पारितंत्र | परिभाषा | प्रकार। ecosystem in hindi

पारितंत्र
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आप जानते हैं कि शायद पृथ्वी सौर मण्डल का ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन का अस्तित्व है। पृथ्वी का वह भाग जो जीवन को बनाये रखता है जैव मंडल कहलाता है। जैव मण्डल अति विशाल है और इसका अध्ययन एकल इकाई के रूप में नहीं किया जा सकता है। इसे अनेक स्पष्ट क्रियात्मक इकाइयों में विभाजित किया गया है जिन्हें पारितंत्र कहते हैं।

पारितंत्र (ECOSYSTEM)

प्रकृति में जीवों के विभिन्न समुदाय एक साथ रहते हैं और परस्पर एक दूसरे के साथ-साथ अपने भौतिक पर्यावरण के साथ एक पारिस्थितिक इकाई के रूप में अन्योन्यक्रिया करते हैं। हम इसे पारितंत्र कहते हैं। पारितंत्र या पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) शब्द की रचना 1935 में ए.जी. टैन्सले के द्वारा की गई थी। एक पारितंत्र प्रकृति की क्रियात्मक इकाई है जिसमें इसके जैविक तथा अजैविक घटकों के बीच होने वाली जटिल अन्योन्यक्रियाएं सम्मिलित हैं। उदाहरण के लिए तालाब पारितंत्र का अच्छा उदाहरण है।
पारितंत्र के घटक पारितंत्र के घटकों को दो समूहों में बांटा गया है।
  • (क) अजैविक तथा
  • (ख) जैविक

(क) अजैविक घटक (निर्जीव): अजैविक घटकों को निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:
  • (i) भौतिक कारक ( Physical factor): सूर्य का प्रकाश, तापमान, वर्षा, आर्द्रता तथा दाब। यह पारितंत्र में जीवों की वृद्धि को सीमित और स्थिर बनाए रखते हैं।
  • (ii) अकार्बनिक पदार्थः कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन फास्फोरस, सल्फर, जल, चट्टान, मिट्टी तथा अन्य खनिज।
  • (iii) कार्बनिक पदार्थ: कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड तथा ह्यूमिक पदार्थ यह सजीव तंत्र के मूलभूत अंग हैं और इसीलिए ये जैविक तथा अजैविक घटकों के बीच की कड़ी हैं।

(ख) जैविक घटक (सजीव):
  • (i) उत्पादक (Producer): हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण के द्वारा पूरे पारितंत्र के लिए भोजन का निर्माण करते हैं। हरे पौधे स्वपोषी कहलाते हैं क्योंकि यह इस प्रक्रम के लिए मिट्टी से जल एवं पोषक तत्व, वायु से कार्बनडाईऑक्साइड प्राप्त करते हैं, तथा सूर्य से सौर ऊर्जा अवशोषित करते हैं।
  • (ii) उपभोक्ता (Consumer ): यह विषमपोषी कहलाते हैं और स्वपोषियों द्वारा संश्लेषित किए गए भोजन को खाते हैं। भोजन की पसंद के आधार पर इन्हें तीन वर्गों में रखा जा सकता है। शाकाहारी (गाय, हिरन और खरगोश आदि) सीधे ही पौधों को खाते हैं। मांसहारी वे जन्तु हैं जो अन्य जन्तुओं को खाते हैं। (उदाहरण शेर, बिल्ली, कुत्ता आदि) और सर्वाहारी जीव पौधों और जन्तुओं दोनों को खाते हैं) उदाहरण-मानव, सुअर और गोरैया)।
  • (iii) अपघटक (Decomposer ): इन्हें मृतपोषी भी कहते हैं। यह अधिकतर बैक्टीरिया (जीवाणु) और कवक होते हैं, जो पौधों तथा जन्तुओं के मृत अपघटित और मृत कार्बनिक पदार्थ को सड़ रहे पदार्थों पर अपने शरीर के बाहर एन्जाइमों का स्राव करके ग्रहण करते हैं। पोषकों के चक्रण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन्हें अपरदभोजी (Detrivores) भी कहा जाता है।

पारितंत्र के कार्य

पारितंत्र जटिल परिवर्तनात्मक तंत्र है। ये विशिष्ट कार्य करते हैं जो इस प्रकार हैं:-
  1. खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्रवाह
  2. पोषकों का चक्रण ( भूजैवरासायनिक चक्र)
  3. पारिस्थितिकीय अनुक्रम या पारितंत्र का विकास।
  4. समस्थापन (या संतांत्रिका, cybernetic) या पुनर्भरण नियंत्रण प्रणालियाँ
तालाब, झीलें, चरागाह, दलदल, घास के मैदान, मरुस्थल और जंगल प्राकृतिक पारितंत्र के उदाहरण हैं। आप लोगों में से कुछ ने अपने पड़ोस में एक्वेरियम, बगीचा या लॉन इत्यादि देखा होगा। ये मानव निर्मित पारितंत्र हैं।

