चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात (Cyclone and Anticyclone) |

स्थायी वायुदावं की पेटियों में स्थायी पवनें प्रवाहित होती हैं। इन्हीं स्थायी पवनों के क्षेत्र में ही चक्रवात, प्रतिचक्रवात, तड़ित झंझा आदि उत्पन्न होते हैं। वायुमण्डल की इन्हीं परिघटनाओं को द्वितीयक परिसंचरण की संज्ञा दी जाती हैं।
चक्रवात वह वायुदाब प्रणाली है जिसके केन्द्र में निम्न वायुदाब के कारण हवायें केन्द्र की ओर प्रवाहित होती हैं। इस निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर बढ़ते वायुदाब की रेखायें पाई जाती हैं। चक्रवाते में पवन की दिशा बाहर से केन्द्र की ओर होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में चक्रवात में वायु की दिशा घड़ी की दिशा के विपरीत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की दिशा के अनुकूल होती है। चक्रवात दो प्रकार के होते हैं |
1. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
2. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclone)
मध्य एवं उच्च अक्षांशों में विकसित चक्रवातीय वायु प्रणाली शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विकास 35०-65° अक्षांशो के मध्य दोनों गोलाद्धों में होता है। ध्रुवीय ठण्डी पवन एवं गर्म पछुआ पवनों के अभिसरण के क्षेत्र में वाताग्र के सहारे शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति होती है। यह चक्रवात-गोलाकार., अंडाकार या V आकार का होता है। आदर्श शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का दिर्घव्यास 1920 किमी. तक होता है। ये पछुआ पवनों के प्रभाव से पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होकर मध्य अक्षांशों के मौसम को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। इनकी सामान्य गति 32 से 48 किमी./घंटा होती हैं।
उत्पत्ति- शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का जनन ध्रुवीय वाताग्रों से संबंधित है जहाँ दो विपरीत स्वभाव वाली वायु अभिसरित होती हैं। इसकी उत्पत्ति के लिए दिए गए सिद्धांतों में वर्कनीज का ध्रुवीय वाताग्रं सिद्धांत सर्वाधिक मान्य है। उन्होंने शीतोष्ण चक्रवात की 6 क्रमिक अवस्थाओं का वर्णन किया।
1. स्थायी वाताग्र की अवस्था (Stationary front stage)
2. चक्रीय प्रवाह के प्रारंभ की अवस्था (Cyclonic circulation stage)
3. गर्म खंड के निर्माण की अवस्था (Warm sector formation stage)
4. शीत वाताग्र के अग्रसारित होने की अवस्था (Colf front overtaking stage)
5. संरोध की अवस्था (Occulation stage)
6. समापन को अवस्था (End Stage)
प्रारंभिक अवस्था में स्थिर वाताग्र का निर्माण होता है। यह वह स्थिति है जब दो भिन्न स्वभाव की वायु विपरीत दिशाओं से गति करते हुए निम्न वातगर्तों के निकट मिश्रण का प्रयास करती हैं। चूंकि दोनों वायु राशियों के गुण भिन्न होते हैं जिससे वे सहज ही मिश्रित नहीं हो पाते हैं। परन्तु पवनों का अग्र भाग जब एक दूसरे के संपर्क में आता है तो एक संक्रमण क्षेत्र का विकास होता है और यही संक्रमण क्षेत्र स्थिर वाताग्र है।।
शीतोष्णा चक्रवात के दूसरे अवस्था के अंतर्गत शीतल एवं उष्ण वायु स्थिर वाताग्र के ऊपर अपना प्रभाव स्थापित करती है। शीतल वायु अधिक घनत्व के कारण तुलनात्मक रूप से अधिक क्षैतिज गति करती हैं। इसीलिए वह वाताग्र पर दबाव उत्पन्न करतो है। स्थिर वाताग्र का वह भाग जिसमें स्थानांतरण की प्रवृत्ति विकसित होती है, उसे शीत वाताग्र कहा जाता है। इसका ढाल प्रपाती स्वरूप का होता है। इसके विपरीत स्थिर वाताग्र का वह भाग जिस पर गर्म वायु का प्रभाव होता है उसे गर्म वाताग्र कहा जाता है तथा यह ऊध्र्वाधर ढाल विकसित करता है।
तीसरी अवस्था में गर्म खंड (Warm Sector) का निर्माण होता है तथा गर्म वायु का क्षेत्र खंडीय रूप ले लेता है। इसका प्रमुख कारण शीत वाताग्रं का.पुन: स्थानांतरित होना है। इसी के साथ शीतल वायु के प्रश्नाव क्षेत्र में वृद्धि होती है एवं चक्रीय प्रवाह अधिक स्पष्ट एवं परिभाषित होता है। इस अवस्था में गर्म वायु का संपर्क अपने स्रोत क्षेत्र से टूट जाता है एवं वह खंडीय स्वरूप में गतिशील होती हैं।



