हरित क्रांति - हरित क्रांति क्या है, अर्थ‌ एवं इसके प्रभाव, उद्देश्य व समस्याएं | harit kranti

हरित क्रांति

स्वतंत्रता के बाद कृषि विकास और खाद्य सुरक्षा भारत की मुख्य समस्याएँ रही है। परंतु उन पर बल विविधतापूर्ण रहा है। परिणाम यह हुआ कि कृषि सेक्टर के विकास ने सविरामी रूप से शिखर और गर्त देखे। पहली पंचवर्षीय योजना ने अपने मुख्य फोकस के रूप में कृषि के विकास को अपने मुख्य केंद्र पर रखा। इसके बावजूद दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत ने गंभीर खाद्य कमी का सामना किया है। harit kranti
harit-kranti
इस समस्या से निपटने के लिए 1958 में भारत में खाद्यान्न कमी के कारणों की जाँच करने और उपचारी उपाय सुझाने के लिए (संयुक्त राज्य के कृषि विभाग के डॉ. एस. एफ, जानसन की अध्यक्षता में) विशेषज्ञों का दल आमंत्रित किया। दल ने (India's Food Problem and Steps to meet it' (1959)" नाम से अपनी रिपोर्ट में) सिफारिश की कि भारत को उन क्षेत्रों पर अधिक फोकस करना चाहिए जहाँ कृषि उत्पादकता बढ़ाने की संभावना अधिक है। इसके परिणामस्वरूप पहले से ही विकसित हुए क्षेत्रों को अधिक खाद्यान्न पैदा करने के सघन खेती के लिए चुना गया। बाद में 1960 के दशक में दो मुख्य कार्यक्रम, अर्थात् सघन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP 1961) और सघन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP, 1964) प्रारंभ किए गए। इन दोनों कार्यक्रमों ने सिंचाई, उर्वरक, कृषि अनुसंधान और विकास, शिक्षा और विस्तार सेवाओं पर भारी निवेश किया, जिसने मिलकर परिणामतः भारतीय कृषि में उत्पादकता और उत्पादन में उच्च वृद्धि को संभव बनाया। आमतौर पर इसका हरित क्रांति (GR) के रूप में उल्लेख किया गया। यद्यपि इसकी सफलता व्यापक रूप से स्वीकार की गई परंतु वास्तविकता यह है कि इसे
केवल पहले से ही कृषि की दृष्टि से विकसित भौगोलिक क्षेत्रों में फोकस किया गया था और उन्हीं क्षेत्रों में सघन निवेश द्वारा बढाया गया था। इसकी सारी रचना उसके क्षेत्रीय विकास के पक्षधर दृष्टिकोण पर ही आधारित थी। दूसरे शब्दों में, उसके दृष्टिकोण और अभिकल्पना में सभी क्षेत्रों के संतुलित विकास पर आग्रह स्पष्ट नहीं था। harit kranti kya hoti hai इसलिए यद्यपि हरित क्रांति ने समग्र कृषि उत्पादन, उत्पादकता और आय पर्याप्त रूप से बढ़ाई, खाद्य कमी अर्थव्यवस्था को खाद्य पर्याप्तता में रूपांतरित किया परंतु इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कई नकारात्मक प्रभाव भी उत्पन्न किये।
विशेष रूप से, निम्नलिखित के अनुसार उसके आर्थिक और पारितंत्र परिणामों से सफलता की कहानी के निराशाजनक पहलू प्रकट हुए :-
  • (i) भौमजल स्तर का अवक्षय
  • (ii) मृदा की गुणवत्ता में हास
  • (iii) वर्धित निवेश लागत
  • (iv) वर्धित ऋण आवश्यकता, आदि।
इस पृष्ठभूमि में हम भारतीय अर्थव्यवस्था पर हरित क्रांति के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर विस्तार से इसी इकाई में अध्ययन करेंगे। हम अति आवश्यक द्वितीय हरित क्रांति के आयामों के बारे में भी अध्ययन करेंगे जो वर्तमान परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और आयाम के कारण अति आवश्यक हो गया है। परंतु हम अपनी चर्चा पहली हरित क्रांति के ऐतिहासिक पहलुओं के संक्षिप्त विवरण से प्रारंभ करेंगे।

हरित क्रांति क्या है?

'हरित क्रांति' शब्द का अर्थ है नए पौधों की किस्मों के विकास द्वारा उत्पादन को कई गुना बढ़ाने के उपाय। उच्च उत्पादन वाली (High yielding varieties, HYVs) धान व गेहूं की किस्में हरित क्रांति के मुख्य तत्व रहे हैं। मार्च 1968 में अमरीकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (US Agency for International Development, USAID) के संचालक विलियम गैंड ने पहली बार “हरित क्रांति" शब्दों का प्रयोग किया था। इस शब्द का प्रयोग नई तकनीकों द्वारा चावल, गैहूं, मक्के और अन्य पौधों की कई गुना विकसित हुई उत्पादकता के संदर्भ में किया गया था। हालांकि 'हरित क्रांति' नामक शब्दों का प्रयोग मुख्यतः गैहूं और धान के संदर्भ में किया जाता है, परन्तु कुछ कृषि विशेषज्ञों ने मक्का, सोयाबीन व गन्ने जैसे उन अन्य अनाजों को भी इस श्रेणी में शामिल किया है, जिनके उत्पादन में, नई तकनीकों के प्रयोगों द्वारा, कई गुणा वृद्धि हुई है। harit kranti kya hai
जिनके द्वारा हरित क्रांति संभव हुई हैं, वे इस प्रकार है :
  • फसलों के उच्च उत्पादकता वाले पौधों का प्रवेशन (introduction)।
  • बहु-कृषि (सम्मिलित रूप से पौधे उगाने की प्रक्रिया), बेहतर सिंचाई व पर्याप्त मात्रा में खादों की आपूर्ति।
  • बीमारियों व कीटाणुओं के विरुद्ध पौधों के संरक्षण की विधियों का प्रयोग।
  • वैज्ञानिक कृषि की तकनीकों का अनुसंधान व उनका खेतों से ग्रामीण कृषकों तक स्थानान्तरण।
  • खेतों से बाजार तक फसल के यातायात की बेहतर व्यवस्था करना।
  • आधुनिक तकनीकों के प्रयोग द्वारा पौधों (विशेषकर अनाज) के उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि को हरित क्रांति नाम दिया गया है।
उदाहरण के लिए, जब एक मेक्सिकन गैहूं की किस्म (ऊंची उत्पादकता एवं अच्छी तरह सिंचाई किए हुए) का उतने ही अच्छे स्तर की भारत गैहूं की किस्म (रोग की प्रतिरोधक क्षमता एवं अच्छी गुणवत्ता वाला अनाज) से आधुनिक तकनीक द्वारा संकरण किया गया तब एक उच्च उत्पादकता वाले और बीमारी से लड़ने में सक्षम गैहं की किस्म की उत्पत्ति हुई। कछ मुख्य 'क्रांतिकारी' किस्मों के नाम हैं- 'कल्याण सोना', 'सोनालिका', और 'शर्बती सोनोरा' इत्यादि। harit kranti kya h

