जल प्रदूषण | कारण | प्रभाव | जल प्रदूषण की परिभाषा (jal pradushan)

जल प्रदूषण (Water Pollution)

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जल जीवों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है एवं यह जैवमंडल में पोषक तत्त्वों के संचरण एवं चक्रण में सहायक है। औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं मानव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण जल की मांग में तीव्र वृद्धि हुई है एवं गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। यद्यपि जल में स्वयं शुद्धीकरण की क्षमता होती है परंतु जब मानव जनित स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषकों का जल में सांद्रण इतना अधिक हो जाता है कि वह जल की स्वयं शुद्धीकरण की क्षमता से अधिक हो जाता है तो जल प्रदूषित हो जाता है।
जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अभिलक्षणों में प्राकृतिक एवं मानव-जनित प्रक्रियाओं द्वारा होने वाला ऐसा अवनयन जिससे कि वह मानव एवं अन्य जैविक समुदायों के लिये अनुपयुक्त हो जाता है, जल प्रदूषण कहलाता है।

जल प्रदूषण के स्रोत (Sources of Water Pollution)

उत्पत्ति के आधार पर जल प्रदूषकों के स्रोतों को दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-

बिंदु स्रोत प्रदूषण (Point Source Pollution)
इसके अंतर्गत ऐसा प्रदूषण आता है जिसमें प्रदूषक जल के निश्चित स्रोत से आते हैं। जैसे- नगरपालिका क्षेत्र का सीवेज स्थल एवं फैक्ट्रियों का बहि:स्राव स्थल।

अबिंदु स्रोत प्रदूषण (Non-Point Source Pollution)
इसके अंतर्गत ऐसे प्रदूषण को शामिल किया जाता है जिसमें प्रदूषकों का बहि:स्राव किसी पृथक् स्रोत से नहीं होता है। इसमें प्रदूषक एक विस्तृत क्षेत्र से आते हैं। उदाहरण के लिये शहर के वर्षा जल का बहाव, कृषि क्षेत्र का बहाव, धोबी घाट, खुले में शौच., पशुओं के शव इत्यादि।
बिंदु स्रोत प्रदूषण को उपयुक्त तकनीक का प्रयोग कर नियंत्रित किया जा सकता है किंतु अबिंदु स्रोत प्रदूषण को नियंत्रित करना कठिन है।

जल प्रदूषण के कारण (Causes of Water Pollution)
  • घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्टों का जलस्रोतों में मिलना,
  • कृषि में प्रयुक्त उर्वरक एवं खरपतवार युक्त जल का नदी में मिलना,
  • तेल अधिप्लाव,
  • रेडियोसक्रिय तत्त्वों से युक्त रसायन का जलीय तंत्र तक पहुँचना,
  • विद्युत ऊर्जा केंद्र से निकले उच्च तापयुक्त जल का जल स्रोत में निकास,
  • नहाने व कपड़े धोने के लिये नदी जल का प्रयोग

तेल अधिप्लाव (Oil Spills)
सागरीय क्षेत्रों में तेल टैंकरों के दुर्घटनाग्रस्त होने से तेल रिसाव के कारण तथा तटीय क्षेत्रों में तेल खनन से फैले प्रदूषण के कारण प्लैंकटन, मछलियाँ व समुद्री जीवों की मृत्यु हो जाती है। प्रत्येक वर्ष 10 करोड़ टन से अधिक तेल का परिवहन होता है तथा परिवहन के दौरान लगभग 6.01 प्रतिशत तेल का रिसाव समुद्र में होता है। इस प्रकार प्रतिवर्ष 200 लाख गैलन तेल सागरीय जल को प्रदूषित करता है। अंतर्राष्ट्रीय तेल पाइपलाइन में रिसाव से भी तेल अधिप्लाव की समस्या उत्पन्न होती है।