शीतोष्ण चक्रवात अपने चौथे अवस्था में शीत वाताग्र एवं गर्म वाताग्र के और भी समीप चला जाता है तथा समीप पहुंचकर लगभग समानांतर स्थिति में आ जाता है। गर्म वायु का खंड लगभग रेखीय एवं सँकरे आकार का हो जाता है। अधिकांश क्षेत्रो में ठंडी वायु का प्रभाव भी स्थापित हो जाता है। इस अवस्था में चक्रवातीय प्रवाह का व्यास भी निर्धारित होता है जो सामान्यत: 500 कि.मी. से 3000 कि.मी. तक हो सकता है। शीत एवं उष्ण वाताग्र के अभिसरण से आवर्त जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे दोनों पवनों का मिश्रित चक्रीय प्रवाह स्पष्ट एवं परिभाषित हो जाता है। परन्तु इस अवस्था में दोनों पवनों की भिन्न प्रवाह की पहचान संभव है।

पाँचवी अवस्था में शीत एवं उष्ण वाताग्र मिलने की स्थित में होते हैं। आवर्त के निकट गर्म वायु का क्षेत्र सर्वाधिक सँकरा हो जाता है। अत: प्रारंभिक संरोध अर्थात् गर्म एवं शीत वाताग्र का मिलन उसी क्षेत्र में होती है। मिश्रित वाताग्र को हो संशोधित वाताग्र भी कहा जाता है। परन्तु इस स्थिति में भी चक्रवातीय प्रवाह के बाह्य क्षेत्र में शीत वाताग्र एवं उष्ण वाताग्र की स्थिति होती है तथा दोनों के मध्य उष्ण वायु का प्रवाह पाया जाता है।

छठे एवं अंतिम अवस्था में वाताग्र का समापन हो जाता है एवं इसी के साथ शीतोष्ण चक्रवात का भी अंत हो जाता है। गर्म खंड के समाप्त होते ही ठंडी वायु की दिशा पृथ्वी के घूर्णन से निर्देशित होने लगती है। अर्थात् वह शीतल वायु जो दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा में प्रवाह विकसित कर चुकी थी पुनः उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर प्रवाहित होने लगती है। इसी के साथ-साथ उपध्रुवीय निम्न भार के दक्षिण से पछुआ गर्म वायु का प्रवाह भी प्रारंभ हो जाता है। दूसरे शब्दों में, चक्रीय प्रवाह समाप्त हो जाते हैं एवं स्थायी या ग्रहीय वायु सतह पर पुनः गतिशील हो जाती हैं। पुन: दो विपरीत विशेषताओं की वायु दो विपरीत दिशाओं से चलते हुए एक संपर्क क्षेत्र को विकसित करते हैं जो नये वाताग्र जनन की प्रारंभिक स्थिति होती है। इस प्रकार वाताग्र के समापन के पश्चात् पुनः नये वाताग्र विकसित होते हैं। । सर्वप्रथम शीतोष्ण चक्रवात के निर्माण एवं आगमन की पूर्व सूचना पश्चिमी दिशा में क्षितिज पर दिखाई देने वाले पक्षाभ बादलों से होती है। इसके अलावा रात्रि में चन्द्रमा तथा दिन में सूर्य के चारों ओर प्रभामण्डल का निर्माण होता है। संपूर्ण शीतोष्ण चक्रवातीय क्षेत्र में विविध मौसमी विशेषताएँ पायी जाती हैं।