भारत में उच्च उत्पादन की किस्मों के प्रयोग का आरम्भ
कषि के क्षेत्र में विकसित देशों के मुकाबले. हमारी औसत राष्ट्रीय उत्पादकता की दर केवल 800 किलो प्रति हेक्टेयर के स्तर की ही थी, जो कि विकसित देशों की तुलना में बहुत कम थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्राक्तन डायरेक्टर जनरल एम एस स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan) ने पौधों की उत्पादकता के ठहराव व पौधों के उत्पादन की अस्थिरता का गहरा विश्लेषण किया तथा उन कारणों की तह तक पहुंचने की कोशिश की, जिनके कारणवश यह स्थिति विद्यमान थी। bharat mein harit kranti
उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि उस समय प्रयोग में आने वाली लम्बी किस्मों की शारीरिक बनावट ही अधिक उत्पादन के मार्ग में एक बाधा सिद्ध हो रही थी। उन्होंने उक्त पौधों की किस्मों की उत्पत्ति की प्रक्रिया की ही जननिक कार्यशैलियों के पुन:निर्देशन पर जोर दिया। सन् 1970-80 के दशक के दौरान, गेहूं की जननिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नए किस्म के बीजों वाले, उच्च उत्पादकता के छोटे आकार के गैहूं की किस्मों का विकास किया गया। इसी दौरान कुछ महत्वपूर्ण किस्में, 'कल्याण सोना', 'शर्बती सोनारा', 'सोनालिका' जैसी ऊंची उत्पादकता की किस्मों का विकास हुआ जिन्होंने खादों और सिंचाई की ओर अच्छा रुख अपनाया।
भारतीय जननिक वैज्ञानिकों के अनुरोध पर, सन् 1963 में भारत सरकार ने मेक्सिको देश से प्रोफेसर नॉर्मन-ई-बोरलौग (Prof. Norman G. Borlaug) को आमंत्रित किया ताकि पौधों की बौनी (कम आकार) किस्मों के उत्पादन की संभावनाओं का वे भारत वर्ष में मूल्यांकन करें। भारत के कई क्षेत्रों का दौरा करने के पश्चात, उन्होंने भारत में मैक्सिकी उद्भव के ही छोटे आकार के गेहूं की किस्मों को बोने का प्रस्ताव रखा। वे इस निष्कर्ष पर इस कारणवश पहुंचे क्योंकि मेक्सिको का मौसम व भूमि दोनों तुलनात्मक रूप से एक समान थीं। उनके सुझाव पर, लेरमा-राजो व सोनोरा-64 नामक दो किस्मों का चयन किया गया और उन्हें हमारे सींचे गए खेतों में बोने के लिए प्रयुक्त किया गया। इन किस्मों के प्रयोग से गैहूं की उत्पादकता कई गुना बढ़ गयी और हमारे गैहूं के निर्यात में क्रांति आ गई।
डॉ. बोरलॉग, मेक्सिको सरकार तथा रॉकफेलेर फाउंडेशन की सहकारी योजना के अन्तर्गत गैहूं अनुसंधान व विकास कार्यक्रम के मुखिया के रूप में जुड़े। सन् 1966 में उनकी गेहूं के विकास की गुपचुप क्रांति ने संसार भर का ध्यान आकर्षित किया तथा मेक्सिको में ही अन्तर्राष्ट्रीय गैहूं व मक्के के विकास का केन्द्र (Centre for Quiet Revolution in Wheat Improvement) स्थापित किया गया। सन् 1970 में उन्हें 'हरी क्रांति' लाने के लिए नोबेल पुरसस्कार से सम्मानित किया गया। इसी हरी क्रांति ने भारत की इतनी मदद की थी।
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन एक बेहतरीन उत्परिवर्तन जननिक वैज्ञानिक रहे हैं। इन्होंने सन् 1967
में उगाने के लिए 'शर्बती सोनारा' नामक किस्म को निर्मित किया। उत्परिवर्तन जनन के कार्यक्रम में सोनारा 64 को अल्ट्रावायलेट किरणों से पारित करके उन्होंने इस 'किस्म' का निर्माण किया।

हरित क्रांति की अवधारणा

शब्द "हरित क्रांति" का उल्लेख कृषि विशेषज्ञों के दल द्वारा 1950 के और 1960 के दशकों के दौरान विकसित नई कृषि प्रौद्योगिकी के लिए किया गया है। इस दल में मैक्सिको में अंतर्राष्ट्रीय मक्का और गेहूँ सुधार केंद्र और फिलिपीन्स में अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) के कृषि विशेषज्ञ थे। इन दो केंद्रों में विकसित प्रौद्योगिकी बाद में एशिया और लेटिन अमेरिका के अधिकांश विकासशील देशों द्वारा अपनाई गई ताकि इन देशों में खाद्यान्न आत्मनिर्भरता प्राप्त करने तथा कृषि उत्पादकता सुधार करने में योगदान हो सके। प्रौद्योगिकी में अधिक पैदावार वाली किस्म (HYV) के बीजों का प्रयोग और आधुनिक कृषि निवेशों, औजारों और प्रणालियों (जैसे रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं, सुनिश्चित और नियंत्रित सिंचाई, ट्रैक्टरों, थ्रेशरों, विद्युत और डीज़ल पम्पों आदि) का पैकेज अंतर्निहित है। यद्यपि प्रारंभ में नई कृषि रणनीति मुख्यतया गेहूँ और चावल की फसलों तक सीमित थी, बाद में, अन्य फसलों के लिए भी इसका विस्तार किया गया। ये प्रणालियाँ उन परंपरागत कृषि प्रणालियों के स्थान पर प्रारंभ की गई, जो अधिकांशतः किसानों के अपने स्वामित्व के आदानों और संसाधनों पर आधारित थे (जैसे देशी बीज, खेत में बनी खाद, हाथ से सिंचाई, रहट का प्रयोग)। देशी बीजों की समस्या यह थी कि वे उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक उर्वरक की अधिक मात्रा बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। जबकि रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई के संयोजन में HYV बीजों ने अधिक वांछित उच्चतर उत्पादकता दी। "हरित क्रांति' शब्द की रचना डॉ. विलयिम माडे (USAID के तत्कालिक प्रशासक) द्वारा की गई थी। उन्होंने 1968 में एशिया और लेटिन अमेरिका के विकासशील देशों में नई कृषि प्रौद्योगिकी द्वारा प्राप्त सफलता का वर्णन करने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया।

ऐतिहासिक संदर्भ
"हरित क्रांति की प्रक्रिया डॉ. नार्मन बोरलॉग सहित रॉकफेलर फाउंडेशन के कृषि विशेषज्ञों की टीम द्वारा मेक्सिकों में 1950 के दशक के प्रारंभ में कृषि अनुसंधान कार्यक्रम के प्रवर्तन से आरंभ हुई। डॉ. नार्मन बोरलॉग, ने मेक्सिकन गेहूँ पर गहन अनुसंधान किया और वे 1950 के दशक के मध्य में अधिक पैदावार देने वाली बौने गेहूँ की किस्मों का आविष्कार करने में सफल हुए। गेहँ के HYV बीजों के प्रयोग से मैक्सिको 1960 के दशक के प्रारंभ तक गेहूँ उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया, यहां तक कि उसने निर्यात करना भी आरंभ किया। बाद में 1962 में चावल की फसल के नए HYV बीज विकसित करने के लिए फिलिपीन्स में (पुनः रॉकफेलर और फोर्ड फाउंडेशन की सहायता से) अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान IRRI) स्थापित किया गया था। IRRI द्वारा विकसित चावल की नई किस्मों ने फिलिपीन्स में मैक्सिको में गेहूँ के मामलों की अपेक्षा चावल की अधिक उत्पादकता बढ़ाई है। मैक्सिकन गेहूँ की भांति चावल बीज भी रासायनिक उर्वरक और सिंचाई के प्रयोग के प्रति अधिक अनुक्रियाशील थे।
इन दोनों प्रयासों ने भारत सहित अधिकांश विकासशील देशों में हरित क्रांति प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। डॉ. बोरलॉग को कृषि विकास में उसके योगदान और उस समय की विश्व खाद्य समस्या हल करने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था।
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है भारत को 1950 और 1960 के दशकों में गंभीर खाद्य कमी का सामना करना पड़ा और खाद्यान्न का आयात करना पड़ा। भारत खाद्यान्न की कमी जल्दी से जल्दी पूरा करने के लिए बेचैन था। परिणामस्वरूप फोर्ड फाउंडेशन के कृषि विशेषज्ञों के दल की सिफारिशों पर भारत ने कृषि की दृष्टि से विकसित चुनिन्दा क्षेत्रों में अधिक खाद्यान्न, विशेषकर गेहूँ और चावल अधिक पैदा करने की नई कृषि रणनीति अपनाई। 1960 के दशक में फोर्ड फाउंडेशन ने भारत सरकार की स्वीकृति से कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी आदानों से गहन कृषि क्षेत्र कार्यक्रम (IAAP) प्रारंभ किया। उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केन्द्रित करने पर बल दिया गया था जहाँ कृषि विकास की संभावना अधिक थी ताकि खाद्यान्न उत्पादन में त्वरित वृद्धि प्राप्त की जा सके। इन चुनिन्दा क्षेत्रों में किसानों को आवश्यक निर्देश और सेवाएं प्रदान की गई। कार्यक्रम चुनिन्दा क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में पर्याप्त प्रभावकारी सिद्ध हुआ। IAAP के आशाप्रद परिणामों तथा अधिक खाद्यान्न के लिए बढ़ती हुई आवश्यकताओं को देखते हुए सरकार ने (1964-65 के दौरान) उन चुनिन्दा 114 जिलों में गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) प्रारंभ किया जहाँ कृषि विकास की संभावना बहुत अधिक थी। IAAP और IADP दोनों आर्थिक विकास के "बड़े प्रयास" सिद्धांत पर आधारित थे। ये दोनों कार्यक्रम भारत में हरित क्रांति प्राप्त करने की दिशा में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए। डॉ. नार्मन बोरलॉग और डा. एम.एस. स्वामीनाथन (कृषि वैज्ञानिक) तथा सी. सुब्रह्मण्यम, तत्कालीन कृषि मंत्री, भारत में नई कृषि प्रौद्योगिकी लाने में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रहे हैं। नई रणनीति का मुख्य उद्देश्य किसानों को आवश्यक आदान और सेवाओं की सुलभता प्रदान कर खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था।
इसे निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रचुर सार्वजनिक निवेश के अधीन पर्याप्त कृषि अनुसंधान, विस्तार और विपणन, आधारभूत संरचना स्थापित कर किया गया था-
  • (i) पृष्ठीय और भौमजल सिंचाई
  • (ii) कृषि उपकरणों और उर्वरकों का विनिर्माण
  • (iii) कृषि मूल्य आयोग की स्थापना
  • (iv) निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण; और
  • (v) किसानों को ऋण सुविधाएँ प्रदान करने के लिए सहकारी ऋण संस्थाओं की स्थापना।
इसके अतिरिक्त, इस अवधि के दौरान नलकूप प्रौद्योगिकी का आविष्कार, कृषि उत्पादकता, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वृद्धि करने में योगदान से और फसल स्वरूप में परिवर्तन करने में सहायक हुआ है। बहुत कम समय में गेहूँ क्रांति संपूर्ण उत्तर भारत में फैल गई है और गेहूँ के उत्पादन और उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई। बाद में ऐसी ही क्रांति चावल की खेती में हुई। किंतु इसकी औचित्य, पारितंत्र और पर्यावरण संबंधित मुद्दों पर गंभीर आलोचना भी हुई है। इसके बावजूद हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के रूपांतरण में असाधारण योगदान किया। खाद्य कमी की असम्मानजनक स्थिति जलयान से मुँह तक में ऐसा परिवर्तन हुआ कि देश न केवल आत्मनिर्भर, बल्कि खाद्य अधिशेष देश भी बन गया।

हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएँ

परंपरागत फार्म कार्यविधि के विपरीत, जो अधिकांशतः देशी बीजों और आंतरिक निवेश (अक्रीत निवेशों) पर निर्भर होती है, नई कृषि प्रौद्योगिकी मुख्यतया बाह्य आदानों (क्रीत आदानों) पर आधारित थी जिसे उसके अपनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। GR प्रौद्योगिकी HYV बीजों-सिंचाई-उर्वरकों के पैकेज में आया। ये सभी एकसाथ सही अनुपात में आवश्यक होते हैं, क्योंकि, जल का अपर्याप्त और अत्यधिक प्रयोग दोनों ही इन बीजों के लिए हानिकारक थे। इसलिए सुनिश्चित और नियंत्रित सिंचाई की उपलब्धता और रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग HYV बीजों की उत्पादकता बढ़ाने में दो महत्त्वपूर्ण कारक बन गए। अतः GR प्रौद्योगिकी उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त थी, जहाँ पर्याप्त सिंचाई सुविधाएँ और उपयुक्त सिंचाई के साथ थे। साथ ही जल निकासी व्यवस्था भी थी। यद्यपि एक ओर HYV बीजों को अपनी वृद्धि के लिए रासायनिक उर्वरकों की उच्च मात्रा की आवश्यकता होती है, इसके प्रतिस्वरूप उर्वरकों के प्रयोग से उत्पन्न खरपतवार के लिए खरपतवारनाशी के प्रयोग की भी आवश्यकता होती है। harit kranti ke uddeshya
HYV की मुख्य विशेषताओं में एक यह है कि उनकी परिपक्वता की अवधि बहुत कम थी जिससे किसानों को वर्ष में कई फसलें उगाने के अवसर मिले। इस प्रकार GR प्रौद्योगिकी फसल सघनता बढ़ाने में सहायक हुई। GR प्रौद्योगिकी के अधीन उत्पादकता के उच्चतर स्तर और फसल गहनता ने इसे भूमि बचत प्रौद्योगिकी बनाया। परंतु अगली फसल के लिए भूमि खाली करने के लिए किसानों को समय पर फसल कटाई और अगली फसल के लिए भूमि तैयार करने सहित विभिन्न फार्म क्रियाएँ करने की आवश्यकता होती है। इसके लिए आधुनिक फार्म मशीनों, जैसे ट्रैक्टरों, श्रेशरों, सिंचाई पम्पों आदि का प्रयोग आवश्यक था। harit kranti ka uddeshy
इस प्रकार GR प्रौद्योगिकी फार्म मशीनें, सिंचाई पम्पों आदि के विनिर्माण में अधिक निवेश आकर्षित करने तथा छोटे कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बैकिंग और विपणन ढाँचागत सुविधाएं स्थापित करने में भी सहायक हुई। चूंकि GR प्रौद्योगिकी में भारी आधारभूत संरचना अंतर्निहित है, इसलिए प्रौद्योगिकी उन बड़े किसानों के लिए अधिक उपयुक्त थी जो अपने विशाल आकार के फार्मों के कारण उनका अधिकतम उपयोग करने के लिए फार्म मशीनें और उपकरण खरीदने में खर्च कर सकते थे। यद्यपि HYV फसलें अपनाने के लिए भारी मशीनरी पर निवेश आवश्यक था परंतु किराये पर और अन्य आदानों की खरीद पर अधिक खर्च करना छोटे किसानों के लिए भी आवश्यक था।
ऋण की सीमित सुलभता के कारण छोटे और सीमांत किसानों के पास निवेश करने की अधिक क्षमता नहीं थी। इस प्रकार यद्यपि HYV उर्वरक-सिंचाई प्रौद्योगिकी को पैमाने के प्रति निरपेक्ष समझा गया था और प्रचलित सभी आकार की जोतों पर भूमि की उत्पादिता बढ़ी। फिर भी वास्तव में यह संसाधन निरपेक्ष नहीं थी। इसलिए छोटे और सीमांत आकार की जोतों पर सामूहिक खेती, जैसे कुछ संस्थागत उपायों के माध्यम से नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग लागत प्रभावी बनाना आवश्यक है।
अतः संक्षेप में, HYV बीज रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग, आधुनिक फार्म मशीनों का अनुप्रयोग, विस्तृत सिंचाई सुविधाएँ. अनेकधा सस्यन, उन्नत ऋण सुविधाएँ, समर्थन मूल्य नीति और उन्नत अनुसंधान और विकास तथा विस्तार तथा आधारभूत संरचना, भारत में हरित क्रांति आंदोलन की मुख्य विशेषताओं के रूप में उल्लेखनीय हैं।

हरित क्रांति का प्रभाव

भारत में हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने विशेष रूप से कृषि पर और सामान्य रूप से संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर अद्भुत प्रभाव डाला है।

सकारात्मक प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव के क्षेत्र में हरित क्रांति प्रौद्योगिकी फसलों के, विशेषकर गेहूँ और चावल के उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने तथा सस्य सघनता बढ़ाने, मोटे धान्य से श्रेष्ठ धान्य में सस्यक्रम बदलने और बाद में गन्ना और बागवानी फसलों सहित नकदी फसल बोने और खाद्य सुरक्षा की समस्या हल करने में सहायक हुआ।

