामिल थी। इसके तहत सामंत को जब भी जरूरत पड़ती मातहत को उसे एक खास संख्या में सैनिकों की आपूर्ति करनी होती थी। इसके बदले में सामंत उसे अनुदान देता थ जो आम तौर पर मातहत और उसके सैनिकों के भरण-पोषण के लिए जमीनें होती थी। इस तरह के अनुदान को फीफ या यूडम कहते थे। इसी से यूडलिज्म (सामंतवाद) शब्द विकसित हुआ। यही सामंतवाद का सैन्य पहलू है। सामंत अपने इलाकों में सशस्त्र समर्थक गोलबंद करते थे जो सीधे निजी तौर पर उसके वफादर थे। इस सशस्त्र सेना बल के साथ जरूरत पड़ने पर वह अपने से उच्च सामंत को सैन्य समर्थन देता था। इस बल के कारण सामंत अपने इलाके के पूर्ण मालिक बन बैठे थे और राज्य भी उन्हें चुनौती नहीं दे सकता था।

मध्यकालीन यूरोप की अर्थव्यवस्था बुनियादी रूप से कृषि पर आधारित थी। रोमन साम्राज्य के अंतिम दौर में गुलाम श्रम का इस्तेमाल खासकर कृषि में लगभग खत्म हो चुका था। ऐसा गुलामों की जबदस्त किल्लत के कारण हुआ था। कृषिगत उत्पादन के लिए गुलामों के नहीं मिल पाने से रोमन अभिजातों की जीवनशैली प्रभावित हुई। वे तब तक भोग-विलास और ऐश-आराम नहीं कर सकते थे जब तक उन्हें शोषण के लिए दूसरे लोग न मिलें। उन्होंने यह काम मुक्त किसानों, काश्तकारों और खेत मजदूरों पर बोझ बढ़ाकर अंजाम दिया। आइए देखते हैं उन्होंने यह सब कैसे किया? राजनीतिक हलचल और अशांति के दौर में किसानों ने सामंतों की ही तरह सरंक्षण पाना चाहा। यह एक आम आर्थिक संकट का दौर था और मुक्त किसानों के पास आम तौर पर कम संसाधन थे। उनके पास अपने खेत नहीं थे और न ही खेती-बाड़ी के औजार थे। वे बीज खरीदने की स्थिति में भी नहीं थे। इन सबके लिए और संरक्षण पाने के लिए मुक्त किसानों ने सामंतों की तरफ रूख किया। उन्होंने सामंतों के पास अपनी आजादी गिरवी रख दी और जमीन से बंध गए। बाद में ऐसे कानूनी प्रावधान किए गए जो किसानों को जमीन से हटने या सामंतों को छोड़ कर कहीं और जाने से रोकते थे। जब जर्मनिक कबीले रोमन समाज के संपर्क में आए तो उनके अभिजातों ने अपने कबीले के किसानों को भी इसी हैसियत में पहुंचा दिया। उसके बाद जब भी मुक्त किसानों ने शक्तिशाली रोमन भूस्वामियों या जर्मनिक सरदारों से संरक्षण मांगा, उन्हें अपनी आजादी खोनी पड़ी।

किसानों की आजादी खत्म होने की इस प्रक्रिया के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर बड़े सामंतों, योद्धा सरदारों और जर्मनिक सरदारों की राजनीतिक और आर्थिक ताकत भी बढ़ती गई। स्थिति मेंज ब मजबूत और केन्द्रीकृत राज्य का वजूद नहीं था, किसान पूरी तरह कुलीन भूस्वामियों के रहमोकरम पर थे। जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं, इन सामंतों के पास सशस्त्र शक्ति भी थी। वे इसका इस्तेमाल किसानों को धमकाने-सताने में करते थे। इसके अतिरिक्त उनके पास असीम राजनीतिमक और न्यायिक अधिकार भी थे। वे उनका इस्तेमाल किसानों को झुकाने और अपने ऊपर आश्रित करने में करते थे। जमीन से बंधे और सामंतों के पूरी तरह अधीन मध्यकालीन यूरोप के इन आश्रित किसानों को भूदास कहा जाता है।
इस काल की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक सामंतों के हाथों भूदास के शोषण पर आधारित थी। इस काल के दौरान संपति का एक बड़ा हिस्सा शोषण के जरिए सृजित किया गया। यह समझने के लिए कि यह सब कैसे हुआ, आइए देखें किइस काल में कृषि किस तरह से संगठित की गई थी।
सामतों के नियंत्रण वाली समूची जमीन मेनर (गढ़ी) कहलाती थी। मेनर तीन हिस्सों में बंटी होती थी। एक हिस्सा डीमेन कहलाता था। जायदाद का यह हिस्सा सामंत के सीधे प्रबंधन के तहत होता था। मेनर के दूसरे हिस्से में भूदासों की जोत थी। इसके अलावा मैदानी हिस्से थे जिन पर अपने पशुओं को चराने का अधिकार सबको प्राप्त था। भूदासों के जोतों पर अधिकार रखने वालों को सामंत के मेनर काश्तकार माना जाता थ। काश्तकार होने के नाते उन्हें सामंत को लगान के रूप में कुछ देना होता था। काश्तकार सामंत को यह लगान श्रम सेवा के रूप में अदा करते थे। श्रम सेवा के तहत उन्हें हफते में कुछ खास दिन डीमेन पर काम करना पड़ता था।