चक्रवात में मौसम तथा वर्षा की स्थितिः शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात पछुआ पवनों का अनुसरण करते हुए मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव डालता है। ये चक्रवात जिन क्षेत्रों से गुजरते हैं उन क्षेत्रों की मौसमी गतिविधियों में परितर्तन करते है।


शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के किसी क्षेत्र में आगमन की स्थिति में वायुदाब तीव्रता से कम होता है। आकाश में पक्षोभ मेघ विकसित होते हैं। जैसे-जैसे चक्रवात निकट आता है बादल घने व काले हो जाते हैं। मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में उष्ण वाताग्र का ढाल मंद होने के कारण गर्म वायु धीमी गति से ऊपर उठती है तथा वर्षा हल्की व लंबे समय तक होती है। वर्षा मुख्यत: वर्षा स्तरी मेघों से होती है। वायु की दिशा में परिवर्तन से उष्ण वृत्तांश का आगमन होता है तथा मौसम में अचानक परिवर्तन हो जाता है। आकाश बादल रहित तथा मौसम साफ व सुहावना होता है। शीत वाताग्र के आगमन से क्षेत्र के तापमान में कमी आती हैं। इस स्थिति में ठंडी वायु आक्रामक होने के कारण गर्म वायु को ऊपर धकेलती है जिससे आकाश में बादल छाने लगते है एवं वर्षा आरंभ हो जाती है। शीत वाताग्र की स्थिति में ढाल तीव्र होने के कारण गर्म वायु तीव्रती से ऊपर उठती है तथा आकाश में काले कपासी वर्षा मेघ छा जाते हैं तथा वर्षा मूसलाधार, अल्पकालिक व कम क्षेत्र में होती है। इस क्षेत्र में तड़ित झंझा व बिजली की चमक के साथ वर्षा होती हैं। शीत वाताग्र के गमन के पश्चात् शीत वृतांश का आगमन होता है। तापक्रम कम होने से वायुदाब में वृद्धि होती है एवं प्रतिचक्रवातीय दशाएँ विकसित होने लगती है तथा आकाश बादल रहित होकर साफ हो जाता है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के समाप्त होने के साथ ही पुन: चक्रवात के आगमन की दशाएँ निर्मित होने लगती है।


शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के क्षेत्र

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. उत्तरी प्रशांत में अल्यूशियन द्वीप के निकट के क्षेत्रों में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। यह प्रक्रिया शीत ऋतु में ज्यादा सक्रिय रूप से कार्यरत होती है क्योंकि इस क्षेत्र में शीतऋतु में दो भिन्न गुणों वाली वायुराशियों (ताप के संदर्भ में) का अभिसरण होता है। इससे कनाडा तथा यु.एस.ए. के अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा होती हैं।

2. आइसलैंड निम्न वायुदाब के क्षेत्र में - उत्तरी अटलांटिक महासागर में आइसलैंड द्वीप के निकट पछुआ तथा ध्रुवीय वायु के ''अभिसरण से शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। वस्तुत: यहाँ वाताग्र जनन की प्रक्रिया वर्ष भर चलती है परन्तु शीत ऋतु में अभिसरण करने वाली वायु राशियों के तापमान, आर्द्रता एवं स्थिरता जैसे गुणों में गल्फस्ट्रीम जलधारा के कारण व्यापक विषमता उत्पन्न होती है जिससे शीतोष्ण चक्रवातों का जन्म होता है। ग्रीष्मऋतु में वायुराशियों के तापमान में भिन्नता के कारण इसकी उत्पत्ति में कमी आती है। शीतऋतु में जहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी यूरोप तक वृष्टि होती है वहीं गर्मियों में पूर्वी क्षेत्र में वृष्टि सापेक्षिक रूप से कम होती है। इसके अलावा शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का पश्चिम से पूर्व की ओर गतिशील होने के ही कारण पश्चिम से पूर्व की ओर वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है। इस वर्षा से कड़ाके की सर्दी का आगमन तथा हिमपात भी होता है।


3. ग्रीनलैंड के दक्षिणी क्षेत्र एवं न्यूफाउंडलैंड के क्षेत्र में भी शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। ये मुख्यत: यू.एस.ए. के उत्तर-पूर्वी तथा कनाडा के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं। ग्रीनलैंड में इसी के कारण हिमपात होता है। इसके अलावा ये महासागरीय क्षेत्र में वृष्टि करते हैं।


