रोग एवं स्वास्थ्य 


हमारे जीवन में अनेक बार ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जिसके कारण ये अंगतंत्र अपनी पूरी दक्षता के साथ कार्य कर पाने में असमर्थ होते हैं, जिससे हमारे शरीर को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी बुरी स्थितियाँ किसी भी कारण से हो सकती है, जैसे- हमारे शरीर में किसी बाह्य जीव के आक्रमण से, हमारे दैनिक जीवन की अनियमितताओं से, हमारे मानसिक, सामाजिक तथा शारीरिक संतुलन में अनियमितताओं से आदि। हमारे शरीर की क्रिया-विधियों को बाधित करने वाले कारकों को ही सामान्य शब्दों में रोग (Disease) की संज्ञा दी जाती है। अपनी प्रवृत्ति, रोग फैलाने के तरीके, प्रभावित अंग तथा प्रभाव के समय के आधार पर इन रोगों को अनेक प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है,


स्वास्थ्य (Health)-

रोग, उनका प्रभाव, उनके कारण और उनके उपचार को समझने से पूर्व हमें समझना होगा कि स्वास्थ्य क्या होता है। हम किन व्यक्तियों को स्वस्थ कह सकते हैं? क्या कोई व्यक्ति एक समय में पूर्णतः स्वस्थ होता है? स्वास्थ्य के अंतर्गत क्या मात्र बुखार, जुकाम, डायरिया जैसी सामान्य और कैंसर तथा एड्स जैसी विशिष्ट बीमारियों से दूर रहना आता है, या 'स्वास्थ्य' शब्द अपने अंदर और भी कुछ समाहित किये हुए है?

1946 में स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) ने इसके अंदर तीन प्रकार के स्वास्थ्य की बात की-
  1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical health)
  2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental health)
  3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social health)
अर्थात् यदि कोई व्यक्ति किसी समय शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ है तो उस व्यक्ति को पूर्णतः स्वस्थ कहा जाएगा।
अब यह प्रश्न उठता है कि कौन से लक्षण स्वास्थ्य के और कौन सा व्यवहार स्वस्थ व्यवहार कहलायेगा? इसके लिए स्वास्थ्य एवं रोगों के लक्षणों को दर्शाती हुए अनेक पुस्तकें WHO द्वारा प्रकाशित की गई हैं। जिनमें से प्रमुख हैं
  1. इन्टरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ फन्कशनींग, डिसेबिलिटी एण्ड हेल्थ (International Classification of Functioning, Disability and Health- ICF),
  2. इण्टरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ डिजिजेस (International classification of Diseases -ICD),
स्वास्थ्य की परिभाषा में सामाजिक स्वास्थ्य को शामिल करके WHO ने स्वास्थ्य के क्षेत्र को अत्यधिक विस्तृत कर दिया है। एक व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए मात्र उसकी अपनी प्रतिरक्षी क्षमता, या व्यक्तिगत जिम्मेदारी ही आवश्यक नहीं बल्कि उसका सामाजिक, आर्थिक ढाँचा, परिवार, वातावरण सबकुछ महत्वपूर्ण हो गया है।

वर्तमान धारणा के अनुसार किसी व्यक्ति के अच्छे या बुरे स्वास्थ्य के लिए इनका महत्व है-
  1. व्यक्तिगत स्वास्थ्य व्यवहार और प्रतिरोधी क्षमता
  2. जन्म के पूर्व से लेकर बड़े होने तक पर परवरिश
  3. आनुवांशिकी
  4. रोगकारकों का प्रकोप
  5. लिंग
  6. आमदनी और समाज में व्यक्ति विशेष का स्थान
  7. शिक्षा का स्तर
  8. पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण आदि।
ये तीनों तरह के स्वास्थ्य एक-दूसरे से अंर्तसंबंधित हैं। लंबे समय से कैंसर (Physical disease) से पीड़ित व्यक्ति अवसाद (Depression) (mental disease) से पीड़ित हो सकता है, और उसका अवसाद समाज एवं दोस्तों के बीच उसके उदासीन व्यवहार, उसकी क्षीण जीजीविषा, जीवन के प्रति उसके नकारात्मकता रवैये (Social disease) को जन्म दे सकता है।
अच्छे स्वास्थ्य को निर्धारित करने वाला एक अहम् कारक है- अच्छा भोजन। यह मान्यता है कि अच्छा भोजन मनुष्य को अनेक रोगों से मुक्त रख सकता है। संतुलित आहार मनुष्य की सभी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिया जाने वाला आहार है जो उसे अनेक कुपोषण जनित रोगों से मुक्ति दिलाता है साथ ही साथ दूसरे रोगों से लड़ने में शरीर की सहायता करता है।

संतुलित भोजन (Balanced food)-

  • मनुष्य के भोजन की आवश्यकता : ऊपर हमने मनुष्य के पाचन तंत्र के बारे में पढ़ा और यह जाना कि भोजन का कौन-कौन सा भाग कहाँ-कहाँ पचता है, और इस पाचन क्रिया में किस अंग के किस एन्जाइम की भूमिका होती है। अब हमें यह पढ़ना है कि हमारे पोषण के आवश्यक अंग कौन-कौन से होते हैं? क्या हमारे लिए मात्र दिन में दो वक्त पेट भर खाना मिल जाना ही पर्याप्त है या हमें इसके अतिरिक्त भी हमारे भोजन में कुछ और बातों पर ध्यान देना होता है। पोषण के ये विभिन्न अवयव हमारे शरीर में क्या भूमिका निभाते हैं? ये अवयव क्या सभी प्रकार की भोजन सामग्री में समान मात्रा में उपस्थित रहते हैं? हमें इनकी नियत मात्रा की आवश्यकता होती है या हम जितना अधिक से अधिक संभव हो इनका उपयोग करने में सक्षम होते हैं? और सबसे प्रमुख इनकी कमी या अधिकता हमारे शरीर पर, हमारे स्वास्थ्य पर और हमारे विकास की गति पर किस प्रकार प्रभाव डालती है?
इन प्रश्नों के उत्तर हमको मिल जायेंगे यदि हम हमारे शरीर की क्रिया-विधि को समझें। हमारे शरीर की आवश्यकताओं को जानें- आप अक्सर अपनी लंबाई, चौड़ाई, हड्डियों की मजबूजी, शरीर में कार्य करने की ताकत, चेहरे पर रंगत, आँखों की रोशनी, शरीर में मॉस-पेशियों का सही वितरण आदि अनेक बातों के बारे में सोचते होंगे? आपको यह भी मालूम होगा कि यह सभी चीजें आपके आहार से बहुत तक प्रभावित होती हैं जैसे यदि आप आवश्यकता से अधिक आलू और चावल खायेंगे तो आप मोटे हो जायेंगे आप आवश्यकता से कम खायेंगे तो आपको अपने अंदर ऊर्जा का ह्रास अनुभव होगा।
  • जिस आहार से शरीर की समुचित वृद्धि, रोगों से रक्षा तथा आवश्यक ऊष्मा और ऊर्जा के लिए सभी पोषक तत्वों अर्थात् कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज-लवण, जल, विटामिन अपेक्षित मात्रा में पूरी हो जाय, उसे संतुलित आहार कहा जाता है। हर एक पोषक तत्व में कैलोरी की मात्रा अलग-अलग रहती है। एक ग्राम स्टार्च में 4.00, प्रोटीन में 4.1 और वसा में 9.0 कैलोरी रहती है और एक युवा व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन 3500 कैलोरी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार प्रतिदिन आवश्यक कैलोरी की पूर्ति के लिए 500 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 100 ग्राम प्रोटीन तथा 100 ग्राम वसा की आवश्यकता होती है।
खनिज लवण, विटामिन और जल तथा कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा की उक्त मात्रा पूरी करने के लिए, भोजन में आवश्यक पदार्थों की अलग-अलग मात्रा सुनिश्चत की गई है। अत: कैलोरी की दैनिक आवश्यकता को आधार बनाकर, खाद्य पदार्थों की जो समुचित मात्रा निर्धारित की गई है, उसे संतुलित आहार कहा जाता है।

मानव आहार (Human Diet)

हमारे शरीर को एक जटिल मशीन की संज्ञा दी जाती है। जिस प्रकार किसी भी मशीन को चलाने के लिए ईंधन की आवश्यकता होती है वैसे ही भोजन हमारे शरीर की आवश्यकता है। भोजन से हमें पोषक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज-लवण, विटामिन, जल आदि प्राप्त होता है जो हमारे जीवित रहने, कार्य एवं विकास करने के लिए आवश्यक हैं। ये सभी पदार्थ हमारे शरीर का ऊर्जा, ऊतकों के निर्माण एवं कोशिकाओं की मरम्मत के स्त्रोत होते हैं।
हमारे भोजन के प्रमुख पोषक तत्व हैं- कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, विटामिन, खनिज लवण, जल।

कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate)-

यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का कार्बनिक यौगिक है। इसमें ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का अनुपात जल में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के अनुपात के समान रहता है। अतः इसे जल में घुले कार्बन के रूप में समझा जा सकता है। कार्बोहाइड्रेट का प्रयोग तीन रूपों में किया जाता है- स्टार्च (Starch) शर्करा (Sugar) और सेलुलोज (Cellulose)
श्वेतसार (Starch) - चावल, गेहूँ, आलू , मक्का, जौ, केला, और साबूदाना आदि में पाया जाता है।।
शर्करा (Sugar) - मधु, अंगूर, गन्ना तथा अन्य मीठे फलों में पाई जाती है।
सेलुलोज (Cellulose)- यह फलों और तरकारियों में पाया जाता है।
  • कार्बोहाइड्रेट metabolism के दौरान स्टार्च और शर्करा ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं, जो ऑक्सीजन के संयोग से जलकर शरीर को गर्मी और शक्ति प्रदान करते हैं। मनुष्य को प्रतिदिन 450-500 ग्राम कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है।

वसा (Fat)-

कार्बोहाइड्रेट की अपेक्षा वसा से अधिक मात्रा में ऊर्जा मिलती है। वसा ऊतकों के निर्माण में अपना योगदान देती है। कार्बोहाइड्रेट की ही तरह यह भी कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन कार्बनिक यौगिक है, परन्तु इसमें तीनों का अनुपात कार्बोहाइड्रेट की तुलना में अलग रहता है। यह भी शरीर को ऊष्मा एवं ऊर्जा प्रदान करता है। वसा शरीर को चिकना एवं हिष्ट-पुष्ट बनाता है। एक युवा व्यक्ति को प्रतिदिन 100 ग्राम वसा की आवश्यकता होती है। मनुष्यों के लिए वसा के दो स्त्रोत होते हैं- प्राणि और वनस्पति।
प्राणिज वसा- दूध, मक्खन, घी, चर्बी आदि।
वानस्पतिक वसा- सरसों, तिल, बादाम, मूंगफली नारियल आदि।

प्रोटीन(Protein)-

यह एक जटिल कार्बनिक यौगिक है जिसमें कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर और फास्फोरस आदि पाये जाते हैं। इसे नाइट्रोजनीय पदार्थ भी कहते हैं क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य पोषक कार्बनिक पदार्थों में नाइट्रोजन नहीं पाया जाता। प्रोटीन ऊतकों का परिवर्धन, नई कोशिकाओं का निर्माण तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत करता है। प्रोटीन प्राप्ति के दो स्त्रोत हैं- वनस्पति और जन्तु। वनस्पति से प्राप्त होने वाले प्रोटीन के मुख्य स्त्रोत फलियाँ होती हैं- जैसे सोयाबीन, सेम, मटर, चने आदि इनके अलावा हमें टमाटर, बादाम, मूंगफली अखरोट आदि से भी प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलता है। वानस्पतिक प्रोटीन से शरीर में आवश्यक अमीनो अम्लों की आवश्यकता पूरी होती है।

खनिज-लवण (Mineral Salt)-

खनिज लवण ऊतकों का निर्माण करते हैं एवं शरीर की सभी क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। उदाहरणस्वरूप- अस्थियों एवं दांतों की संरचना का एक मुख्य भाग फास्फोरस एवं कैल्सियम का होता है। हिमोग्लोबिन में लोहा रहता है, जो ऑक्सीजन के वहन में सक्रिय भूमिका निभाता है। अमाशाय रस में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मुख्य भाग क्लोरीन का होता है। थॉयरोक्सीन हार्मोन के स्त्रावण के लिए ऑयोडीन की अत्यंत आवश्यकता होती है। अग्नाशयी हार्मोन में सल्फर एवं जिंक होते हैं। रक्त के बनने के लिए कोबाल्ट आवश्यक है एवं ट्रिप्सिन में क्रोमियम होता है। रक्त-प्लाज्मा, ऊतक द्रव एवं लसीका में विभिन्न तत्वों के आयन पाये जाते हैं।

ऊतकों में उपस्थित आयनों की एक निश्चित मात्रा एवं अनुपात होती है जिससे ऊतकों में परासरण दाब (Osmotic pressure) संतुलित रहता है। और शरीर में अम्ल क्षार की मात्रा संतुलित रहती है। मानव शरीर में खनिज तत्वों की कुल मात्रा शरीर के वजन का लगभग 4.5 प्रतिशत होती है। खनिज लवण हमारे लिए कितने आवश्यक है यह इसी तथ्य से पता लगाया जा सकता है कि इनकी कमी से हमारे शरीर में कई तरह के रोग हो जाते हैं। उदाहरण स्वरूप- आयोडीन की कमी के कारण थॉयराइड ग्रंथि फूल जाती है जिसे घेघा (Goiter) कहा जाता है, कैल्सियम की कमी से हड्डियाँ कमजोर हो जाती है, आयरन की कमी से रक्त की मात्रा कम हो जाती है और कई बार एनीमिया की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी तरह खनिज लवणों की शरीर में आवश्यकता से अधिक अधिकता भी रोग उत्पन्न करती है जैसे रक्त में यूरिक अम्ल की मात्रा बढ़ जाने पर , अम्ल का लवण जोड़ों (Joints) कण्डराओं (Tendons) और उपास्थियों में जमा हो जाता है, जिसके कारण गठिया (Gout) हो जाता है।