खाद्यान्नों के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि
हरित क्रांति (GR) के सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रभावों में एक धान्य फसलों, विशेषकर गेहूँ और चावल के उत्पादन और उत्पादकता की वृद्धि थी। धान्य उत्पादन तीन कारकों द्वारा बढ़ाया गया था :-
  • (i) खेती के अधीन निवल क्षेत्र में वृद्धि
  • (ii)भूमि के उसी टुकड़े पर वर्ष में दो या अधिक फसलों की उगाई; और
  • (iii) HYV बीजों का प्रयोग।
हरित क्रांति के परिणामस्वरूप खाद्यान्नों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यह 1965-66 में 72.4 मिलियन टन से बढ़कर 1978-79 में 131.9 मिलियन टन हुआ। इससे भारत विश्व के सबसे बड़ा कृषि उत्पादकों में गिना गया। खाद्यान्नों की प्रति हेक्टेयर उपज 1965-66 में 6.3 क्विंटल प्रति हेक्टयर (Q/ha) थी जो बढ़कर 1978-79 में 10.2 O/ha हो गयी। सिंचाई के अधीन कुल खाद्यान्न का प्रतिशत भी 1965-66 से 20.9 से बढ़कर 1978-79 में 28.8 हुआ। इन उत्पादकता वृद्धियों से भारत उस समय के दौरान खाद्यान्नों का निर्यातक बनने में सक्षम हुआ।
चित्र 1 भारत में 1950-51 से 2009-10 तक की गेहूँ फसल का क्षेत्र, उत्पादन और उपज में प्रवृत्तियां दिखाता है। ग्राफ से स्पष्ट है कि गेहूँ का उत्पादन हरित क्रांति की अवधि के दौरान और उसके बाद उल्लेखनीय ढंग से बढ़ा है। उत्पादन 196566 में 10.4 मिलियन टन (MT) से 1978-79 में 35.5 MT और आगे 2009-10 में 80.7 MT बढ़ा है। उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि मुख्यतया उसके प्रति हेक्टेयर उपज में भारी वृद्धि थी जो 1965-66 में 8.3 Q/Ha से 1978-79 में 15.7 Q/Ha और आगे 2009-10 में 28.3 Q/Ha हुई। हरित क्रांति के दौरान और उसके बाद की अवधियों के दौरान भी गेहूँ के अधीन क्षेत्रफल में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसे भी चित्र.1 में देखा जा सकता है। परंतु हाल ही के वर्षों में गेहूँ की प्रति हेक्टेयर उपज उसके क्षेत्रफल की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ी है, इसका आशय यह है कि गेहूँ में उत्पादकता वृद्धि ने उसके अधीन क्षेत्रफल में वृद्धि की अपेक्षा अधिक योगदान किया है। यद्यपि गेहूँ का उत्पादन, अवधि के दौरान पर्याप्त वृद्धि दर्शाता है और वर्षों के उतार-चढ़ाव भी दर्शाता है।
harit-kranti
चावल (धान) के क्षेत्रफल, उत्पादन और उपज में भी हरित क्रांति के दौरान और उसके बाद उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उत्पादन 1965-66 में 30.6 MT से बढ़कर 1978-79 में 53.8 MT और आगे 2009-10 में 89.1 MT पहुंचा। चावल की प्रति हेक्टेयर उपज गेहूँ की उपज की तुलना में काफी धीमी बढ़ी। इसका आशय है कि हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने चावल फसल की अपेक्षा गेहूँ फसल में अधिक प्रवेश किया। इसके अलावा चावल के अधीन क्षेत्रफल में भी अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि दिखाई, जब गेहूँ के अधीन क्षेत्रफल से तुलना की गई। फिर यह ध्यान रखना भी महत्त्वपूर्ण है कि रेखाचित्रों में प्रस्तुत गेहूँ और चावल फसलों के क्षेत्रफल उत्पादन और उपज पर आंकड़े अखिल भारतीय औसत हैं जिसमें सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्र शामिल हैं।
दो मुख्य धान्य फसलों (गेहूँ और चावल) की चार अवधियों के दौरान क्षेत्रफल, उत्पादन और उपज के अनुमान तालिका में प्रस्तुत की गई है।
ये अवधियाँ निम्न प्रकार
  • हरित क्रांति पूर्व अवधि (1950-51 से 1964-65)
  • हरित क्रांति अवधि (1967-68 से 1978-79)
  • हरित क्रांति उत्तर अवधि (1979-80 से 1990-91) और
  • आर्थिक सुधार पश्च अवधि (1991-92 से 2009-10)
गेहूँ के मामले में हरित क्रांति अवधि के दौरान उच्चतम वृद्धि (3.3 प्रतिशत), इसके बाद हरित क्रांति पूर्व अवधि (2.7 प्रतिशत) और हरित क्रांति पश्च और सुधार पश्च अवधियों में अल्पतम (0.6 से 0.7 प्रतिशत) रिकार्ड किए गए हैं।
harit-kranti
इसी प्रकार, हरित क्रांति अवधि में गेहूँ के उत्पादन में उच्चतम वृद्धि (5.9 प्रतिशत) रिकार्ड हुई। इसके बाद हरित क्रांति पूर्व अवधि में (4.3 प्रतिशत) थी। 1980-91 की हरित क्रांति पश्च अवधि में गेहूँ उत्पादन में वृद्धि (4.2 प्रतिशत) भी बहुत कम नहीं थी बल्कि आर्थिक सुधारों के बाद अवधि में यह 1.7 प्रतिशत पर अल्पतम थी। परंतु गेहूँ की प्रति हेक्टेयर उपज के अनुसार हरित क्रांति के वर्षों बाद की अवधि में उच्चतम उपज (3.6 प्रतिशत) थी। एक बार फिर, प्रति हेक्टेयर उपज 1992-2011 के सुधार के बाद के वर्षों में अल्पतम थी। चावल के प्रति हेक्टेयर उपज में वैसी ही प्रवृत्ति देखी गई है। जिसमें 1980-91 के हरित क्रांति के बाद के वर्षों में उच्चतम वृद्धि (3.7 प्रतिशत) देखी गई थी। गेहूँ की भांति चावल के लिए भी 1992-2010 के सुधार के वर्षों में प्रति हेक्टेयर उपज में तीव्र गिरावट (1.1 प्रतिशत) देखी गई।

रोजगार सृजन
कृषि में रोजगार पैदा करने के संबंध में हरित क्रांति प्रौद्योगिकी का प्रभाव विवादास्पद रहा है। हरित क्रांति के आलोचक तर्क देते हैं कि हरित क्रांति क्षेत्रों में फार्म कार्यप्रणाली के बढ़े हुए यंत्रीकरण ने कृषि में रोज़गार घटाया है। उदाहरण के लिए, सी.एच.हनुमंथा राव ने टिप्पणी की कि "बीज-उर्वरक-सिंचाई पैकेज के अनुसार हरित क्रांति प्रौद्योगिकी का कृषि में रोजगार पैदा करने पर पर्याप्त सकारात्मक प्रभाव था, परंतु फार्म मशीनों, जैसे ट्रैक्टरों के बढ़ते हुए उपयोग से रोजगार पैदा होने में कमी आई। फिर भी, ट्रैक्टर और अन्य आधुनिक मशीनों के बढ़े हुए प्रयोग ने बढ़ते हुए सस्य सघनता, फार्म उत्पादकता और बदलते हुए सस्य क्रम ने रोजगार के संपूर्ण स्तर बढ़ाए। इसके अलावा अग्रानुबंधन और पश्चानुबंधन के तरीकों द्वारा गैस्फार्म कार्य में अतिरिक्त रोजगार पैदा करने में भी फार्म मशीनें और उपकरण सहायक रहे। दूसरे शब्दों में, प्रौद्योगिकी और बेहतर निवेश ने विनिर्माण और सेवा सेक्टरों के गैस्कृषि सेक्टरों में रोजगार के महत्त्वपूर्ण अवसर उत्पन्न किए हैं। इसके अलावा, सिंचाई (जिसे GR तकनीकों के अंगीकरण के लिए पूर्व शर्त माना गया था) के विस्तार ने अधिक रोजगार पैदा किये हैं, क्योंकि, असिंचित की तुलना में सिंचित फसलों में अधिक कृषि कार्य होते हैं। वास्तव में, हरित क्रांति क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने बड़ी समस्याओं में एक कृषि श्रमिकों की कमी की समस्या का अनुभव किया, इसके परिणामस्वरूप पिछड़े और गरीब कृषि क्षेत्रों से कृषि रोजगार के लिए श्रमिकों का प्रवासन harit kranti क्षेत्रों में हुआ। इस प्रकार हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी ने अन्य क्षेत्रों के कृषि श्रमिकों के लिए भी रोजगार के अप्रत्यक्ष अवसर उत्पन्न किए।