तेल अधिप्लाव का प्रभाव (Effects of Oil Spills)
स्थानीय उद्योगों पर प्रभाव- तेल अधिप्लाव का असर स्थानीय उद्योग पर पड़ता है, जैसे- पर्यटन उद्योग, मत्स्य उद्योग, स्वीमिंग एवं सेलिंग (sailing)। हालाँकि इसका प्रभाव सीमित समय तक ही रहता है।
मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव- समुद्री जलीय तेल से प्रभावित भोजन मनुष्य के लिये हानिकारक होता है। तेल अधिप्लावित क्षेत्रों में आग लगने से श्वसन, आँखों के रोग आदि समस्या उत्पन्न होती है। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोग अस्थमा, गले में इन्फेक्शन, आँखों में जलन, माइग्रेन आदि की समस्या से ग्रस्त रहते हैं।
जलीय पारितंत्र पर प्रभाव- तेल फैलाव का असर समुद्री वनस्पति पर पड़ता है। प्रवाल भित्तियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। जलीय जीव-जन्तुओं पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तेल अधिप्लाव के कारण प्रत्येक वर्ष लाखों प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। इससे खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित होती है ।

तेल अधिप्लाव नियंत्रण के उपाय (Control Measures of Oil Spills)

रासायनिक विधि
डिटर्जेंट का प्रयोग कर तेल को बुलबुले के माध्यम से वाष्पीकृत किया जाता है। परन्तु इससे जलीय पारितंत्र पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है।

भौतिक विधि
दहन प्रक्रिया द्वारा तेल को जलाकर 98% तेल अधिप्लाव को हटाया जा सकता है परंतु इस तेल अधिप्लाव स्तर की मोटाई कम-से-कम 9 मिलीमीटर होनी आवश्यक है।

जैविक विधि
टेरी (TERI) द्वारा विकसित ऑयल जैपिंग (Oil Zapping) उपचार (Bio Remediation) की एक विधि है। इसमें बैक्टीरिया का प्रयोग कर तेल अधिप्लाव को नियंत्रित किया जाता है। ये ऑयल जैपर बैक्टीरिया तेल में उपस्थित हाइडोकार्बन को खाकर उसे गैर-हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड और जल में बदल देते हैं।

यांत्रिक विधि
  • (i) बूम (Booms): इसमें (तेल क्षेत्र  जैविक में) एक प्रकार की दीवार बना दी जाती है। 
  • (ii) सोरबेन्ट्स (Sorbents): यह एक तरीका है जिसमें या तो अवशोषण  या सोखने द्वारा तेल को हटाया  जाता है।
  • (iii) स्कीमर (Skimmers): यह एक प्रकार के वैक्यूम क्लीनर के समान है जो तेल को खींचता है।

जल प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Water Pollution)

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव (Effects on Aquatic Ecosystem)
जल प्रदूषण से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक अभिलक्षणों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • प्रदूषित पदार्थों के आधिक्य के कारण जल में घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen: DO) की मात्रा घट जाती है, जिससे कुछ संवेदी जीवों जैसे प्लवक, मोलस्क एवं कुछ मछलियों की मृत्यु हो जाती है। मात्र कुछ सहनशील प्रजातियाँ जैसे एनेलीड तथा कुछ कीट ही कम DO में जीवित रह पाते हैं। ऐसे जीवों को प्रदूषित जल की सूचक प्रजातियों (Indicator Species) के रूप में पहचाना जाता है।
  • जैवनाशक (Biocides), पॉली क्लोरीनेटेड बाईफिनाइल्स (PCBs) और भारी धातुएँ, जैसे- पारा, सीसा, कैडमियम, तांबा, चांदी आदि, जीवों की विभिन्न प्रजातियों को सीधे ही नष्ट कर देती है
  • उच्च तापमान पर जल में ऑक्सीजन का विलयन कम होता है। अत: उद्योगों से निकले अपशिष्ट गर्म जल को जब जलाशयों में डाला जाता है तो वह उनकी DO की मात्रा को कम कर देता है। DO की मात्रा लवणता बढ़ने पर घटती है तथा दाब के बढ़ने पर बढ़ती है।