4. मध्य अटलांटिक में यू.एस.ए. के उत्तर पूर्वी क्षेत्र यहाँ गल्फ स्ट्रीम के क्षेत्रों में उत्तरी अमेरिका से उत्पन्न शीतल एवं शुष्क वायु राशि का जन्म होता है जबकि यू.एस.ए. के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से उष्ण एवं आद्र वायु धाराओं का जन्म होता है तथा इन्हीं दोनों के अभिसरण से शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति होती है। इससे संपूर्ण उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तटीय क्षेत्र तथा ग्रीनलैंड में वर्षा होती है और इसका प्रभाव पश्चिमी यूरोप तक होता है।


5. भूमध्य सागरीय क्षेत्र में भी निम्न वायुदाय केंद्रों पर शीत ऋतु में शीतोष्ण चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। भूमध्यसागर में अफ्रीकी महाद्वीप से उष्ण एवं शुष्क महाद्वीपीय पवन, जो भूमध्य सागर में प्रवेश करते हैं और आर्द्रता युक्त हो जाती हैं, का अभिसरण यूरोपीय महाद्वीप से भूमध्यसागर की ओर गतिशील शीतल एवं शुष्क पवनों से होता है। इससे दक्षिणी स्पेन, द. पुर्तगाल, फ्राँस, इटली, यूनान और संपूर्ण भूमध्यसागरीय तटीय क्षेत्र के अलावा भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरी भारत में वर्षा होती है। इस वर्षा से शीत लहर का आगमन होता है तथा हिमालयी क्षेत्र में हिमपात भी होता है। इसी प्रकार से यूरोप के आंतरिक क्षेत्रों में भी हिमपात होता है। यह वर्षा शीतकालीन (रबी) फसलों हेतु काफी लाभदायक होती है। इससे भारतीय मैदान में हल्की एवं फुहार रूपी वर्षा होती है।