पारितंत्र के प्रकार

पारितंत्रों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है:
  1. प्राकृतिक पारितंत्र (Natural ecosystem)
  2. मानव निर्मित पारितंत्र (Human modified ecosystem)

(i) प्राकृतिक पारितंत्र
  • पूर्ण रूप से सौर विकिरण पर निर्भर। उदाहरण, जंगल, घास के मैदान, समुद्र, झील, नदियां और मरुस्थल। इनसे हमें भोजन, ईंधन, चारा तथा औषधियां प्राप्त होती हैं।
  • पारितंत्र सौर विकिरण तथा ऊर्जा सहायकों (वैकल्पिक स्रोत) जैसे हवा, वर्षा और ज्वार- भाटा पर निर्भर होता है। उदाहरण- उष्णकटिबंधीय वर्षा वन, ज्वारनद मुख, कोरल रीफ (मूंगा चट्टान)

(ii) मानव निर्मित पारितंत्र
  • सौर-ऊर्जा पर निर्भर- उदाहरण: खेत और एक्वाकल्चर तालाब।
  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भर उदाहरण- नगरीय और औद्योगिक पारितंत्र

तालाब: पारितंत्र का एक उदाहरण
तालाब एक पूर्ण, बंद और स्वतंत्र पारितंत्र का उदाहरण है यह किसी भी पारितंत्र की मूलभूत संरचना और कार्यों का अध्ययन करने का एक सरल साधन है। यह सौर ऊर्जा पर कार्य करता है तथा अपने जैविक समुदाय को साम्यावस्था में बनाए रखता है। यदि आप एक गिलास तालाब का पानी या एक चम्मच तालाब की तलहटी की कीचड़ एकत्रित करते हैं तो इसमें पौधों, जन्तुओं, अकार्बनिक तथा कार्बनिक पदार्थों का मिश्रण होता है। किसी तालाब पारितंत्र में निम्नलिखित घटक पाये जाते हैं:

(क) अजैविक घटक (Abiotic components)

(i) प्रकाशः सौर विकिरण ऊर्जा उपलब्ध कराता है जो सम्पूर्ण पारितंत्र को नियंत्रित करती है। प्रकाश का भेदन पानी की पारदर्शिता या जल में निलंबित कण तथा प्लवकों (Planktons) की संख्या पर निर्भर होता है। प्रकाश के भेदन की सीमा के आधार पर तालाब को सुप्रकाशित, Euphotic (eu = वास्तविक, photic = प्रकाश) मध्य प्रकाशित (Mesophotic) तथा अप्रकाशित (Aphotic) क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। सुप्रकाशित क्षेत्र में पौधों और जन्तुओं को प्रचुर मात्रा में प्रकाश उपलब्ध रहता है। अप्रकाशी क्षेत्र में प्रकाश उपलब्ध नहीं रहता।

(ii) अकार्बनिक पदार्थ (Inorganic material ): इन पदार्थों में जल, कार्बन, नाइट्रोजन, फ़ास्फोरस, कैल्शियम तथा कुछ अन्य तत्व जैसे सल्फर, फास्फोरस जो तालाब की अवस्थिति पर निर्भर हैं, सम्मिलित हैं। अकार्बनिक पदार्थ जैसे O2 तथा CO2 पानी में घुलनशील अवस्था में होते हैं। सभी पौधे और जन्तु भोजन तथा गैसों के विनिमय के लिए पानी पर निर्भर होते हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर तथा अन्य अकार्बनिक लवण तली के अवसाद में तथा सजीवों के अन्दर आरक्षित अवस्था में रहते हैं। इनकी अल्प मात्रा घुलनशील अवस्था में हो सकती है।

(iii) कार्बनिक यौगिक (Organic compound): तालाब में आमतौर से पाये जाने वाले कार्बनिक पदार्थ अमीनो अम्ल और ह्यूमिक अम्ल तथा मृत पौधों और जन्तुओं के अपघटित उत्पाद हैं। यह आंशिक रूप से पानी में घुले रहते हैं तथा आंशिक रूप से ही पानी में निलंबित रहते हैं।

(ख) जैविक घटक (Biotic components)

(i) उत्पादक या स्वपोषी (Producer/Autotrops ): तालाब के सभी विषमपोषियों के लिए भोजन का संश्लेषण करते हैं। इन्हें दो समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
प्लावी सूक्ष्मजीव तथा पादप तथा जड़युक्त पादप