खेती के दिनों मे भूदास को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती था। तब हल जोतना, बुआई, कटाई इत्यादि की जरूरत पड़ती थी। इस तरह की अवैतनिक सेवाओं में भवन-निर्माण और ईंधन के लिए लकड़ियां काटने जैसे कष्टसाध्य काम भी शामिल थे।

भूदासों को वस्तु की शक्ल में कुछ शुल्क या कर भी अदा करना होता था। मसलन उन्हें अपनी उपज का एक हिस्सा देना होता था। ये शुल्क मनमाने ढंग से लगाए जाते थे। जब भी सामंतों को अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत होती थी, वे शुल्क थोप देते थे। सामंत अप्रत्यक्ष रूप से भी किसानों का शोषण करते था मेनर एक आत्मनिर्भर आर्थिक इकाई भी थी। इसका मतलब था कि रोजमररा की जरूरतों की करीब-करीब तमाम चीजों का यहां उत्पादन और उपभोग होता था। इन सबके लिए वहां विभिन्न सुविधाएं होती थीं मसलन लोहे के सामान बनाने के लिए भट्ठी, गेहूं पीसने के लिए चक्की, रोटी बनाने के लिए तंदूर और शराब बनाने के लिए अंगूर पेरने के कोल्हू मौजूद थे। ये सब सामंत की मिल्कियत होते थे।
किसानों को उन उपकाणों और मशानों के इस्तेमाल के लिए मजबूर किया जाता था। सामंत उनका शुल्क मनमाने ढंग से तय करता था।

सामंती अर्थव्यवस्था में परिवर्तन : खुशहाली और संकट

हमने अभी-अभी सामंती व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया है। क्या समूचे मध्यकाल के दौरान यह प्रणाली जस की तस रही? नहीं, सामंती अर्थव्यवस्था में खुशहाली और संकट के रुझान रहे। आइए इन रुझानों को शुरू से देखें रोमन साम्राजय के पतन के बाद की कुछ सदियों के दौरान आर्थिक जीवन स्तर निम्न था। हम पहले से ही जानते हैं कि यह राजनीतिक परिवर्तनों और अशांति का दौर था। इस दौर की कुछ विशेषताओं में नगरीय जीवन, व्यापार और मुद्रा विनिमय में गिरावट शामिल हैं। रोमन काल के कुछ शहर टिके रहे। लेकिन वे महल खाली बोतलों की तरह थे। उनकी कोई वास्तविक आर्थिक भूमिका नहीं थी। सड़कें टूट-फूट गई थीं और वस्तु-विनिमय प्रणाली ने मुद्रा की जगह ले ली थी। यूरोपीय अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह कृषि पर और बेहद सीमित स्थानीय व्यापार पर आधारित थी। उस समय मुख्य आर्थिक इकाई आत्मनिर्भर जागीरें या सामंती मेनर थी जिनके बार में हम पढ़ चुके हैं। कृषि में इस्तेमाल होने वाली तकनीक पिछड़ी थी और उपज कम थी। ये हालात करीब दसवीं सदी ईस्वी तक बने रहे।

दसवीं सदी के दौरान उत्पादन की सामंती पद्धति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। 11वीं और 12वीं सदी ईस्वी में यह व्यवस्था पूरे यूरोप में लगातार फलती-फूलती रही। जैसे-जैसे व्यवस्था स्थिरता पाती गई, कृषि उपज में इजाफा होता गया। कृषि तकनीक में सुधार एक अन्य कारक था जिसके कारण कृषि उत्पादकता में इजाफा हुआ। रोमन काल से इस्तेमाल में आने वाले हल्के हल 'अरेट्रम' की जगह एक नए हल ने ले ली जो 'चैरय' कहलाता था। नयस हल भारी था। यह पहियों से युक्त था और उसे बैलों का एक दल खींचता था। इसने उत्तरी यूरोप की सख्त और चिपचिपी मिट्टी की बेहतर जुताई में मदद की।