जल (Water)-

शरीर एवं हमारे दैनिक जीवन में जल के महत्व से सभी परिचित हैं। जल को भी हमारे भोजन का अभिन्न अंग माना जाता है, क्योंकि भोजन के अंतर्ग्रहण से लेकर अवशोषण से होते हुए ऊतकों में इसके उपापचय तक सक्रिय भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त जल शरीर के उत्सर्जी तंत्र, रक्त परिसंचरण तंत्र आदि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जल के लिए कहा जाता है कि "जल ही जीवन है" यह उक्ति सत्य ही है क्योंकि एक युवा शरीर का 70 प्रतिशत भाग जल ही होता है और शरीर से अत्यधिक जल का निष्कासन हो जाने पर मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। युवा मानव शरीर को औसतन एक दिन में 2 से 2.5 लीटर जल की आवश्यकता होती है।

विटामिन (Vitamin)

विटामिन कार्बनिक यौगिक होते हैं। जो शरीर की सामान्य वृद्धि एवं रोगों की इसकी रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं। इसका अभाव शरीर में अनेक रोगों को जन्म देता है। विटामिन हमारे शरीर के लिए ऊर्जा का स्त्रोत न होकर भी हमारे शरीर के लिए आवश्यक है क्योंकि यह शरीर को रोगों से बचाता है एवं शरीर में होने वाले उपापचय क्रियाओं में उत्तेजक (Catalyst) की भूमिका निभाता है। यह ऊतकों में एन्जाईम का निर्माण करता है जो कोशिकाओं और ऊतकों में पोषक तत्वों को परिवर्तित करने में मदद करता है। रासायनिक बनावट और किए गए शारीरिक कार्यों के अनुसार विटामिन को प्रमुखतः 'ए' 'बी' 'सी' 'डी' 'ई' और 'के' में विभाजित किया जाता है। विटामिन 'बी' 'सी' जल में तथा 'ए' 'डी' और 'के' केवल वसा में घुलनशील हैं।


विटामिन 'ए' (रेटिनॉल) (Vitamin 'A' or Retinol)-

यह केवल वसा में घुलनशील है और शरीर की वृद्धि में सहायक है। शरीर के उपकला ऊतकों को स्वस्थ बनाने में इसकी अहम भूमिका होती है, इसकी कमी से श्वासनली तथा पाचक नाल की उपकलाएँ बीमार हो जाती हैं। रतौंधी, आँखों में शुष्की (Xerophthalmia) कार्निया में श्वेत फुल्ली पड़ना और दृष्टि का समाप्त हो जाना, आदि इसी की कमी के कारण होते हैं।
  • विटामिन 'ए' के स्त्रोत- मक्खन, अंडे, जरदी, दूध, तथा मछली का तेल। हमारे शरीर में भी विटामिन 'ए' का निर्माण होता है। शरीर में इस विटामिन के निर्माण के लिए कैरोटिन की आवश्यकता होती है ये कैरोटीन शरीर को पादपों से प्राप्त होता है जैसे- गाजर, पालक, टमाटर आदि। भोजन में प्रतिदिन 1 से 2 मिग्रा. विटामिन 'ए' या कैरोटिन की आवश्यकता होती है।

विटामिन 'बी-1' (थायमीन) (Vitamin 'B-1' or Thymene)-

यह शरीर में मुख्यत: carbohydrate metabolism में भाग लेता है। इसकी कमी के कारण सामान्यतः बेरी-बेरी रोग हो जाता है। मनुष्य के शरीर में इसना उत्पादन नहीं हो सकता तथा इसे शरीर में संचित नहीं किया जा सकता। भोजन में प्रतिदिन 2 मिग्रा. विटामिन बी-1 की आवश्यकता होती है।
  • स्त्रोत- मटर, शुष्क खमीर, अंडे की जरदी तथा कुछ अनाजों की भूसी।

विटामिन 'बी-2' (राइबोफ्लेविन) (Vitamin 'B-2' or Riboflavin)-

यह कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य पदार्थों के उपापचय में भाग लेता है और श्वसन, रक्तोत्पत्ति तथा तंत्रिकातंत्र के कार्यों को प्रभावित करता है। Riboflavin की कमी के कारण चर्म-रोग होता है बाल गिरने लगते हैं तंत्रिका तंत्र में गडबडी उत्पन्न हो जाती है तथा नेत्रगोलक में परिवर्तन आ जाात है। भोजन में प्रतिदिन 2 मिग्रा. विटामिन 'बी-2 की आवश्कता होती है।
  • स्त्रोत - खमीर, कलेजी आदि।

विटामिन 'बी-6 (पाइरीडॉक्सीन) (Vitamin 'B-6' or Pyridoxine)-

इसका मुख्य कार्य प्रोटीन, वसा एवं सल्फर के उपापचय में भाग लेना है। इसकी कमी के कारण तंत्रिका तंत्र एवं त्वचा में विकार उत्पन्न होता है।
  • स्त्रोत- कलेजा, मॉस, मछली, खमीर ,मटर आदि।

विटामिन 'बी-7' (निकोटिनिक अम्ल) (Vitamin 'B-7' or Nicotinic Acid)-

यह ऊतकों में चलने वाले carbohydrate metabolism एवं अन्य उपापचय क्रियाओं में भाग लेता है। यह पाचन ग्रंथियों एवं रक्त उत्पन्न करने वाले अवयव के कार्यों को प्रभावित करता है। इस विटामिन की कमी के कारण पेलाग्रा रोग हो जाता है।
  • स्त्रोत- चावल, गेंहूँ के चोकर, दूध, पत्तागोभी, टमाटर, खमीर आदि।


विटामिन 'बी-12 (साईनोकोबाल्मिन) (Vitamin 'B-12' (Cynocobalamine)-

यह अत्यंत महत्वपूर्ण विटामिन है और रक्त की उत्पत्ति में सहायक है। यह लाल रक्त कणों की परिपक्वता के लिए आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण करता है अतः इसकी कमी के कारण रक्त की उत्पत्ति एवं परिपक्वता में बाधा उत्पन्न होती है। यह कमी शरीर में केवल विटामिन बी-12 की कमी के कारण ही नहीं बल्कि आमाशय और छोटी आंत में विकार उत्पन्न होने के कारण भी हो सकता है क्योंकि शरीर के अवयव भोजन से इस विटामिन के अवशोषण नहीं कर पाते हैं।


विटामिन 'सी' (स्कॉर्विक अम्ल) (Vitamin 'C' or Scorbic Acid)-


यह जल में घुलनशील तथा स्कर्वी निरोधी विटामिन है। इसकी कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है। स्कर्वी रोग के अंतर्गत मसूड़े से खून निकलना, दाँतों का कमजोर होकर गिरना, रक्तवाहिकाओं का कमजोर होना, मांसपेशियों के भीतर रक्त-स्त्राव होना आदि सामान्य लक्षण हैं। भोजन में प्रतिदिन लगभग 50-60 मिग्रा. विटामिन 'सी' की आवश्यकता होती है।
  • स्त्रोत- टमाटर, पत्तागोभी, प्याज, नींबू, संतरे, तथा हरी-सब्जियों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।

विटामिन 'डी' (कैल्सिफेरोल) (Vitamin 'D' or Calciferrol)-

यह वसा में घुलनशील होता है। इसकी कमी के कारण रिकेट्स रोग हो जाता है इसलिए इसे रिकेट्स निरोधी विटामिन कहते हैं। रिकेट्स में अस्थियाँ कमजोर एवं टेढ़ी हो जाती हैं, बच्चों के दाँत देर से निकलते हैं, पसलियाँ मोटी तथा सिर बड़ा हो जाता है। विटामिन डी के कई प्रकारों में विटामिन 'डी-3' सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है।
कैल्सियम एवं फास्फोरस का उपापचय ठीक से नहीं होने पर अस्थियों में कैल्सियम का संचय ठीक से नहीं हो पाता। विटामिन 'डी' उन्हीं सब खाद्य पदार्थों में पर्याप्त मात्रा में मिलता है जिनमें विटामिन ए मिलता है
  • स्त्रोत- मछली का तेल, मक्खन, कलेजी, अंडे की जरदी, दूध ।यह धूप और प्रकाश में भी पाया जाता है।

विटामिन 'ई' (टोकोफेरोल) (Vitamin 'E' or Tocoferrol)-

यह विटामिन प्रजनन शक्ति को प्रभावित करता है। पशुओं पर प्रयोग करने के बाद यह पाया गया कि इसकी कमी के कारण बनध्यता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, त्वचा सूज जाती है, और शरीर में अन्य कई प्रकार की गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है।
  • स्त्रोत- मॉस, अंडे की जरदी, गेहूँ आदि।

विटामिन 'के' ( फिलोक्विनोन) (Vitamin 'K' or Philoquinon)-

यह रक्तस्त्रावरोधी विटामिन है जो यकृत में प्रोथ्रॉम्बीन के निर्माण के लिए आवश्यक है। रक्त का जमना प्रोथॉम्बीन पर निर्भर करता है। इसका निर्माण बड़ी आँत में मौजूद जीवाणु करते हैं। इस विटामिन की कमी के कारण रक्त में जमने (Clotting) की क्षमता कम हो जाती है और मसूड़े आदि से रक्तस्त्राव होने लगता है। जोड़ों और दृष्टिपटल आदि के भीतर भी रक्तस्त्राव होने लगता है।
  • स्त्रोत- पालक, गाजर, पत्तागोभी, सलाद आदि।


रोग विज्ञान (Etiology)

जीव विज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत रोग उत्पन्न करने वाले कारणों का विश्लेषण किया जाता है, उसे रोग-हेतु विज्ञान (Etiology) कहा जाता है।
  • आज के समय में यह विज्ञान बहुत ही सफल है। इसकी सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज डॉक्टर मरीज के बाह्य लक्षणों को देख कर ही उसकी बीमारी का अंदाजा लगा लेते हैं। हर बीमारी का अलग कारण होता है, अलग लक्षण होते हैं, और उनसे बचने के अलग तरीके होते हैं, परंतु रोगों के कारणों को समझने के लिए उनको निम्न वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. जन्मजात (congenital)
  2. पोषाहार न्यूनता (Deficiency)
  3. संक्रामक (Infectious)
  4. अर्बुदीय (Neoplastic)
  5. औषधजन्य और अज्ञात रोग (latrogenic and didopathic)

जन्मजात रोग (Congenital)

हम सब को यह विदित है कि इस दुनिया में जन्म लेने से पहले भी हमारा जीवन नौ महीनों तक अस्तित्व में रहता है। कहा जाता है कि माँ का गर्भ बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होता है, यह सत्य है परंतु यह स्थान भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है। बहुत से रोग हैं जो बच्चे पर तब आक्रमण करते हैं जब बच्चा गर्भावस्था में होता है, इन रोगों को ही जन्मजात रोग (Congenital diseases ) कहते हैं। कुछ रोग जो हमें बच्चों में जन्म से ही देखने को मिलते हैं जन्मजात रोगों की श्रेणी में रखे जाते हैं; जैसे- कटे होंठ (Harelip) विदीर्ण तालु (Cleft palate) और पॉव का फिरा होना (Club foot) । इनके अलावा कुछ रोग ऐसे होते हैं जो गुणसूत्रों की अनियमितता के कारण उत्पन्न होते हैं, ये रोग भी जन्मजात रोगों की श्रेणी में आते हैं। इन रोगों के साथ यह संभव है कि बच्चे के जन्म के साथ यह रोग परिलक्षित न हों परंतु बच्चे उनसे प्रभावित होते हैं। इस श्रेणी में निम्न रोगों को शामिल किया गया है- मॉन्गोलिज्म (Mongolism) नील शिशु (Blue baby) (हृदय-विकृति के कारण) स्थानिक अधरांगता (Spastic paraplegia) (तंत्रिका की असामान्यता)।
  • इस तरह हम देखते हैं कि जन्मजात रोग भ्रूण की गूणसूत्रीय संरचना में गड़बड़ी या गर्भाशय स्थित शिशु पर आघात पहुँचने के कारण होते हैं। इनके अतिरिक्त गर्भाशय में पल रहे शिशु पर उसकी माता को होने वाली बीमारियों एवं माता की नशे, दवाओं आदि की लतों का भी गलत असर पड़ता है और ये शिशु में विभिन्न बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। इस कारण से होने वाली बीमारियों में मुख्यतः शिशु के हृदय, मानसिक विकास, दृष्टि, श्रवण शक्ति पर बुरा प्रभाव है। कुछ ऐसे भी जन्मजात रोग होते हैं जो शिशु अपने अभिभावकों से प्राप्त करता है और अपने बच्चों को हस्तान्तरित करता है, इन बीमारियों को वंशानुगत बीमारी (Heritary disease) कहते हैं। इन रोगों में हेमोफिलिया, फेनिलकिटोन्यूरिया (Phenylketonuria) सिकल सेल एनीमिया, वर्णाधता, डायबीटिज आदि हैं। हेमोफिलिया एक रक्त रोग है जिसमें रक्त के जमने की प्रक्रिया अवरूद्ध हो जाती है और छोटे से घाव के भी सुखने की संभावना कम हो जाती है। फेनिलकिटोन्यूरिया में विषाक्त फिनाईलों (Toxic phenyls) का उपापचय करने वाले एन्जाइम की कमी हो जाती है; इससे रक्त-प्रवाह में फिनाईल उत्पन्न होने लगता है, आहार में अमीनो अम्ल की मात्रा कम कर, इसका ईलाज किया जा सकता है।

