सूक्ष्म जीव क्या है? (Micro Organisms) | sukshma jeev

सूक्ष्म जीव क्या है?

सूक्ष्म जीव (Micro-organisms) को सूक्ष्मदर्शी (Microscope) से देखा जा सकता है। कुछ प्रमुख सूक्ष्म जीवों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित हैं अधिकांश सूक्ष्मजीव एक या अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं और इनके बारे में हमारे मन में धारणा बनी है कि सूक्ष्मजीव केवल बीमारियाँ ही फैलाते हैं। परन्तु यह बात पूरी तरह सही नहीं है।
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सूक्ष्मजीव हमारे लिए उपयोगी भी हैं जैसे कि ये खाद्य पदार्थ, दवाइयाँ, रंग, रेशें इत्यादि तैयार करने में सहयोगी हैं।

सूक्ष्मजीवों का आवास

सरल शब्दों में कहा जाए तो सूक्ष्मजीव हर जगह पाए जाते है अर्थात् हवा, मिट्टी, जल, भोजन इत्यादि सभी स्थानों पर पाए जाते हैं, परन्तु फिर भी कुछ स्थानों पर ये अधिक संख्या में पाए जाते हैं।
  1. सड़ी गली वस्तुओं पर।
  2. मल, मूत्र, गोबर इत्यादि पर।
  3. नमी युक्त स्थानों पर।
  4. मिट्टी में।
  5. सड़ते जल में।
  6. वायु में।
  7. बीमार प्राणियों एवं पौधों के शरीर में।
उपरोक्त स्थानों के अतिरिक्त हमारे शरीर, वस्त्रों, बर्तन, धूल, उपकरणों इत्यादि पर भी असंख्य सूक्ष्म जीव उपस्थित होते हैं। इतना ही नहीं कुछ जीव गर्म पानी के झरनों चिमनियों पर एवं जमी हुई बर्फ में भी पाए जाते हैं।

क्या आप जानते हैं?
  • कुछ सूक्ष्मजीव 10°C जैसे कम तथा 70°C। जैसे उच्च ताप पर भी नष्ट नहीं होते हैं। ये सूक्ष्म जीव इन परिस्थितियों में अपनी कोशिका के चारों ओर एक कठोर आवरण बना लेते हैं जिसे सिस्ट कहते हैं। अनुकूल | स्थितियाँ आने पर ये पुन: आवरण से बाहर निकल आते हैं।

सूक्ष्मजीवों के प्रकार

प्रकृति में अनेक प्रकार के सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं। इन सभी सूक्ष्मजीवों को निम्नांकित पाँच प्रकारों में बाँटा गया है।
  1. शैवाल
  2. जीवाणु 
  3. कवक
  4. प्रोटोजोआ
  5. विषाणु
उपरोक्त सभी सूक्ष्मजीव का आवास स्थान, लक्षण तथा रचना अलग-अलग है। आइए इन सूक्ष्मजीवों के बारे में विस्तार से जानें।

शैवाल

नील हरित शैवाल - ये एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय शैवालों का समूह है। इन्हें अंग्रेजी में सायनोबैक्टीरिया भी कहा जाता है। सामान्यत: ये शैवाल रुके हुए पानी में उगती हैं और फिसलन बनाती हैं।
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लक्षण
  • इन शैवालों का रंग नीला हरा होता है।
  • इनका पादप शरीर थैलस कहलाता है जो तन्तुवत तथा बेलनाकार होता है।
  • इनके थैलस के चारों ओर म्यूसीलेज का चिपचिपा आवरण होता है।
  • इनके थैलस सामान्यत: अशाखित होते हैं तथा इनकी कोशिकाओं में केन्द्रक स्पष्ट नहीं होता है।

आर्थिक महत्व
लाभदायक प्रभाव-
  • सभी नीले-हरे शैवाल मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है।
  • जैविक खाद के निर्माण में।
हानिकारक प्रभाव-
  • जल को प्रदूषित करना।
  • इन शैवालों की अधिकता से तालाब के अन्य पौधे व जीव मरने लगते हैं।

