आर्द्रता एवं वर्षण (Humidity and Precipitation) |


आर्द्रता एवं वर्षण (Humidity and Precipitation) |

अर्द्रता का अर्थ (Meaning of Humidity) :
वायुमंडल में उपलब्ध जल का गैसीय रूप (जलवाष्य) हो वायुमंडलीय आर्द्रता है। पृथ्वी के वायुमण्डल में गैसों के अलावा जलवाष्ण भी पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। जलवाष्प वायु में औसतन 2 से 5% तक उपलब्ध रहता है। सूर्यातप के कारण सायरीय जल भाप बनकर वायुमंडल में मिलता रहता है, जिससे वायुमंडलीय आर्द्रता में वृद्धि होती है। वायु के तापमान में वृद्धि से आर्द्रता में वृद्धि होती है। यही कारण है कि ग्रीष्म ऋतु में शीत ऋतु की अपेक्षा वायुमंडलीय आर्द्रता अधिक होती है। जब वायुमण्डल के ताप में परिवर्तन होता है, तो वायुमंडल की आर्द्रता धरातल पर ओस (Dew), पाली (Frost), धुन्ध (Mist) तथा धर्षण (Precipitation) आदि रूपों में दिखाई देती है।
आर्द्रता सामर्थ्य / आर्द्रता की मात्रा (Water vapour Capacity) :
किसी निश्चित ताप पर वायु के निश्चित आयतन पर अधिकतम नमी धारण करने की क्षमता को वायु की आर्द्रता सामर्थ्य कहते हैं। वायुमंडलीय आर्द्रता की प्रति घनफुट प्रति वर्ग सेमी. में मापा जाता है। प्रति घनफुट को ग्रेन में तथा प्रति वर्ग सेमी. को ग्राम में मापा जाता है। वायु के तापमान व आर्द्रता में सकारात्मक संबंध होता है। अर्थात् वायु में तापमान की वृद्धि से आर्द्रता धारण करने की क्षमता बढती है। उदाहरण के लिए यदि एक घनफुट वायु का ताप 30° F है, तो उसमें आर्द्रता की मात्रा 1.9 ग्रेन होगी, यदि वायु का तप्त 40° F हो जाये तो उसकी क्षमता 2.9 ग्रेन हो जायेगी अर्थात् वायु के ताप में 10° वृद्धि होने पर आर्द्रता 1 ग्रेन बढ़ जाती है। यदि वायु का ताप 100° F हो तो आद्रता 19.7 ग्रेन होती है।

भूमध्यरेखीय गर्म प्रदेशों में वायु गर्म होती है. इसलिए इस प्रदेश में आर्द्रता भी अधिक होती है, जबकिं धुर्वीय तथा ठंडे क्षेत्रों में आर्द्रता बहुत कम होती है सामान्यत: गर्म मरुस्थलों के वायुमण्डल में आर्द्रता नहीं होती है, क्योकि यहाँ जल की उपलब्धता हो होती है।
आर्द्रता के रूप (Types of Humidity) : वायुमडलीय आर्द्रता को निनलिखित रूप में व्यक्त किया जाता है |
1. निरपेक्ष आर्द्रता (Alsolute Humidity) -
वायुमंडल के किसी भाग में स्थित जलवाष्य की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।
जैसे - एक घनफुट वायु का ताप 70° F है और उसमें 8 ग्रेन जलवाष्म स्थित है, तो यह वायु की निरपेक्ष आर्द्रता है। दूसरे शब्दों में वायु के निश्चित ताप एवं आयतन पर उपस्थित जलवाष्म की मात्रा निरपेक्ष आर्द्रता है। यह आर्द्रता की वास्तविक मात्रा को प्रकट करती है। वायु की निरपेक्ष आर्द्रता में वाष्पीकरण द्वारा वृद्धि तथा वर्षा द्वारा कमी होती है। निरपेक्ष आर्द्रता पर तापमान में वृद्धि या कमी का कोई प्रभाव नहीं होता है, लेकिन वायु के आयतन में परिवर्तन से आर्द्रता घट-बढ़ सकती है। भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर निरपेक्ष आर्द्रता में कमी आती हैं।
सागरों पर निरपेक्ष आर्द्रता अधिक तथा महाद्वीपों पर कम होती है। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु में निरपेक्ष आर्द्रता अधिक और शीत ऋतु में कम होती है।
2. सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) -
किसी निश्चत ताप एवं आयतन वाली वायु की आर्द्रता सामर्थ्य तथा उसमें उपस्थित आर्द्रता की वास्तविक मात्रा के अनुपात को सापेक्षिक आर्द्रता कहते हैं। जैसे- एक घनफुट वायु 70° F पर 8.0 ग्रेन तक जलवाष्प धारण कर सकती है, किन्तु यदि उसमें केवल 4 ग्रेन जलवाष्प है तो उसकी आर्द्रता धारण करने की क्षमता को आधा भाग (50 प्रतिशत) ही उस वायु में उपलब्ध है। यही सापेक्षिक आर्द्रता है।
सापेक्षिक आर्द्रता = निरपेक्ष आर्द्रता/आर्द्रता सामर्थ X 100
= 4/8 x 100 = 50%
विषुवतरेखा के समीप सापेक्षिक आर्द्रता अधिक जबकि विपुवत रेखा से 30° अक्षांश तक सापेक्षिक आर्द्रता की मात्रा कम होती है। वहीं 30° अक्षांश के बाद उच्च अक्षांशों में सापेक्षिक आर्द्रता की मात्रा में वृद्धि होती है। ध्रुवों पर ताप निम्न होने के कारण सापेक्षिक आर्द्रता की मात्रा कम होती है। सापेक्षिक आर्द्रता तथा वर्षा में प्रत्यक्ष संबध है अर्थात् वायु में सापेक्षिक आर्द्रता में वृद्धि से वर्षा की संभावना बढ़ जाती है। वाष्पीकरण तथा सापेक्षिक आर्द्रता में विपरीत संबंध होता है।
यदि वायु में सापेक्षिक आर्द्रता अधिक है तो वाष्पीकरण कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता कम होने की स्थिति में वाष्पीकरण अधिक एवं सर्वाधिक आर्द्रता स्वास्थ्य से सीधे संबंधित है। सापेक्षिक आर्द्रता अधिक या कम होने की स्थिति स्वास्थ्य के लिए होती है। यही कारण है कि अधिक सापेक्षिक आर्द्रता वाला विषुवतीय प्रदेश तथा न्यून सापेक्षिक आर्द्रता वाले उष्णकटिबंधीय मरुस्थलों में जनसंख्या का बसाव कम है। सापेक्षिक आर्द्रता वस्तुओं के स्थायित्व, विद्युतयंत्रों, रेडियो आदि पर भी प्रभाव डालती है।

विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity) -
वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं। इसे , ग्राम प्रति किलोग्राम में प्रदर्शित करते है चूँकि इसे भार की इकाइयों के रूप में मापा जाता है अतः इस पर वायुदाब एवं तापमान में परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आर्द्रता को व्यक्त करने का यह उपयोगी तरीका है।
वाष्पीकरण (Evaporation)
जल के वाष्प में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। इसकी मात्रा मुख्यत: वायु के तापमान, गति तथा शुष्कता पर निर्भर करती है। अधिक तापक्रम वाली शुष्क वायु में वाष्प ग्रहण करने की अधिक क्षमता होने के कारण अधिक वाष्पीकरण होता है।
• महाद्वीपों की अपेक्षा महासागरों पर वाष्पीकरण अधिक होता है।
• महाद्वीपों पर सर्वाधिक वाष्पीकरण 10° उत्तर से 10° दक्षिण अक्षांशों के मध्य विषुवतीय जलवायु वाले क्षेत्रों में होता है।
• महासागरों पर सर्वाधिक वाष्पीकरण 10° से 20° अक्षांशों के मध्य दोनो गोलाद्धों में होता है।

संघनन (Corideusation)
जलवाष्य के द्रव में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को संघनन कहते हैं। यदि वायु ओसांक/ओस बिंदु (Dews Point) से नीचे शीतल होती है तो वायु के जलवाष्प की कुछ मात्रा जल में परिवर्तित हो जाती है। यदि वायु का तापमान हिमांक से नीचे हो तो जलवाष्प हिम क्रिस्टलों में परिवर्तित हो जाता है। संघनन दो कारको पर निर्भर करता है-
1. वायु की सापेक्षिक आर्द्रता
2. वायु को शीतलन की मात्रा।
यही कारण है कि मरुस्थलीय क्षेत्रों में ओसांक बिंदु पर पहुँचने हेतु अधिक शीतलन की आवश्यकता होती है। संघनन तथा वाष्पीकरण एक दूसरे की विपरीत क्रिया है। जहाँ वाष्पीकरण में जल का परिवर्तन वाष्प में होता है, वही संघनन में जल का परिवर्तन तरल या ठोस में होता है। परन्तु किसी भी प्रकार के स्वरूप के परिवर्तन हेतु वायु में उपलब्ध गुप्त उष्मा महत्त्वपूर्ण होती हैं।