पोषाहार न्यूनता (Dietary Deficiency)-

हमारे दैनिक जीवन में हमें परेशान करने वाले बहुत से रोग आहार की कमी या अनयमितता के कारण होते हैं। पर्याप्त आहार का अर्थ केवल पेट भरना नहीं होता, हमें रोगों से बचाने के लिए विटामिन की जरूरत होती है, और पेट भर खाना मिलने के बाद भी यदि हमारे भोजन में विटामिन की कमी है तो हम निश्चित ही बीमार पड़ सकते हैं। कई तरह के विटामिन होते हैं जो अलग-अलग तरह के रोगों से लड़ने में हमारी सहायता करते हैं। विभिन्न विटामिन विभिन्न खाद्य पदार्थों में पाये जाते हैं। यदि हमारे भोजन में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों का समावेश नहीं होगा तो हो सकता है कि हम किसी प्रकार के विटामिन से वंचित रह जाएँ और उस विटामिन की कमी से होने वाले रोग से ग्रसित हो जाएँ । जैसे विटामिन-बी। की कमी से बेरी-बेरी, विटामिन 'डी' की कमी से रिकेट्स, विटामिन ए की कमी से दृष्टि संबंधी दोष, आयरन की कमी से एनीमिया, आयोडीन की कमी से घेघा (Goiter) की संभावना रहती है। शाकाहार अच्छी आदत है और मानव शरीर के लिए शाकाहार पाचन की दृष्टि से ज्यादा लाभप्रद भी है परंतु पूर्णत: शाकाहारी लोगों को विटामिन ए, डी और ई की कमी का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इन विटामिनों की पर्याप्त मात्रा जन्तु वसा में उपस्थित होती है।


संक्रामक रोग (Infectious Diseases)

यह रोग का वह प्रकार है जो हमें सबसे अधिक प्रभावित करता है। साधारण से जुकाम से लेकर प्राणघातक भोजन विषाक्तता (Food poistioning) इसी श्रेणी में होती है जो विभिन्न प्रकार के रोगाणुओं द्वारा प्रसारित की जाती है। ये रोगाणु हमारे शरीर पर परजीवी होते हैं और जन्तु जगत के विभिन्न वर्गों से संबंधित होते हैं जैसे बैक्टीरिया, वायरस, फंजाई, वर्म आदि। ये जीव हमारे शरीर में प्रवेश करके अपनी दैनिक आवश्यकताएँ हमारे शरीर से प्राप्त करते हैं और अपने जीवन के विभिन्न चरणों में अलग-अलग तरह के पदार्थ स्त्रावित करते हैं जो हमारे शरीर के लिए विषाक्त (Toxic) होते हैं जिससे हमारा शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। उदाहरणस्वरूप पोलिया विषाणु मेरूरज्जु में स्थित विशेष प्रकार की तंत्रिका कोशिकाओं को नष्ट करता है जिससे पीड़ित व्यक्ति को पोलियो हो जाता है। पोलियो विषाणु की तरह अधिकांश विषाणु अंत:कोशिकीय परजीवी (Intracellular parasite) होते हैं। दूसरी तरफ जीवाणु हैं जो सामान्यतः अन्तर्कोशिकीय परजीवी (Intercellular parasites) होते हैं और ये घातक 'बैक्टीरिया-जीव विष' उत्पन्न करते हैं। कुछ प्रोटोजोआ भी हैं जो हमारे शरीर में घातक रोग उत्पन्न करते हैं जैसे- मलेरिया परजीवी रक्तकणों को नष्ट करता है और एन्टअमीबाहिस्टोलिटीका अमीबीय पेचिस करता है जिसकी चरम स्थिति में पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।
  • संक्रामक रोगों के एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलने की संभावना अधिक होती है क्योंकि इनको उत्पन्न करने वाले कारक जीवित जंतु होते हैं जिनका एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना अपेक्षाकृत आसान होता है। इन रोगाणुओं के एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के शरीर में जाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे कोई रोगाण स्पर्श से ही दूसरे व्यक्ति में जा सकता है, कोई हवा एवं पानी के द्वारा फैल सकता है। 

अर्बुदीय रोग (Neoplastic diseases)-

अर्बुद का अर्थ होता है, गाँठ (Tumour) कुछ ऐसे रोग होते हैं जिनमें शरीर के किसी हिस्से में अचानक से कोई गाँठ बनने लगती है जिसे ट्यूमर या गाँठ कहते हैं। ये ट्यूमर शरीर में छोटे से अघातक मस्से के रूप में भी हो सकते हैं और प्राणघातक कैंसर भी बन सकते हैं। इन गाँठों बनने और बढ़ने के कारणों पर अभी अध्ययन चल रहा है। कैंसर से प्रभावित ऊतक मृत होकर अपना कार्य बंद कर देते हैं, इस प्रकार कैंसर के शरीर में अत्यधिक फैलने से बहुत से ऊतक अपना कार्य बंद कर देते हैं और सही समय पर ईलाज न होने पर मरीज की मृत्यु हो जाती है। कैंसर का मुख्य कारण अभी तक अज्ञात है लेकिन बहुत से ऐसे कारकों का पता लगाया जा सकता है जो कोशिकाओं को कैंसरगत होने की संभावनाएँ बढ़ाती हैं, इन कारकों को कार्सिनोजन कहा जाता है। कुछ कार्सिनोजन निम्न हैं- तम्बाकू, अल्ट्रा-वायलेट किरणें, शराब, सिगरेट आदि।


औषधजन्य और अज्ञात रोग (Iatrogenic and idiopathic diseases)-

कुछ रोग ऐसे होते हैं जो स्वयं तो हानिकारक होते ही हैं, इनके उपचार के लिए ली गई औषधियाँ भी हानिकारक होती हैं और शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करती है, जिन्हें सामान्यतः हम दवाओं का सह प्रभाव (साईड इफैक्ट) कहा जाता है। अज्ञात रोगों की श्रेणी में उन रोगों को शामिल किया जाता है जिनके कारणों का अभी तक कुछ पता नहीं है। सोरियसिस, कैंसर आदि कुछ ऐसे ही रोग हैं। चूँकि इन रोगों के कारणों का ठीक से पता नहीं होता इसलिए इनके ईलाज में भी बहुत कठिनाई आती है।

पादप रोग (Plant Diseases)

रोग मनुष्यों एवं जंतुओं को जिस प्रकार प्रभावित करते हैं उसी प्रकार पादपों को भी प्रभावित करते हैं। पादपों में भी अनेक प्रकार के जीवाणुओं, विषाणुओं तथा कवकों के कारण अनेक प्रकार के रोग होते हैं। पोषाहार न्यूनता अर्थात् जल और खनिज लवणों की कमी से भी पादपों की वृद्धि और क्रियाशीलता प्रभावित होती है तथा पादप हार्मोन की अनियमितताओं के कारण पादपों की वृद्धि, विकास, दैनिक क्रिया-विधियाँ प्रभावित होती हैं जिससे पादपों में अलग-अलग तरह के लक्षण परिलक्षित होते हैं, जैसे- पत्त्यिों का समय से पहले पीला पड़ना तथा झड़ना, फलों का अल्पविकसित रह जाना एवं पकने से पूर्व ही पादपों से टूट जाना, पादप का खनिज लवणों के अभाव में वृद्धि न कर पाना, हार्मोन अनियमितता के कारण पादप की ऊँचाई बाधित होना, पादपों की पत्तियों का विकृत रूप से मुड़ जाना, पत्त्यिों तथा पादप के अन्य भागों में रस्ट या फफोलों जैसी संरचना दिखना आदि।
  • नीचे तालिका में विभिन्न प्रकार के पादप रोगों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी गई है-
क्रमांक
रोग
रोगकारक
प्रभावित पादप
रोग के लक्षण
1.
लीफ कर्ल
टमाटरआलू
पत्ते नीचे की ओर मुड़ जाते हैं तथा पीले पड़ जाते हैं।
2.
मोजेक रोग
टमाटरमिर्चतम्बाकू आदि।
पत्तियों पर पीले धब्बों का विकसित होना।
3.
लघुपर्ण
माइकोप्लाज्मा (विषाणु)
बैंगनटमाटर
कलिकाओं की पत्तियाँ छोटी एवं अत्यधिक संख्या में होनापुष्पन नहीं होना।
4.
मेंगों मालफारमेशन
आम
पत्तियों का एक स्थान से अधिक संख्या में निकलना,   पुष्पन एवं फलन का अभाव।
5.
साइट्रस कैंसर
जैन्थोमोनास सिट्री (जीवाणु)
नींबू जाति के पौधे
पत्तियों एवं फलों पर भूरे काष्ठीय धब्बे
6.
ब्लैक आर्म रोग
जैन्थोमोनास माल्वेसिरम (जीवाणु)
कपास
पत्तियोंकोमल तनों पर ऊतकों की मृत्यु के धब्बेशिराएँ स्पष्ट हो जाती हैं।
7.
टुन्डु रोग
कोरीनी बैक्टीरियम (जीवाणु)
गेहूँ
नवजात बालियों से सुनहरे पीले द्रव का स्त्रावजो पर्णों व ग्लुम को आपस में चिपका देता है।
8.
रेड राट्
कोलीटोट्राय (कवक)
गन्ना
पत्तियों पर लाल चकत्ते। तने के ऊतक लाल रंग के हो जाते हैं। विशेष प्रकार की गन्ध आने लगती
9.
रस्ट
पक्सीनिया (कवक)
गेहूँजौबाजराज्वार आदि।
पत्त्यिों तथा कोमल तनों पर कालेभूरेपीले रेखीय धब्बे।
10.
स्मट
अस्टीलागो (कवक)
गेहेंजौबाजराज्वार आदि।
बालियों में दानों की जग काले रंग के चूर्ण का निर्माण
11.
ग्रीन इयर रोग
स्क्लीरोस्पोरा (कवक)
बाजरा
बाजरे के स्थान पर ही छोटी पर्णिल संरचनाओं   का विकास हो जाता है।
12.
टिक्का रोग
सरकोस्पोरा (कवक)
मूंगफली
पत्तियों पर काले भूरेगोल चकत्ते।
13.
लीफ स्पोट या ब्राउन लीफ स्पोट
हेल्मिन्थोस्पोरियम (कवक)
तिल-चावल
पत्तियोंपर्ण तथा ग्लूमस पर छोटे वृत्तीय धब्बेबीजों का झुर्रीदार एवं रंग बदल जाना।
14.
ब्लास्ट ऑफ राइस
पीरिक्यूलेरिया (कवक)
चावल
नवोद्भिद एवं वयस्क पादपों की पत्तियों पर तर्कु आकार के धब्बे।
15.
ब्लिस्टर ब्लाइट
एक्सोनेसिडियम वेक्सैन्स (कवक)
चाय
पत्तियों पर छोटे पीले धब्बों का बनना। ऊपरी सतह नालीदार बन जाती है तथा निचली सतह पर हल्के हरे-सफेद धब्बे बनते हैं।
16.
रूट नॉट
मेलेडोगाइन (निमेटोड)
भिन्डीमिर्च, टमाटरबैंगन   आदि|
जड़ों में रेखीय क्रम में मणिका जैसी गांठों का निर्माण


 इन रोगों के अतिरिक्त भी पादप कीटों की अनेक गतिविधियों से प्रभावित होते हैं। वास्तव में पादप ही कीटों का मुख्य भोजन होते हैं, अनेक कीट अपने भोजन की प्राप्ति के लिए पादपों को अत्यधिक नुकसान पहुँचाते हैं। उदाहरणस्वरूप- राइसग्रास हॉपर तथा भूरा ग्रास हॉपर कोमल पत्तियों तथा बीजों को खा जाते हैं।

जंतुओं में जीवाणु जनित रोग (Bacterial diseases in Animals)-

रोग
रोग कारक जीवाणु
(1) ऐन्थ्रेक्स (Anthrax)
बैसिलस ऐन्धेसिस
(2) आवर्तीज्वर (Relapsing fever)
ट्रिपोनिया रिकरेंटिस
(3) गलघोंटू (Haemorrhagic Septicaemia)
पास्चुरैला समूह
(4) हैजा (कॉलेरा) (Cholera)
विब्रियो कॉलेरी
(5) कुष्ठ (Leprocy)
माइको बैक्टीरिया लेप्री
(6) कुकर खाँसी (Whooping cough)
हीमोफिलस पयूसिस
(7) थनैला रोग (Mastistis)
स्टेफाइलोकोकाई
(8) उपदंश (Syphlis)
ट्रिपोनीमा पेलिडम
(9) डिप्थेरिया (Diphtheria)
कोरिने वैक्टीरियम थिफथेरी
(10) पेचिस (Dysentry)
शिगेला डिसेन्टरी
(11) निमोनिया (Pneumonia)
डिप्लो कॉकस न्युमोनी
(12) यक्ष्मा (Tuberculosis)
माइको बैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस
(13) टिटेनस (Tetanus)
क्लॉस्ट्रीडियम टिटेनाइ
(14) टाइफॉयड (Typhoid)
सल्मोनेला टाइफी

  • मुख्य खनिज लवण एवं उनकी कमी से होने वाले रोग- 


खनिज लवण
कमी से होने वाले रोग
आयोडीन
घेघा (Goiter)
आयरन
एनीमिया या हिमोग्लोबिन की कमी
कैल्सियम
कमजोर हड्डी एवं दाँत
सोडियम
डिहाइड्रेसन
मैंगनीज
दृष्टि एवं श्रवण समस्या
जिंक
विटामिन अवशेषण क्षमता में कमी
  • विटामिनों की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग-