6. दक्षिणी गोलार्द्ध में सामान्यत: 45° से 65° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न होते हैं। इनकी आदर्श उत्पत्ति महासागरीय धरातल पर होती है, परन्तु दक्षिणी अर्जेन्टिना, द. अफ्रीका,द.ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा तस्मानिया द्वीप आदि में चक्रवात उत्पन्न होते हैं। 60° द. अक्षांशों के निकट शीतोष्ण चक्रवातों द्वारा तड़ित झंझाओं के निर्माण से तीव्र वृष्टि होती है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति 8०-15° उत्तरी अक्षांशों के मध्य महासागरों पर होती है। यह एक आक्रामक तूफान है जो तटीय क्षेत्रों की ओर गतिमान होते हैं। ये चक्रवात विध्वंसक प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। इन चक्रवातों को हिन्द महासागर में चक्रवात, अटलान्टिक महासागर में हरीकेन, पश्चिम प्रशान्त एवं दक्षिणी चीन सागर में टाइफून तथा पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में विली-विली के नाम से जाना जाता है।
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का व्यास सामान्य रूप से 80-300 किमी. तक पाया जाता है। इनके केन्द्र में वायुदाब 920-950 मिलीबार अंकित किया जाता है। चक्रवातों को विध्वंसक बनाने वाली ऊर्जा कपासी स्तरी मेघों से प्राप्त होती हैं जो इस तूफान के केन्द्र को घेरे रहते हैं। जलीय सतह से सतत् आर्द्रता की आपूर्ति इस तूफान को अधिक विनाशक बनाती हैं। स्थलीय क्षेत्र पर आर्द्रता की आपूर्ति बाधित होने से चक्रवात क्षोण होकर समाप्त हो जाते हैं। 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरने वाले चक्रवातो की दिशा अनिश्चित होती है तथा ये अधिक विध्वंसक होते हैं। क्षीण चक्रवात की गति 32 किमी./घंटा जबकि हरिकेन को गति 120 किमी./घंटा से भी अधिक तीव्र होती हैं।
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की विशेषताएँ -
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के केन्द्र में वायुदाब निम्न होता है। समदाब रेखायें वृत्ताकार व संख्या कम होती है।
  • इन चक्रवातों के आकार में पर्याप्त अन्तर होता है। इनका व्यास सामान्य रूप से 80 से 300 किमी. तक होता है।
  • ये चक्रवात जलीय भागों पर तीव्रता से गतिमान होते हैं। क्षीण चक्रवात की गति 32 किमी./घंटा, हरिकेन की 120 किमी./घंटा तथा सुपर चक्रवात की गति 200 किमी./घंटा तक या इससे भी अधिक होती है। स्थलों पर पहुँचने पर ये क्षीण हो जाते हैं क्योंकि आर्द्रता की आपूर्ति बाधित होती है।
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में वाताग्र का निर्माण नहीं होता है क्योंकि इस चक्रवात में तापमान सम्बन्धी भिन्नता नहीं होती है। इन चक्रवातों के प्रत्येक भाग में वर्षा होती है।
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवात व्यापारिक पवनों का अनुसरण करते हुए पूर्व से पश्चिम दिशा में अग्रसर होते हैं। इन चक्रवातों का भ्रमण पथ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग होता है। उपोष्ण कटिबन्ध में प्रवेश करते ही ये समाप्त होने लगते हैं।
  • सामान्यत: उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का आगमन ग्रीष्मऋतु में होता है। शीतकाल में इन चक्रवातों की उत्पत्ति नहीं होती है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की तुलना में इनका प्रभाव क्षेत्र व संख्या कम होती है।
  • ये चक्रवात अपनी प्रचण्ड गति एवं तूफानी स्वभाव के कारण अत्यन्त विनाशकारी होते हैं। तटीय क्षेत्रों में भारी वर्षा एवं बाढ़ की स्थित उत्पन्न करते हैं।
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति एवं विकास के लिए निम्नलिखित दशाओं का होना अनिवार्य है।
  • वृहत समुद्री सतह जहाँ तापमान 27° से अधिक हो।
  • चक्रवात के केन्द्र की आरोही वायु का तापमान व आर्द्रता अधिक होनी चाहिये।
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति के लिए कोरिऑलिस बल का होना अनिवार्य है। इसी कारण भूमध्य रेखा के समीप कोरिऑलिस बल के अभाव में इन चक्रवातों का विकास नहीं होता है।
  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवात अन्तराउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) से संबंधित होते हैं जहाँ उत्तर-पूर्व व्यापारिक पवनों एवं दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के अभिसरण के क्रम में चक्रवातीय दशा उत्पन्न होती है। सूर्य के उत्तरायण व दक्षिणायण के क्रम में अन्तराउणकटिबंधीय क्षेत्र (ITCZ) में परिवर्तन होता है। इस कारण शीतकाल में निम्न तापमान होने के कारण उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्पन्न नहीं होते हैं।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की संरचना -


उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र, जिसके चारों ओर वायु का परिसंचरण होता है, को चक्रवात की आँख कहते हैं। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 किमी. तक होता है।
इन चक्रवातों की ऊँचाई पृथ्वी से 10 से 15 किमी. तक होती है। 1000 मी. से 2000 मी. की ऊँचाई तक पवनें केन्द्र की ओर प्रवाहित होती हैं।

क्षोभमण्डल में 10 से 15 किमी. की ऊँचाई पर इन चक्रवातों से बाहर की ओर वायु प्रवाह होता है। इससे केन्द्र में वायु के अभिसरण होते हुए भी निम्न वायुदाब की स्थिति बनी रहती है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती है, किन्तु चक्रवात का केन्द्रीय क्षेत्र (आँख) शांत रहता है। ये चक्रवात तटीय क्षेत्रों के मौसम को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं।


उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के प्रकार

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के आकार में पर्याप्त अन्तर होता है। शीतोष्ण चक्रवात की भाँति इनमें तापमान संबंधी भिन्नता नही होती है क्योंकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में वाताग्र नहीं बनते हैं। उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के प्रत्येक भाग में वर्षा होती है। उष्ण कटिबंधीय चक्रवात व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में अग्रसर होते हैं। इन चक्रवातों के आकार, स्वभाव एवं तीव्रता के आधार पर निन रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
1. उष्ण कटिबंधीय विक्षोभ (Tropical Disturbance)
2. उष्ण कटिबंधीय अवदाब (Tropical Depression)
3. उष्ण कटिबंधीय तूफान (Tropical Stonn)
4. हरिकेन या टाइफून (Hurricane or Typhoon)
उष्ण कटिबंधीय विक्षोभ उष्ण चक्रवातों के प्रकारों में सर्वाधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है। यह विक्षोभ उष्ण एवं उपोष्ण दोनों कटिबन्धों को प्रभावित करता हैं। इन चक्रवातों में एक या दो समदाब रेखायें होती हैं तथा वायु क्षीण गति से केन्द्र की ओर प्रवाहित होती है। यह चक्रवात मन्द गति से आगे बढ़ता है। गति कम होने के कारण उष्ण कटिबंधीय विक्षोभ कभी कभी एक ही स्थान पर कई दिनों तक स्थिर रहता है जिससे कहीं-कहीं हल्की वर्षा होती है।
उष्ण कटिबंधीय अवदाबां का विकास अन्तर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्रों में होता है। इन अवदावों में एक से अधिक समदाब रेखायें होती हैं तथा यह आकार में छोटे होते हैं। इन चक्रवातों के अन्दर हवायं 40-50 किमी./घंटा की गति से प्रवाहित होती है। ये चक्रवात -मुख्य रूप से उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, जापान, चीन तथा ग्रीष्मऋतु में भारत के बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं। इन चक्रवातों से प्रभावित क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण बाढ़ आती है।

उष्ण कटिबंधीय तूफान में कई समदाब रेखायें होती हैं। ये अपनी गति एवं तीव्रता के कारण अधिक विनाशक होते हैं। हरिकेन । तथा टाइफून को इसी वर्ग में सम्मिलित किया जाता है। इन तूफानों को पश्चिमी द्वीप समूह में हरीकेन, चीन, फिलीपीन्स तथा जापान में टाइफून तथा हिन्द महासागर में साइक्लोन कहा जाता है।
हरिकेन एक प्रकार का उष्ण कटिबंधीय तूफान है जो कई समदाब रेखाओं से घिरा हुआ रहता है। अपनी गति के कारण ये काफी विनाशक होते हैं। हरीकेन की गति 120 किमी. घंटा से भी अधिक होती हैं किन्तु कम संख्या में आने के कारण इनका जलवायु संबंधी महत्त्व कम है। हरिकेन वायुप्रणाली, आकार तथा वर्षा के संबंध में लगभग शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की भाँति दिखाई पड़ते हैं। समदाब रेखा व दाब प्रवणता में अन्तर अधिक होने के कारण ये तीव्र गति से आगे बढ़ते हैं। बंगाल की खाड़ी में आने वाला सुपर साइक्लोन को इसी वर्ग में सम्मिलित किया जाता है। भारत में नीलम, लैला, फयान तथा फाइलीन नामक उष्णा कटिबंधीय चक्रवातों ने मध्य बंगाल की खाड़ी या अरब सागर क्षेत्र को काफी प्रभावित किया है। टॉरनेडो तथा वाटर स्पॉउट इसी श्रेणी के चक्रवात हैं।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में मौसम

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के किसी क्षेत्र में आगमन से तापमान में वृद्धि के साथ वायुदाब में कमी तथा वायु के वेग में वृद्धि होती है। आकाश में पक्षाभ मेघ के साथ काले कपासी वर्षा मेघ छा जाते हैं। आकाश में मेघाच्छादन के कारण दृश्यता समाप्त हो जाती है तथा मूसलाधार वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। कुछ घण्टे बाद अचानक वायु शान्त पड़ जाती है। आकाश मेघरहित होकर साफ हो जाता हैं। यह लक्षण चक्रवात की आँख का संकेतक है। इस अवस्था के बाद चक्रवात के पृष्ठ भाग के आने से मूसलाधार वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। यह दशा लम्बे समय तक बनी रहती है। जैसे-जैसे चक्रवात आगे बढ़ता है, वायुदाब में वृद्धि से वायु वेग मंद हो जाता है। तथा बादलों का आवरण हल्का होने से वर्षा क्षीण हो जाती है। चक्रवात के बाद आकाश से बादल छैट जाते है तथा मौसम साफ हो
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के क्षेत्र
।. उत्तरी प्रशान्त महासागर का पूर्वी क्षेत्र - मैक्सिको व मध्य अमेरिका के पश्चिम तटवर्ती क्षेत्र।
2. बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर।
3. दक्षिणी हिन्द महासागर - मेडागास्कर से 90° पूर्वी देशान्तर तक।
4. उष्ण कटिबंधीय उत्तरी अटलान्टिक महासागर - पश्चिमी द्वीप समूह, मैक्सिको की खाड़ी, कैरेबियन सागर |
5. उत्तरी प्रशान्त महासागर के पश्चिमी क्षेत्र - चीन सागर, जापान, फिलीपीन्स।
6. दक्षिणी प्रशान्त महासागर - समोआ, फिजी द्वीप, तिमोर सागर, ऑस्ट्रेलिया में क्वीन्सलैंड व न्यू साउथवेल्स का पृर्वी तट।