(क) प्लावी सूक्ष्मजीव (हरित) तथा पादप प्लवक (phytoplankton) ("phyto"-पादप, "plankton"-प्लावी) कहलाते हैं। यह छोटे सूक्ष्मदर्शीय जीव हैं। कभी-कभी यह तालाब में इतनी अधिक मात्रा में हो जाते हैं कि तालाब हरा दिखाई देने लगता है। उदाहरण- स्पाइरोगायरा, यूलोथ्रिक्स, क्लेडोफोरा डायएटम्स, वॉलवॉक्स।

(ख) जड़युक्त पादप- यह पादप परिसीमा से लेकर गहन परतों वाले संकेन्द्री क्षेत्रों में पाये जाते हैं। पानी की गहराई बढ़ने के साथ-साथ जलीय पौधों के तीन स्पष्ट क्षेत्र निम्नलिखित क्रम में देखे जा सकते हैं:-
  1. निर्गत (उद्रामी) पादप क्षेत्र: उदाहरण- टाइफा, बुलरश तथा सैजीटेरिया। 
  2. प्लावी पत्तियों वाले जड़युक्त पादपों का क्षेत्र: उदाहरण निम्फिया।
  3. जल में डूबे हुए पादपों का क्षेत्र: उदाहरण- तालाब में पायी जाने वाली खरपतवार जैसे हाइड्रिला, रूपिया, मस्क घास इत्यादि।

(ii) उपभोक्ता या विषमपोषी (Consumer or Heterotrophs); वे जन्तु जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वपोषी जीवों से भोजन प्राप्त करते हैं। जैसे टैडपोल, घोंघा, सनफिश बास इत्यादि।

तालाब के जन्तुओं को निम्नलिखित समूहों में वर्गीकृत कर सकते हैं:
  • जंतुप्लवक (Zooplanktons)- ये तिरने वाले जंतु हैं जैसे साइक्लोप्स, साइप्रिस। 
  • तरणक (Nektons)- वे जन्तु जो अपनी इच्छा से तैर सकते हैं जैसे मछलियां।
  • नितलस्थ प्राणी (Benthic animals)- ये तलहटी में रहने वाले जीव हैं। उदाहरण भृंग, माइटस, घोंघे तथा कुछ क्रस्टेशियन।

(iii) अपघटकः यह पूरे तालाब में वितरित रहते हैं परन्तु अवसाद के अन्दर बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। ये वैक्टीरिया और कवक हो सकते हैं (राइजोपस, पेनिसिलियम) जो तालाब की तली में पाए जाते हैं

पारितंत्र का कार्य: पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह
खाद्य श्रृंखलाएं और ऊर्जा प्रवाह किसी पारितंत्र की कार्यत्मक विशेषताएं हैं जो इन्हें गतिशील (dynamic) बनाती है। किसी पारितंत्र के जैविक तथा अजैविक घटक इनके द्वारा संयोजित रहते हैं।

खाद्य श्रृंखला ( Food chain)
खाद्य श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवधारियों का क्रम है जिसके द्वारा पारितंत्र में हरित पादपों (उत्पादक) से ऊर्जा का स्थानान्तरण होता है। हरे पादपों द्वारा निर्मित खाद्यों से प्राप्त ऊर्जा को विभिन्न जीवों के क्रमवार अन्य जीवों को खाने और स्वतः भी खाए जाने को खाद्य श्रृंखला कहते हैं।

उदाहरण:-
घास → टिड्डा → मेढक → सांप बाज/चील

खाद्यशृंखला में प्रत्येक सोपान पोषण स्तर (trophic level) कहलाता है। उपरोक्त उदाहरण में घास प्रथम तथा बाज पंचम पोषण स्तर का प्रतिनिधित्व करता है।
ऊर्जा-स्थानान्तरण की इस प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा तंत्र में से ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में क्षय हो जाती है और अगले पोषण स्तर के लिए उपलब्ध नहीं हो पाती। अत:शृंखला में सोपानों की संख्या 4 से 5 तक सीमित हो जाती है।

खाद्य श्रृंखला में निम्नलिखित पोषण स्तरों की पहचान की जा सकती है।

(1) स्वपोषी (Autotrophs): ये पारितंत्र के अन्य सभी जीवों के लिए भोजन का उत्पादन करने वाले हैं इनमें अधिकतर हरे पादप आते हैं और अकार्बनिक पदार्थ को सौर ऊर्जा की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा रासायनिक ऊर्जा ( भोजन) में परिवर्तित कर देते हैं। हरे पौधों में प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा जिस दर से विकिरण ऊर्जा संचित होती है उसे सकल प्राथमिक उत्पादन (GPP, Gross Primary Product) कहा जाता है। इसे कुल (पूर्ण) प्रकाश संश्लेषण अथवा कुल (पूर्ण) स्वांगीकरण भी कहा जाता है। सकल प्राथमिक उत्पादकता का एक भाग पौधों के द्वारा अपने उपापचय के लिए उपयोग कर लिया जाता है। शेष भाग पौधों के द्वारा नेट प्राथमिक उत्पादन (NPP, Net Primary Product) के रूप में संचित कर लिया जाता है जो उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध रहता है।