विटामिन
कमी से होने वाले रोग
विटामिन ''
त्वचा का शुष्क पड़ना, रतौंधी और नेत्र संबंधी अन्य रोग जैसे Xeropthalmia (नेत्र का शुष्क पड़ जाना), कार्निया में सफेद फल्ली, दृष्टि का समाप्त होना आदि।
विटामिन 'बी-1'
बेरी-बेरी
विटामिन 'बी-2'
जिह्वा में सूजन, मुख कोण की त्वचा और ओठ का फटना तथा नेत्र का लाल होना।
विटामिन 'बी-6'
शिशुओं के शरीर में ऐंठन, पेट का तना रहना, चिड़चिड़ापन वजन का न बढ़ना आदि।
विटामिन 'बी-7'
पेलाग्रा (Pellagra)
विटामिन 'बी-12'
पर्निसियस एनीमिया
विटामिन 'सी'
स्कर्वी
विटामिन 'डी'
बालकों में रिकेट्स तथा स्त्रियों में अस्थिमृदुत
विटामिन '
Sterlity (बंध्यता)
विटामिन 'के'
रक्त स्कंदन (Blood coagulation) में कमी
  • वायरस जनित रोग-


वायरस के नाम/ प्रकार
रोग
एच. आई. वी.
एड्स
इन्फ्लुएन्जा वायरस
इन्फ्लुएन्जा
मीजल्स वायरस
मीजल्स
पोलियो वायरस
पोलियो
रेबीज वायरस
रेबीज
रेस्पीरेटरी सिनसाइटियल वायरस
निमोनिया
हिपेटाइटिस वायरस (ए. बी. और सी.)
हिपेटाइटिस
स्मॉल पॉक्स वायरस
स्मॉलपॉक्स
ह्यूमन हर्पस् वायरस
कपोसी सार्कोमा

  • रोग एवं उनसे प्रभावित होने वाले अंग-    


रोग
प्रभावित होने वाले अंग
1. पोलियो
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र
2. रेबीज
केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र
3. कनफेर
लार ग्रंथि
4. डिप्थेरिया
गला
5. कुकुर खाँसी (Whooping cough)
गला
6. टेटनस
मेरूरज्जु
7. इन्फ्लुएन्जा
फेफड़े
8. यकृत शोथ (Hepatitis)
यकृत (Liver)
9. पीत ज्वर (yellow fever)
यकृत
10. ऐन्धैक्स
फेफड़े, बड़ी आंत, त्वचा
11. टायफायड
बड़ी आँत
12. हैजा
छोटी आँत
13. खसरा (Measles)
त्वचा
14. चेचक
मुख्यतः त्वचा
15. ब्यूबोनिक प्लेग
लसीका ग्रंथ
16. मधुमेह (Diabetes)
वृक्क
17. पीलिया (Joundice)
यकृत


रोगों के प्रकार-


रोगों को वर्गीकृत करने के अनेक तरीके हो सकते हैं। जिनमें से दो तथ्यों को आधार बनाकर यह कुछ रोगों का वर्गीकरण किया गया है-
ये दो तथ्य हैं-
  1. रोगों के फैलने की प्रवृत्ति
  2. प्रभावित अंग

इन दो आधारों पर वर्गीकरण-

संक्रामक रोग (Infectious Disesases)-


यह ऐसे रोग होते हैं जो हवा, पानी, तथा अन्य तरीकों से शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश से होते हैं। इन रोगों के प्रभाव में आने के लिए रोगी का दूसरे रोगी के संपर्क में आने की आवश्यकता नहीं होती है। हैजा, प्लेग, चेचक आदि इसी श्रेणी में आते हैं।



संसर्गज रोग (Contageous Diseases)-


इसके अंतर्गत वे रोग आते हैं जिनके प्रभाव में आने के लिए रोगी की प्रत्यक्ष रूप से किसी रोगी व्यक्ति के संपर्क में आने की आवश्यकता होती है। यह प्रत्यक्ष संपर्क रोगी के स्पर्श उसके उपयोग किये हुए कपड़ों, बर्तन आदि के द्वारा हो सकता है। इसके अंतर्गत खुजली, दाद आदि आते है।



स्थानिक रोग (Epidemic Diseases)-


यह ऐसा रोग है, जिसका कारण किसी स्थान की आबादी, या स्थान-विशेष की स्थिति में मौजूद रहता है। मलेरिया इसका उदाहरण है।



महामारी (Epidemic)-


रोग का किसी स्थान विशेष पर बहुत तीव्रता से फैलना महामारी कहलाता है। यह एक साथ बहुत से व्यक्तियों को प्रभावित करता है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदूषित भोजन, जल, वस्त्र आदि जैसे विभिन्न जरियों से पहुँच जाता है। यह रोग संक्रामक होता है।

यहाँ कुछ महत्वपूर्ण रोगों के कारक, फैलने के तरीके, रोगी के लक्षण, रोगी का ईलाज, एवं बचाव के तरीकों का संक्षिप्त विवरण दिया जाएगा।



संक्रामक रोग (Infectious Diseases)


संक्रामक रोगों को उनके रोग कारकों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. विषाणु जनित रोग
  2. जीवाणु जनित रोग
  3. अन्य रोगकारक जीवों (अमीबा, कृमि आदि) जनित रोग

मच्छरों से फैलने वाले रोग-


मच्छर हमारे आस-पास ही रहते हैं, और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं। मच्छर अपने-आप में कोई रोगकारक नहीं है, लेकिन मच्छर बहुत से रोगकारकों का वाहक होता है, इसलिए मच्छर के काटने से अनेक रोगों का संचरण होता है। कुछ रोग जिनके संचरण में मच्छर की अहम भूमिका होती है, निम्न हैं-
  1. मलेरिया
  2. पीतज्वर (Yellow fever),
  3. डेंगू ज्वर (Dengue),
  4. फाइलेरिया (Filariasis),
  5. इन्सेफ्लाइटिस (Encephalitis),
  6. डर्माटोबिया आदि।

विषाणु जनित रोग

1. चेचक (Small Pox)-

यह एक विषाणुजनित संक्रामक रोग है। चेचक फैलाने वाल वायरस को वैरियोला (Variola virus) कहा जाता है। दो प्रकार के वैरियोला वायरस चेचक फैला सकते हैं इन्हें क्रमशः वैरियोला माइनर और वैरियोला मेजर कहा जाता है। वैरियोला वायरस की वजह से उत्पन्न होने के कारण इस बीमारी को वैरियोला वेरा भी कहते हैं। चेचक के विषाणु रोगी की त्वचा, थूक, फफोलों के पीव, सुरण्डों (scabs) मलमूत्र, मक्खियों, हवा और अन्य संदूषित पदार्थों के जरिए फैलते हैं।

लक्षण-
  • सर्वप्रथम सिर, पीठ, कमर और बाद में सारे शरीर में जोरों का दर्द होता है।
  • बदन में कंपकपी और कभी-कभी उल्टी (vomiting) होती है।
  • प्रथम दो दिनों के अंदर बुखार 102 से 104 फैरेनहाईट तक हो जाता है।
  • तीसरे दिन लाल-लाल दाने निकल जाते हैं जो बाद में फफोले का रूप धारण कर लेते हैं।
  • फफोलों को ठीक होने में लगभग 15 दिन लग जाते हैं।
उपचार-
  • रोगी को हवादार कमरे में रखना चाहिए।
  • ज्वर की स्थिति में दूध और अन्य पेय आहाद देना चाहिए।
  • रोगी के पूरे शरीर पर पोटेशियम परमैग्नेट क संतृप्त घोल का लेप चढ़ाना चाहिए।
  • आँख की पलकों पर वैसलीन लगाना चाहिए
  • आँख को बोरेसिक लोशन (Voracic lotion) से धोना चाहिए।
यदि फोड़ों से दुर्गन्ध आ रही हो तो त्वचा पर पोटाशियम परमैंग्नेट के बदले कार्बोलिक सॉल्यूशन का लेप चढ़ाना चाहिए।


2. इन्फ्लुएंजा (Influenza) -



यह एक संक्रामक रोग है जो विषाणु एवं जीवाणु दोनों के द्वारा फैलता है। इसका रोगकारक विषाणु जो मनुष्यों में इन्फ्लुएंजा फैलाता है, इन्फ्लुएंजा-B (Influenze-B) कहलाता है और जीवाणु जो इन्फ्लुएंजा फैलाता है वह वैसिलस इन्फ्लुएंजी कहलाता है। इसके रोगाणु रोगी के छींक एवं खाँसी के जरिए शरीर से बाहर निकलते हैं तथा संपर्क में आनेवाले व्यक्तियों को संक्रमित करते हैं। यह कभी-कभी महामारी का रूप भी ले लेते हैं।

लक्षण-
  • सिर और पूरे शरीर में जोरों का दर्द होता है।
  • सर्दी, खाँसी तथा तेज बुखार, बुखार दो-तीन दिनों में ठीक हो जाता है।
  • शरीर मे कंपकपी 
उपचार एवं रोकथाम-
  • रोगी के लिए उसका बुखार कम होते तक अलग कमरे में बिस्तर लगा देना चाहिए।
  • रोगी का पेट साफ रखना चाहिए।
  • पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से सुबह-शाम गरारा करना चाहिए।
  • यह रोगी के खाँसने एवं छींकने से फैलता है इसलिए रोगी की सेवा करने वाले रोगी को अपने नाक एवं मुँह पर नकाब पहनना चाहिए।
  • अन्य व्यक्तियों को रोगी के संपर्क से यथासंभव दूर रखना चाहिए।


3. हाइड्रोफोबिया (Hydrophobia/ Rabies)-



यह एक सांघातिक रोग है, जिसका संक्रमण केन्द्रीय तंत्रिकातंत्र (Central Nervous System) में होता है। इसका संक्रमण पागल कुत्ते, भेड़िये और लोमड़ी के काटने से होता है, क्योंकि यह रोग सर्वप्रथम इन्हीं जन्तुओं को होता है। इनके काटने से रोग के विषाणु 'न्युट्रॉपिक वाइरस' (Neutropic Virus) शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और समुचित समय पर चिकित्सा न की जाने पर केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं।
  • यह रोग दो रूपों में देखने को मिलता है। एक में उत्तेजना होती है, जल से भय (Hydrophobia) उत्पन्न होता है औश्र रोगी की आवाज कुत्ते के भूकने जैसी निकलती है। दूसरे में रोगी को पक्षाघात (paralysis) , तेज ज्वर और भयंकर सिरदर्द होता है तथा उल्टी करने की प्रवृत्ति और बेचैनी महसूस होती है।
उपचार-
प्राथमिक उपचार के रूप में घाव को दबाकर, जितना हो सके, रक्त निकाल देना चाहिए और इसे साबुन से बार-बार साफ करना चाहिए। विशेष चिकित्सा के लिए चिकित्सक की सलाह देनी चाहिए।


4. एड्स (Aids)-


पूरा शब्द 'एक्वायर्ड इम्युनिटी डिफिसिएन्सी सिन्ड्रोम' है, जिसका अर्थ है शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का क्षीण हो जाना। सर्वप्रथम यह रोग 1981 में मध्य अमरीका में प्रकट हुआ था। मनुष्य हर क्षण किसी-न-किसी रोगाणु का शिकार होता रहता है। किन्तु, शरीर की रक्षात्मक-प्रणाली इसे सुरक्षित रखती है। इसकी कमी के कारण शरीर रोगाणुओं के आक्रमण से अपनी रक्षा करने में पूर्णतः असमर्थ हो जाता है और वह ऐसे भयंकर रोग की चपेट में आ जाता है जिसके होने का खतरा स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले व्यक्ति को कतई नहीं रहता।
  • इसीलिए यह एक ऐसा घातक रोग सिद्ध हो चुका है। जिसके हो जाने से मृत्यु निश्चित होती है। इस रोग का संक्रमण अनेक के साथ लैंगिक संबंध रखने, एक ही सुई से निर्जीवाणुकृत किए बिना कई व्यक्तियों के इन्जेक्शन लगाने तथा रक्ताधान के जरिए से होता है।


5. पोलियो (Poliomyelitis)-


यह रोग निस्यन्दी विषाणु (Filterable virus) के कारण होता है। विषाणु मुँह या नाक के रास्ते से शरीर में प्रवेश करता है और आँत में आश्रय लेने के बाद रक्त प्रवाह में आ जाता है। इससे सिरदर्द, ज्वर और वमन आदि लक्षण प्रकट होते हैं। शरीर इससे बचने के लिए रोगप्रतिकारक पदार्थ (Antibodies) का निर्माण करने लगता है, जिससे विषाणु मर जाता है और रोगी पुर्णतः चंगा हो जाता है इससे रोग की असंक्राम्यता (Immunity) उत्पन्न हो जाती है।
  • ऐसी स्थिति भी आती है जिसमें विषाणु की संख्या में काफी वृद्धि हो जाती है। विषाणु मस्तिष्क और मरूरज्जु में पहुँच कर तंत्रिका ऊतकों को नष्ट कर देता है। परिणाम यह होता है कि मस्तिष्क पेशियों को कार्य करने का जो आदेश देता है, उसे तंत्रिकाएँ उन तक पहुँचाने में अक्षम हो जाती हैं, और पैरों में पक्षाघात (Paralysis) हो जाता है। इससे बचने के लिए बच्चों को पोलियो निरोधी टीका दिया जाता है।