उष्ण कटिबंधीय एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की तुलना

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात
1.यह स्थल और सागरे दोनों पर विकसित होते हैं। इनकी समदाब रेखाएँ V आकार की होती हैं वायु का वेग अधिक नहीं होता।   वायुदाब प्रवणता कम होती है।


2. ये हजारों वर्ग किमी. में विस्तृत होते हैं। {500-3000 किमी.) ये प्राय: पश्चिम से पूर्व की ओर गमन करते हैं। वर्षा धीरे धीरे होती हैं. कभी-कभी तीव्र बौछारें होती हैं। वर्षा कई दिनों तक होती है।



3. इसके विभिन्न क्षेत्रों में ताप विभिन्नता होती हैं। इसमें प्राय: दो वाताग्र होते हैं। यह शीत ऋतु में अधिक उत्पन्न होते हैं।

4. चक्रवात के केंद्र/आवर्त में वर्षा प्राय: नहीं होती। चक्रवात समाप्त होने के बाद प्रति चक्रवात पैदा होते हैं। सामान्यत: महासागरों के पूर्वी भाग में उत्पन्न होते हैं। 35-65° अक्षांशों के मध्य इनकी उत्पत्ति होती है।
1.यह प्राय: महासागरों पर ही विकसित होते हैं। इनकी समदाब रेखाएँ V आकार की होती हैं। इनकी समदाब रेखाएँ प्रायः गोलाकार/पूर्णवृत्त होती हैं। वायु का वेग प्राय: 80 से 120 किमी./घंटा या इससे भी अधिक हो जाता है। वायुदाब प्रवणता प्राय: बहुत तीव्र होती है।

2. इनका विस्तार तुलनात्मक रूप से कम होता है। ये प्रायः पूर्व से पश्चिम.की ओर गमन करते हैं। ' | वर्षा बहुत तीव्र गति से होती है। (अधिक विनाशकारी ) वर्षा कुछ घंटे से अधिक नहीं होती, यदि चक्रवात रुक  जाए तो वर्षा कई दिन तक हो सकती हैं।

3.इसके क्षेत्रों पर ताप का वितरण लगभग समान होता है। इसमें वाताग्र प्रायः अनुपस्थित होते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु में अधिक उत्पन्न होते हैं।

4. चक्रवात के केंद्र में वायु शांत और वर्षा नहीं होती है। प्रति चक्रवात उत्पन्न नहीं होते हैं। सामान्यतः महासागरों के पश्चिम भाग में उत्पन्न होते हैं। 8-20° अक्षांशों के मध्य इनकी उत्पत्ति होती है।

प्रतिचक्रवात (Anticyclone)

प्रतिचक्रवात उच्च वायुदाय के वे विशाल क्षेत्र हैं जिसमें धरातल की हवाएँ केंद्र से बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं। यह वायुदाब का अंडाकार तथा गोलाकार संरचना है जिसमें सबसे अधिक वायुदाब केंद्र में होता है। हवाओं की गति की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के अनुरूप तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा के विपरीत होती है। प्रतिचक्रवात शब्द का प्रयोग सबसे पहले फ्रांसिस गाल्टन ने किया था।