कृषि में सार्वजनिक/निजी निवेश का प्रवाह
भारत में हरित क्रांति की सफलता के पीछे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक सुनिश्चित सिंचाई की उपलब्धता है। नलकूप प्रौद्योगिकी के आविष्कार ने विशेष रूप से सिंधु गंगा बेसिन में प्रति हेक्टेयर फसल उपज बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। नई कृषि रणनीति के लिए कृषि अनुसंधान, विस्तार, बिजली, सड़कों, सिंचाई में निवेश सहित कृषि आधारभूत संरचना में सार्वजनिक निवेश आवश्यक है। भारत सरकार ने उन क्षेत्रों में कृषि में भारी सार्वजनिक निवेश किया, जहां नई रणनीति अपनाई गई थी।
इस निवेश से कृषि में भी निजी निवेश की गति तेज करने पर अनुकूल प्रभाव हुआ। किसानों ने नलकूप, ट्रैक्टर और उसके उपकरणों बिजली और डीजल पम्प सेटों, भूमि समतलन, और विकास आदि में निवेश किया। भारत में मैकेनिकल और इलैक्ट्रिकल विद्युत का अंश 1971-72 में 39.4 प्रतिशत से बढ़कर 2005-06 में 86.6 प्रतिशत हो गया। कृषि में कुल बिजली खपत में मानव श्रम का अनुपात घटा है। यह 1971-72 में 15.1 प्रतिशत से घटकर 1991-92 में 8.6 प्रतिशत और आगे 2005-06 में 5.6 प्रतिशत हुआ। इन प्रवृत्तियों का आशय है कि कृषि में हरित क्रांति के बाद बढे हए सार्वजनिक निवेश द्वारा प्रदत्त प्रोत्साहन के अनुसरण करते हुए निजी निवेश अत्यधिक बढ़ा।

भूमि की बचत
भूमि सीमित संसाधन है, इसके वैकल्पिक प्रयोग के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है। जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की तीव्र वृद्धि के कारण कृषीतर प्रयोजनों के लिए भूमि की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। कृषीतर प्रयोजनों के लिए भूमि को खाली करने पर विवाद कम हो सकता है यदि भूमि की उत्पादकता और अन्य संसाधन बढ़ाने से कृषि प्रयोजनों के लिए भूमि की आवश्यकता पूरी की जा सके। इस संदर्भ में हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी को भूमि बचाऊ माना गया है क्योंकि, इसने विभिन्न कृषि फसलों की प्रति हेक्टेयर उपज सार्थक रूप से बढ़ाई है। कृषि में उत्पादकता वृद्धि ने अप्रत्यक्ष रूप से वन भूमि को भी बचाया है क्योंकि हरित क्रांति harit kranti के कारण बढ़ी हुई कृषि उत्पादिता के अभाव में आवश्यकता पूरी करने के लिए अधिक वन भूमि को कृषि भूमि में बदला जा सकता था। इस दृष्टि से कभी-कभी यह तर्क भी दिया जाता है कि पर्यावरण पर हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव होते हुए भी वन भूमि बचाकर इस पर सकारात्मक प्रभाव हुआ है।

ग्रामीण कृषीतर अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
हरित क्रांति ने ग्रामीण कृषीतर अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न किया। इसके फलस्वरूप भूमि से प्रतिलाभ में पर्याप्त वृद्धि हुई है इससे किसानों की आय में पर्याप्त वृद्धि हुई। चूंकि ग्रामीण समुदाय का बहुत बड़ा भाग कृषि श्रमिकों और किसानों का होता है, इसलिए कृषि विकास के कारण उनकी आय में वृद्धि स्थानीय रूप से उत्पादित माल और सेवाओं की मांग बढ़ाता है। इस प्रकार कृषीतर सेवाओं में रोजगार और आय में वृद्धि होती है। इसके अलावा, फार्म आदानों, फार्म औजारों और मशीनों की मरम्मत और अनुरक्षण, परिवहन और विपणन सेवाओं, कृषि संसाधनों की मांग के विस्तार से कृषीतर कार्यों में लगे ग्रामीण परिवारों में अतिरिक्त आय और रोजगार सृजित होता है।

हरित क्रांति के नकारात्मक प्रभाव

भारत में हरित क्रांति ने कई नकारात्मक प्रभाव भी उत्पन्न किए हैं। चूंकि GR प्रौद्योगिकी अपनी अंतःनिर्मित असमान सुलभता और "क्षेत्र के असंतुलित विकास' की विशेषता के साथ "सबल पर संबल" की रणनीति पर आधारित है। इसलिए इसने क्षेत्रों और फार्मों की श्रेणियों के कृषि विकास में असमानता पैदा की है। किसी भी प्रकार के फेरबदल के बिना और जल, उर्वरकों और कीटनाशक दवाओं का भारी प्रयोग कर उसी भूमि पर गेहूँ या चावल की दो या तीन भी फसलें उगाने की प्रवृत्ति भी देखी गई। इसने मृदा उर्वरता और जल की मात्रा/गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ा। हम हरित क्रांति harit kranti के इस प्रतिकूल पहलुओं पर अधिक विस्तार से आगे चर्चा कर रहे हैं।

मृदा उर्वरता में ह्रास
हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी ने मृदा उर्वरता में गुण ह्रास उत्पन्न किया है। "प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन" (भारत सरकार, 2007) पर कार्यदल की रिपोर्ट के अनुसार 1980 के और 1990 के दशकों के दौरान मृदा कोटि निम्नीकरण के कारण अनुमानित हानि GDP के 11 से 26 प्रतिशत तक हुई। विश्वसनीय सलाह और मृदा परीक्षण सुविधाओं के अभाव के कारण अंधाधुंध और हानिकारक रासायनिकों का प्रयोग हुआ है। खेत उत्पन्न खाद और हरी खाद का प्रयोग विभिन्न कारणों से घटा है जैसे जताई पशुओं में कमी, आदि। यह भी तर्क दिया जाता है कि हरित क्रांति प्रौद्योगिकी फसल विविधता को प्रोत्साहित नहीं कर सकी। इसने तो फसल संकेन्द्रण को प्रोत्साहित किया है। हाल ही में "मृदा, साहाय्य और जीवनधारिता” पर ग्रीनपीस इंडिया रिपोर्ट (2011) ने टिप्पणी की है कि "रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग हमारी मृदा की हत्या कर रहा है और हमारी खाद्य सुरक्षा को संकट में डाल रहा है। इनसे हटने और अपनी मृदा को पारिस्थितिकीय तरीके से पारिपोषित करने का यही समय है।"

जैव विविधता की क्षति
ग्रामीण आजीविका को धारणीय बनाए रखने और खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए जैव विविधता आवश्यक है। परंतु HYV बीजों के प्रयोग ने उन देशी प्रजातियों पर आधारित कृषि कार्यप्रणाली बदल डाली जो पीढ़ियों के दौरान निर्मित हुई थी। इसके कारण बहुत से महत्त्वपूर्ण जीन कोषों की जननिक संवेदनशीलता, बिगड़ते हुए जैव विविधता और कृषि जननिक संसाधनों को क्षति हुई।

भौमजल संसाधनों का अवक्षय
1990 के दशक में कूपजल प्रौद्योगिकी का विकास सिन्धु गंगा प्रदेशों में हरित क्रांति लाने वाले महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है। परंतु इन क्षेत्रों में नलकूपों की चिरघातांकी वृद्धि भी भौमजल संसाधनों के तीव्र ह्रास के मुख्य कारण रही है। यद्यपि निष्पक्षता, दक्षता और निजी निवेश के आधार पर भौमजल सिंचाई को वरीयता दी जाती है, परंतु, बहुत-सी सरकारी नीतियों (जैसे क्रांति निवेश पर कृषि सरकारी सहायता, धारणीय भौमजल प्रयोग पर प्रभावशाली विनियम का अभाव आदि) ने भी अवक्षय में योगदान किया है।

