सुशासन क्या है? | sushasan kya hai

सुशासन क्या है?

हम सभी की यह इच्छा और अभिलाषा होती है कि हमारी सरकार अच्छी और प्रभावशाली हो। वास्तव में, हम सभी यह जानते हैं कि राज्य की उत्पत्ति एक सुरक्षित और खुशहाल जीवन की परिस्थितियों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हुई है, इसकी निरंतरता को इस आधार पर न्यायसंगत ठहराया जाता है कि यह जीवन की श्रेष्ठता को बढ़ावा देता है तथा उसे सुरक्षित बनाए रखता है। कौटिल्य का मानना था कि यह सरकार का एक अनिवार्य कर्तव्य है कि वह लोगों की भौतिक, बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए कार्य करे।
इसी कारण से राजनीति विज्ञान का अध्ययन करते समय अच्छे शासन का अध्ययन भी महत्वपूर्ण हो गया है। उस अध्याय में एक अच्छे शासन, शासन और उसके सामने आने वाली बाधाओं से निकलने के उपायों तथा एक अच्छी शासन प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए लोगों की भूमिका के विषय में विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है।

सुशासन का अर्थ

सुशासन की संकल्पना को समझने के लिए सबसे पहले हमें शासन का अर्थ समझना होगा। शासन क्या है? सत्ताधारियों द्वारा जनसामान्य की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए वस्तुएँ व सेवाएँ उपलब्ध कराना तथा उनकी इच्छाओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए शक्ति और अधिकारों का प्रयोग ही शासन है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शासन शक्ति, नीतियों, योजनाओं तथा परियोजनाओं से संबंधित है, जिसका उद्देश्य जीवन की परिस्थितियों को बेहतर बनाना है। लोग यह आशा करते हैं कि उनकी सरकार इस प्रकार से कार्य करे कि कम से कम लागत पर परिणाम अधिक से अधिक आएँ। शासन तब अच्छा बन जाता है, जब सरकार के निर्णय और कार्य; लोगों की सहमति, वैधता और उत्तरदायित्व पर आधारित होते हैं। इस तरह, अच्छा शासन प्रक्रिया में उच्च गुणवत्ता से संबद्ध होता है। आज समाज के सभी वर्ग अपनी सरकार को उसके शासन के आधार पर परखते हैं। पहले क्रूर राज्य ही अच्छे शासन का प्रभावशाली हथियार माना जाता था। प्राचीन व मध्य भारत में एक राजा, जो सर्वसत्तावादी होता था, ही जनसामान्य की जरूरतों के लिए कर्तव्यनिष्ठ व उत्तरदायी समझा जाता था।
आज के आधुनिक समय में, एक अच्छा शासन, जागरूक नागरिकता और उत्तरदायी व संवैधानिक सरकार की ओर इंगित करता है। सुशासन आज विकास की मुख्य संकल्पना है। बहस का संबंध केवल इस प्रश्न से है कि विकास कैसे किया जाए। यह एक ऐसी धारणा है जो अपनी प्रकृति में विस्तृत और सकारात्मक है। यह विस्तृत इस कारण से है क्योंकि यह विकास की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी अभिलक्षित करती है। इस प्रकार से विकास मात्र जन अनुस्थापित ही नहीं होता, बल्कि जनकेंद्रित भी होता है। दक्षता, ज्ञान और विकास हेतु सहयोग के लिए नए स्तरों का निर्माण इसकी सकारात्मकता को दर्शाता है। आइए अब हम एक अच्छे शासन की विशेषताओं और उसके लक्षणों के बारे में पढ़ें।

