सूक्ष्म जीव क्या है ? (Micro Organisms)

सूक्ष्म जीव क्या है ? (Micro Organisms)

सूक्ष्म जीव (Micro-organisms) को सूक्ष्मदर्शी (Microscope) से देखा जा सकता है। कुछ प्रमुख सूक्ष्म जीवों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं

विषाणु (Virus) -

इसकी खोज डी. आई. आइवेनोवस्की (D.I. Ivanovsky) ने 1892 ई. में रोगग्रस्त तंबाकू के पौधे में की, और इस विषाणु का नाम टोबैको मोजैक वायरस रखा तथा डब्ल्यू., एम. स्टैनले (W. M. Stanley) ने वायरस को रवेदार रूप (Crystallise form) में प्राप्त किया।
  • विषाणु (वायरस) जीवाणु (Bacteria) से भी छोटे होते हैं।
  • ये दो प्रकार के पदार्थों से बने होते हैं - (1) प्रोटीन (2) न्यूक्लिक अम्ल।
  • प्रोटीन के खोल को कैप्सिड (Capsid) कहते हैं जो कि न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर होता है। कैप्सिड की छोटी-छोटी इकाइयों को कैप्सोमियर (Capsomere) कहते हैं।
  • न्यूक्लिक अम्ल या तो RNA या DNA होता है।
  • परपोषी प्रकृति के अनुसार विषाणु तीन प्रकार के होते हैं
1. पादप वायरस में न्यूक्लिक अम्ल RNA होता है।
2. जंतु वायरस में न्यूक्लिक अम्ल DNA होता है।
3. बैक्टीरियो पेज (Bacteriophage) जीवाणुओं पर आक्रमण करते हैं। इनमें न्यूक्लिक अम्ल DNA होता है।
  • जिस विषाणु में आनुवंशिक पदार्थ RNA होता है, उसे रेट्रोविषाणु कहते हैं तथा जिनमें DNA होता है, उसे एडीनोविषाणु कहते हैं।
  • विरियोन (Virion) - एक संपूर्ण विषाणुवीय कण है जो संक्रमण फैलाने में सक्षम होता है।
  • विषाणु की प्रकृति- वायरस में निर्जीव एवं सजीव दोनों के गुण पाए जाते हैं

निर्जीव के गुण:
  • वायरस स्वयं वृद्धि नहीं कर सकते हैं। वे केवल जीवित परपोषी की कोशिका में ही अपना गुणन करने में सूक्ष्म हैं। जिसे अविकल्पी (Obligate) परजीवी कहते हैं।
  • वायरस को क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।
  • कोशिका के बाहर वायरस में श्वसन एवं अन्य उपापचय क्रियाएँ नहीं होती हैं।

सजीव के गुण :
  • वायरस जनन कर सकते हैं एवं उनमें उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।
  • ये संवेदनशील होते हैं और उनपर ताप, पराबैंगनी किरणों आदि का प्रभाव पड़ता है।
  • विषाणु, पोषी कोशिका को नष्ट कर देते हैं।
  • विरोइड्स (Viroids)- अमेरिकी वैज्ञानिक टी. ओ. डाइनर ने सर्वप्रथम विरोइड्स की खोज की थी। ये गोलाकार एक स्ट्रेंडेड RNA के बने होते हैं जिनमें प्रोटीन का खोल नहीं होता है। ये विषाणु से भी सूक्ष्म होते हैं। इसके कारण सिट्रस एक्जीकारटिस रोग, नारियल के पेड़ का कंडाग रोग आदि होते हैं।
  • प्रियॉन (Prion) - प्रियॉन केवल प्रोटीन के बने होते हैं और इनमें न्यूक्लिक अम्ल नहीं पाया जाता है। इसकी खोज एवं नामकरण स्टेन्ले प्रूसीनर ने की।

इसके कारण निम्नलिखित रोग होते हैं-
  • क्रोयुटसफेल्ट जैकब (Creutzfeldt Jacobs CJD) रोग : यह मनुष्य के तांत्रिक तंत्र का रोग है जिसमें याददाश्त की कमी या पागलपन (dementia) एवं पेशी अनियंत्रण (Loss of muscle control) हो जाता है। और अंततः रोगी की मृत्यु हो जाती है। CJD एक वंशानुगत रोग है लेकिन यह शल्कक्रिया (surgery) द्वारा एक मानव से दूसरे में प्रसारित हो जाता है।
  • मैड-गाय बीमारी (Mad cow disease) or Bovine Spongiform encephal opathy (BSE): यह प्रियॉन विषाण के कारण होती है।
  • स्क्रेपी (Scrapie) रोग : इस विषाणु के कारण बकरियों और भेड़ों की मस्तिष्क कोशिकाओं का अपह्रास होता है।
  • इबोला विषाणु रोग : इसमें सम्पूर्ण शरीर प्रभावित होता है। खतरनाक बुखार, सिरदर्द, वमन तथा यकृत एवं गुर्दा संक्रमण तथा इनकी क्रियाशीलता में कमी, इसके प्रमख लक्षण हैं।
  • स्वाइन इनफ्लुएन्जा रोग : यह H-1 N-1 विषाणु से होनेवाला रोग है, जिसमें शारीरिक माँसपेशियाँ प्रभावित होती हैं। थकान, सिरदर्द, वमन तथा श्वसनीय समस्याएँ इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

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