(2) शाकाहरी (Herbivores): ऐसे जन्तु जो प्रत्यक्ष रूप से पौधों को खाते करते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता या शाकाहारी कहलाते हैं जैसे कीड़े-मकोड़े, पक्षी, कृन्तक और जुगाली करने वाले जंतु।

(3) मांसाहारी (Carnivores): ऐसे जन्तु जो शाकाहारी जन्तुओं का भक्षण करते हैं प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं और यदि वे मांसाहारी जन्तुओं का भक्षण करते हैं तो तृतीय उपभोक कहलाते हैं। जैसे मेढक, कुत्ता, बिल्ली तथा बाघ।

(4) सर्वाहारी (Omnivores): ऐसे जन्तु जो पौधों और जन्तु दोनों का भक्षण करते हैं। उदाहरण सुअर, भालू तथा मनुष्य।

(5) अपघटक (Decomposers): यह प्रत्येक पोषण स्तर में जीवों के मृत अवशेषों का भक्षण करते हैं तथा पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं उदाहरण जीवाणु तथा कवक।

खाद्य शृंखलाएं दो प्रकार की हैं:-

(i) चारागाह वाली खाद्य श्रृंखलाऐं: यह श्रृंखलाएं उन हरे पौधों से आरम्भ होती हैं जो शाकाहारी और मांसाहारी जन्तुओं के लिए खाद्य उत्पन्न करते हैं।

(ii) अपरद खाद्य शृंखलाऐं: यह श्रृंखलाएं मृत कार्बनिक पदार्थ तथा उन मृतजीवी जीवों से आरम्भ होती हैं जो प्रोटोजोन तथा मांसाहारी जन्तुओं के लिए भोजन उत्पन्न करते हैं।
पारितंत्र में दोनों शृंखलाऐं परस्पर संयोजित हो जाती हैं तथा y- के आकार की खाद्य श्रृंखला बनाती हैं।

ये खाद्य श्रृंखलाएं दो प्रकार की हैं:
  1. उत्पादक → शाकाहारी → मांसाहारी
  2. उत्पादक → अपरदहारी → मांसाहारी

खाद्य जाल ( Food web)
पारितंत्र में पोषण स्तर रैखिक नहीं होते वरन यह एक दूसरे से संयोजित होते हैं और खाद्य जाल का निर्माण करते हैं। इस प्रकार खाद्य जाल किसी पारितंत्र में एक दूसरे से संयोजित खाद्य श्रृंखलाओं का एक नेटवर्क है। एक जन्तु विभिन्न खाद्य श्रृंखलाओं का सदस्य हो सकता है। खाद्य जाल, किसी पारितंत्र ऊर्जा प्रवाह का सबसे अधिक यथार्थ माडल हैं।
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह सदैव रेखीय होता है। क्रमवर्ती पोषण स्तरों में ऊर्जा प्रवाह की मात्रा में हास होता है जैसा कि घटते आकार के बाक्सों के द्वारा दिखाया गया है खाद्य श्रृंखला या खाद्य जाल के प्रत्येक सोपान में जीवों द्वारा प्राप्त की गई ऊर्जा इसके स्वयं के उपापचय और अनुरक्षण में भी प्रयुक्त होती है और शेष ऊर्जा अगले पोषण स्तर को हस्तान्तरित होती है।
ECOSYSTEM

पारिस्थितिक पिरैमिड ( Ecological pyramid )
पारिस्थितिक पिरैमिड किसी पारितंत्र में पोषण स्तरों का आलेखीय निरूपण है। इनकी आकृति पिरैमिड की तरह होती है और यह तीन प्रकार के होते हैं। उत्पादक पिरैमिड के आधार की रचना करते हैं और पिरैमिड की अनुवर्ती श्रेणियां शाकाहारी, मांसाहारी और शीर्षस्थ मांसाहारी स्तरों को दर्शाती है।