सुशासन की विशेषताएँ

अगला महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एक अच्छे शासन की मूल विशेषताएँ व तत्व क्या होते हैं? बहुत-सी रिर्पोटों और अध्ययनों में अनेक विशेषताएँ बताई गई हैं। उदाहरण के तौर पर कौटिल्य की पद्धति में निम्न विशेषताएँ एक अच्छे शासन का निर्माण करती हैं:
  • कानून व व्यवस्था
  • लोक कल्याणकारी प्रशासन
  • न्याय व तर्क के आधार पर निर्णय
  • भ्रष्टाचार मुक्त शासन
विश्व बैंक ने अपनी 1989 व 1992 की रिपोर्टो, द ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD), कमिशन ऑन ग्लोबल गवर्नेस (1995), यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) 1997 आदि में एक अच्छे शासन के गुणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
अच्छे शासन के कार्यों को 'एशियन डेवलपमेंट बेसिक रिपोर्ट' के अंदर निम्नलिखित प्रश्नों के रूप में साफ-साफ रखा गया है।
  • क्या लोग शासन में पूरी तरह भागीदारी करते हैं?
  • क्या लोगों तक सभी जानकारियाँ पहुँचती हैं?
  • क्या लोग निर्णय ले सकते हैं अथवा क्या वे निर्णय लेने वालों को उत्तरदायी बनाए रख सकते हैं?
  • क्या शासन में महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर अधिकार हैं?
  • क्या गरीब और पिछड़े लोगों की जरूरतें पूरी होती हैं?
  • क्या मानवाधिकारों की गारंटी दी गई है?
  • क्या वर्तमान नीतियों में भावी पीढ़ियों की जरूरतों का ध्यान रखा गया है?
  • क्या लोग शासन की रूपरेखा को स्वीकारते हैं?