छोटे और सीमांत किसानों पर प्रभाव
यह तर्क दिया जाता है कि परंपरागत कृषि से एकधा सस्यन में अंतरण का छोटे किसानों पर नकारात्मक प्रभाव हुआ है। छोटे और सीमांत किसानों को मंहगा HYV बीज, उर्वरक और कीटनाशक दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं जिनके लिए उन्हें अपेक्षाकत अधिक ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता है और परिणामस्वरूप वे "ऋण के जाल' में फंस जाते हैं। इसके अलावा धनी किसानों द्वारा भौमजल के अतिदोहन से छोटे और सीमांत किसानों को पानी की उपलब्धता कठिन हो जाती है।

कृषि में अति पूँजीकरण
परंपरागत कृषि प्रथा अधिकांशतः स्थानीय रूप से उपलब्ध कृषि आदानों और औजारों, जैसे फार्म में उगाए गए बीजों, काष्ठ या लोहे के हल, पशु जुताई, खेत पर उत्पन्न खाद, बैलगाड़ी और स्थानीय बढ़इयों और लौहारों द्वारा बनाए गए अन्य कृषि औजारों पर आधारित थी। इन निवेशों और औजारों को प्राप्त करने के लिए रुपयों की बहुत कम या कोई आवश्यकता नहीं होती थी क्योंकि उनमें से अधिकांश स्वयं अपने होते थे या "जजमानी" प्रथा के अधीन किसानों द्वारा दिए जाने वाले हितलाभों के बदले बढ़ई और लौहार काम देते थे। यद्यपि जजमानी प्रथा का ह्रास हो रहा है, कृषि में उभरती हुई कार्यप्रणाली बहुत से क्षेत्रों में अधिक पूँजीकरण की ओर बढ़ रही है। नई कृषि प्रौद्योगिकी के लिए आधुनिक फार्म मशीनें, ट्रैक्टरों, पम्पसेटों आदि में भारी निवेश की आवश्यकता थी जो अधिकांश मामलों में स्वकर्षित जोतों के विभाजन के कारण अल्प प्रयुक्त रहते थे। उदाहरण के लिए, स्वकर्षित जोतों का विभाजन किसानों को अधिक ट्रैक्टर और औजार तथा सिंचाई पम्प खरीदने के लिए प्रोत्साहित करता है जिसके कारण कृषि में अति पूँजीकरण होता है। कषि की दष्टि से अधिक विकसित क्षेत्रों में जैसे पंजाब और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कृषि में अति पूंजीकरण है। चंद और कुमार (2004) कई स्वकर्षित जोतों में वृद्धि, कृषि में निजी पूँजी निर्माण के महत्त्वपूर्ण निर्धारक के रूप में पाते हैं। जोतों का विभाजन इनकी संख्या को बढ़ाता है। यह फार्म पारिसंपत्तियों और मशीनरी में निवेश की मांग बढ़ाता है। यह जानना प्रासंगिक हो सकता है कि भारत में स्वकर्षित जोतों की संख्या बढ़ी है। यह 198586 में 97.16 मिलियन थी जो बढ़कर 1995-96 में 115.68 मिलियन और आगे 2000-09 में 120.28 मिलियन हो गई। फार्म सेक्टर और संस्थागत ऋण और राजकीय सहायता की उपलब्धता, फार्म मशीनरी में निवेश बढ़ाने के लिए इन विभाजित जोतों को अभिप्रेरित करती है। कृषि में इस किस्म का निजी निवेश वांछनीय नहीं है क्योंकि खेती की इकाई लागत छोटे किसानों की प्रतिस्पर्धात्मकता घटाती है और उनमें ऋणग्रस्तता बढ़ाती

असमानताओं में बढ़ोतरी
हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी ने क्षेत्रों और फार्मों की श्रेणियों में असमानताएँ उत्पन्न की हैं। चूंकि यह "सबल पर संबल" दृष्टिकोण पर आधारित है इसलिए असमानता इसमें स्वाभाविक थी। नई प्रौद्योगिकी के लाभ कुछ ही फसलों, जैसे गेहूँ, चावल, गन्ना और कृषि की दृष्टि से विकसित कुछ क्षेत्रों तक सीमित थे, जहां सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ थीं। अधिकांश फसलों और वर्षा प्रधान कृषि क्षेत्रों ने हरित क्रांति harit kranti से पर्याप्त लाभ प्राप्त नहीं किए। यह देखा गया है कि अधिकांश देशों में, जहां नई प्रौद्योगिकी अपनाई गई थी, पहले से विकसित क्षेत्रों के किसानों ने अधिक लाभ प्राप्त किए, अधिकांशतः सबसे गरीब किसानों और अल्पतम विकसित क्षेत्रों ने नहीं। इस संबंध में परस्पर विरोधी प्रमाण है कि क्या इसके "प्रसार प्रभाव' भी है या इसने विभिन्न क्षेत्रों में आय अंतर तेजी से बढ़ाए हैं। प्रारंभ में हरित क्रांति मुख्य रूप से उत्तर भारत में गेहूँ की फसल तक सीमित रही गई। इसका परिणाम यह हुआ कि देश के समग्र आर्थिक विकास में इसका योगदान भी सीमित रहा। चूंकि बीज-उर्वरक प्रौद्योगिकी असिंचित और वर्षा प्रधान क्षेत्रों की कृषि के लिए उपयुक्त नहीं थी इसलिए क्षेत्रीय आय असमानताओं में काफी हद तक इसका योगदान रहा। शुष्क क्षेत्रों में हरित क्रांति harit kranti का विस्तार अनुपयुक्त सिद्ध हुआ और प्रायः उन किसानों के लिए गंभीर, विपत्ति का कारण बना जिन्होंने भौमजल संसाधनों पर आधारित शुष्क क्षेत्र में हरित क्रांति harit kranti अपनाया। हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी ने उन फार्मों में प्रभावकारी ढंग से कार्य किया जिनमें नियंत्रित उत्पादन वातावरण था, जैसे, अच्छी कोटि की मृदा बेहतर सिंचाई और बाज़ार सुविधाएँ। चूंकि, यह वातावरण कृषि की दृष्टि से पिछड़े क्षेत्रों में पर्याप्त रूप में उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन क्षेत्रों के किसान नई प्रौद्योगिकी से अधिक लाभ प्राप्त नहीं कर सके, बल्कि, उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता नष्ट हो गई और वे विकसित क्षेत्रों के अपने प्रतिपक्षियों के मुकाबले अपेक्षाकृत अलाभकर स्थिति में रहे। सी.एच. हनुमंथा ने निष्कर्ष निकाला कि भारतीय कृषि में प्रौद्योगिकी परिवर्तन ने भिन्नभिन्न क्षेत्रों के बीच छोटे और बड़े किसानों के बीच, और भूस्वामियों तथा भूमिहीन श्रमिकों के बीच आर्थिक असमानताएँ बढ़ाई। फिर भी, उन्होंने प्रेक्षण किया है कि खाद्यान्नों की उत्पादकता, उत्पादन और सुलभता की दृष्टि से हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी का लाभ साधारणतया समाज के सभी वर्गों में पहुंचा।

पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर प्रभाव
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी के सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभावों में उसके पारिस्थितिकी और पर्यावरण प्रभाव प्रमुख हैं। कृषि में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक दवाओं का अत्यधिक प्रयोग भूमि की उर्वरता की कमी का मुख्य स्रोत है। इसने सामान्यतया जलीय जीवन और विशेष रूप से मत्स्य उत्पादन प्रभावित करते हुए नदी जल संसाधनों को भी प्रदूषित किया है। हाल ही के दशकों में, उत्पादकता रुद्धता भी उस मृदा और जल संसाधनों के निम्नीकरण के कारण हुई है जो विशेषकर चावल-गेहूँ और उत्तर भारत के राज्यों के गेहूँ-गन्ना उत्पादन से उत्पन्न हुआ है। इसलिए उर्वरकों, कीटनाशियों और खरपतवार नाशियों के अत्यधिक प्रयोग से न केवल प्राकृतिक संसाधनों का निम्नीकरण हुआ है बल्कि उत्पादकता भी अवरुद्ध हुई है।