(1) संख्या पिरैमिड (Number pyramid): यह प्रत्येक पोषण स्तर में जीवों की संख्या को दर्शाता है। उदाहरण के लिए- घास के मैदान में घास की संख्या घास को खाने वाले शाकाहारी जन्तुओं की तुलना में अधिक होती है और शाकाहारी जन्तुओं की संख्या मांसाहारी जन्तुओं से अधिक होती है। कुछ मामलों में संख्या पिरैमिड उल्टा भी हो सकता है अर्थात शाकाहारी, प्राथमिक उत्पादकों से अधिक होते हैं। जैसा कि आप देख सकते हैं कि अनेकों इल्लियां और कीट एक ही वृक्ष से भोजन प्राप्त करते हैं।

(2) जीव द्रव्यमान पिरैमिड (Biomass pyramid): यह प्रत्येक पोषण स्तर पर खड़ी फसल के कुल जीव संहति को दर्शाता है। खड़ी फसल का जीव संहति किसी दिए हुए समय में सजीव पदार्थ की मात्रा है। इसे ग्राम/यूनिट क्षेत्रफल या किलो कैलोरी/ एकांक क्षेत्रफल के द्वारा व्यक्त किया जाता है। अधिकतर स्थलीय पारितंत्रों में जीव संहति का पिरैमिड सीधा (upright) होता है जबकि जलीय पारित्रों में जीव संहति का पिरैमिड उल्टा हो सकता है। उदाहरणत: तालाब में पादप प्लवक मुख्य उत्पादक है। इनका जीवन चक्र बहुत छोटा होता है। और बहुत तेजी से नए पौधें इनकी जगह ले लेते हैं अत: किसी दिए हुए समय में इनका कुल जीव संहति इन पर आश्रित शाकाहारी जन्तुओं की तुलना में कम होता है।

(3) ऊर्जा पिरैमिड (Energy pyramid): यह पिरैमिड प्रत्येक पोषण स्तर पर ऊर्जा की कुल मात्रा को दर्शाता है। ऊर्जा को किलोकैलोरी/एकांक क्षेत्र/एकांक समय ( Kcal/unit area/unit time) अथवा कैलोरी/एकांक/क्षेत्र/एकांक समय (Cal/ Unit area/Unit time) के द्वारा व्यक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए किसी झील में स्वपोषी ऊर्जा 20810 किलोकैलोरी/मी/वर्ष (Kcal/m/year) है ऊर्जा पिरैमिड कभी भी उल्टे नहीं होते।
पारिस्थितिक दक्षता (ECOLOGYCAL EFFICIENCY)
पारितंत्र की पोषण संरचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि क्रमवर्ती पोषण स्तर में ऊर्जा का हास होता है।

इसके दो कारण है:-
1. प्रत्येक पोषण स्तर में उपलब्ध ऊर्जा का एक भाग श्वसन में नष्ट हो जाता है या उपापचय क्रियाओं में प्रयुक्त हो जाता हैं।
2. ऊर्जा का एक भाग प्रत्येक रूपान्तरण पर नष्ट हो जाता है अर्थात जब ऊर्जा निम्न पोषण स्तर से उच्चतर पोषण स्तर में जाती है तो ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में नष्ट हो जाता है।

निम्नतर पोषण स्तर के द्वारा प्राप्त की गई ऊर्जा तथा उच्चतर पोषण स्तर को स्थानान्तरित होने वाली ऊर्जा का अनुपात पारिस्थितिक दक्षता कहलाता है। इन पारिस्थितिक दक्षताओं को सर्वप्रथम 1942 में लिन्डमेन ने परिभाषित किया था और 10% का नियम प्रस्तुत किया अर्थात यदि स्वपोषी 100 कैलोरी का उत्पादन करते हैं तो शाकाहारी जीवों को 10 कैलोरी तथा मांसाहारी जन्तुओं को 1 कैलोरी उपलब्ध होगी। यद्यपि, विभिन्न पारितंत्रों में थोड़ा अन्तर हो सकता है तथा पारिस्थितिक दक्षताओं का परास 5 से 35% के मध्य हो सकता है।
पारिस्थितिक दक्षता (इसे लिन्डमेन की दक्षता भी कहते हैं) को निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:-

ECOSYSTEM

खाद्य श्रृंखलाओं के अध्ययन का महत्व
यह पारितंत्र के विभिन्न जीवों की अन्योन्यक्रियाओं और पोषण संबंधों को समझने में सहायक होता है।
यह पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह और पदार्थों के परिसंचरण की व्याख्या करता है।
यह पारितंत्रों में जैव आवर्धन की परिकल्पना को समझने में सहायक होता है।