स्वर्ण शैवाल (डायटम्स) - ये भी एक प्रकार के शैवाल हैं, जो समुद्री एवं स्वच्छ जल में पाए जाते हैं। सुनहरे भूरे रंग के ये शैवाल काफी चमकदार होते हैं इसीलिए इन्हें स्वर्ण शैवाल भी कहा जाता है। इन शैवालों की कोशिका के दो अर्धांश होते हैं जो एक छोटी डिबिया के समान रचना बनाते हैं। इसी कारण इन्हें डायटम्स कहते हैं।
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इन शैवालों की कोशिका मित्ति की बाह्य पर्त पर सिलिका जमा होकर विशिष्ट क्रम में व्यवस्थित हो जाता है जिससे ये सुन्दर दिखाई देते हैं। डायटम्स के कुछ उदाहरण नेवीकुला, पेनुलेरिया, सायक्लोटिला इत्यादि हैं।

आर्थिक महत्व
  • समुद्री जीवों का प्रमुख भोजन डायटम्स है।
  • टूथपेस्ट बनाने में।
  • तापरोधी ईटें बनाने में।
  • वार्निश तथा पेंट बनाने में।

जीवाणु

ये अत्यंत छोटे सूक्ष्म जीव हैं जिन्हें बैक्टीरिया भी कहा जाता है। ये सामान्यतः एक कोशिकीय होते हैं जो हवा, मिट्टी, जल सभी जगह पाए जाते हैं, परन्तु नमीयुक्त स्थानों पर अधिक पाए जाते हैं। ये गोल या छड़ की आकृति वाले सूक्ष्मजीव हैं। ये अत्यंत तीव्रता से विभाजन करके अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं। सामान्यतः इनमें प्रजनन द्विखण्डन विधि द्वारा होता है।
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संरचना
जीवाणुओं की कोशिका के चारों ओर कोशिका भित्ति पाई जाती है। इस कोशिका भित्ति के अन्दर की ओर जीव द्रव्य होता है जिसमें केवल कुछ कोशिकांग, संचित भोजन एवं आनुवांशिक पदार्थ होता है। जीवाणु की कोशिका में सुस्पष्ट केन्द्रक तथा झिल्ली वाले कोशिकांग नहीं होते हैं। जीवाणुओं की कोशिका भित्ति अपने चारों ओर एक कठोर आवरण बनाती है, जो कोशिका की रक्षा करता है। कुछ जीवाणुओं की कोशिका के बाहर गति के लिए धागे जैसी एक या अनेक रचनाएँ पाई जाती हैं जिन्हें फ्लैजिला कहते हैं।
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आर्थिक महत्व
जीवाणुओं को आमतौर पर हानिकारक समझा जाता है परन्तु ये हमारे लिए अनेक लाभदायक कार्य भी करते हैं। इसीलिए इन्हें हमारे शत्रु एवं मित्र दोनों कहा जाता है।

लाभदायक क्रियाएँ
  • दूध से दही का निर्माण।
  • प्रतिजैविक दवाइयों का निर्माण।
  • किण्वन द्वारा खाद्य पदार्थों का निर्माण।
  • खाद एवं उर्वरक निर्माण में।
  • उद्योगों में एल्कोहल, सिरका एवं अन्य उत्पाद बनाने में।

हानिकारक क्रियाएँ
  • मनुष्यों में निमोनिया, टी.बी., हैजा जैसे रोग होते हैं।
  • पौधों में भी रोग फैलाते हैं जैसे नींबू का केन्कर, आलू का गलन रोग आदि।
  • अनेक जीवाणु भोजन को खराब करके विषैला बना देते हैं।
  • उपयोगी सामग्री एवं फर्नीचर पर उगकर उन्हें खराब कर देते हैं।

कवक

कवकों को सामान्य बोलचाल की भाषा में फफूंद कहा जाता है। हम अक्सर अपने घरों में भोजन, अचार, चमड़े की वस्तुओं पर इन्हें उगते हुए देखते हैं। बरसात के दिनों में कूड़े-करकट पर उगने वाली छातेनुमा रचना भी एक प्रकार का कवक है। कवक विशिष्ट प्रकार के सूक्ष्मजीव हैं। पहले इन्हें पौधे माना जाता था, परन्तु अब इन्हें पौधों एवं जन्तुओं से अलग समूह में वर्गीकृत किया गया है।
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संरचना
कवकों का शरीर भी थैलस ही होता है। कवकों में अनेक लम्बे-लम्बे धागे जैसी बेलनाकार रचनाएँ होती हैं। कवकों के तन्तु एक कोशिकीय या बहुकोशिकीय होते हैं। इनके कवक तन्तु आपस में उलझकर एक जाल जैसी रचना बनाते हैं। अधिकांश कवकों में सुविकसित केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया, राइबोसोम जैसे सभी कोशिकांग पाए जाते हैं।