6. पीत ज्वर (Yellow fever)-


इस रोग से अधिकांशतः दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका के लोग प्रभावित रहते हैं। यह एक विषाणु जनित रोग है । यह विषाणु जंगली जानवरों के शरीर में आश्रय पाता है। इस रोग के विषाणुओं को जंगली जानवरों के शरीर से निकाल कर मनुष्य के शरीर में फैलाने का श्रेय दो मच्छरों को जाता है-
  1. हेमोगोगस (Haemogogous)
  2. इडीस (Aedes)।
यह रोग मनुष्य के शरीर में अचानक आए तेज बुखार एवं तेज सिर एवं हड्डियों के दर्द के साथ मनुष्य के शरीर में दस्तक देता है। अन्य लक्षणों के तौर पर, इस रोग के अंतर्गत रोगी को चेहरा सूज जाता है तथा त्वचा शुष्क हो जाती है। कुछ दिनों के बाद भयानक पीलिया रोग हो जाता है तथा रक्तस्त्राव, रक्त और पित्त वमन, आदि लक्षण प्रकट होते हैं। इस रोग में मृत्यु की अत्यधिक आशंका बनी रहती है।


7. डेंगू ज्वर (Dengue or Break bone fever)-


यह एक विषाणु जनित रोग है। इसको संचारित करने का श्रेय तीन प्रजाति के मच्छरों को जाता है। ये मच्छर हैं-
  1. इडिस इजिप्टी (Aedes Aegyptie)
  2. इडिस एल्बोपिक्टस (Aedes albopictus)
  3. क्यूलेक्स फटिगन्स (Culex fatigans)। 
इस रोग में अचानक तेज बुखार आ जाता है, चेहरे पर पत्तियाँ (rash) निकल आती हैं, तथा सिर, आँख, पेशियों और जोड़ों का दर्द होता है। यह महामारी के रूप में अचानक फैलता है।


8. मस्तिष्क शोथ (Encephalitis)-


यह एक विषाणुजनित रोग है। यह रोग मनुष्यों के साथ-साथ घोड़ों और अन्य पालतू जानवरों को भी प्रभावित करता है। यह रोग इडिस (Aedes) और क्यूलेक्स (Culex) जाति के अनेक मच्छरों द्वारा संचारित होता है। इस रोग में अचानक तेज ज्वर, भयानक सिर दर्द, मतली, आँखों में जलन एवं पानी आना, नींद का अनुभव होना, बेहोशी, आदि लक्षण प्रकट होते हैं तथा आक्रांत व्यक्ति की मृत्यु अधिकांशतः लक्षण प्रकट होने के कुछ घंटे बाद हो जाती है। इस रोग के संक्रमण से बचने के लिए मच्छरों से बचना पहला उपाय है। यह रोग पालतु जानवरों को होता है जिससे मच्छरों द्वारा संचरित होकर यह मनुष्यों को प्रभावित करता है, अतः यदि संभव हो तो पास-पड़ोस के पालतू जानवरों हटा देना चाहिए। खुल एव दुषित खाद्यपदाथों के प्रयोग से बचना चाहिए। रोग के लक्षणों का पता चलते ही तुरंत हॉस्पिटल जाना चाहिए।


जीवाणु जनित रोग

1. आंत्र ज्वर (Typhoid)-


यह भी एक जीवाणुजनित संक्रामक रोग है। इसको फैलाने वाला जीवाणु बैसिलस टाइफोसस (Bacillus typhosus) है। ये जीवाणु प्रदूषित खाद्य पदार्थों के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं। इस जीवाणु का संक्रमण आँत में होता है, जहाँ से ये जीवाणु रक्त में चले जाते हैं और रक्त संचालन तथा पाचन-क्रिया का संबंध विच्छेदित कर देते हैं।

रोग के लक्षण-
  • प्लीहा (Spleen) और आंत्रयोजनी ग्रंथियाँ बढ़ जाती हैं।
  • आरम्भिक समय में सिरदर्द, कंपकपी, दस्त, पेट में दर्द, नाक से रक्तस्त्राव आदि।
  • पहले सप्ताह में शरीर का तापक्रम बढ़ता है, दूसरे सप्ताह में यह अत्यधिक बना रहता है और तीसरे सप्ताह में धीरे-धीरे उतरता है।
संक्रमण के तरीके-
  • बैसिलस टाइफोसस रोगी के मल, चम्मच, तौलिया, ग्लास तथा व्यवहार में लाई गई अन्य वस्तुओं के जरिए फैलते हैं।
उपचार एवं बचाव-
  • रोगी के मल को वातावरण में खुला न छोड़ना।
  • रोगी की अन्य वस्तुओं को विसंकमित करना।
  • खाने-पीने की चीजों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए।
  • बिना उबाले दूध तथा बिना विसंकमित किए सब्जियाँ और फल नहीं खाने चाहिए।
  • रोगी को आराम करना चाहिए एवं टायफाइड निरोधन-टीका लगवा लेना चाहिए।
  • इसके ईलाज के लिए क्लोरोमाइसिटिन का उपयोग किया जाता है।


2. पेचिश (Dysentery)-


यह एक जीवाणु एवं प्रोटेस्टा जनित संक्रामक रोग है। दो प्रकार के जीव इस रोग के लिए जिम्मेदार होते हैं-
  1. बैसिलस (Bacillus)
  2. अमीबा।
बैसिलस जीवाणु के कारण जो पेचिश होता है उसे बैसिलरी पेचिश तथा अमीबा द्वारा जो पेचिश होता है उसे अमीबिक पेचिश कहते हैं। इसमें से जीवाणु द्वारा (Basillus) द्वारा होने वाला पेचिश महामारी के रूप में फैलता है और अमीबा द्वारा होने वाला पेजिश रोगी को बहुछ दिनों तक पीड़ित रखता है। अमीबा से होने वाला पेचिश चिरकालिक (Chronic type) होती है।
लक्षण-
  • लगातार दस्त एवं उल्टी
  • दस्त में आँव एवं खून की मात्रा अधिक होती है।
  • पेट में मरोड़।
  • कभी-कभी बुखार
  • डिहाइड्रेसन आदि।
उपचार एवं बचाव-
  • रोगी को गर्म दूध, अल्प मात्रा में फलों का रस, बार्ली तथा माड़-भात देना चाहिए।
  • हल्का एवं पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
  • इस रोग के जीवाणु एवं अमीबा मक्खियों द्वारा फैलते हैं अतः खाने-पीने की वस्तुओं को ढक कर रखना चाहिए।
  • रोगी की विष्ठा को खुले वातावरण में नहीं रहने देना चाहिए।
  • पानी तथा दूध को उबाल कर पीना चाहिए तथा गर्म भोजन करना चाहिए।


3. हैजा (Cholera)-


हैजा एक जीवाणजनित रोग है एवं संक्रामक है। हैजा फैलाने वाले जीवाणु को कॉलेरा विब्रियो (Cholera vibrio) के नाम से जाना जाता है। हैजा का संक्रमण मुख्यतः घरेलु मक्खियों द्वारा होता है। घरेलू मक्खी पीड़ित व्यक्ति के कै-दस्त पर बैठती है तब उसके पैर और पंखों में कॉलेरा विब्रियो चिपक जाता है और फिर वहाँ से उड़कर जब वो खाद्य पदार्थों या जल स्त्रातों पर बैठती है तो जीवाणु मक्खी के शरीर को छोड़कर खाद्य पदार्थों में बैठ जाते हैं, और इन पदार्थों का सेवन करने पर व्यक्ति को कॉलेरा होने की पूर्ण संभावना रहती है।

कॉलेरा के लक्षण-
  • पतला दस्त एवं उल्टी (Vomiting)
  • हाथ पैर में ऐंठन
  • पेशाब बंद हो जाती है।
  • डिहाइड्रेसन (शरीर में पानी की कमी) जिससे प्यास का बढ़ जाना
  • शरीर का तापक्रम कम हो जाता है एवं आँखें धंस जाती है
  • रक्त में पानी कम हो जाने के कारण रक्त जमने लगता है और रक्त का संचार धीमा पड़ जाता है
उपचार (Treatment)-
  • सेलाईन वाटर (For dehydration)
  • उल्टी रोकने के लिए बेनाडन का अंत:पेशी (Intramuscular) इंजेक्शन
  • आवश्यकतानुसार अन्य औषधियाँ


4. डिप्थेरिया (Diphtheria)-


यह बच्चों को प्रभावित करने वाला एक संक्रामक रोग है। यह एक जीवाणुजनित रोग है जो के.एल. बैसिलस KL basillus) नामक बैक्टीरिया द्वारा होता है। इस रोग में गले में एक कृत्रिम झिल्ली बन जाती है और बच्चों को सॉस लेने में तकलीफ होती है, जिससे रोगी की म्रत्यु हो जाती है। इस रोग का आक्रमण टॉन्सिल  फैरिक्स, लैरिंक्स, श्वसनली तथा कभी-कभी किडनी और फेफड़े को भी होता है।

लक्षण-
  • सर्दी, सिर, पीठ, तथा पैरों में जोरों का दर्द, गले में दर्द।
  • तेज बुखार (102 से 103 फैरेनहाईट)।
  • गले में एक कृत्रिम झिल्ली का बन जाना जो बहुत ही तेजी से फैलता है।
  • वायुकोष्ठों एवं वायुनली में जीवाणु का आक्रमण होने पर बीमारी भयानक रूप धारण कर लेती है।
उपचार एवं रोकथाम-
  • यह जीवाणु अधिकांशतः संमित दूध के जरिए फैलता है अत: हर को अच्छी तरह उबाल कर बैंक कर रखना चाहिए।
  • बच्चों को ठंडा दूध नहीं पिलाना चाहिए।
  • स्वस्थ बच्चों को रोगी बच्चे के संपर्क में यथासंभव नहीं आने देना चाहिए।
  • क्योंकि यह रोग रोगी के छींक, खाँसी, उल्टी आदि से फैलता है।
  • रोगी को हवादार कमरे में आराम करना चाहिए एवं उनके खाने-पीने के बर्तन अलग रखने चाहिए।
  • रोगी के कपड़ों को विसंक्रमित कर देना चाहिए।
  • रोगी की नाक एवं मुँह को पोटैशियम परमैंगनेट से धो कर साफ करना चाहिए।
  • इससे बचाव के लिए बच्चों को ट्रिपल एन्टीजन (Triple Antigen) का इन्जेक्शन लगवा देना चाहिए।

5. प्लेग (Plague)-


यह एक जीवाणुजनित संक्रामक रोग है, जो पेस्ट्युरेला पेस्टिस (Pasteurella Pestis) नामक जीवाणु के आक्रमण से होता है। यह रोग सर्वप्रथम चूहे को होता है और फिर चूहे से इंसानों में फैलता है। चूहे के शरीर में पिस्सू रहते हैं, जो इनका संदूषित रक्त चूसते हैं जिससे ये जीवाणु पिस्सू के शरीर में आ जाते हैं। चूहे के मरने के बाद पिस्सू उसके शरीर से बाहर निकलकर इधर-उधर फैल जाते हैं और बिस्तर तथा कपड़ों में छिप जाते हैं। इन्हीं पिस्सुओं के काटने से शरीर में इस जीवाणु का प्रवेश होता है।
प्लेग तीन प्रकार के होते हैं-

(1) गिल्टी वाला प्लेग (Bubonic Plague)- इस प्लेग में रोगी की जाँघ, काँख, और गर्दन की ग्रन्थियों में सूजन हो जाता है।

(2) न्यूमोनिक प्लेग (Pneumonic Plague)- इस प्लेग रोगी की छींक, खाँसी, थूक के जरिए फैलता है। इस प्लेग मे रोगी के फेफड़ों में सूजन आ जाती है तथा कफ के साथ खन भी निकलता है।

(3) सेप्टीसिमिक प्लेग (Septicimic Plague)- इस प्लेग में जीवाणु गिल्टियों से रक्त में प्रवेश कर जाते हैं। यह बहुत घातक सिद्ध होता है।

उपचार एवं रोकथाम-
  • इसकी रोकथाम के लिए सर्वप्रथम चूहों को नष्ट कर देना चाहिए।
  • मृत चूहों को जला देना चाहिए तथा इन्हें हाथ से नहीं छूना चाहिए।
  • घर के कपड़ों को विसंक्रमित कर देना चाहिए।
  • कुछ दिनों के लिए यदि संभव हो तो घर छोड़ देना चाहिए क्योंकि पिस्सू भोजन के अभाव में 8-10 दिनों से
  • अधिक जीवित नहीं रह सकते।
  • प्लेग-निरोधन सीरम का इन्जेक्शन ले लेना चाहिए।


6. तपेदिक (Tuberculosis)-


यह एक जीवाणु जनित संक्रामक रोग है। इसे फैलाने वाले जीवाणु को बैसिलस टयूबरक्यूलोसिस (Bacillus Tuberculosis) कहा जाता है। ये बैक्टीरिया रोगी के थूक, एवं कफ (बलगम) में मौजूद रहते हैं और उसके खाँसने या थकने पर दसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकते हैं। भोजन तथा पानी के जरिए भी इस रोग का संक्रमण होता है। यह रोग शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करता है। फेफड़ों को प्रभावित करने वाले टीबी को फुप्फुसीय टीबी (Pulmonary TB) , आँत में होने वाले टीबी को आँत की टीबी (Intestinal TB) तथा अस्थि में होने वाले टीबी को अस्थि टीबी (Bone TB) कहा जाता है। इसी तरह यह रोग शरीर के अन्य अंगों में भी हो सकता है। इन विभिन्न अंगों में होने वाले टीबी के जीवाणु एक ही होते हैं। संक्रमित अंग के हिसाब से इनका नाम बदल जाता है।