ऊर्जा समस्याएँ
हरित क्रांति से संबंधित एक अन्य समस्या जीवाश्म ईंधन ऊर्जा स्रोतों पर उसकी अधिक निर्भरता है। यह तर्क दिया जाता है कि ऊर्जा आधारित कृषि आदानों की लागत में वृद्धि के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि होती है, इससे हरित क्रांति harit kranti कार्यप्रणाली आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टि से संदेह्रास्पद है। देखा गया है कि कृषि में मैकेनिकल और इलैक्ट्रिकल विद्युत खपत का अंश समय के चलते बहुत बढ़ा है। डीजल आयात की अधिक उच्च मांग ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी बहुत दबाव रखा है।

हरित क्रांति के पश्चात के प्रयास

जैसाकि ऊपर देखा गया है कि प्रथम हरित क्रांति अवधि (1968-79) के लाभ अधिकांशतः कुछ ही फसलों और कृषि की दृष्टि से विकसित क्षेत्र के बड़े किसानों तक सीमित रहे। भारत का बहुत बड़ा भाग, विशेषकर पूर्वी राज्यों के वर्षा निर्भर क्षेत्र, जैसे असम, बिहार और उड़ीसा हरित क्रांति प्रौद्योगिकी से अधिकांशतः अछूता रहा। इसे ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने उन क्षेत्रों और फसलों के कृषि विकास के लिए विशिष्ट प्रयास प्रारंभ किए जो पहली हरित क्रांति के लाभ प्राप्त नहीं कर सकते थे।
ये प्रयास इन बातों के इर्द-गिर्द केन्द्रित थे :-
  • (i) पूर्वी राज्य के कृषि विकास पर बल
  • (ii) लोगों की आजीविका सुधारने और खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए वर्षा प्रधान और असिंचित कृषि क्षेत्रों का विकास, तथा
  • (iii) उच्च महत्त्व की बागवानी, पुष्प कृषि, पशुधन, डेयरी उत्पादों पर फोकस के साथ कृषि उत्पादों की संविदा कृषि और अन्य नवाचारी प्रयासों के माध्यम से अनुसंधान और विकास (RCD), कृषि उत्पादों के भंडारण, विपणन और प्रसंस्करण में कृषि व्यावसायिक कंपनियों की अधिक सहभागिता।
पूर्वी क्षेत्र में हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी के लाभ न पहुंचने का मुख्य कारण यही था कि छोटे खेतों और जोतों के छोटे आकार के स्वामी किसानों के पास पम्प सेट खरीद कर अपने नलकूल लगाने के लिए धन का नितांत अभाव था। गांवों के विद्युतीकरण में विलंब भी नलकूपों की धीमी प्रगति का एक कारक था। इन कारणों को ध्यान में रखते हुए पूर्वी क्षेत्र में भौमजल विकास सभी क्षेत्रों की अपेक्षा सबसे कम था। परंतु बाद में अपनी उत्पादकता और विभिन्न फसलों की विविधता सुधारने के लिए पूर्वी राज्यों के किसानों को नीतिगत सहायता पर ध्यान दिया गया। इन प्रयासों से बिहार, उड़ीसा और असम में कृषि वृद्धि उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। इसके अलावा वर्षा प्रधान और शुष्क भूमि कृषि क्षेत्रों पर (जिसमें कुल NSA निवल बोआई क्षेत्रफल का लगभग 60 प्रतिशत था, जिसमें कुल कृषि उत्पाद का लगभग 40 प्रतिशत होता था) ध्यान केन्द्रित किया गया। इसमें इन क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए मदा और जल संरक्षण तथा जल संचयन से संबंधित कार्यों में निवेश के रूप में सरकार ने हस्तक्षेप किया। इन क्षेत्रों में कृषि विकास प्राप्त करने में नीतिगत फोकस कृषि उत्पादकता और आय बढ़ाकर लोगों की आजीविका बनाए रखने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, नवीकरण और प्रबंधन के लिए सकल दृष्टिकोण में से एक था। उसी प्रकार कृषि सेक्टर में कार्पोरेट निवेश आकर्षित करने के लिए पहले बहुत से मिशन विधा प्रयासों द्वारा किए गए, जैसे राष्ट्रीय बागवानी मिशन, राष्ट्रीय तिलहन मिशन, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय बांस मिशन, राष्ट्रीय दलहल मिशन, आदि।
निम्नलिखित के इर्द-गिर्द केन्द्रित संविदा, आदि अन्य प्रयास किये गए :-
  • (i) छोटे और सीमांत किसानों को अपने स्वकर्षित जोतों का आकार बढ़ाने के लिए भूमि खरीदने के वास्ते संस्थागत ऋण
  • (ii) भूमि पट्टा बाजार का उदारीकरण
  • (iii) APMC अधिनियम संशोधित कर बिचौलियों की भूमिका कम करते हुए कृषि उत्पादों का सीधा विपणन।
हरित क्रांति harit kranti के बाद की अवधि में किए गए प्रयासों की उपर्युक्त रूपरेखा सुझाती है कि यद्यपि हरित क्रांति अवधि के दौरान कृषि वृद्धि अधिकांशतः आपूर्ति पक्ष कारकों द्वारा प्रेरित थी। हरित क्रांति पश्च अवधि में यह काफी हद तक मांग पक्ष कारकों द्वारा प्रेरित रही। परिणामस्वरूप हरित क्रांति पश्च अवधि के दौरान कृषि विकास उच्च मूल्य बागवानी, जैसे फल, सब्जियाँ, पुष्प, आदि विविधीकरण की दिशा में अधिक था। इसके अलावा, संबद्ध कार्यों जैसे डेयरी, कुक्कट पालन और मत्स्य पालन का विकास की दिशा की ओर रूझान रहा। यद्यपि यह सत्य है कि कृषि में अनुसंधान और विकास, विस्तार, सिंचाई, बिजली, प्रसंस्करण, विपणन और आपूर्ति श्रृंखला के लिए भारी निवेश आवश्यक है जिससे कृषि आय और रोज़गार बढ़ाने के लिए फार्म सेक्टर सशक्त किया जा सके। इसके लिए कार्पोरेट दृष्टिकोण वांछित है, परंतु यह भय भी है कि कृषि व्यापारिक कंपनियाँ विशेषकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सहभागिता जननिक रूप से रूपांतरित बीज प्रौद्योगिकी के लाभ प्राप्त करने में इन कंपनियों के बीच गुटतंत्रीय शक्ति निर्मित हो सकती है, जो आगे चलकर बिचौलियों को हटाने और सार्वजनिक निवेश/संस्थाओं की भूमिका कम करने पर किसानों का शोषण कर सकती है। इस कारण से, कार्पोरेट दृष्टिकोण और सार्वजनिक निवेश केन्द्रित नीतियों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर वाद-विवाद बढ़ रहा है।