भूजैवरासायनिक चक्र (BIOGEOCHEMICAL CYCLES)
पारितंत्र में ऊर्जा प्रवाह रैखिक होता है परन्तु पोषकों का प्रवाह चक्रीय होता है। इसका कारण यह है कि ऊर्जा का प्रवाह अधोगामी होता है इसका अर्थ है कि जैसे जैसे ऊर्जा का प्रवाह आगे की तरफ होता है वह या तो उपयोग कर ली जाती है या ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है इसके विपरीत पोषक तत्वों के चक्रण में जीवों के मृत अवशेष अपघटकों के द्वारा वापस मिट्टी में चले जाते हैं तथा पुनः अवशोषित कर लिए जाते हैं अर्थात हरे पादपों की जड़ें मिट्टी के पोषक तत्वों को अवशोषित करके शाकाहारी जन्तुओं और तत्पश्चात मांसाहारी जन्तुओं में स्थानांतरित कर देती हैं। पोषक तत्व जीवों के मृत अवशेषों में बन्द हो जाते हैं और अपघटकों के द्वारा पुन: मिट्टी में विमोचित हो जाते हैं। पोषक तत्वों का यह पुन:चक्रण भूजैवरासायनिक या पोषक चक्र कहलाता है (Bio-जैव, Geo-भू. Chemical -रसायन)। पादप और जीवों की विभिन्न जैव प्रक्रियाओं के लिए लगभग 40 तत्वों की आवश्यकता होती है। सम्पूर्ण पृथ्वी या जैव मंडल एक बंद प्रकार का तंत्र है अर्थात पोषक तत्व जैव मंडल में न तो आयतित होते हैं और न ही निर्यात किए जाते हैं।

भूजैवरासायनिक चक्र के दो मुख्य घटक हैं:-
  1. भण्डार निकाय- वायुमण्डल या चट्टान, जिसमें पोषक तत्वों का विपुल भंडार है।
  2. चक्रण निकाय या चक्र के उपखण्ड- ये पौधों और जंतुओं के रूप में कार्बन के अपेक्षाकृत छोटे भंडार हैं।

कार्बन चक्र (Carbon cycle)
वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाईऑक्साइड सभी प्रकार के कार्बनों का स्रोत है। यह पानी में अत्यंत घुलनशील होती है। अतः समुद्र में भी बड़ी मात्रा में घुलनशील कार्बन डाईऑक्साइड होती है।

भूमण्डलीय कार्बन चक्र के निम्नलिखित चरण होते हैं:-

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis)
हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में CO2 का उपयोग करते हैं तथा अजैव कार्बन को कार्बनिक पदार्थ ( भोजन) में परिवर्तित करते हैं तथा आक्सीजन को विमोचित कर देते हैं। प्रकाशसंश्लेषण के द्वारा बनाए गए भोजन का एक भाग पौधे अपनी उपापचय क्रियाओं में प्रयुक्त कर लेते हैं तथा शेष भाग इनकी जीव संहति के रूप में संग्रहित कर लिया जाता है जो विभिन्न शाकाहारी, विषमपोषी जीवों, जिनमें मानव तथा सूक्ष्म जीव शामिल हैं, को भोजन के रूप में उपलब्ध रहता है। प्रति वर्ष हरे पौधों द्वारा सम्पूर्ण जैव मंडल की 4.9 x 1011 Kg कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण होता है। वन CO2 के भंडार के रूप में कार्य करते हैं क्योंकि वृक्षों के द्वारा स्थिर किए जाने वाला कार्बन इनके दीर्घ जीवन चक्र के कारण लम्बे समय तक इनमें संग्रहित रहता है। जंगल में लगने वाली आग के द्वारा बड़ी मात्रा में CO2 विमोचित की जाती है।

Ecosystem-paritantra
श्वसन (Respiration)
सभी जीवधारी श्वसन करते हैं। यह एक उपापचीय क्रिया है जिसमें ऊर्जा भोजन के आक्सीकरण द्वारा CO2 तथा जल मुक्त कराने के लिए होता है। श्वसन के द्वारा मुक्त होने वाली ऊर्जा जीवधारियों (पादप, जन्तु, अपघटक आदि) द्वारा जैविक क्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए उपयोग की जाती है। इस प्रकार कार्बन डाईऑक्साइड वायुमण्डल में पुन: विमोचित हो जाती है।

अपघटन (Decomposition)
जन्तुओं के द्वारा स्वांगीकृत या पौधों के द्वारा संश्लेषित किया गया समस्त भोजन उनके द्वारा पूर्णरूप से उपापचीय क्रियाओं में प्रयुक्त नहीं किया जाता है। इसका अधिकांश भाग उनके अपनी जीव संहित के रूप में संग्रहित रहता है जो उनकी मृत्यु होने पर अपघटकों को उपलब्ध हो जाता है। मृत जीव पदार्थ सूक्ष्मजीवों के द्वारा अपघटित कर दिया जाता है तथा अपघटकों के द्वारा CO2 वायुमण्डल में विमोचित हो जाती है।