लक्षण-
  • कफ एवं ज्वर
  • रात्रि में पसीना आना
  • क्लांति
  • भूख की कमी, कब्जियत
  • शक्ति और वजन का हास
  • पाचन और तंत्रिका तंत्र में गड़बड़ी
उपचार एवं बचाव-
  • रोगी को पूर्ण विश्राम करना चाहिए।
  • रोगी के जल्दी ठीक होने के लिए पौष्टिक भोजन और शुद्ध हवा अत्यंत आवश्यक है।
  • रोगी के भोजन में दूध, घी, अण्डा, माँस तथा हरी सब्जियों की नियत मात्रा होनी चाहिए।
  • इसके ईलाज के लिए स्ट्रेप्टोमाइसीन, कैल्सियम, विटामिन तथा आयोडीन का उपयोग किया जाता है।
  • इस रोग से बचने के लिए बी.सी.जी का टीका लगाया जाता है।
  • रोगी को यत्र-तत्र थूकने से बचना चाहिए।
  • रोगी के खाने-पीने के बर्तन अलग कर दिये जाने चाहिए।
  • दूध को पीने के पहले अच्छी तरह उबालना चाहिए।
  • रोगी को शुद्ध हवा एवं सुबह की धूप के लेनी चाहिए एवं शरीर को हर प्रकार से मजबूत बनाए रखना चाहिए।


7. स्कारलेट ज्वर (Scarlet Fever)-


यह एक जीवाणुजनित रोग है जो हेमोलिटिक (Haemalvtic) वर्ग के स्टेप्टोकोकस स्कारलेटिनी (Strepto coccus scarlatinae) नामक जीवाणु के गले में प्रवेश करने के कारण होती है।

लक्षण-
  • ज्वर तथा गलशोथ हो जाता है
  • शरीर में लाल-लाल दाने निकल आते हैं।
  • पेरिकार्डियम, इडोकार्डियम तथा अंगुलियों की जोड़ों और कलाई में सूजन आ जाती है।
उपचार एवं बचाव-
  • रोगी को कम से कम तीन सप्ताह से पूर्णतः विश्राम करना चाहिए।
  • कमरे का तापमान लगभग 62 डिग्री. फारेनहाईट तक बनाए रखना चाहिए।
  • रोगी को हवादार कमरे में रखना चाहिए।
  • बुखार की हालत में रोगी को ग्लूकोज, नारंगी, शरबत, बार्ली-जल, पावरोटी, मक्खन, शहद, केला तथा हरी सब्जियाँ देनी चाहिए।
  • स्कारलेट बुखार की रोगनिरोधी इंजेक्शन (Prophilactic) ले लेनी चाहिए।
  • रोगी के संपर्क में आने से बचना चाहिए।

8. टेटनस (Tetanus)-


सामान्यतः इसे लॉक जॉ (Lock Jaw) या धनुष-टंकार या जंभुआ भी कहा जाता है। इस रोग का संक्रमण क्लॉस्ट्रियम टिटैनी (Clostrium tetani) नामक जीवाणु के कारण होता है। जीवाणु घाव से होकर शरीर में प्रवेश करता है। घाव में उत्पन्न जीव-विष (Toxin) रक्त-प्रवाह के जरिए केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Central nervous system) में आ जाता है और मेरूरज्जु की तंत्रिका कोशिकाओं में संचित हो जाता है। फलतः मस्तिष्क और पेशियों के बीच का सम्पर्क टूट जाता है, क्योंकि मस्तिष्क मेरूरज्जु स्थित प्रेरक तन्त्रिकाओं (Motornerves) के जरिए ही पेशियों को कार्य करने का आदेश देता है। जीवाणु जो जीवविष उत्पन्न करता है, उससे जीव-रासायनिक प्रतिक्रियाएँ (Biochemical reaction) बन्द हो जाती हैं और तंत्रिकाओं का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। फलतः पेशियों में आकुंचन और प्रसरण (Relaxation) नहीं हो पाता है और शरीर में अकड़न होने लगती है।
प्रोटोजोआ (अमीबा, प्लाज्मोडियम आदि) से और कृमि (Worm) से होने वाले रोग-


1. मलेरिया (Maleria)-


इस रोग का संचरण मादा एनोफिलिज मच्छर के काटने से होता है। इस रोग का रोगकारक प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ होता है। मादा एनोफिलिज मच्छर प्लाज्मोडियम का वाहक होती है, और जब प्लाज्मोडियम वाली मादा मच्छर मनुष्य को काटती है तो अपने डंक के द्वारा वह इस प्लाज्मोडियम को मनुष्य के शरीर में डाल कर मनुष्य को रोगी करती है।


2. निद्रारोग या स्लीपिंग सिकनेस (Sleeping Sickness)-


यह रोग ट्रिपोनोसोमा (Tryponosoma) नामक प्रोटोजोआ के संक्रमण से होता है। यह एक परजीवी है, जो सी-सी मक्खियों के शरीर में आश्रय पाता है। यह मक्खियाँ दो प्रकार की होती हैं-

(1) ग्लॉसिना पल्पेलिस (Glossina Palpalis) - यह ट्रिपोनोसोमा गैम्बिएन्स (Tryponosoma gambience) का वाहक होती है।

(2) ग्लॉसिना मॉर्सिटेन्स (Glossina morsitans) - यह ट्रिपोनोसोमा रोडेसिएन्स का वाहक होती है। इन मक्खियों के मनुष्य को काटने से ये प्रोटोजोआ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और शरीर की लसीका ग्रंथियाँ आकार में बढ़ने लगती हैं।

लक्षण-
  • शारीरिक तथा मानसिक निष्कियता उत्पन्न हो जाती है।
  • शरीर में दर्द तथा कमजोरी मालूम होती है।
  • रोगी दिन भर नींद में बोझिल मालूम पड़ता है, और हमेश ऊँघता रहता है।
उपचार एवं बचाव-
  • सी-सी मक्खियों को कीटनाशक का प्रयोग करके मार देना चाहिए।
  • ट्रिपर्सेमाइड (Trypasamide) इन्जेक्शन का पूरा कोर्स कर लेना चाहिए जिससे शरीर के अंदर प्रवेश किए हुए प्रोटोजोआ जीवन के जिस भी चरण में हो खत्म हो जाए।

3. फाइलेरिया (Filaria)-


यह सूत्र कृमियों (Nematodes) द्वारा होने वाला रोग है। फाइलेरिया फैलाने वाले कृमि अनेक प्रकार होते हैं-
  1. फाइलेरिया बैन्क्रॉफ्टी (Filaria bancrofti) और
  2. लोआ-लोआ (Loa-Loa)।
इन कृमियों का वाहक मच्छर होता है जिसे मादा क्युलेक्स फैटिगन्स (Female culex fatigans) कहते हैं। जब ये मच्छर मनुष्य को काटते हैं तो यह कृमि एवं इनके भ्रूण मच्छर के शरीर से हमारे रक्त प्रवाह में प्रवेश करते हैं। कृमि के ये भ्रूण लसीका-वाहिनी और लसीका ग्रन्थियों में चले जाते हैं। मनुष्य की लसीकावाहिनी एवं लसीका ग्रन्थियों में ही इस जीवाणु के भ्रूण विकसित होते हैं। ये जीवाणु लसीका वाहिनियों और ग्रन्थियों में घूमते हैं और इनके मार्ग में बाधा डालते हैं। इस कारण लसीका वाहिनियाँ एवं ग्रंथियाँ फूल जाती हैं, इसी को फाइलेरियोसिस कहा जाता है।

लक्षण-
  • आरंभिक अवस्था में तेज ठंड के साथ बुखार हो जाता है।
  • बुखार एक-दो दिनों में उतर जाता है।
  • फुला हुआ भाग दिनों-दिन बढ़ता जाता है।
उपचार एवं बचाव-

हेट्राजन (Hetrazan) की टेबलेट से रोगी को आराम मिलता है पर यह रोग को पूर्णतः समाप्त नहीं करता है।
रोगियों को दही, केला तथा अन्य चर्बी और प्रोटीनजनीय खाद्य पदार्थ नहीं देना चाहिए।
इससे बचाव के लिए मच्छरों को नष्ट कर देना।


उपापचय असंतुलन के कारण होने वाले रोग-

1. पीलिया (Jaundice)-


यह एक यकृत (liver) रोग है। इस रोग के अंतर्गत पित्तवर्णक (Bile pigment) अधिक मात्रा में रक्त में चला आता है। इसमें यकृत में पित्तवर्णक का स्त्राव अधिक होने लगता है परंतु यकृत की कोशिकाएँ इसका उत्सर्जन निम्न मात्रा में करती है।फलतः  पित्तकवर्णक यकृत-शिरा Hepatin) के जरिए रक्त में प्रवेश कर जाता है।

लक्षण-
  • त्वचा और नेत्रश्लेष्मा पिली पड़ जाती है।
  • पेशाब का रंग भी पिला पड़ जाता है।शरीर में इस पीलेपन के कारण ही इस रोग को पीलिया कहा जाता है।
उपचार एवं रोकथाम-
  • इस रोग से बचने के लिए ठंडक से बचना चाहिए।
  • हल्का परन्तु पौष्टिक भोजन करना चाहिए। 
  • रोगी को आहार में मॉस, मछली, अंडा, दूध, घी, तेल, मक्खन आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • पेट साफ रखना चाहिए तथा हवादार कमरे में रहना चाहिए। . रोगी द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुओं का उपयोग अन्य व्यक्तियों को नहीं करना चाहिए।


2. एडिसन रोग (Addison's Disease)-


सर्वप्रथम इस रोग की पहचान एडिसन नामक एक फिजीशयन ने की थी, इसीलिए इस रोग को एडिसन रोग कहा जाता है। एड्रिनल कॉर्टेक्स (Adrenal cortex- एड्रिनल ग्रन्थि का ऊपरी भाग) कई प्रकार के हार्मोनों का आन्तरिक स्त्राव करता है। इन हार्मोनों को कार्टिकोस्टिरायड्स (Corticosteroids) कहा जाता है। इसके अन्तर्गत एल्डोस्टिरोन (Aldosterone), हाइड्रोकार्टिसोन (Hydrocortisone) और कार्टिकोस्टिरोन (Corticosterone) आदि प्रमुख हार्मोन हैं। हाइड्रोकार्बन और कार्टिकोस्टिरोन प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट का उपापचय करते हैं। अतः एडिनल कार्टेक्स की क्रिया मन्द पड़ जाने के कारण, इन हार्मोनों का स्त्राव आवश्यक मात्रा में नहीं हो पाता है, जिसके कारण उपापचय में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है और व्यक्ति इस रोग का शिकार हो जाता है। इस रोग में वजन, भूख और रक्त-चाप में कमी आ जाती है। त्वचा का कॉसे के रंग का होना रोग का विशेष लक्षण है। यह रोग पहले घातक सिद्ध हुआ करता था परन्तु आजकल इस रोग की चिकित्सा एड्रिनल ग्रन्थि द्वारा स्त्रावित हार्मोनों से की जाती और मर्ज को बढ़ने से रोक दिया जाता है।


3. मधुमेह (Duabetes)-


यह गुर्दे से संबंधित रोग है, जो इन्सुलिन का पर्याप्त स्त्राव नहीं होने के कारण होता है। इस रोग में शर्करा (नहत) की मात्रा रक्त और मूत्र में आ जाती है। इन्सुलिन दो प्रकार का कार्य करता है। (1) भोजन का कार्बोहाइड्रेट वाला भाग पचाकर शर्करा में परिवर्तित हो जाता है, जो इन्सुलिन की प्रतिक्रिया से खंडित होकर तन्तुओं में मिल जाता है। इसके अभाव में यह शर्करा रक्त में चली जाती है। (2) इन्सुलिन यकृत और पेशियों में ग्लाइकोजिन संचित नहीं हो पाता है। फलतः यकृत में पूर्व संचित ग्लाइकोजिन का उपयोग होता है और ग्लाइकोजिन की मात्रा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। ऐसी स्थिति में तन्तुओं के प्रोटीन और संचित वसा शर्करा में परिवर्तित होने लगते हैं। इससे रक्त में शर्करा की मात्रा और बढ़ जाती है। यह शर्करा मूत्र के जरिए से बाहर निकलने लगती है, जिसे मधुमेह की संज्ञा दी जाती है।


4. थ्रॉम्बोसिस (Thrombosis)-


रक्तवाहिकाओं के छिद्र वसा संचित हो जाने के कारण संकीर्ण हो जाते हैं। फलतः इन रक्त वाहिकाओं से रक्त के प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है। मार्ग अवरूद्ध होने के कारण रक्त वाहिकाओ में रक्त जम जाता है। इसे थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है। उच्च रक्त चाप वाले व्यक्तिया में मह रोग होने की आशंका अधिक रहती है।
हृदय वाहिकाओं में रक्त जमने की प्रक्रिया को कॉरोनरी थ्रॉम्बोसिस (Coronary Thrombosis) कहा जाता है। कॉरोनरी थ्रॉम्बोसिस के कारण, हृदय की उन पेशियों को रक्त नहीं मिल पाता है, जिन्हें रक्त की आपूर्ति इन वाहिकाओं के द्वारा होती है। फलतः हृदय की लयबद्ध गति (Rhythmical Movement) में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। दिल का दौरा (Heart attack) में यही स्थिति उत्पन्न होती है।
धमनियों या शिराओं में रक्त का जो थक्का जमता है, वह टूट-टूट कर दूसरी धमनी या शिरा में आ जाता है। प्रमस्तिष्कीय धमनियों (Cerebral arteries) में ऐसी घटना घटने पर, मस्तिष्कीय कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है इसे स्ट्रोक (Stroke) कहा जाता है। इसकी चिकित्सा क्षतिग्रस्त वाहिकाओं की शल्य-क्रिया द्वारा की जाती है। परन्तु यह चिकित्सा अत्यन्त कारगर नहीं होती है। फिजियोथेरेपी और रिहैब्लिटेशन अधिक लाभकारी सिद्ध होता है।