  • DO (Dissolved Oxygen): यह जल में घुलित ऑक्सीजन की वह मात्रा है जो जलीय जीवों के श्वसन के लिये आवश्यक होती है। जब जल में DO की मात्रा 8.0 mg/लीटर से कम हो जाती है तो ऐसे जल को संदूषित (Contaminated) कहा जाता है। जब यह मात्रा 4.0 mg/लीटर से कम हो जाती है तो इसे अत्यधिक प्रदूषित (Highly Polluted) कहा जाता है।
  • BOD (Biological Oxygen Demand) जैविक ऑक्सीजन मांग: ऑक्सीजन की वह मात्रा जो जल में कार्बनिक पदार्थों के जैव रासायनिक अपघटन के लिये आवश्यक होती है। जहाँ उच्च BOD है वहाँ DO निम्न होगा। जल प्रदूषण की मात्रा को BOD के माध्यम से मापा जाता है। परन्तु BOD के माध्यम से केवल जैव अपघटक का पता चलता है साथ ही यह बहुत लंबी प्रक्रिया है। इसलिये BOD को प्रदूषण मापन में इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
  • COD (Chemical Oxygen Demand) रासायनिक ऑक्सीजन मांग: जल में ऑक्सीजन की वह मात्रा जो उपस्थित कुल कार्बनिक पदार्थों (घुलनशील अथवा अघुलनशील) के ऑक्सीकरण के लिये आवश्यक होती है। यह जल प्रदूषण के मापन के लिये बेहतर विकल्प है।
  • MPN (Most Probable Number) (सर्वाधिक संभाव्य संख्या ): जिस जल में जल-मल जैसे जैविक अपशिष्टों का प्रदूषण होता है उसमें ई. कोलाई (E.Coli) जैसे जीवाणुओं की संख्या अधिक पाई जाती है। MPN परीक्षण की सहायता से ई. कोलाई आदि जीवों को पहचाना एवं मापा जा सकता है। प्रदूषित जल में उच्च MPN पाया जाता है।

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भारत में फ्लोराइड, जिंक, क्रोमियम, भारी धातुएँ (पारा, यूरेनियम, कैडमियम आदि) को पेयजल प्रदूषण के लिये उत्तरदायी माना है।
  • EPA 2010 राष्ट्रीय झील आकलन में भारत की 20 प्रतिशत झीलों में उच्च मात्रा में नाइट्रोजन और फास्फोरस प्रदूषक पाए गए। इससे जलीय पारितंत्र पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
  • जलीय पारितंत्र में सुपोषण, जैव आवर्द्धन आदि प्रक्रिया तेज़ हो जाती है।
  • प्रदूषित जल का प्रभाव प्रवाल भित्ति पर भी पड़ता है, इससे प्रवाल विरंजन की घटना में बढ़ोतरी होती है।

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effects on Human Health)

  • प्रदूषित जल में उपस्थित वायरस, जीवाणुओं, परजीवियों एवं कृमियों के कारण संक्रमण जन्य रोगों, जैसे- पीलिया, हैजा, टाइफाइड, अतिसार, हेपेटाइटिस, किडनी खराब आदि का खतरा रहता है। यह संक्रमित जल पीने, नहाने, खाना बनाने आदि के लिये अनुपयुक्त होता है।
  • भारी धातुओं से युक्त जल के प्रयोग से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। पारायुक्त जल से प्रभावित मछलियों के सेवन से 1956 में जापान में मिनामाटा बीमारी से अनेक लोगों की मौत हो गई थी। अपशिष्ट जल में उपस्थित पारा मिश्रण सूक्ष्म जैविक क्रियाओं द्वारा अत्यधिक विषैले पदार्थ मिथाइल पारा (Methyl Mercury) में बदल जाता है जिससे अंगों, होंठ, जीभ आदि में संवेदनशून्यता; बहरापन, आँखों का धुंधलापन एवं मानसिक असंतुलन हो जाता है।
  • कैडमियम प्रदूषण से 'इटाई-इटाई' रोग हो जाता है जिससे हड्डियों एवं जोड़ों में तीव्र दर्द होता है तथा यकृत एवं फेफड़े का कैंसर हो जाता है।
  • सीसा युक्त जल से एनीमिया, सिर दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी एवं मसूड़ों में नीलापन आदि प्रभाव दिखाई देते हैं।
  • एस्बेस्टस के रेशों से युक्त जल द्वारा एस्बेस्टोसिस (फेफड़े के कैंसर का एक रूप) रोग हो जाता है।

आर्थिक प्रभाव

जल प्रदूषण का आर्थिक प्रभाव बहुत अधिक दृष्टिगोचर होता है। स्वच्छ पानी (Mineral Water) के मूल्य की तुलना में प्रदूषित पानी को स्वच्छ करना महँगा पड़ता है। जल प्रदूषण से मछलियों व अन्य जलीय जीवों पर प्रभाव पड़ता है। इसका नकारात्मक प्रभाव पर्यटन पर भी पड़ता के है। एक अनुमान अनुसार, जल प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष $50 बिलियन का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नुकसान होता है।