एक प्रतिचक्रवातीय क्षेत्र दो चक्रवातीय क्षेत्र के मध्य उपस्थित होता है। प्रतिचक्रवातीय क्षेत्र में हवाएँ हल्की और मंद गति की होती हैं। वे कभी भी तीव्र गति से नहीं बहती और केंद्र प्रायः शांत क्षेत्र रहता है तथा वायु की गति 30-50 किमी./घंटा के लगभग होती है। प्रतिचक्रवातीय क्षेत्र के केंद्र में हवाएँ ऊपर से नीचे उतरती हैं, जिस कारण केंद्र का मौसम साफ होता है। वर्षा की संभावना नहीं होती हैं। प्रतिचक्रवात आकार में चक्रवातों की अपेक्षा अधिक विस्तृत होते है। प्रतिचक्रवात यद्यपि चक्रवातों के पीछे ही चलते हैं, परन्तु इनके मार्ग एवं दिशा में निश्चितता नहीं होती। प्रतिचक्रवात लगभग दीर्घवृतीय आकार के होते हैं। इन क्षेत्रों में तापमान की भिन्नता के साथ समदाब रेखायें दूर-दूर होती हैं।
प्रतिचक्रवात विशालकाय होते हैं। शीतोष्ण कटिबंधीय प्रति चक्रवात इतने अधिक विस्तृत होते हैं कि आधे संयुक्त राज्य अमेरिका पर विस्तृत हो जाते हैं। इसी प्रकार यूरेशिया में प्रति चक्रवात काला सागर से लेकर बेरिंग जलडमरूमध्य तक विस्तृत हो जाते हैं। कभी-कभी प्रतिचक्रवात का व्यास 9000 किमी. तक होता है।
प्रतिचक्रवात के प्रकार (Types of Anticyclone)
1. शीत प्रतिचक्रवात : आर्कटिक क्षेत्रों में शीतकाल में विकिरण द्वारा अत्यधिक ताप ह्रास होने तथा कण सूर्यातप मिलने के कारण उच्च दाब बन जाता है जिससे शीत प्रति चक्रवात उत्पन्न हो जाते हैं। कनाडा के उत्तर में उत्पन्न प्रतिचक्रवात कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका को प्रभावित करते हैं। साइबेरिया के उत्तर में उत्पन्न प्रतिचक्रवात चीन, जापान को प्रभावित करते हैं।
2. गर्म प्रतिचक्रवात : इन चक्रवातों की उत्पत्ति उपोष्ण उच्च वायुदाय पेटी में होती है, क्योंकि जो हवाएँ क्षोभसीमा से नीचे की ओर उतरती हैं, संपीड़न के कारण पृथ्वी के धरातल पर उच्च वायुदाब स्थापित करती हैं, इसी से हवाओं का अपसरण होता है। उपोष्ण कटिबंध होने के कारण सूर्यातप ज्यादा होता है जिससे अनुकूल गर्म प्रतिचक्रवाती स्थित पैदा होती है। ये प्रतिचक्रवात दक्षिण-पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप को अधिक प्रभावित करते हैं।
पुनः हफ्री (Humphrey) ने प्रतिचक्रवातों को तीन प्रकार में विभाजित किया है।
1. यांत्रिक प्रतिचक्रवातः वायु को संवहन गति से ऊपर उठी वायु जब 30 से 35° अक्षांशों के मध्य दोनों ही गोलाद्ध में अवतलित होती है तब इस क्षेत्र में यात्रिक प्रतिचक्रवात निर्मित होते हैं।
2. विकिरित प्रतिचक्रवात : ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में हमेशा अधिक ऊँचाई तथा मुक्त विकिरण के कारण उच्च वायुदाब की स्थित बनी रहती है। इस कारण यहाँ एक अस्थायी प्रतिचक्रवात का केंद्र बना रहता है।
3. तापीय प्रतिचक्रवात : यह एक अस्थायी स्वभाव वाला प्रतिचक्रवात है। इसकी उत्पत्ति ठंडी जलधाराओं द्वारा समुद्र के सतह के तापमान को कम कर देने के कारण उत्पन्न हुए उच्चदाब से होता है। बरमूडा तथा न्यूजीलैंड को छोड़कर यांत्रिक प्रतिचक्रवात का क्षेत्र तापीय प्रतिचक्रवात का भी क्षेत्र है।

वायुराशि तथा वाताग्र (Air Mass and Fronts) |


आर्द्रता एवं वर्षण (Humidity and Precipitation) |



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