उत्तरदायित्व
सर्वसम्मति से इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि शासन उन लोगों के उत्तरदायित्वों के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, जो इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। उत्तरदायित्व इस बात की ओर इंगित करता है कि नौकरशाही की भी जवाबदेही होनी चाहिए कि वह क्या करती है और क्या नहीं करती? संसदीय प्रणाली में ऐसा प्रशासन प्रश्नों, वाद-विवादों, बहसों, बजट अनुमोदन, कमेटी तथा संसद के अन्य तरीकों के माध्यम से किया जाता है। कार्यपालिका अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से लोगों के प्रति उत्तरदायी होती है। लेकिन यह भी सच है कि यह प्रक्रिया बहुत-से कारणों के चलते प्रभावहीन सिद्ध हुई है। चर्चा व प्रतिनिधियों की गुणवत्ता और चरित्र में गिरावट, संसदीय प्रणाली की सरकार का कैबिनेट प्रणाली में परिवर्तन, राजनीति का अपराधीकरण और समाज का विखंडन इसके प्रभावहीन होने के मुख्य कारण हैं। दूसरा, उत्तरदायित्व को सरकारी निर्णयों और कानूनों की न्यायिक समीक्षा के माध्यम से भी सुनिश्चित किया जाता है।
नागरिक भी जनसामान्य के हितों की अवहेलना करने वाले तात्कालिक मुद्दों पर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं। इस प्रकार की कार्यप्रणाली न्यूजीलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया और भारत में लोकप्रिय है। हाल ही के समय में जन-उत्तरदायित्व का एक प्रभावशाली माध्यम नागरिक चार्टर प्रणाली है। इस विचार की उत्पत्ति नागरिकों के लिए नौकरशाही संस्कृति को बदलकर उसके स्थान पर जनहितैषी-व्यवहार को शामिल करने के लिए की गई है ताकि पुराने, उदासीन, अनौपचारिक और संवेदनहीन व्यवहार को इसमें शामिल न किया जा सके। पुराने सामंती मूल्यों के स्थान पर आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को नौकरशाही में स्थान दिया जाना चाहिए।
इस प्रकार से, एक उत्तरदायी शासन प्रणाली लोक-सेवकों की निम्न क्रियात्मक व व्यवहारात्मक विशेषताओं को आवश्यक मानती है-
  • उपलब्धि अभिमुख व्यवहार
  • अधिकारों का न्यायसंगत प्रयोग
  • लोगों की खुशहाली के लिए प्रयत्न
  • निर्णय लेते समय तर्क और अनुभव का प्रयोग अपने दायित्वों से पीछे हटने को पहचानना और दंड देना
  • समय-सीमा में नीतियों और योजनाओं को लागू करना
  • चरित्रबल, योग्यता तथा लोक सेवकों की लगन एवं व्याप्ति
  • दूसरों से व्यवहार करते समय ईमानदारी, मित्रता और दृढ़निष्ठा
  • निपुणता और उत्कृष्टता से अनुपूरित कार्य करने की क्षमता
प्रत्येक देश में कई प्रकार की संस्थानिक व कानूनी व्यवस्थाएँ होती हैं, ताकि उत्तरदायी प्रशासन की विशेषताओं की व्यापकता को सुरक्षित किया जा सके। उदाहरण के तौर पर भारत में केंद्रीय सतर्कता आयोग, महिलाओं, अनुसूचित जातियों व जनजातियों, अल्पसंख्यक व पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयोग, राष्ट्रीय श्रमिक आयोग, अल्पसंख्यकों व मानव अधिकारों के लिए राष्ट्रीय आयोग तथा भारत के लेखा महानियंत्रक जैसी संस्थाओं का गठन नौकरशाही में सामाजिक, कानूनी, संवैधानिक और व्यस्थापरक वचनबद्धता का प्रबंध करने के लिए किए गए प्रयास हैं। ये प्रशासन की पक्षपाती प्रवृत्ति, भ्रष्टाचार, अलगाव और गोपनीयता को दूर करने के प्रयास करते हैं। इसका उद्देश्य प्रशासन को गरीबों के प्रति संवेदनशील, लिंग-अनुपात के प्रति संवेदनशील तथा इससे भी बढ़कर जनसामान्य की परेशानियों के प्रति संवेदनशील बनाना है।
इसका उद्देश्य लोकसेवकों के अवांछित कार्यों और व्यवहार को कम करना और उनकी क्षमता तथा सत्यनिष्ठा को बढ़ाना है। सरकार ने भी अपने स्तर पर ऐसे उपायों की शुरुआत की है, जिससे प्रशासन में उत्तरदायित्व की कार्रयवाइयों को जाँचा जा सके।
इस सम्बन्ध में निम्नलिखित को ध्यान में रखा जा सकता है :
  • प्रयोजन द्वारा प्रबंधन (MBO-Management by objective)
  • जन शिकायतों को दूर करने के लिए मशीनरी
  • सूचना के अधिकार को स्वीकार करना
  • सूचना-प्रौद्योगिकी का प्रयोग तथा ई-शासन
  • सत्ता का लोकतंत्रीकरण तथा विकेंद्रीकरण
  • हाशिए में खड़े समूहों का सशक्तीकरण, विशेषकर महिलाओं का
  • सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता
  • विभिन्न प्रकार के कानूनों, नियमों और विनियमन की समीक्षा।
स्थानीय सरकार के स्तर पर उत्तरदायित्व की स्थापना करने और हाशिए में खड़े समूहों का समर्थन करने के उद्देश्य से भारतीय संसद ने 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन को पारित किया, जिसमें अन्य चीजों के साथ महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया गया। इसके साथ ही विकेन्द्रित विकास नियोजन, वित्तीय शक्तियों में वृद्धि तथा स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय शक्तियां प्रदान की गईं। इस प्रकार विकेन्द्रीकरण और लोकतंत्रीकरण को विकासात्मक प्रशासन का मूलाधार बनाया गया है।
इनके अतिरिक्त केन्द्र सरकार के 79 मंत्रालय व विभाग नागरिक चार्टर की संरचना को संचालित कर रहे हैं। यह चार्टर निम्नलिखित का विवरण है:
  • सेवाओं की समयसीमा और मानदंड;
  • शिकायतों को कम करने के ढंग, और
  • चार्टर को लागू करने की जाँच प्रणाली और स्वतंत्र समीक्षा को निर्धारित करना।
केन्द्र सरकार और अनेक राज्यों ने लोक शिकायतों के शीघ्रातिशीघ्र निस्तारण हेतु विशेष संस्थाओं एवं इकाइयों की स्थापना की है। इनका उद्देश्य है- अधिकारियों/कार्यालयों द्वारा ध्यान न देना, मामलों के निस्तारण में अत्यधिक समय लगने एवं अधिकारियों का असहानूभूतिपूर्ण रवैए पर अंकुश लगाना। शासन तंत्र में उत्तरदायित्वों के वहन की भूमिका खुली और पारदर्शी होनी चाहिए। किसी भी निर्णय या कार्य में पारदर्शिता न लाने पर उसमें भेदभाव की भूमिका होने का अंदेशा रहता है। पारदर्शिता से पक्षपात की संभावना कम रहती है।
सभी को पूर्वाग्रह से मुक्ति मिलती है। भारतीय संसद ने सभी नागरिकों के लिए सूचना प्राप्ति के अधिकार की व्यवस्था की है। केन्द्रीय मंत्रालय और विभाग खूब प्रचार-प्रसार के साथ ऐसे काउंटर खोल कर लोक शिकायतों को आमंत्रित करते हैं।