जल प्रदूषण का नियंत्रण (Control of Water Pollution)

जल प्रदूषण को निम्नलिखित उपायों द्वारा प्रभावशाली तरीके से अपनाकर नियंत्रित किया जा सकता है
  1. घरेलू सीवेज: घरेलू सीवेज में 99.9% जल एवं 0.1% प्रदूषक होते हैं। शहरी क्षेत्रों के घरेलू सीवेज के 90% से अधिक प्रदूषकों को केंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट द्वारा हटाया जा सकता है।
  2. औद्योगिक अपशिष्ट जल: कुछ उद्योगों द्वारा सामान्य विषाक्त प्रदूषकों का उत्सर्जन किया जाता है जिनका निपटान नगरपालिका द्वारा किया जा सकता है किंतु कुछ प्रदूषकों जैसे तेल, ग्रीस, भारी धातुओं आदि का निपटान विशेष निपटान संयंत्रों द्वारा किया जाना चाहिये। औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिये यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि वे कारखानों से निकले अपशिष्टों को बिना शोधित किये नदियों, झीलों एवं तालाबों में विसर्जित न करें।
  3. कृषि अपशिष्ट जल: कृषि क्षेत्र में अनेक अपरदन नियंत्रण प्रणालियों द्वारा जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है। किसान उर्वरकों एवं कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक उपयोग न कर तथा जैव-उर्वरकों एवं जैव-कीटनाशकों का प्रयोग कर जल की गुणवत्ता को बनाए रख सकते हैं।
  4. आम जनता को जागरूक किया जाना चाहिये एवं जल प्रदूषण एवं उससे उत्पन्न कुप्रभावों से अवगत कराना चाहिये।
  5. सरकार को जल प्रदूषण के नियंत्रण के लिये प्रभावी कानून बनाना चाहिये। यद्यपि सरकार ने जल (संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1974 लागू किया था लेकिन इसे और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

भूमिगत जल प्रदूषण (Ground Water Pollution)

औद्योगिक, नगरीय एवं कृषि अपशिष्टों से युक्त जल के रिसकर भूमिगत जल से मिल जाने से भूमिगत जल संक्रमित हो जाता है। स्वच्छ पानी की कुल मात्रा में भूमिगत जल लगभग 30 प्रतिशत है। भूमिगत जल 1.5 बिलियन लोगों के लिये जल का प्राथमिक स्रोत है। भूमिगत जल में कमी मानव के लिये कृषि समेत अन्य गतिविधियों के लिये विकट समस्या पैदा करती है।

 

भूमिगत जल प्रदूषण का प्रभाव (Effects of Ground Water Pollution)

पेयजल में नाइट्रेट की अधिक मात्रा से यह नवजात शिशुओं के हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर मिथेमोग्लोबिन बनाता है जो ऑक्सीजन परिवहन में बाधा उत्पन्न करता है। इससे नवजात शिशुओं की मृत्यु हो जाती है। इस रोग को मिथेमोग्लोबीनेमिया या ब्लू बेबी सिंड्रोम कहा जाता है।

पेयजल में फ्लोराइड की अधिकता से फ्लोरोसिस नामक रोग हो जाता है जिससे दाँत एवं हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।

आर्सेनिक युक्त जल के प्रयोग से ब्लैक फुट नामक चर्म रोग हो जाता है। इसके अलावा आर्सेनिक से डायरिया, हाइपरकिरेटोसिस, पेरिफेरल न्यूरीटिस तथा फेफड़े एवं त्वचा का कैंसर हो जाता है।


जल प्रदूषण पर नियंत्रण के लिये सरकारी प्रयास

जल निकायों का संरक्षण (Conservation of Water Bodies)

भारत की अधिकतर नदियाँ इस समय प्रदूषित नालों के समान बन गई हैं। भारत के आधे तालाब, झील प्रदूषण के शिकार हैं तथा इनका जल पीने योग्य नहीं रह गया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन कार्यरत 'राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय' का कार्य केन्द्र प्रायोजित स्कीमों 'राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP)' एवं 'जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण हेतु राष्ट्रीय योजना' (NPCA) के तहत नदियों, झीलों एवं नम भूमियों के संरक्षण के लिये राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है।