कवकों का आर्थिक महत्व
अधिकांश कवक प्राकृतिक रूप से अत्यंत उपयोगी हैं। मिट्टी में उपस्थित कवक पौधों एवं जन्तुओं के मृत शरीर एवं बचे भागों को सड़ा-गलाकर खनिज में बदल देते हैं।

लाभदायक क्रियाएँ
  • जलेबी, खमण, डोसा आदि खाद्य पदार्थ बनाने में खमीर नामक कवक का उपयोग होता है।
  • पेनीसिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसीन जैसी औषधियाँ कवकों से निर्मित होती हैं।
  • मशरूम ऐसे कवक है जिनके सब्जी के रूप में खाते हैं।
  • अनेक कवकों से रंग निर्माण करते हैं।

हानिकारक क्रियाएँ
अनेक कवक पौधों, जन्तुओं एवं मनुष्यों में रोग फैलाने का कार्य करते हैं। आलू का वार्ट रोग, गेहूँ का गेरुआ रोग तथा मनुष्य के त्वचीय रोग (दाद, खुजली) भी कवकों द्वारा होते हैं।

प्रोटोजोआ

प्रोटोजोआ सूक्ष्मजीवों का एक समूह है, सामान्यत: इस समूह के सूक्ष्मजीव एक कोशिकीय होते हैं जो जल, मिट्टी, पौधों एवं जानवरों के शरीर में उपस्थित रहते हैं। अमीबा, पैरामीशियम एवं युग्लीना प्रोटोजोआ समुदाय के जीव हैं।

संरचना
इन जीवों की कोशिका पूरी तरह जन्तु कोशिका के समान होती है। इस समूह के जीव स्वतंत्र जीवी या अन्य जीवों के शरीर में परजीवी के रूप में मिलते हैं। इन जीवों में प्रचलन के लिए कुछ विशेष रचनाएँ होती हैं। जैसे युग्लीना में फ्लैजिला, पैरामीशियम में सिलिया तथा अमीबा में कूटपाद होते हैं।
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आर्थिक महत्व
सामान्यत: प्रोटोजोआ समुदाय के जीव मनुष्यों में रोग फैलाते हैं। इनमें से कुछ रोग एवं रोगवाहक का विवरण इस प्रकार है।

रोग का नाम

रोगाणु का नाम

रोगवाहक

मलेरिया

प्लाज्मोडियम

मादा एनॉफिलीज

पेचिस

एण्ट अमीबा

दूषित भोज्य पदार्थ

निद्रा रोग

ट्रिपैनोसोमा

सीसी मक्खी


विषाणु (वायरस)

वायरस अत्यंत सूक्ष्म होते हैं तथा ये जीवित एवं अजीवित दोनों के लक्षण प्रदर्शित करते हैं। इन्हें जीवित एवं अजीवितों के बीच की कड़ी कहा जाता है। वायरस किसी कोशिका के भीतर ही जीवित रह सकते हैं। कोशिका के बाहर ये निर्जीव के समान व्यवहार दर्शाते हैं।
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वायरस की संरचना देखने पर ज्ञात होता है कि इनके बाहर की ओर प्रोटीन का आवरण होता है तथा केन्द्रीय भाग में आनुवांशिक पदार्थ (DNA या RNA) होता है। पौधों एवं जन्तुओं दोनों के वायरस अलग-अलग होते हैं। सर्दी, पोलियो तथा रेबीज मानवीय बीमारियाँ हैं परन्तु तम्बाकू का मौजेक एवं गोभी का बौनापन वायरस जनित पौधों की बीमारियाँ हैं।
इसकी खोज डी. आई. आइवेनोवस्की (D.I. Ivanovsky) ने 1892 ई. में रोगग्रस्त तंबाकू के पौधे में की, और इस विषाणु का नाम टोबैको मोजैक वायरस रखा तथा डब्ल्यू., एम. स्टैनले (W. M. Stanley) ने वायरस को रवेदार रूप (Crystallise form) में प्राप्त किया।
  • विषाणु (वायरस) जीवाणु (Bacteria) से भी छोटे होते हैं।
  • ये दो प्रकार के पदार्थों से बने होते हैं - (1) प्रोटीन (2) न्यूक्लिक अम्ल।
  • प्रोटीन के खोल को कैप्सिड (Capsid) कहते हैं जो कि न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर होता है। कैप्सिड की छोटी-छोटी इकाइयों को कैप्सोमियर (Capsomere) कहते हैं।
  • न्यूक्लिक अम्ल या तो RNA या DNA होता है।
परपोषी प्रकृति के अनुसार विषाणु तीन प्रकार के होते हैं
  1. पादप वायरस में न्यूक्लिक अम्ल RNA होता है।
  2. जंतु वायरस में न्यूक्लिक अम्ल DNA होता है।
  3. बैक्टीरियो पेज (Bacteriophage) जीवाणुओं पर आक्रमण करते हैं। इनमें न्यूक्लिक अम्ल DNA होता है।
  • जिस विषाणु में आनुवंशिक पदार्थ RNA होता है, उसे रेट्रोविषाणु कहते हैं तथा जिनमें DNA होता है, उसे एडीनोविषाणु कहते हैं।
  • विरियोन (Virion) - एक संपूर्ण विषाणुवीय कण है जो संक्रमण फैलाने में सक्षम होता है।
  • विषाणु की प्रकृति - विषाणु में निर्जीव एवं सजीव दोनों के गुण पाए जाते हैं