हरित क्रांति से जीन क्रांति तक

जैसाकि (गेहूँ और चावल की उत्पादकता में अनुमानित वृद्धि दर से) पहले देखा गया है कि हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी से संबद्ध उत्पादकता में बढोतरी 1990 के दशक के दौरान कम होनी आरंभ हो गई थी। इस संदर्भ में, कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए अपेक्षित संभावना प्रदान करने तथा खाद्य सुरक्षा की समस्या हल करने के लिए जैव प्रौद्योगिकी की संकल्पना की गई है। प्रौद्योगिकी ने 1980 के दशक के प्रारंभ में गति प्राप्त की जब विशाल निगमों ने पराजैविक फसलें विकसित करने के लिए अनुसंधान और विकास के लिए भारी राशि निवेश करना प्रारंभ किया। जननिक रूप से रूपांतरित (GM) बीजों के प्रयोग की भूमिका उत्पादकता में आश्चर्यजनक वृद्धि करने के वचन की पूर्ति माना गया था तथा एक ओर किसानों को कृषि से अपनी आय बढ़ाने के सहायक अन्य संसाधन तो दूसरी ओर अधिक सस्ता और गुणवत्ता की खाद्य सामग्री मुहैया कर उपभोक्ताओं के लिए लाभ कर माना गया। जैव प्रौद्योगिकी केन्द्रित तरीकों के प्रयोग को भी पैमाना निर्पेक्ष समझा गया था क्योंकि यह बीजों पर फोकस करता है. रासायनिक, उर्वरकों और मंहगी फार्म मशीनरी पर नहीं। GM बीजों को अधिक उत्पादनकारी, अधिक कीटनाशी सह और सभी श्रेणियों के फार्मों और सभी कृषि क्षेत्रों के लिए उपयुक्त समझा गया है। परंतु भारतीय कृषि में जीन प्रौद्योगिकी का अंगीकरण अभी वाद-विवाद और चर्चा का विषय है क्योंकि पादपों, जंतुओं और मानव जीवन पर उसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का पूरी तरह से परीक्षण अभी नहीं हुआ है। यद्यपि एक ओर GM बीज प्रौद्योगिकी के पर्यावरणीय, पारिस्थितिकीय और स्वास्थ्य संबंधी परिणामों को उसके आर्थिक लाभों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया गया है तो दूसरी ओर, बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने अनुसंधानकर्ताओं और सक्रियतावादियों का ध्यान आकर्षित किया है। उनमें प्रमुख हैं, नैतिक, सुरक्षा और स्वामित्व मुद्दे। उसे अपनाने का सबसे बड़े खतरों में एक यह है कि आधारभूत मानवीय आवश्यकता (जो भोजन है), पर कछ बहराष्ट्रीय जैव बीजों के प्रजनक कंपनियों का एकाधिकारी नियंत्रण हो जाएगा। इस प्रकार यद्यपि GM बीज प्रौद्योगिकी में भारतीय कृषि में क्रांति लाने की विपुल संभावना है परंतु GM बीज प्रौद्योगिकी मंहगी और अपने स्वरूप में स्वामित्व होने के कारण संदेह है कि प्रौद्योगिकी संसाधन संपन्न किसानों के लिए अधिक उपयुक्त हो सकती है और सीमांत और छोटे किसानों की बहुत बड़ी संख्या, विशेषकर पिछड़े कृषि क्षेत्रों में इसके लाभ प्राप्त करने से छूट जाते हैं। परंतु हमें स्मरण करना चाहिए कि हरित क्रांति harit kranti आधारित प्रौद्योगिकी भी छोटे और सीमांत किसानों की तुलना में केवल धनी किसानों के अनुकूल है। इसलिए हरित क्रांति और जीन क्रांति के बीच आधारभूत अंतर ऐसा कहा जा सकता है हरित क्रांति मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र प्रेरित थी तो 'जीन क्रांति' का आधार निजी क्षेत्र रहेगा। इस पृष्ठभूमि के प्रतिकूल वर्तमान चर्चा ऐसी "द्वितीय हरित क्रांति आरंभ करने पर है जिसकी व्यापक विशेषताएँ राष्ट्रीय कृषि नीति दृष्टि प्रलेख में निर्दिष्ट की गई है।

सारांश

हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी और उससे प्राप्त लाभ भारतीय अर्थव्यवस्था को रूपांतरित करने में सहायक हुए। देश खाद्य अभाव की अवस्था से खाद्य अधिशेष की अवस्था में गया। परंतु GR के लाभ देश बहुत से क्षेत्रों में विशेषकर भारत के पूर्वी राज्यों में नहीं पहुंचे क्योंकि वहां छोटे और सीमांत किसानों की बहत बड़ी संख्या के जोत छोटे-छोटे टुकड़ों में थे जिनकी हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी प्रयोग करने के लिए आवश्यक पूँजी निवेश करने की क्षमता नहीं थी। हरित क्रांति harit kranti के बाद के वर्षों में संकेन्द्रित नीतिगत सहायता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों ने इस संबंध में स्थिति में सुधार किया। हरित क्रांति harit kranti प्रौद्योगिकी पर्यावरण मैत्रीपूर्ण नहीं थी क्योंकि यह रासायनिक उर्वरकों और खरपतवार नाशियों पर बहुत अधिक निर्भर थी जिससे मृदा और जल संसाधन प्रदूषित हुए। इस प्रौद्योगिकी का एक विकल्प, अर्थात् GM प्रौद्योगिकी 1980 के दशक के दौरान उसके अप्रदूषणकारी प्रभावों के कारण लोकप्रिय हुई। परंतु इस प्रौद्योगिकी का विशाल स्तर पर क्रियान्वयन अपने जड़े नहीं जमा सका। फिर भी, इस प्रौद्योगिकी के आर्थिकेत्तर आयामों जो मूल रूप से अपने स्वामित्व स्वरूप के इर्द-गिर्द केन्द्रित रहते हैं को ध्यान में (अर्थात् उसकी धनी MNC/कार्पोरेट हाउस को उसकी सुलभता/लाभ का एकाधिकार बनाने की संभावना) रखना भी आवश्यक है। इसलिए अधिक व्यापक समावेशिता के इस दृष्टिकोण से GR और GM दोनों प्रौद्योगिकियां उन छोटे और सीमांत किसानों के लिए अनुपयुक्त है जो इन प्रौद्योगिकियों से लाभ प्राप्त करने के लिए अपेक्षित साधन नहीं जुटा सकते (अर्थात् पर्याप्त मात्रा में पूँजी नहीं जुटा सकते जो GM और GR दोनों प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक है) इसलिए हाल में, "दूसरी हरित क्रांति" की आवश्यकता पर चर्चा आरंभ हुई है जो अधिक समावेशी स्वरूप से खाद्य सुरक्षा/असुरक्षा की समस्या का समाधान करने के लिए उपयुक्त हो, अर्थात् प्रक्रिया के मुख्य घटकों के रूप में छोटे सीमांत किसानों और वर्षा प्रधान तथा शुष्क क्षेत्रों पर बल सहित कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर आग्रह करती हो।

शब्दावली

हरित क्रांति (GR)
इसका संबंध नई कृषि प्रौद्योगिकी से है। 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1960 के दशक के प्रारंभ में गेहूँ और चावल फसलों के लिए क्रमशः मैक्सिको और फिलिपीन्स में विकसित की गई थी, इसने एशिया और लेटिन अमरीका के बहुत से खाद्य अभाव देशों को खाद्य अभिशेष अर्थव्यवस्था में रूपांतरित किया। परंतु प्रौद्योगिकी को उर्वरक और मशीनें खरीदने के लिए प्रचुर पूँजी की आवश्यकता होती है और इसकी प्रयोज्यता केवल उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त थी जो सिंचाई और कृषि उत्पादकता के अनुसार पहले से ही समृद्ध थे। GR प्रौद्योगिकी की इन विशेषताओं के कारण बहुत से छोटे और सीमांत किसानों तथा गरीब राज्य/क्षेत्र इस प्रक्रिया का भाग होने में असमर्थ रहे। परिणामस्वरूप देश के बहुत से भाग इसके लाभ प्राप्त नहीं कर सके।

अधिक पैदावर वाली फसलों के बीज
ये विशेष बीज हैं जो GR प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग क्षेत्रों में प्रयुक्त किये गए थे। ये देशी बीजों की भांति नहीं थे। वे उर्वरकों की उच्च मात्रा भी सह सकते थे, परंतु केवल इसी कारण से वे कम पर्यावरण मित्र थे, क्योंकि, उन्होंने मृदाओं की उर्वरता कम की। परंतु उनकी शीघ्र उपजों के कारण उसी खेत पर एक वर्ष के दौरान कई फसल उगा सकते थे। इससे कृषि उत्पाद की उत्पादकता और किसानों की आय/लाभ बढ़ सकती थी।

जननिक रूप से रूपांतरित (GM) बीज
यह एक विकल्प है जिसे 1980 के दशक में विकसित किया गया। यह HYV बीज की भांति नहीं है GM बीज रासायनिक खादों पर बहुत अधिक निर्भर नहीं थे परन्तु प्रौद्योगिकी का विशिष्ट स्वामित्व स्वरूप था। कुछ MNC/ कार्पोरेट व्यापारिक घरानों के एकाधिकार। इसी कारण इनकी सुलभता सीमित थी।

एक टिप्पणी भेजें

Post a Comment (0)

और नया पुराने