गंगा एक्शन प्लान (GAP)

देश की प्रमुख नदियों में से एक तथा स्वयं का निर्मलीकरण (गंगा में पाए जाने वाले वाइरस जैसे Bacteriophage वगैरह जीवाणु आदि को खा जाते हैं।) करने वाली गंगा आज लगभग अपने अपवाह के आधे भाग में प्रदूषित हो गई है। वर्तमान में 50,000 से अधिक आबादी वाले 100 से अधिक शहरों का असंसाधित मल-अपशिष्ट गंगा में अपवाहित किया जाता है तथा हज़ारों की संख्या में लाशों व जले हुए अवशेषों को इसमें प्रवाहित किया जाता है। गंगा बेसिन में भारत की लगभग 35 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 'केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण' (CGA) का गठन कर 1985 में गंगा एक्शन प्लान (GAP) की शुरुआत की गई। GAP-I सन् 1986 से 1993 तक चला।

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan)

1995 में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण (CGA) का नाम बदलकर 'राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण' (NRCA) कर दिया गया था। गंगा कार्ययोजना का विलय NRCP के साथ कर दिया गया। वर्तमान में इसमें 19 राज्यों में फैले 121 शहरों की 40 नदियों के प्रदूषित भाग को शामिल किया गया है।
  • NRCP का उद्देश्य प्रदूषित नदियों के किनारे बसे विभिन्न शहरों में प्रदूषण उपशमन कार्यों के ज़रिये नदियों के जल की गुणवत्ता में सुधार करना है।
  • NRC के तहत किये गए प्रदूषण उपशमन कार्यों में खुले नालों से नदियों में आ रहे कचरे को रोकने के लिये मल व्यवस्था प्रणाली बनाना, गंदे जल के शोधन के लिये जल शोधन संयंत्र लगाना, नदी किनारे शौच पर प्रतिबंध, नदी तट एवं स्नान घाटों का सुधार, सहभागिता, जागरुकता इत्यादि शामिल हैं।
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) के आदेश पर पर्यावरण शोध प्रयोगशाला (ERL) लखनऊ ने जल की गुणवत्ता के परीक्षणोपरांत जल को पांच श्रेणियों में विभक्त किया है-
  • वर्ग A (Category A) - पीने के लिये उपयुक्त
  • वर्ग B (Category B) - स्नान, तैराकी और मनोरंजन के लिये उपयुक्त
  • वर्ग C (Category C) - पारम्परिक उपचार के बाद पीने योग्य
  • वर्ग D (Category D) - वन्यजीव और मछलियों के लिये उपयुक्त 
  • वर्ग E (Category E) - सिंचाई, औद्योगिक शीतलन और अपशिष्ट निपटान हेतु उपयुक्त

क्र.सं.

नदी

क्र.सं.

नदी

1.

अडयार

21.

महानंदा

2.

बेतवा

22.

मिंद्यौला

3.

ब्यास

23.

मूसी

4.

बीहर

24.

नर्मदा

5.

भद्रा

25.

पेन्नार

6.

ब्राह्मणी

26.

पंबा

7.

कावेरी

27.

पंच गंगा

8.

कूम

28.

रानी चियू

9.

चंबल

29.

साबरमती

10.

दामोदर

30.

सतलज

11.

दीफू और धनश्री

31.

स्वर्णरेखा

12.

घग्गर

32.

ताप्ती

13.

गोदावरी

33.

तापी

14.

गोमती

34.

तुंगा

15.

खान

35.

तुंगभद्रा

16.

कृष्णा

36.

ताम्रबरनी

17.

क्षिप्रा

37.

वैगाई

18.

महानदी

38.

वैन्नार

19.

मंदाकिनी

39.

वेनगंगा

20.

मांडवी

40.