निर्जीव के गुण
  • विषाणु स्वयं वृद्धि नहीं कर सकते हैं। वे केवल जीवित परपोषी की कोशिका में ही अपना गुणन करने में सूक्ष्म हैं। जिसे अविकल्पी (Obligate) परजीवी कहते हैं।
  • विषाणु को क्रिस्टल के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।
  • कोशिका के बाहर वायरस में श्वसन एवं अन्य उपापचय क्रियाएँ नहीं होती हैं।

सजीव के गुण
  • विषाणु जनन कर सकते हैं एवं उनमें उत्परिवर्तन की क्षमता होती है।
  • ये संवेदनशील होते हैं और उनपर ताप, पराबैंगनी किरणों आदि का प्रभाव पड़ता है।
  • विषाणु, पोषी कोशिका को नष्ट कर देते हैं।
  • विरोइड्स (Viroids)- अमेरिकी वैज्ञानिक टी. ओ. डाइनर ने सर्वप्रथम विरोइड्स की खोज की थी। ये गोलाकार एक स्ट्रेंडेड RNA के बने होते हैं जिनमें प्रोटीन का खोल नहीं होता है। ये विषाणु से भी सूक्ष्म होते हैं। इसके कारण सिट्रस एक्जीकारटिस रोग, नारियल के पेड़ का कंडाग रोग आदि होते हैं।
  • प्रियॉन (Prion) - प्रियॉन केवल प्रोटीन के बने होते हैं और इनमें न्यूक्लिक अम्ल नहीं पाया जाता है। इसकी खोज एवं नामकरण स्टेन्ले प्रूसीनर ने की।

इसके कारण निम्नलिखित रोग होते हैं
  • क्रोयुटसफेल्ट जैकब (Creutzfeldt Jacobs CJD) रोग : यह मनुष्य के तांत्रिक तंत्र का रोग है जिसमें याददाश्त की कमी या पागलपन (dementia) एवं पेशी अनियंत्रण (Loss of muscle control) हो जाता है। और अंततः रोगी की मृत्यु हो जाती है। CJD एक वंशानुगत रोग है लेकिन यह शल्कक्रिया (surgery) द्वारा एक मानव से दूसरे में प्रसारित हो जाता है।
  • मैड-गाय बीमारी (Mad cow disease) or Bovine Spongiform encephal opathy (BSE) : यह प्रियॉन विषाण के कारण होती है।
  • स्क्रेपी (Scrapie) रोग : इस विषाणु के कारण बकरियों और भेड़ों की मस्तिष्क कोशिकाओं का अपह्रास होता है।
  • इबोला विषाणु रोग : इसमें सम्पूर्ण शरीर प्रभावित होता है। खतरनाक बुखार, सिरदर्द, वमन तथा यकृत एवं गुर्दा संक्रमण तथा इनकी क्रियाशीलता में कमी, इसके प्रमख लक्षण हैं।
  • स्वाइन इनफ्लुएन्जा रोग : यह H-1 N-1 विषाणु से होनेवाला रोग है, जिसमें शारीरिक माँसपेशियाँ प्रभावित होती हैं। थकान, सिरदर्द, वमन तथा श्वसनीय समस्याएँ इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

क्या आप जानते हैं?
  • गंगा नदी के जल में बैक्टीरियोफेजेज नामक वायरस होता है। यह वायरस पानी सड़ाने वाले सूक्ष्मजीवों का भक्षण कर लेता है। इसीलिए गंगा नदी का जल अनेक वर्षों तक भी सड़ता नहीं है।

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