दहन (Combustion)
जीव संहति के जलने पर वायुमण्डल में कार्बन डॉईआक्साइड विमोचित हो जाती है।

मानव गतिविधियों का प्रभाव

मानव गतिविधियां विशेषकर औद्योगीकरण के प्रारम्भ से ही भूमण्डलीय कार्बन चक्र में बड़े पैमाने पर वनोन्मूलन और उद्योगों, बिजली संयंत्रों तथा मोटरवाहनों की संख्या में वृद्धि के कारण जीवाश्म ईंधनों के उपभोग में होने वाली वृद्धि कार्बन डाइऑक्साइड में वृद्धि के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है।
मानव गतिविधियों जैसे औद्योगीकरण, शहरीकरण व मोटर गाड़ियों के बढ़ते प्रयोग के कारण वायुमण्डल मे कार्बन डाइऑक्साइड सतत रूप से बढ़ रही है इस बढ़ोत्तरी के कारण वायुमण्डल में CO2 का सान्द्रण बढ़ रहा है, जो भूमण्डलीय तापन का मुख्य कारण है।

नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen cycle)
नाइट्रोजन प्रोटीन का अनिवार्य घटक है और मानव सहित सभी सजीव जीवों को इसकी आवश्यकता होती है।
हमारे वायुमण्डल में लगभग 79 प्रतिशत नाइट्रोजन है परन्तु अधिकतर जीव इसे प्रत्यक्ष रूप से अपने उपयोग में नहीं ला सकते। कार्बन डाइआक्साइड की तरह नाइट्रोजन का भी विभिन्न जीवों की गतिविधियों के द्वारा गैसीय अवस्था से ठोस अवस्था में और ठोस अवस्था से पुनः गैसीय अवस्था में चक्रण होता है। नाइट्रोजन का चक्रण समस्त सजीवों के लिए आवश्यक रूप से महत्वपूर्ण है।
नाइट्रोजन चक्र के लिए पांच मुख्य प्रक्रियाएं आवश्यक हैं।

(क) नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation ): इस प्रक्रिया में गैसीय नाइट्रोजन का अमोनिया में परिवर्तन सम्मिलित है। यह अमोनिया पौधों द्वारा उपयोग में लाई जाती है। वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण निम्नलिखित तीन विधियों द्वारा सम्पन्न होता है।

(i) वायुमण्डलीय स्थिरीकरणः बिजली का चमकना, दहन तथा ज्वालामुखीय गतिविधियां नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायक होती है।

(ii) औद्योगिक स्थिरीकरण (Industrial fixation): उच्च तापमान (400*C) और उच्च दाब (200 atm.) पर आण्विक नाइट्रोजन परमाण्विक नाइट्रोजन में विभाजित हो जाती है जो हाइड्रोजन से संयोग करके अमोनिया बना लेती है।

(iii) जीवाणुओं द्वारा स्थिरीकरण (Bacterial fixation): दो प्रकार के जीवाणु हैं:
(i) सहजीवी बैक्टीरिया जैसे दलहनी पौधों की ग्रन्थिकाओं में राइजोबियम।
(ii) मुक्तरूप या सहजीवी से रहने वाले बैक्टीरिया जैसे 1. नॉस्टॉक 2. एजेटोबेक्टर 3. साएनोबैक्टीरिया वायुमण्डलीय अथवा घुलनशील नाइट्रोजन को हाइड्रोजन के साथ संयोजित करके अमोनिया का निर्माण करते हैं।

(ख) नाइट्रीकरण (Nitrification): यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अमोनिया नाइट्रोसोमोनास तथा नाइट्रोकोकस जीवाणुओं द्वारा क्रमश: नाइट्रेट और नाइट्राइट में परिवर्तित हो जाती है। मृदा में पाया जाने वाला एक अन्य जीवाणु नाइट्रोबेक्टर नाइट्रेट को नाइट्राइट में परिवर्तित कर सकता है।

(ग) स्वांगीकरण (Assimilation): इस प्रक्रिया में पौधों के द्वारा स्थिर की गयी नाइट्रोजन कार्बनिक अणुओं जैसे प्रोटीन, DNA, RNA इत्यादि में परिवर्तित की जाती है। ये अणु पौधों तथा जन्तुओं के ऊतकों का निर्माण करते हैं।

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(घ) अमोनीकरण (Ammonification): सभी जीवधारी नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ जैसे यूरिया और यूरिक अम्ल उत्पन्न करते हैं। यह अपशिष्ट पदार्थ तथा जीवों के मृत अवशेष बैक्टीरिया के द्वारा वापस अकार्बनिक अमोनिया में परिवर्तित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया अमोनीकरण कहलाती है। अमोनीकारक बैक्टीरिया इस प्रक्रिया में सहायता करते हैं।