वर्षण (Precipitation)
जब आर्द्र वायु की अपार मात्रा किसी कारणवश (उष्ण होकर, परिसंचरण प्रक्रिया से या विक्षेपक बल द्वारा) ऊपर उठती है। तो उसके तापमान में क्रमश: गिरावट आने लगती है जिससे अंतत: एक ऊँचाई पर पहुँचने के बाद वे संघनित होने लगते हैं और संघनन से मेघों की उत्पत्ति होती है। मेघ जल के महीन बूंदों अथवा छोटे-छोटे हिमकणों अथवा दोनों ही से निर्मित होते हैं। बूंद भार में हल्की होने के कारण मेघों को त्याग नहीं पाती है। परंतु जब छोटी-छोटी जल बूंदें आपस में संयुक्त होकर बड़ी बूंदों में बदल जाती है, तो उनका भार इतना अधिक हो जाता है कि वे मेघों को त्यागकर धरातल पर तरल अवस्था या ठोस रूप में गुरुत्वाकर्षण बल के कारण गिरने लगती हैं। इसी प्रक्रिया को वर्षण (Precipitation) कहते हैं। यह वर्षण जल वर्षा, हिम , फुहार तथा ओलावृष्टि आदि के रुप में हो सकता है।
वर्षण के रूप - वर्षण जल या ठोस या दोनों के मिश्रित रूप में हो सकता है। जब तापमान हिमांक से नीचे होता है तो वर्षण हिमकणों के रूप में होती हैं जिसे हिमपात (Snowfall) कहते हैं। हिमपात प्राय: पर्वतों के ढालों या उच्च अक्षांशी क्षेत्रों में होता है। जल वृष्टि तथा हिम वृष्टि के मिश्रण को सहिम वृष्टि (Sleet) कहा जाता है। जब धरती के समीप वायु की परत का तापमान हिमांक से ऊपर हो तब ऐसी परिस्थिति में सहिम वृष्टि होती है। स्लीट वर्षण का विश्व प्रसिद्ध क्षेत्र साइबेरिया है। भारत में शिमला, मसूरी, रानीखेत आदि में स्लीटवर्षा शीतऋतु में होती है। स्लीट को बर्फ बजरी भी कहते हैं। जब बर्फ की कड़ी एवं वही गोलियों की बौछार होने लगती है तो इसे ओला (Hail) कहते हैं।
ओला में बर्फ की कई संकेद्रीय परतें होती हैं। यह एक मिश्रित बर्षण है। ओलावृष्टि के लिए संतृप्त वायु का तापमान हिमांक से नीचे व सतह का तापमान हिमांक से ऊपर होना आवश्यक है। सामान्यत: 30° से 60° उच्च अक्षांशों के मध्य तथा अधिक ऊँचाई के उच्चावच प्रदेशों में ओलावृष्टि देखने को मिलती है। जब वर्षा की बूंदें अत्यन्त सूक्ष्म, सघन एवं समान आकार की होती है तथा वायु की दिशा में उड़ती हुई प्रतीत होती है तो ऐसी वृष्टि फुहार (Drizzle) कहलाती है।

वर्षा के प्रकार (Kinds of Rainfall) :

1. संवहनीय वर्षा (Convectional Rainfall) :
संवहनीय वर्षा मूलत: जल बूंदों की वृष्टि है। विषुवतीय प्रदेश में अंतर उष्ण अभिसरण अभिक्रिया से गर्म वायु मिश्रित होकर लंबवत् रूप से ऊपर उठती. है तथा शुष्क एड़ियाबेटिक दर से शीतल होकर संतृप्त होने लगती हैं। इससे संघनन के बाद कपासी वर्षा मेघ का निर्माण होता है तथा विषुवतीय प्रदेश में लगभग प्रतिदिन 5° उत्तरी अक्षांश से 5° दक्षिणी अक्षांश के बीच भारी वर्षा होती है। वर्षा प्राय: अपराह्न में होती हैं। इस प्रकार की वर्षा ग्रीष्म ऋतु के समय महाद्वीपों के अधिक गर्म होने से मरुस्थलीय या अर्द्धमरुस्थलीय क्षेत्रों में आकस्मिक तथा तीव्र वर्षा (Torrential Rain) के रूप में भी देखने को मिलता है। इस प्रक्रिया में न्यूनतम समय में अधिकतम वर्षा होती है।