यमुना


जलीय पारिस्थितिकी प्रणाली के संरक्षण के लिये राष्ट्रीय योजना (National Plan for Conservation of Aquatic Ecosystem : NPCA)

झीलों एवं नम भूमियों के संरक्षण के लिये पूर्व में पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय द्वारा केन्द्र प्रायोजित योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा था-
  1. राष्ट्रीय नम भूमि संरक्षण कार्यक्रम 
  2. राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना
दोहराव से बचने एवं बेहतर समन्वय के लिये इन दोनों योजनाओं को एकीकृत कर NPCA आरंभ की गई। योजना की लागत को केन्द्र व राज्य सरकारों में क्रमश: 70:30 के अनुपात में तथा विशेष राज्यों के मामले में 90:10 में बाँटा गया। इस योजना का लक्ष्य जल की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिये झीलों एवं नम भूमियों का संरक्षण एवं पुनरुद्धार तथा एक सामान्य विनियामक संरचना के माध्यम से जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी में सुधार लाना है। यह योजना झीलों के प्रदूषण में कमी लाएगी एवं नम भूमि संसाधनों के तर्कसंगत इस्तेमाल में सहायता प्रदान करेगी।
विश्व में लगभग 15 करोड़ लोग आर्सेनिक युक्त जल पीने को मजबूर हैं। भारत में 10 राज्यों में आर्सेनिक प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है। आर्सेनिक की 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

जल (प्रदूषण नियंत्रण एवं रोकथाम) अधिनियम 1974, Water (Prevention and Control of Pollution) Act 1974

यह अधिनियम जल प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिये बनाया गया है। इसके माध्यम से विभिन्न बोर्डों का गठन किया गया है, जो जल प्रदूषण की रोकथाम व नियंत्रण करते हैं। अधिनियम द्वारा बोर्डों को अधिकार एवं कर्त्तव्य प्रदत्त किये गए हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्य निम्नलिखित हैं
  • केंद्र सरकार को जल प्रदूषण संबंधी सलाह देना।
  • राज्य बोर्डों के कार्यों का एकीकरण।
  • राज्य बोर्डों को जल प्रदूषण जाँच और शोध-कार्य में सहायता प्रदान करना।
  • जल प्रदूषण विशेषज्ञों की ट्रेनिंग।
  • जल प्रदूषण संबंधी जानकारी संचार माध्यमों द्वारा जनसाधारण को प्रदान करना।
  • संबंधित तकनीकी व सांख्यिकी सूचना को एकत्र, एकीकृत एवं प्रकाशित करना।,,
  • सरकार की सहायता से जल प्रदूषकों का मानक तय करना तथा समय-समय पर उन्हें पुनरीक्षित करना।
  • जल प्रदूषण रोकने के लिये राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाना।
  • राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कार्य राज्य सरकार के जल प्रदूषण रोकने के कार्यक्रम का संचालन।
  • राज्य सरकार को जल प्रदूषण संबंधी सलाह देना।
  • राज्य स्तर पर जल प्रदूषण संबंधी सूचनाएँ एकत्र करना एवं उन्हें प्रकाशित करना।
  • जल प्रदूषण रोकने के लिये अनुसंधान कराना।
  • विशेषज्ञों की ट्रेनिंग में केंद्रीय बोर्ड की सहायता करना।
  • सीवेज तथा उत्स्गों का उपचार की दृष्टि से निरीक्षण करना।
  • जल प्रदूषण के मानक स्थापित एवं पुनरीक्षित करना।
  • जल उपचार के कारगर व सस्ते तरीके निकालना।
  • सीवेज तथा उत्सर्ग के उपयोग-प्रयोग ज्ञात करना, सीवेज एवं उत्सर्ग हटाने के उचित तरीके निकालना।
  • उपचार के मानक स्थापित करना, सरकार को उन उद्योगों की जानकारी देना, जो हानिकारक उत्सर्ग बाहर छोड़ रहे हों।
  • बोर्ड के सदस्य, अधिकारी या अधिकृत व्यक्ति किसी भी उद्योग से उत्सर्जित जल का नमूना ले सकते हैं। बोर्ड के सदस्य, अधिकारी या अधिकृत व्यक्ति किसी भी उद्योग का निरीक्षण कर सकते हैं। किसी व्यक्ति को जानबूझकर कोई विषाक्त, नशीला पदार्थ किसी जल धारा में निर्गत करने का अधिकार नहीं है। नियमों का उल्लंघन करने पर तीन माह की कैद या जुर्माने अथवा दोनों का प्रावधान है। कंपनियों तथा सरकारी संस्थाओं द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।