सुशासन की बाधाएँ

प्रायः सभी देश राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ शासन को लेकर गंभीर हैं। लेकिन वे अपने नागरिकों को न्यायोचित, समान एवं स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था कैसे उपलब्ध करवाएं, यह एक समस्या है। वे कौन-से कारक हैं, जो स्वच्छ शासन में बाधा उत्पन्न करते हैं? उसके लिए अनेक कारक उत्तरदायी हैं, जिनमें निम्न प्रमुख हैं:
  • (क) भ्रष्टाचार
  • (ख) जनसंख्या वृद्धि
  • (ग) हिंसा की संस्कृति

भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार अधिकारों का अवैध प्रयोग करना है, जो व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जाता है। भ्रष्टाचार लगभग पूरे विश्व में व्याप्त एक सार्वभौमिक बीमारी है, इससे जनता और सरकार दोनों को हानि होती है। भारत जैसे देशों में यह कैंसर की तरह व्याप्त हो गया है। कौटिल्य के समय चरित्र और सत्य निष्ठा प्रमुख सरोकार थे।
अनेक बार राजनीतिक नेता भ्रष्टाचार के आगे अपने हाथ खड़े कर देते हैं और इसे विश्वव्यापी समस्या कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन यहाँ पर प्रश्न ईमानदारी का खड़ा होता है। पहले की अपेक्षा अब इस पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। घोटालों के पर्दाफाश और उनके विरुद्ध कार्रवाई करने की माँग दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है लेकिन तब तक इसके लिए कोई भी कदम कारगर साबित नहीं होगा, जब तक कि सभी प्रकार के भ्रष्टाचार - राजनीतिक, आर्थिक, नैतिक और प्रशासनिक से पूरी दृढ़ता और इच्छाशक्ति से नहीं लड़ा जाएगा। इस परिप्रेक्ष्य में यह पता चलता है कि अच्छे शासन के लिए भ्रष्टाचार से मुक्त होना आवश्यक है।

इसके लिए निम्न आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए:
  • राजनीतिज्ञों, अफसरों और अधिकारियों के बीच गठजोड़ को तोड़ना चाहिए।
  • न्याय सस्ता होना चाहिए।
  • देश, राज्य एवं स्थानीय स्तर पर जनहित याचिकाओं के लिए अदालतों का गठन करना चाहिए।
  • सूचना के अधिकार को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
  • कानून लागू कराने वाली संस्थाओं को शक्तिशाली बनाना चाहिए।
  • भ्रष्टाचारियों की संपत्ति को अभियोग लगने के बाद अविलंब जब्त कर लेना चाहिए। यह सम्पत्ति तभी लौटानी चाहिए जब वह निर्दोष सिद्ध हो जाए।
  • नौकरशाही की कार्यशैली को सुधारने के लिए नियमों, उपनियमों और कार्यप्रणाली को सरल बनाना चाहिए।
  • समाज को नियम-कानूनों के परिपालन हेतु लामबन्द करना चाहिए।
  • सरकारी संगठनों में भाई-भतीजावाद को समाप्त करना चाहिए।