2. पर्वतीय वर्षा (Mountain Rainfall) :
जब पर्वतीय ढाल के सहारे जलवाष्प युक्त वायु ऊपर उठती हैं तो ऊपर उठने के क्रम में वायु के तापमान में कमी आने से वायु संतृप्त होकर बादलों का निर्माण करती है तथा पर्वतीय ढाल पर वर्षा होने लगती है। पर्वतीय वर्ष में पवनाभिमुख ढाल (Leeward Slope) पर वर्षा की मात्रा अधिक होती है। पवनाविमुख ढाल (Windward Stope) वाले क्षेत्र में कम वर्षा के क्षेत्र को वृष्टि छाया क्षेत्र (Rain Shadow Region) कहते हैं। भारत में महाबलेश्वर एवं पुणे में, पुणे वृष्टि छाया क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। यहाँ वर्षा की मात्रा 70 सेमी. होती है जबकि महाबलेश्वर में वर्षा की मात्रा 600 सेमी. है क्योंकि महाबलेश्वर पवनाभिमुख ढाल पर स्थित है। पर्वतीय वर्षा को पर्वत की स्थिति, सागर से दूरी पर्वत की ऊँचाई तथा पवन की आर्द्रता आदि कारक प्रभावित करते हैं।
पर्वतीय वर्षा की विशेषताएँ :
1. पवनमुखी ढाल पर अधिक वर्षा जबकि पवन विमुख ढाल पर न्यून वर्षा होती है।
2. पवनमुखी ढाल पर कपासी बादल तथा पवन विमुख ढाल पर स्तरी (Stratus) बादल निर्मित होते हैं।
3. पर्वतीय ढालों तथा पर्वतपदीय भागों में सर्वाधिक वर्षा तथा क्रमश: दूरी बढ़ने पर वर्षा में कमी आती है।
4. पर्वत की ऊँचाई एक हजार मीटर या उससे कम होने पर सर्वाधिक वर्षा पर्वत के शीर्ष के निकट होती है, जबकि पर्वत की ऊँचाई 1500 मीटर से अधिक होने पर सर्वाधिक वर्षा शीर्ष के नीचे मध्यवर्ती भाग में होती है।
5. पर्वतीय वर्षा के अंतर्गत अत्यधिक ऊँचाई पर कम वर्षा तथा कम ऊँचाई पर अधिक वर्षा होती है, जिसे वर्षा का प्रतिलोमन कहते हैं। |


3. चक्रवातीय वर्षा (Cyclonic Rainfall) :
चक्रवातीय वर्षा उस प्रक्रिया का परिणाम है, जिसके अंतर्गत किसी निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर वायु चक्रीय प्रवाह करते हुए ऊपर उठकर संतृप्त वायु में परिवर्तित होकर वर्षा करती है। चक्रवातीय वर्षा दो प्रकार की होती है। पहला शीतोष्ण चक्रवातीय वर्षा जिसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: शीतोष्ण जलवायु क्षेत्र है। यहाँ गर्म और ठंडी वायु के अभिसरण प्रक्रिया से वाताग्र की उत्पत्ति होती है।
शीत वाताग्र के स्थानांतरण प्रक्रिया से गर्म वायु ऊपर उठने लगती है और ऊपर उठती हुई गर्म वायु ही संतृप्त होकर वर्षा करती है।
उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वर्षा होती है।उष्ण  चक्रवात की उत्पत्ति मुख्यतः 8° से 20° अक्षांशों के मध्य होती है। इस चक्रवात के अंतर्गत, गर्म वायु निम्नं वायु दाब केन्द्र के चारों तरफ चक्रीय रूप में प्रवाहित होकर ऊपर उठने के क्रम में शुष्क एडियाबेटिक दर से क्रमश: शीतल होती है, और बादल का निर्माण करती है जिससे वर्षा होती हैं।

विश्व में वर्षा का वितरण
विश्व में औसत वार्षिक मात्रा 97 सेमी. होती है। विषुवत रेखा से 10° उत्तर से 10° दक्षिणी अक्षांशों में काफी अधिक वर्षा होती है। दोनों गोलाद्धों में 10° से 20° अक्षांशों के मध्य व्यापारिक, हवाओं द्वारा महाद्वीपों के पूर्वी भाग में वर्षा होती है जबकि पश्चिमी भाग में शुष्कता रहती है। 20 से 30 अक्षांशों के मध्य दोनों गोलाद्ध में प्रतिचक्रवातीय दशा के कारण वर्षा नहीं होती " है। विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल इन्हीं अक्षांशों के मध्य स्थित हैं। 30 से 40° अक्षांशों के मध्य महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में जाड़े में वर्षा होती है क्योंकि यह क्षेत्र शीतऋतु में पछुआ पवनों के प्रभाव में आ जाता है तथा महासागरों की ओर से प्रवाहित होने वाली पवनें इस क्षेत्र में वर्षा करती हैं। दोनों गोला में 40° से 60° अक्षांशों के मध्य पछुआ पवनों द्वारा वर्षा होती है। इस क्षेत्र को द्वितीय अधिकतम वर्षा की 'पेटी कहा जाता है। 60° अक्षांशों से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा में कमी होती है तथा 75° अक्षांशों से आगे वर्षा की मात्रा 75 सेमी. ही रह जाती है।

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