5. कॉरोनरी थ्रॉम्बोसिस (Coronary Thrombosis)-


हृदय के पेशी तंतुओं को ऑक्सीजन, पोषक तत्व और अन्य आवश्यक तत्वों की आपूर्ति हृदय की बायीं और दायीं हृदय धमनियाँ (Coronary Arteries) करती हैं। उच्च रक्तचाप (Hypertension) और रक्त-कालेस्ट्रॉल में अधिक वृद्धि के कारण रक्त इन धमनियों में जम (Clotting of blood) जाता है। इससे हृदय की पेशियों को ऑक्सीजन और पोषाहार नहीं मिल पाता है। हृदय की रक्त वाहिकाओं में रक्त जमने की क्रिया को कॉरोनरी थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है।


6. दिल का दौरा (Heart Attack)-


हृदय धमनियाँ (Coronary Arteres) हृदय में पेशी-तन्तुओं को रक्त पहुँचाती हैं। हृदय-धमनियों में रक्त जम जाने के कारण, हृदय के पेशी-तन्तुओं को रक्त नहीं मिल पाता है। इससे हृदय में दर्द होता है, जिसे हृदय शूल (Angina pectoris) कहा जाता है। इससे हृदय की पेशियों में ऐंठन होती है और हृदय अपना कार्य करना बन्द कर देता है।
फलतः हृदय, रक्त का संचार नहीं कर पाता है, क्योंकि क्षेपक कोष्ठों में आकुंचन (Contraction) और प्रसरण (Relaxation) नहीं हो पाता है। इसे हृदय गति का रूक जाना या हश्द्पात (Heart Failure) कहा जाता है।


विटामिन की कमी से होने वाले रोग-

1. बेरी-बेरी (Beri-Beri)-


यह भोजन में विटामिन-बी-1 की कमी से होने वाला रोग है। विटामिन बी-1 कार्बोहाइड्रेट-उपापचय में मदद करता है। इसकी कमी के कारण उपापचय (metabolism) के दौरान, शरीर में जीव-विष उत्पन्न हो जाता है। हृदय का दायाँ प्रक्षेपक कोष्ठ बढ़ जाता है। यकृत और प्लीहा संकुचित (Congested) हो जाते हैं और फेफड़ों में सूजन हो जाता है।

लक्षण-
  • कमजोरी, पैरों में झनझुनी और हृदय-धड़कन की अनियमितता।
  • पैरों में सूजन
  • हृदय की गति बंद हो जाने की संभावना रहती है।
उपचार एवं उपाय-
  • इस रोग से बचने के लिए विटामिन बी-1 युक्त भोजन, जैसे मटर, शुष्क खमीर अण्डे का योक, दूध, चावल की भूसी, हरी सब्जियाँ आदि।


2. स्कर्वी (Scurvy)-


यह रोग भोजन में विटामिन 'सी' की कमी के कारण उत्पन्न होता है। विटामिन 'सी' एस्कॉर्बिक अम्ल (Ascorbic Acid) है, जो स्कर्वी निरोधी होता है। यह रोग बच्चे और वयस्क दोनों को होता है।

लक्षण-
  • मसूड़ों से रक्त का स्त्राव।
  • दाँतों का असमय टूटना।
  • बच्चों के चेहरे एवं अन्य अंगों में सूजन।
  • पेशाब में रक्त या एल्ब्युमिन का अंश आना और अन्त:पेशी से रक्त-स्त्राव होना।
उपचार एवं बचाव-
  • विटामिन 'सी' टमाटर, पत्तागोभी, प्याज, नींबू, संतरा, अंकुरा चना, हरी साग-सब्जी तथा ताजे फलों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
  • प्रतिदिन भोजन में 50-60 मिग्रा. विटामिन 'सी' की आवश्यकता होती है। अत: इस रोग से बचने के लिए उपयुक्त फलों और साग-सब्जियों का सेवन पर्याप्त मात्रा में करना चाहिए।
  • रोगी की एस्कॉर्बिक अम्ल की टेबलेट देनी चाहिए।

3. रिकेट्स या सुखण्डी (Rickets)-


यह रोग विटामिन डी की कमी से होता है। विटामिन डी की कमी के कारण कैल्सियम और फास्फोरस के लवण का उपापचय ठीक से नहीं हो पाता है, जिसके कारण अस्थियों में कैल्सियम संचित (Calcium deposit) नहीं हो पाता है। अतः अस्थियाँ कोमल हो जाती हैं। यह रिकेट-निरोधी विटामिन है, अत: इस रोग से बचने के लिए विटामिन डी युक्त भोजन ग्रहण करना चाहिए।

लक्षण-
  • शारीरिक वृद्धि का हास, अस्थियों का कोमल हो जाना, बच्चों को देर से चलना, अस्थियों का टेढ़ा हो जाना, पैर का टेढ़ा हो जाना, कूबड़ निकल आना आदि विटामिन डी की कमी के कारण होते हैं।
उपचार और रोकथाम-

बच्चों को प्रतिदिन 0.015-0.02 मिग्रा. और वयस्कों को 0.025 मिग्रा. विटामिन डी की आवश्यकता होती है। अतः इसक पूर्ति के लिए विटामिन 'डी' युक्त भोजन ग्रहण करना चाहिए। विटामिन डी मछली के तेल, मक्खन, कलेजी, अण्डे का योक और दूध में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। रोगी को उपर्युक्त विटामिन डी युक्त भोजन देने के अतिरिक्त धूप, परा-बैंगनी प्रकाश और मर्करी वेपर लैम्प के प्रकाश का सेवन कराया जा सकता है।


अरक्तता (Anemia)-


यह एक रक्त रोग है जिसमें सामान्यतः लाल रक्तकणों की संख्या या हिमोग्लिोबिन की मात्रा कम हो जाती है। हिमोग्लोबिन शरीर के ऊतकों को ऑक्सीजन पहुँचाने का कार्य करता है। इसकी कमी के कारण ऊतकों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाता। इससे पीड़ित व्यक्ति को थकान एवं हंफनी महसूस होती है। लाल रक्त कणों का निर्माण अस्थिमज्जा में होता है। इसकी गड़बड़ी के कारण लाल रक्त कणों का निर्माण समुचित मात्रा में नहीं हो पाता है। लाल रक्तकण सामान्यतः चार महीने तक जीवित रहने के बाद मृत हो जाते हैं और इसके स्थान पर नये लाल रक्तकणों का निर्माण होता है। कभी-कभी लाल रक्तकण चार महीने के भीतर ही नष्ट हो जाते हैं और नये कलाकारों का निर्माण शीघ्र नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति में भी लाल रक्तकणों की कमी हो जाती है। भोजन में विटामिन बी-12 या फॉलिक अम्ल की न्यूनता के कारण बड़ी, पीली तथा अस्वाभाविक आकार की रक्तकणिकाएँ उत्पन्न होती हैं, तथा श्वेत रक्त-कणिकाओं में अनेक केन्द्रक बन जाते हैं।

स्त्रोत-
विटामिन बी-12, कलेजी, अण्डा, दूध और खमीर में तथा फॉलिक अम्ल, ताजे फल एवं शाक-सब्जियों में पाया जाता है। भोजन में कमी के कारण अरक्तता होती है। किन्तु भोजन में इनकी समुचित मात्रा पूरी हो जाने के बावजूद शरीर में, अपेक्षित विटामिनों का स्वांगीकरण न होने के कारण भी इस रोग का आक्रमण होता है।


प्रणाशी अरक्तता-

इसके कारण हैं, विटामिन बी-12 का समुचित स्वांगीकरण न होना, भयानक रक्तस्त्राव तथा अस्थि-मज्जा से अपरिपक्व और अस्वाभाविक लाल रक्तकणों का निर्माण होना।
कछ अन्य रोग एवं रोगों के लक्षण :
एलर्जी छींकना खाँसना बुखार आदि वास्तव में रोग नहीं बल्कि रोगों के लक्षण है। जब हमारे शरीर में परेशानियां आती इसका मतलब कि हमारे शरीर के किसी अंग में कोई रोग हो गया है।


एलर्जी (Allergy)-



यह वस्तु विशेष के प्रति मनुष्य की अत्यधिक संवेदन-शीलता है, जो सामान्य मनुष्य में नहीं, पायी जाती है। औषधि, पराग, धूलकण, फफूंद, प्रसाधन सामग्री, रासायनिक पदार्थों और अनेक खाद्य पदार्थों से हे-फिवर (Hayfever) , दमा एक्जिमा, बुखार,, सरदर्द, सर्दी, अतिसार, आदि रोगों का होना इसके उदाहरण हैं। इसकी चिकित्सा ऐन्टीहिस्टामिन (Anti-histmines) औषधियों जैसे- कार्टिसोन (Cortisone) और ए.सी.टी.एच. हार्मोन से की जाती है। परन्तु यह इन दवाओं से जड़-मूल से समाप्त नहीं होती है।


ज्वर (Fever)-


शरीर के स्वाभाविक तापक्रम (98.4 degree F) से अधिक तापक्रम की स्थिति को ज्वर या बुखार कहा जाता है। वैसे तो ज्वर कोई रोग नहीं है बल्कि शरीर में हुए किसी रोग की प्रतिक्रिया है, रोग का एक लक्षण है, जो शरीर में किसी प्रकार के रोगाणु के प्रवेश करने या जीवविष उत्पन्न होने के कारण प्रकट होता है। जीवाणु या विषाणु जीव-विष उत्पन्न करते है जो रक्त प्रवाह में संचारित होने लगता है। रक्त की श्वेतकणिका, जिसमें जीवाण-भक्षण (Phatocvtosis) का गण है. इन जीवाणओं को नष्ट करने की कोशिश करती है। इसके साथ ही शरीर में जीवविष के विरूद्ध रोग-प्रतिकारक पदार्थों की भी प्रतिक्रिया होती है। इन सब प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप शरीर का स्वाभाविक तापक्रम बढ़ जाता है। शरीर का तापक्रम अधिक बढ़ जाने के कारण कुछ रोग के जीवाणु नष्ट भी हो जाते हैं। शरीर के सामान्य तापक्रम में अत्यधिक वृद्धि घातक भी सिद्ध हो सकती है। अतः बुखार मनुष्य का मित्र और शत्रु दोनों ही है।


डर्माटोविया (Dermatobia)-


इस रोग के प्रसार के लिए मच्छर और मक्खी दोनों जिम्मेदार होते हैं। इसमें मक्खी रोगकारक होता है, तथा मच्छर उसका वाहक। यह त्वचा से संबंधित रोग है, जो मनुष्य और मवेशी दोनों को होता है। डर्माटोबिया नामक बॉट फ्लाई (Bot fly) सोरोफोरा (Psorophora) मच्छर के शरीर पर अण्डे देती है। इस मच्छर के काटने पर बॉट फ्लाई के अण्डे मनुष्य या मवेशी की त्वचा में प्रवेश कर जाते हैं तथा तेजी से बढ़कर लार्वा का रूप ले लेते हैं। इसके फलस्वरूप त्वचा में सूजन हो जाता है।


स्ट्रोक (Stroke)-


प्रमस्तिष्कीय रक्तवाहिकाओं (Cerebral blood vessel) में रक्तस्त्राव, थ्रॉम्बुस (Thrombus) या इम्बोलुस (Embolus) के कारण मस्तिष्क को रक्त-आपूर्ति का विच्छेदित हो जाना स्ट्रोक कहलाता है। इसके कारण अस्थायी तौर पर बोली बन्द होना, मस्तिष्कीय कार्यों का सम्पादन न होना, अंगों में पक्षाघात तथा अचानक मृत्यु हो सकती है। मस्तिष्क की यह क्षति स्थायी सम्पादन न होना, अंगों में पक्षाघात तथा अचानक मृत्यु हो सकती है। मस्तिष्क की यह क्षति स्थायी भी हो सकती है। परन्तु इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि स्ट्रोक का प्रभाव मस्तिष्क के कितने भाग पर कितना पड़ा है। मस्तिष्क के एक भाग (बायें या दॉयें) का स्ट्रोक शरीर के दूसरे भाग के अंगों को प्रभावित करता है, क्योंकि मस्तिष्क-स्कंध (Brain stem) में एक भाग की तन्त्रिकाएँ मस्तिष्क से दूसरे भाग की तन्त्रिकाओं को आड़े काटती हुई नीचे उतरती हैं। इसका प्रभाव दृष्टि कॉर्टेक्स (Visual cortex) पर भी पड़ता है, क्योंकि मस्तिष्क के दाहिने भाग में (Stroke) होने पर, चर्बी बॉयी दृष्टि खराब हो जाती है।


मानसिक रोग (Mental disorders)-

आज के समय में मनुष्य शारीरिक बीमारियों से जितना पीड़ित है, उसके कहीं अधिक मानसिक परेशानियों से आहत है। रोज-मर्रा की भाग-दौड़, रिश्तों में कड़वाहट, काम का बढ़ता तनाव, नित्य असफलताएँ, आराम का अभाव व्यक्ति के मन मस्तिष्क को बुरी तरह प्रभावित करता है। सामान्य स्थिति में तो व्यक्ति चिंता, चिड़चिड़ापन, उदासी. विरक्तता का अनुभव करता है, परंतु तनावपूर्ण स्थिति का शीघ्र कोई समाधान न करने पर ये छोटी-छोटी समस्याएँ गंभीर अवसाद एवं अन्य मानसिक रोगों का कारण भी हो सकती हैं। ये मानसिक रोग सामान्यतः मरीज और उसके अभिभावकों की अनदेखी के कारण गंभीर हो जाते हैं, क्योंकि भारत में तो शारीरिक रोगों को नजरअंदाज कर दिया जाता है जो दैनिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं, तो मानसिक परेशानियों को नजरअंदाज करना तो स्वभाविक ही है। कुछ मानसिक रोग स्वत:जनित होते हैं जिनका कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है। कछ मानसिक रोग एवं रोगों के लक्षण निम्न हैं-