जनसंख्या वृद्धि
स्वच्छ शासन का सरोकार न केवल प्रभावी कानूनों, प्रविधियों और उनके क्रियान्वयन से है, बल्कि उसका सरोकार देश के सामाजिक और आर्थिक संसाधनों की गतिशीलता और उपयोगिता से है, ताकि उसका लाभ समाज के प्रत्येक सदस्य को मिल सके। इस प्रकार, पता चलता है कि विकास के प्रयास गरीबी और बेरोजगारी मिटाने तथा साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करने और सभी नागरिकों को प्राथमिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य, खाद्य, पेयजल और आवास उपलब्ध कराने में असफल रहे हैं। इसका मुख्य कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 35 करोड़ की जनसंख्या का बढ़कर वर्तमान में 100 करोड़ से ज्यादा होना है।
भारत के कुछ राज्य जैसे; केरल, तमिलनाडु, गोवा और मणिपुर जनसंख्या में स्थिरता प्राप्त कर रहे हैं, वहीं कुछ राज्य जैसे, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार जनसंख्या के स्थिरीकरण में अधिक समय ले रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या को संतुष्ट करने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। भूमि, जल और वायु संसाधनों में वृद्धि आवश्यक है। भारत में किसी भी सरकार के लिए उचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ, खाद्य, आवास एवं रोजगार उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती होगी।
यदि हम भारत के किसी भी महानगर को देखें, तो ऐसा लगेगा कि वहाँ अधिकतम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं साफ-सफाई, पेय-जल आपूर्ति, सड़कें और विद्युत की समस्याएँ हैं। वास्तव में अनेक अच्छे शहरों जैसे, मुंबई, कोलकाता और दिल्ली में शासन करना कठिन होता जा रहा है। जनसंख्या में हो रही तीव्र वृद्धि ने वास्तव में अच्छे शासन पर विराम लगा दिया है। जनसंख्या वृद्धि को शिक्षा प्रसार, जागरूकता, लोगों की सहभागिता एवं विकास द्वारा स्थिर किया जा सकता है।

हिंसा की संस्कृति
बल का अवैध प्रयोग कानून-व्यवस्था की समस्या है लेकिन यदि कोई इसे अच्छे शासन के दृष्टिकोण से देखे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शांति और कानून व्यवस्था विकास के प्रथम सोपान हैं। हड़तालें, दंगे, आतंकवादी हमले इस हिंसा की संस्कृति के हानिकारक तत्व हैं। सरकार आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास पर तब अच्छी तरह से ध्यान दे सकती है जब वह जान-माल की सुरक्षा आदि की ओर से निश्चित हो। इसके अतिरिक्त आतंकवाद भी कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण है।
आतंकवाद विकास के लिए बाधक है। जो क्षेत्र आतंकवादी गतिविधियों से प्रभावित होते हैं, वहाँ कोई भी निवेशक पूँजी नहीं लगाना चाहता। इसका सीधा प्रभाव वहाँ के रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य सेवाओं पर लंबे समय तक पड़ता है। वहाँ का सामाजिक जीवन थम-सा जाता है। लोग घरों में कैद हो जाते हैं एवं उनके मन-मस्तिष्क पर आतंक की काली छाया मंडराती रहती है।
मानवाधिकार के मुद्दे का भी सामना करना पड़ता है। आतंकवादी जनसाधारण के मानवाधिकारों का कदाचित ही आदर करते हैं। किंतु जब सरकार आतंकवाद को दबाने के लिए सख्ती करती है, तो राज्य पुलिस द्वारा जन साधारण के अधिकारों का हनन हो जाता है। इसके लिए स्पष्ट दृष्टिकोण, साहस और समझ की जरूरत है जिससे आपसी बातचीत द्वारा इस मसले को सुलझाया जा सके। इसके लिए उपयुक्त जन शिकायतों का निवारण, पड़ोसियों की सहभागिता और आतंकवाद के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय सहयोग भी आवश्यक हैं।

सुशासन स्थापित करने के उपाय

प्रत्येक व्यक्ति स्वच्छ शासन के लक्ष्य को प्राप्त करने के अनेक उपाय बता सकता है। आइए, हम दो उपायों की चर्चा करें - जैसे लोगों की सहभागिता को सुनिश्चित करना तथा एक सक्षम, प्रभावशाली, ईमानदार, पारदर्शी तथा कानून का पालन करने वाली शासन व्यवस्था के लिए कम्प्यूटरों तथा प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना।