नमामि गंगे कार्यक्रम

केंद्र सरकार द्वारा जून 2014 में नमामि गंगे नामक फ्लैगशिप कार्यक्रम के लिये 20,000 करोड़ आवंटित किये गए। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गंगा नदी का संरक्षण जीर्णोद्धार एवं प्रदूषण को खत्म करना है।
नमामि गंगे कार्यक्रम के निम्नलिखित मुख्य स्तंभ हैं-
  1. सीवरेज ट्रीटमेंट
  2. वनीकरण
  3. जनजागरूकता
  4. नदी सतह की सफाई
  5. रिवर फ्रंट डेवलपमेंट
  6. जैवविविधता का विकास
  7. गंगा ग्राम योजना
  8. औद्योगिक प्रवाह निगरानी

समुद्री प्रदूषण (Marine Pollution)

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समुद्र पृथ्वी पर विशालतम जलीय निकाय है। पिछले कुछ दशकों से मानवीय क्रियाओं के कारण समुद्र गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। मानव द्वारा समुद्र में हानिकारक पदार्थों, जैसे- प्लास्टिक औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्टों, तेल एवं रासायनिक पदार्थों के निक्षेपण से समुद्र प्रदूषित हुए हैं।

समुद्री प्रदूषण के कारण (Causes of Marine Pollution)

  • नदियों एवं वर्षा जल द्वारा लाया गया सीवेज, कृषि अपशिष्ट, कूड़ा-करकट, कीटनाशक एवं उर्वरक, भारी धातुएँ, प्लास्टिक आदि समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करते हैं।
  • समुद्र में तेल एवं पेट्रोलियम पदार्थों का विसर्जन एवं रेडियोएक्टिव अपशिष्टों की डंपिंग से भी समुद्री प्रदूषण में वृद्धि होती है।
  • विषाक्त रसायन एवं भारी धातुएँ जो औद्योगिक अपशिष्टों के साथ आकर समुद्र में मिल जाती हैं, समुद्री पारिस्थितिकी को नष्ट करती हैं।
  • वहाँ गहरे सागर एवं सागर तल में खनन से भारी धातुओं का जमाव हो जाता है। इसके कारण उस स्थान पर विषाक्त प्रभाव पड़ता है एवं सागरीय पारिस्थितिक तंत्र के लिये स्थायी एवं गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है।
  • वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप अम्ल वर्षा होती है। यह अम्ल वर्षा समुद्र में हो तो समुद्री जीवों की मृत्यु हो जाती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण सागरीय जल का तापमान भी बढ़ रहा है जिससे सागरीय जल की जैव विविधता का ह्रास हो रहा है।

समुद्री प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Marine Pollution)

  • तेल आप्लाव/तेल रिसाव (Oil Spills) सागरीय जीवों के गिल्स (Gills) एवं पंखों पर आवरण बनाकर उनके श्वसन एवं गति में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • तेल रिसाव के कारण सागरीय जीव प्रवाल (Coral) के छिद्र बंद हो जाने से उसकी मृत्यु हो जाती है। प्रवाल भित्ति जैव विविधता से संपन्न होती है, अतः प्रवाल की मृत्यु से वहाँ की जैव विविधता नष्ट होने लगती है।
  • समुद्री प्रदूषकों के अपघटन में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। प्रदूषकों के कारण सागरीय जल में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है। जिसके परिणामस्वरूप, सागरीय जीवों की संख्या में कमी आती है।
  • कुछ विशेष औद्योगिक एवं कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशक एवं उर्वरक सागरीय जल में पहुंचकर सागरीय जीवों के वसा ऊतकों में संगृहीत होकर उनकी जनन क्षमता पर नकारात्मक असर डालते हैं। इससे उनकी संख्या में तीव्रता से कमी आती है।
  • ये प्रदूषक सागरीय जीवों के शरीर में जमा होते जाते हैं। इस प्रकार ये खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं, जिसके कारण इन जीवों के सेवन से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  • विषैली धातु, प्रदूषित जल, अपशिष्ट तथा उर्वरकों का अप्रवाह नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की मात्रा को बढ़ा देता है।
  • नाइट्रोजन की अधिक मात्रा शैवाल की तीव्र वृद्धि करती है जो कि सूर्य के प्रकाश को रोकती है जिससे उपयोगी समुद्री घास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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