साइजोफ्रेनिया (Schizophrenia)-


यह एक मानसिक रोग है, जो अधिकांशतः युवा व्यक्तियों में देखा गया है। इस रोग के अंतर्गत रोगी कल्पना जगत को वास्तविक जगत की अपेक्षा अधिक सत्य समझ बैठता है। इसके अंतर्गत रोगी के कार्य, मनोभाव और चिंतन में कोई सामंजस्य नहीं रहता है। व्यक्ति को वे चीजें दिखाई या सुनाई देने लगती हैं, जो वास्तव में अस्तित्व रखती ही नहीं। कई बार तो व्यक्ति उन काल्पनिक चीजों का स्पर्श भी अनुभव करता है। मानसिक रोगों में यह सबसे सामान्य रोग है। अधिकांश मानसिक रोगी किसी प्रकार के साइजोफ्रेनिया से ही ग्रसित रहते हैं। क्योंकि पीड़ित व्यक्ति कल्पना जगत में जीने लगता है, और एक सामान्य इंसान की समझ से परे बातें करता है लोग उसे सामान्यतः पागल की संज्ञा दे देते हैं, जो इन रोगियों के प्रति घोर असंवेदनशीलता का प्रतीक है।


दुर्भीत (Phobia)-


किसी वस्त या प्रहला के पति असंगत और काल्पनिक भय का होना ‘फोबिया' कहलाता है। इस असंगत भय के विषय कुछ भी हो सकते हैं- जैसे ऊँचाई, पानी, गहराई, अंधेरा, सुई, मकड़ी, खिलौने, रंग, या कुछ भी। विभिन्न विषयों पर आधारित सभी दुर्भीत में एक चीज सामान्य है कि हर परिस्थिति में रोगी का डर असंगत होता है। उसके डर का कोई कारण नहीं होता। इसका उपचार बीहेवियर थैरेपी के द्वारा किया जाता है।


उन्माद (Mania)-


यह ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें अत्यन्त विश्रश्खल और असंगत मनोवेग उत्पन्न होते हैं। यह पागलपन की आरम्भिक अवस्था है। मेनिया को ही सामान्य भाषा में पागलपन कहा जाता है। इसके ईलाज के लिए मरीज को दवाओं का सेवन करना पड़ता है।


अवसाद (Dipression)-


अवसाद आजकल बहुत से युवाओं को प्रभावित करता है। लंबे समय तक घोर निराशा की स्थिति अवसाद को जन्म देती है। अवसाद की अति की अवस्था में मरीज को आत्महत्या के विचार आते हैं, और कई बार रोगी आत्महत्या करने की कोशिश करता है। अवसाद के मरीजों को अकेलेपन से दूर रहने की सलाह दी जाती है, और उनके मस्तिष्क की क्रियाशीलता को कम करने के लिए उन्हें antidipresant दिये जाते हैं।


बाईपोलर डिस्ऑर्डर (Bipolar Disorder)-


जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस रोग में रोगी का व्यवहार दो विपरीत अंत के बीच झूलता रहता है। कुछ दिन वह बहुत उत्साहित रहता है, और उसको ऐसा लगता है कि उसमें दुनिया जीत लेने की क्षमता है, तो कुछ दिन वह घोर अवसाद की स्थिति में चला जाता है। मरीज की ये दोनों मानसिक अवस्थाएँ तीन-चार दिनों के लिए रहती हैं और फिर बदल जाती हैं।


डेमेन्शिया (Dementia)-


यह अधिकांशतः बुजुर्गों में देखा जाता है। इस बीमारी के अंतर्गत व्यक्ति को अपना अतीत तो याद रहता है, उसको अपनी शादी की तिथि याद रहती है, उसके बच्चों का जन्मदिन, उसका पुराना घर सबकुछ याद रहता है लेकिन उसकी तात्कालिक याद्दाश्त कमजोर होने लगती है, जैसे वह यह भूल जाता है कि उसने खाना खाया या नहीं, उसने दवाई खाई या नहीं, उसको कहाँ जाना है, उसका घर कहाँ है आदि।


ऑबसेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर-


इसके अंतर्गत रोगी कुछ विशिष्ट तरीको के कार्यों को करने के लिए विवश हो जाता है, जिसके बारे में वह स्वयं जानता है कि वह गलत कर रहा है। जैसे- बार-बार ताला चेक करना, बार-बार हाथ धोना, बार-बार गैस का रेग्युलेटर चेक करना आदि।
  • ऐसे सुनने पर यह सामान्य व्यवहार लगता है, परंतु इस रोग का मरीज दिन-भर कुछ-कुछ मिनटों के अंतराल मे यह करता रहता है। सोने के बाद भी वह पूरी रात उठ-उठ कर यह करता रहता है।
  • 1946 में स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization- WHO) ने इसके अंदर तीन प्रकार के स्वास्थ्य की बात की-
  1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical health)
  2. मानसिक स्वास्थ्य
  3. सामाजिक स्वास्थ्य Social health)
  • WHO द्वारा प्रकाशित किताबें-
  1. इन्टरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ फन्कशनींग, डिसेबिलिटी एण्ड हेल्थ (International Classification of Functioning, Disability and Health- ICF)
  2. इण्टरनेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ डिजिजेस (International classification of Diseases -ICD) जीव विज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत रोग उत्पन्न करने वाले कारणों का विश्लेषण किया जाता है, उसे रोग-हेतु विज्ञान (Etiology) कहा जाता है।
  • हेमोफिलिया एक रक्त रोग है जिसमें रक्त के जमने की प्रक्रिया अवरूद्ध हो जाती है और छोटे से घाव के भी सुखने की संभावना कम हो जाती है।
  • फेनिलकिटोन्यूरिया में विषाक्त फिनाईलों (Toxic phenyls) का उपापचय करने वाले एन्जाइम की कमी हो जाती है; इससे रक्त-प्रवाह में फिनाईल उत्पन्न होने लगता है, आहार में अमीनो अम्ल की मात्रा कम कर, इसका ईलाज किया जा सकता है।
  • विटामिन बी-1 के स्त्रोत हैं- मटर, शुष्क खमीर अण्डे का योक, दूध, चावल की भूसी, हरी सब्जियाँ आदि। स्कर्वी विटामिन 'सी' की कमी के कारण उत्पन्न होता है। विटामिन 'सी' एस्कॉर्बिक अम्ल (Ascorbic Acid) है, जो स्कर्वी निरोधी होता है।
  • विटामिन 'सी' टमाटर, पत्तागोभी, प्याज, नींबू, संतरा, अंकुरा चना, हरी साग-सब्जी तथा ताजे फलों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
  • रिकेट्स या सुखण्डी रोग विटामिन- डी की कमी से होता है।
  • विटामिन डी की कमी के कारण कैल्सियम और फास्फोरस के लवण का उपापचय ठीक से नहीं हो पाता है, जिसके कारण अस्थियों में कैल्सियम संचित (Calcium deposit) नहीं हो पाता है। अतः अस्थियाँ कोमल हो जाती हैं। यह रिकेट-निरोधी विटामिन है।
  • विटामिन डी मछली के तेल, मक्खन, कलेजी, अण्डे का योक और दूध में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। चेचक फैलाने वाल वायरस को वैरियोला (Variola virus) कहा जाता है।
  • इन्फ्लुएंजा विषाणु एवं जीवाणु दोनों के द्वारा फैलता है।
  • इसका रोगकारक विषाणु जो मनुष्यों में इन्फ्लुएंजा फैलाता है, इन्फ्लुएंजा-B (Influenze-B) कहलाता है और जीवाणु जो इन्फ्लुएंजा फैलाता है वह वैसिलस इन्फ्लुएंजी कहलाता है।
  • रेबिज (हाइड्रोफोबिया) एक सांघातिक रोग है, जिसका संक्रमण केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) में होता है। रेबिज का उपचार संभव नहीं है, यदि एक बार इसके वायरस का शरीर पर हमला हो चुका है, तो रोगी की मृत्यु निश्चित होती है।
  • एड्स का पूरा शब्द 'एक्वायम्यनिट डिफिसिएन्सी सिन्ड्रोम' इसकसकसण अस संबंध एक ही सई से निजीवाणकत किए बिना कई व्यक्तियों के इन्जेक्शन लगाने तथा रक्ताधान के जरिए से होता है।
  • पोलियो निस्यन्दी विषाणु (Filterable virus) के कारण होता है।
  • पीत ज्वर के वाहक दो मच्छर होते हैं
  1. हेमोगोगस (Haemogogous)
  2. इडीस (Aedes)
  • डेंगू एक वायरस जनित रोग है जिसका वाहन तीन प्रजाति के मच्छर करते हैं
  1. इडिस इजिप्टी (Aedes Aegyptie)
  2. इडिस एल्बोपिक्टस (Aedes albopictus)
  3. क्यूलेक्स फटिगन्स Culex fatigans)। 
  • आंत्र ज्वर (टॉयफाइड) फ़ैलाने वाला जीवाणु बैसिल्स टाईफोसस (Basillus typhosus) है।
  • पेचिश जीवाणु एवं प्रोटेस्टा जनित संक्रामक रोग है।
  • हैजा फैलाने वाले जीवाणु को कॉलेरा विब्रियो (Cholera vibrio) के नाम से जाना जाता है।
  • डिप्थेरिया बच्चों को प्रभावित करने वाला एक संक्रामक रोग है। यह के.एल. बैसिलस KL basillus) नामक बैक्टीरिया द्वारा होता है।
  • प्लेग पेस्ट्युरेला पेस्टिस (Pasteurella Pestis) नामक जीवाणु के आक्रमण से होता है। यह रोग सर्वप्रथम चूहे को होता है और फिर चूहे से इंसानों में फैलता है।
  • तपेदिक फैलाने वाले जीवाणु को बैसिलस टयूबरक्यूलोसिस (Bacillus Tuberculosis) कहा जाता है। तपेदिक शरीर के विभिन्न भागों को प्रभावित करता है। फेफड़ों को प्रभावित करने वाले टीबी को फुप्फुसीय टीबी (Pulmonary TB) , आँत में होने वाले टीबी को आँत की टीबी (Intestinal TB) तथा अस्थि में होने वाले टीबी को अस्थि टीबी (Bone TB) कहा जाता है।
  • स्कारलेट ज्वर एक जीवाणुजनित रोग है जो मोलिटिक (Haemolytic) वर्ग के स्ट्रेप्टोकोकस स्कारलेटिनी (Strepto coccus scarlatinae) नामक जीवाणु के गले में प्रवेश करने के कारण होती है। टेटनस संक्रमण क्लॉस्ट्रियम टिटैनी (Clostrium tetani) नामक जीवाणु के कारण होता है।
  • मलेरिया का संक्रमण प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ के कारण होता है, तथा इसका संचरण मादा एनोफिलिज केवल मादा मच्छर ही काटते हैं क्योंकि इनको अपने अंडों के पोषण के लिए रक्त के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। नर मच्छरों में डंक का अभाव होता है जिससे वे रक्त नहीं चूस पाते। निद्रारोग या स्लीपिंग सिकनेस ट्रिपोनोसोमा (Tryponosoma) नामक प्रोटोजोआ के संक्रमण से होता है। फाइलेरिया सूत्र कृमियों (Nematodes) द्वारा होने वाला रोग है।
  • फाइलेरिया फैलाने वाले कृमि अनेक प्रकार होते हैं
  1. फाइलेरिया बैन्क्रॉफ्टी (Filaria banerofti) और
  2. लोआ-लोआ (Loa-Loa)।
  • फाइलेरिया कृमियों का वाहक मच्छर होता है जिसे मादा क्युलेक्स फैटिगन्स (Female culex fatigans) कहते हैं।
  • पीलिया एक यकृत (liver) रोग है। इसके अंतर्गत पित्तवर्णक (Bile pigment) अधिक मात्रा में रक्त में चला आता है।
  • मधुमेह में इन्सुलिन की कमी के कारण शर्करा (Sugar) की मात्रा रक्त और मूत्र में आ जाती है।
  • थ्रॉम्बोसिस में रक्तवाहिकाओं के छिद्र वसा संचित हो जाने के कारण संकीर्ण हो जाते हैं, फलतः इन रक्त वाहिकाओं से रक्त के प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है।
  • हृदय-धमनियों में रक्त जम जाने के कारण, हृदय के पेशी-तन्तुओं को रक्त नहीं मिल पाता है, इससे हृदय में दर्द होता है, जिसे हृदय शूल (Angina pectoris) कहा जाता है।
  • हृदय गति का रूक जाना या हश्द्पात (Heart Failure) कहा जाता है।
  • साइजोफ्रेनिया (Schizophrenia) के अंतर्गत रोगी कल्पना जगत को वास्तविक जगत की अपेक्षा अधिक सत्य समझ बैठता है। इसके अंतर्गत रोगी के कार्य, मनोभाव और चिंतन में कोई सामंजस्य नहीं रहता है।
  • किसी वस्तु या घटना के प्रति असंगत और काल्पनिक भय का होना 'फोबिया' कहलाता है।
  • डेमेन्शिया के अंतर्गत व्यक्ति को अपना अतीत तो याद रहता है लेकिन वह रोजमर्रा में होने वाली घटनाओं को भूलने लगता है।                                           

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