खेती दो भूखण्डों के तरीके पर आधारित थी जिसमें जमीन के एक हिस्से पर खेती की जाती थी और दूसरा हिस्सा परती छोड़ दिया जाता था। बाद में इसके बजाय तीन भूखण्डों का तरीका अपनाया गया। इसके तहत एक तिहाई जमीन परती छोड दी जाती, एक तिहाई जमीन पर शरत फसल उपजाई जाती और बाकी पर बसंत फसल लगाई जाती। जमीन के सिर्फ तीसरे हिस्से को परती छोड़ देने से फसल बोई गई जमीन का क्षेत्र काफी बढ़ गया। नए हल, तीन भूखण्ड कृषि पद्धति और कृषि तकनीकों में अन्य नई खोजों के इस्तेमाल से उपज में कई गुना वृद्धि हुई। कृषि में विस्तार के साथ ही दसवीं सदी से 12वीं सदी के बीच के दौर में व्यापार की बहाली हुई और नगरीय जीवन में वृद्धि हुई। स्थानीय हाट में अतिरिक्त अनाज और अंडों की खरीद-फरोख्त से लेकर शराब, और कपास जैसी वस्तुओं की भी दूरी के व्यापार का एक लंबा सिलसिला था।

सड़कों के निर्माण से व्यापर में इजाफा हुआ। नदी और समुद्री रास्ते भी व्यापार के लिए इस्तेमाल किए जाते थे। व्यापार की बहाली से भुगतान के नए तरीके जरूरी हो गए क्योंकि वस्तु विनिमय इसके लिए अपर्याप्त थे। नतीजतन लगभग चार सौ साल बाद मुद्रा अर्थव्यवस्था का दौर फिर लौटा। साथ ही शहरों का बड़ा तेज विकास हुआ। लंबी दूरी के व्यापार और अगल-बगल के ग्रामीण इलाकों में खेती से आई खुशहाली से उसे बड़ा बल मिला। जल्द ही शहर कुछ खास उद्यमों के लिए जाने जाने लगे। उदाहरण के लिए, वस्त्र निर्माण शहरों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक बन गया था। दस्तकारों के संघ महत्व धारण करने लगे। व्यापारिक गतिविधियां और दस्तकारी आधारित उत्पादन दोनों शिल्पसंघों के ही ईद-गिर्द संगठित हए। इससे मध्यकालीन शहरों का महत्व बढ़ता गया और अंततः ये ग्रामीण इलाकों में सामंती संबंधों को तोड़ने वाले महत्वपूर्ण कारक बने।
आर्थिक प्रगति का यह रुझान 12वीं सदी के अंत तक अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया तेरहवीं सदी तक सामंती व्यवस्था में उल्लेखनीय परिवर्तन देखे जा सकते थे जिसने प्रगति की प्रक्रिया उलट दी। आर्थिक प्रगति और खशहाली के काल के चलते आबादी बढ़ी। इसका मतलब हुआ सामंतों के लिए श्रम की आपूर्ति में बढ़ोत्तरी। इसलिए सामंतों ने उन डीमेन को अब बनाए रखना जरूरी नहीं समझा। मेनर को अब डीमेन के एक बड़े हिस्से की छोटी-छोटी जोतों में बांट दिया गया और किसानों को भाड़े पर दे दिया गया। चूंकि ये जोतें बहुत छोटी थीं, पहले डीमेन के विशाल भूखंण्ड में इस्तेमाल होने वाली प्रौद्योगिकी का अब वहां उपयोग संभव नहीं था। साथ ही बड़ी संख्या में श्रमिकों के मौजूद होने के चलते श्रम-शक्ति बचाने वाली प्रौधोगिकी को इस्तेमाल करने वाले कुछेक ही थे। 
इसके साथ ही, चूंकि डीमेन खत्म हो चुके थे, किसानों से श्रम-सेवा वसूलने का तरीका भी खत्म हो गया। इसलिए सामंत अब श्रम-सेवा के बजाय मद्रा या जिंस सामंती लगान की मांग करने लगें। मुद्रा-आधारित अर्थव्यवस्था शहरी केन्द्रों और व्यापार में वृद्धि ने इस विकास को बढ़ाया दिया। श्रम-सेवा में गिरावट और कृषि में प्रौद्योगिकी की गतिरुद्धता ने अन्य कारको के साथ मिल कर कृषि उपज में जबर्दस्त गिरावट ला दी। अनाज की किल्लत और अकाल का सिलसिला शुरू हो गया। प्लेग की महामारी का प्रकोप टूट पड़ा। इन सब के कारण अर्थव्यवस्था में एक साथ गिरावट आई। लेकिन यूरोपीय समाज दसवीं सदी ईस्वी से पहले के संकट के मुकाबले इस संकट से आसानी से उबर गया। 1450 ई. के करीब अर्थव्यवस्था में बहाली का सिलसिला शुरू हो गया।

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