जैविक समदाय का वर्गीकरण (Classification of Living Organism) |

हमारे चारों ओर असंख्य प्रकार के जीवधारी विद्यमान हैं। इनमें सूक्ष्मदर्शी से देखे जा सकने वाले जीवाणु (बैक्टीरिया) से लेकर 30 मीटर लंबे ब्लू व्हेल एवं 100 मीटर लंबे रेडवुड के वृक्ष तक शामिल हैं। कुछ पादप हज़ारों वर्षों तक जीवित रहते हैं जबकि कई कीटों का जीवनकाल कुछ घंटों या कुछ दिनों का ही होता है। पृथ्वी की यह असीमित जैव-विविधता लाखों वर्षों के जैविक विकास का परिणाम है।

अतएव इस असीम जैव समुदाय के अध्ययन के लिये हमें जीवधारियों को कुछ समूहों में वर्गीकृत करना पड़ता है ताकि समान गुणों एवं संरचना वाले जीवों का अध्ययन एक साथ किया जा सके।
जीवों के वर्गीकरण के प्रारंभिक प्रयास प्रसिद्ध यूनानी विचारक अरस्तू के काल से ही दिखते हैं जब उन्होंने प्राणियों का वर्गीकरण स्थल, जल एवं वायु में रहने के आधार पर किया था। उल्लेखनीय है कि जीव विज्ञान के सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास में अरस्तू के महत्त्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें जीव विज्ञान का पिता (Father of Biology) भी कहा जाता है।

जीवों के आधुनिक वर्गीकरण की शुरुआत कैरोलस लीनियस के द्विजगत-सिद्धांत (Two Kingdom Classification) से होती है। उन्होंने जीवों को जंतु जगत (Animal Kingdom) और पादप जगत (Plant Kingdom) में विभाजित किया। इसीलिये लीनियस को वर्गिकी का पिता (Father of Taxonomy) भी कहा जाता है। लीनियस ने ही जीवों के नामकरण की द्विनाम पद्धति (Binomial System of Nomenclature) विकसित की थी, जिसके अंतर्गत प्रत्येक जीव के नाम के दो भाग होते हैं। पहला भाग उसके वंश (Genera) का द्योतक होता है जबकि दूसरा उसकी जाति (Species) का जैसे मानव का वैज्ञानिक नाम होमोसेपियंस है जहाँ होमो वंश है जबकि सेपियंस जाति है।

आधुनिक जीव विज्ञान में सर्वाधिक मान्यता आर.एच. व्हिटेकर के 'पाँच जगत वर्गीकरण' को दी जाती है। उन्होंने जीव जगत (Kingdom) को पाँच बड़े वर्गों मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई, प्लांटी, एनिमेलिया में बाँटा है।

• मोनेरा: यह एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीवों का समूह है, अर्थात् इनमें न तो संगठित केंद्रक होता है और न ही विकसित कोशिकांग होते हैं। इनमें से कुछ में कोशिकाभित्ति पाई जाती है तथा कुछ में नहीं। पोषण के स्तर पर ये स्वपोषी अथवा विषमपोषी दोनों हो सकते हैं।
उदाहरणार्थः जीवाणु, नील हरित शैवाल अथवा सायनो बैक्टीरिया, माइकोप्लाज्मा आदि।

प्रोटिस्टा: इनमें एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव आते हैं। इस वर्ग के कुछ जीवों में गमन के लिये सीलिया, फ्लैजेला नामक संरचनाएँ भी पाई जाती हैं। ये स्वपोषी और विषमपोषी दोनों तरह के होते हैं, उदाहरणार्थ- एककोशिकीय शैवाल, डायटम, प्रोटोज़ोआ इत्यादि। पैरामीशियम और अमीबा इसी जगत के सदस्य हैं।

लाइकेन (Lichen):  लाइकेन मुख्यतः शैवाल तथा कवक के साहचर्य के परिणामस्वरूप बनते हैं। शैवाल के घटक को शैवालांश तथा कवक के घटक को कवकांश कहते हैं, जो मुख्यतः स्वपोषी तथा परपोषित होते हैं। शैवाल कवक के लिये भोजन संश्लेषित करता है, तो कवक शैवाल के लिये आश्रय देता है। 
इन दोनों की घनिष्ठता इतनी है कि यदि इनको (लाइकेन) प्रकृति में देख लो, तो यह अनुमान लगाना असंभव है कि इसमें दो भिन्न प्रकार के जीव उपस्थित हैं। लाइकेन प्रदूषित क्षेत्रों में नहीं उगते हैं, अर्थात् यह प्रदूषण के अच्छे संकेतक होते हैं। ये वनस्पतियों और उचित भूमि निर्माण के आविष्कर्ता हैं। लाइकेन विशेषकर क्रस्तोज लाइकेन, चट्टानों का क्षरण करके उन्हें मृदा में परिवर्तित कर देते हैं। कुछ लाइकेनों में टैनिन होता है,
जो पशुओं की कच्ची खाल पकाने में प्रयुक्त होता है। लाइकेन की कुछ जातियों में सुहावनी गंध होती है। इस कारण यह सुगंध और साबुन बनाने के काम में लाए जाते हैं।

फंजाई (कवक): ये विषमपोषी यूकैरियोटिक जीव हैं। ये पोषण के लिये सड़े-गले कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं, अतः इन्हें मृतजीवी भी कह दिया जाता है। इनमें से कई अपने जीवन की एक विशेष अवस्था में बहुकोशिकीय क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। इन कवकों में काइटिन नामक जटिल शर्करा की बनी हुई कोशिका भित्ति पाई जाती है। यीस्ट, मशरूम आदि इसी जगत के सदस्य हैं।

प्लांटी: यह समूह कोशिकाभित्ति वाले बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों का समूह है। ये स्वपोषी होते हैं और प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा स्वयं का भोजन बनाते हैं, अर्थात् क्लोरोफिल धारक सभी पौधे इस वर्ग के सदस्य हैं।

एनिमेलिया: यह उन सभी बहुकोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों का वर्ग है जिनमें कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है। इस वर्ग के जीव विषमपोषी होते हैं, अर्थात् समस्त जंतु इस जगत के सदस्य होते हैं। अब हम समस्त जीवधारियों को उपरोक्त पाँच जगतों और उनके गुणों के आधार पर निम्नलिखित आरेख से दर्शा सकते हैं।

चूँकि, हमारे चारों तरफ पौधे और जंतु ही सर्वाधिक दिखते हैं, अत: इन दोनों जगतों- प्लांटी और एनिमेलिया को आगे कई उपवर्गों में विभाजित किया जाता है।