सुशासन के लिए लोगों की सहभागिता

शासन व्यवस्था में लोगों की सहभागिता को प्राथमिकता दी जा रही है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अभी भी लोगों की प्रशासनिक सहभागिता के क्षेत्र में - विशेषकर स्थानीय सरकार के स्तर पर जो कुछ उपलब्ध कराया जा रहा है, और जिसका क्रियान्वयन किया जाना है, दोनों में भारी अंतर है। यह मुट्ठी भर लोगों के हाथ में शक्ति देना भर रह गया है।
प्रायः यह देखा गया है कि निर्णय लेने और उनके अनुपालन में लोगों की सहभागिता से निम्नलिखित चीजें सुव्यवस्थित होती हैं:
  • उदासीन एवं अक्षम अफसरशाही पर रोक। दूसरे शब्दों में, लोगों की सहभागिता से प्रशासन के स्तर पर दबाव बनाया जा सकता है कि अफसर कार्य करे और समय पर करे।
  • जवाबदेह एवं उत्तरदायी प्रशासन के यंत्र के रूप में।
  • स्व-शासन और विकासात्मक प्रशासन के माध्यम के रूप में।
  • स्थानीय विकास हेतु स्थानीय संसाधनों को खोजना एवं उनका उपयोग करना।
लोगों की यह भूमिका या तो किसी सामाजिक संगठन के सदस्य के रुप में या हित और दबाव समूहों अथवा कल्याणकारी संगठनों, अथवा किसी राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में अथवा अफसरशाही और राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या स्थानीय सरकार का भाग बन कर हो सकती है। सरकारें चाहती हैं कि लोगों का योगदान लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण - पंचायत और नगरपंचायत स्तर पर अथवा परामर्शी एवं सलाहकार समितियों और संस्थाओं में शामिल करके हो। नागरिकों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए लोग स्वयं संगठित होकर नीतियों की मांग कर सकते हैं। वे समूहों के रूप में संगठित होकर सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों का समर्थन करें - जैसा कि वे खराब नीतियों के विरोध में एकत्र होते हैं। इसके लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन, बचपन बचाओ आंदोलन, पीपुल्स इनीसियेटिव, हेल्प-एज, शिक्षा बचाओ आंदोलन इत्यादि संगठनों के नाम गिने जाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, लोग सरकार एवं प्रशासन के पक्ष एवं विपक्ष में विचार निर्माता की भूमिका निभा सकते हैं।
इस प्रकार लोग शासन-प्रशासन के विवाद हल करने के कार्य कर सकते हैं एवं लोगों तथा अफसरशाही के बीच सेतु का कार्य कर सकते हैं। चूंकि शिक्षा, सूचना, सरकार की जानकारी तथा राजनीतिक और आर्थिक सुविधा के स्तर पर लोगों की सहभागिता को निश्चित करते हैं इसलिए स्थानीय लोगों में से अधिकांश शासन व्यवस्था से बाहर रहते हैं। अतः हमारी सरकार ने विकास और नीति निर्माण में गरीब वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया है। पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33.3 प्रतिशत का आरक्षण इस प्रकार का एक कदम है। स्थानीय सरकारों में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है।
उदाहरण के लिए यदि किसी जिले में 20 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं तो जिला परिषद में उनके लिए 20 प्रतिशत स्थान आरक्षित रहेंगे। इसी प्रकार यदि किसी गांव में 1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग रहते हैं तो उन्हें ग्राम पंचायत में 1 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त होगा। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को राज्य सरकार पर छोड़ दिया गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अभी भी सरकार की कथनी और करनी में अंतर है और यही बात शासन और स्थानीय शासन में जनता की सहभागिता के मामले में भी सच है। केवल मुट्ठी भर लोग हैं जिन्हें सशक्त बनाया गया है।

सुशासन के साधन के रूप

अब तक की चर्चा के अनुसार हमें इस बात को ध्यान से समझना होगा कि अच्छे शासन का सार लोक हितैषी तथा सत्ता में भागीदारी होना - एक तरफ है तो संवेदनशील, पहुंच में, नैतिक, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था होना दूसरी तरफ है। कम्प्यूटरों तथा सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग को अच्छे शासन के प्रभावशाली साधन के रूप में देखा जाता है।
इसके लिए निम्नलिखित सुधार अपेक्षित हैं :
  • जन-सेवाओं की कम मूल्य पर आपूर्ति।
  • सूचना प्रसार द्वारा जन-सशक्तीकरण का प्रयास।
  • सरकार के कार्यों में खुलापन एवं पारदर्शिता।
  • सरकार और जनता द्वारा नए विचारों और अवधारणाओं को सरकार की कार्यप्रणाली से जोड़ना।
  • नागरिक एवं प्रशासन में प्रभावशाली जुड़ाव।
  • सरकार के कार्यों का व्यापक आकलन एवं जांच पड़ताल।
नियमों एवं प्रविधियों से संबद्ध जानकारी या सरकार की कल्याणकारी एवं विकासपरक योजनाओं की जानकारी अथवा किसानों और नागरिकों को मौसम संबंधी जानकारी देने को कंप्यूटर काफी सुलभ एवं आसान बना देता है। कहा जाता है कि भ्रष्टाचार निर्णय लेने वालों और स्वीकार करने वालों के रूबरू होने का दुष्परिणाम है। उनके बीच कंप्यूटर का रिकार्ड व्यक्तिगत संबंधों को कम करके भ्रष्टाचार को दबा सकता है।
उदाहरण के लिए एक किसान अपनी भूमि का रिकार्ड कंप्यूटर से प्राप्त कर सकता है। एक नागरिक अपने करों आदि का भुगतान कंप्यूटर पर बिना लाइन में लगे, बिना काम छोड़े तथा कैश काउंटर पर गए बिना कर सकता है। भारत में मध्य प्रदेश के धार जिले में ज्ञानदूत कार्यक्रम लागू किया गया है जो अनेक प्रकार की सुविधाएं ऑन लाइन उपलब्ध करवाता है। उदाहरणस्वरूप ऑन लाइन पंजीकरण, भूमि रिकार्ड की प्रति तथा कृषि उत्पाद के नीलामी केन्द्रों की जानकारी बहुत ही कम कीमत पर उपलब्ध है। इस सूची में ऋण प्राप्त करने की नियमावली, बीजों के मूल्य, उर्वरक एवं कृषि यंत्र, बिजली कटौती का समय, डीजल की उपलब्धता को जोड़ा जा सकता है। इस व्यवस्था से प्रशासनिक विलम्ब घटेगा जो भ्रष्टाचार का एक कारण है।
इससे नागरिकों को मिलने वाली सुविधा पर लगने वाली कीमत एवं समय बचेगा और नागरिकों को यह सुविधाएं उनके घर पर ही मिल जाएंगी। कर्नाटक की सरकार शैक्षिक दाखिलों और चयन, शिक्षकों के तबादले तथा वेतन देने के मामले में पारदर्शिता के लिए कम्प्यूटरों का प्रयोग कर रही है। कम्प्यूटरों को मुख्यमंत्री के आदेशों और हिदायतों के पालन की स्थिति जानने के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। यह क्षेत्र के प्रबंधन के लिए भी प्रयुक्त किया जा रहा है तथा इससे स्वास्थ्य, आवास और अन्य सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का सार-संक्षेप बनाने का काम भी लिया जा रहा है।
केरल में एक कम्प्यूटराईज्ड योजना 'फ्रेन्ड्स' को प्रयोग किया जा रहा है जो तेज, विश्वसनीय, तुरंत, सक्षम नेटवर्क के रूप में सेवाओं का वितरण कर रहा है। यह लोगों को विविध सेवाएं उपलब्ध करवा रहा है। भारत की केन्द्रीय सरकार ने भी रेलवे, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास, योजना आयोग तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसे अनेक विभागों और मंत्रालयों में प्रशासन की कम्प्यूटराईज्ड व्यवस्था को लागू कर दिया है।

आपने क्या सीखा
आपने इस अध्याय में अच्छे शासन के अर्थ एवं अवधारणा को सीखा। आप अच्छे शासन के लक्ष्यों एवं विचारों को क्रियान्वित करने की समस्याओं को समझ चुके हैं जैसे जनसंख्या विस्फोट, हिंसा, आतंकवाद और भ्रष्टाचार। विभिन्न सरकारों द्वारा इन बाधाओं को दूर करने के लिए अपनाए गए विभिन्न तरीकों का भी आपने अध्ययन किया है। लोगों की सहभागिता, भ्रष्टाचार को रोकना तथा अच्छे शासन को प्रोत्साहित करने के लिए कम्प्यूटरों के प्रयोग पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है।
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