(ड) विनाइट्रीकरण (Denitrification): नाइट्रेट का पुनः गैसीय नाइट्रोजन में परिवर्तित होना विनाइट्रीकरण कहलाता है। विनाइट्रीकरण जीवाणु मिट्टी के अन्दर गहराई में जल तालिका (water table) के निकट रहते हैं क्योंकि यह आक्सीजन मुक्त माध्यम में रहना पसंद करते हैं। विनाइट्रीकरण, नाइट्रोजन स्थिरीकरण की विपरीत प्रक्रिया है।

जल चक्र (Water cycle)

जल चक्र (Water cycle)

जल जीवन के लिए अति आवश्यक है। जल के बिना कोई भी जीव जीवित नहीं रह सकता। अवक्षेपण (वर्षा, हिम, ओस इत्यादि) पृथ्वी पर जल का एकमात्र स्रोत है। वायुमण्डल से पृथ्वी पर पहुंचने वाला जल प्रत्यक्ष रूप से वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल में वापस चला जाता है क्योंकि जैव मण्डल में जल का लगातार गमन होने को चक्र कहलाता है। आप पहले ही अध्ययन कर चुके हैं कि पृथ्वी सौर मण्डल का एक जलीय ग्रह है, धरातल का लगभग 2/3 भाग पानी से ढका हुआ है फिर भी इसकी बहुत ही अल्प मात्रा पादपों व जन्तुओं को उपलब्ध है।
पानी पृथ्वी की सतह पर समान रूप से वितरित नहीं है। पृथ्वी पर पाये जाने वाले जल की कुल मात्रा का लगभग 95% रासायनिक रूप से चट्टानों में आत्मसात है और चक्रित नहीं होता है। शेष 5% जल का लगभग 97.3% भाग समुद्र और 2.1% ध्रुवीय हिम छत्रों में विद्यमान है। इस प्रकार केवल 0.6% जल ही वायुमण्डलीय जलवाष्प के रूप में भूमिगत जल या मृदा जल के रूप में उपलब्ध है।
(1) सौर विकिरण और (2) गुरुत्वाकर्षण जल चक्र के मुख्य चालक बल हैं।
वाष्पीकरण और संघनन जल चक्र में निहित मुख्य प्रक्रियाएं हैं। यह एक दूसरे का स्थान लेती रहती हैं।
समुद्रों, झीलों, तालाबों, नदियों और झरनों का जल सूर्य की ऊष्मीय ऊर्जा के कारण वाष्पीकृत होता रहता है। पौधों की पत्तियां भी बहुत अधिक मात्रा में जल का वाष्पोत्सर्जन करती हैं। जल हवा में वाष्पीय अवस्था में रहता है तथा बादलों का निर्माण करता है जो हवा के साथ गमन करते हैं। बादल पर्वतीय क्षेत्रों में वनों के ऊपर ठंडी हवा से मिलते हैं तथा संघनित होकर अवक्षेपण करते हैं जो गुरुत्वाकर्षण के कारण वर्षा के रूप में नीचे आ जाता है।
जल का औसतन 84% भाग समुद्री सतह से वाष्पित होता है। जबकि 77% भाग अवक्षेपण द्वारा पुन: प्राप्त हो जाता है। 7% जल पृथ्वी की सतह और नदियों से होकर समुद्र में पहुंचता है जो समुद्र के वाष्पन घाटे को संतुलित करता है। पृथ्वी पर वाष्पन 16% तथा अवक्षेपण 23% होता है।

पारितंत्र में समस्थापन

पारितंत्र अपनी साम्यावस्था को बनाए रखने में सक्षम होते हैं। वे अपनी प्रजातीय संरचना और कार्यात्मक प्रक्रियाओं का नियमन कर सकते हैं। पारितंत्रों में आत्मनियमन की यह क्षमता समस्थापन (homeostasis) कहलाती है। पारिस्थितिकी में इस पारिभाषिक शब्द का प्रयोग जैविक निकार्यों की उस प्रवृत्ति के लिए किया जाता है जिसके कारण वह परिवर्तनों का विरोध करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी तालाब के पारितंत्र में यदि जन्तुप्लवकों की जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है तो वे अधिकाधिक संख्या में पादपप्लवकों का उपभोग करने लगते हैं, परिणामस्वरूप शीघ्र ही जन्तुप्लवकों के लिए भोजन की सप्लाई कम हो जाती है । क्योंकि भुखमरी के कारण जन्तुप्लवकों की संख्या घट जाती है इसलिए पादप प्लवकों की जनसंख्या में बढ़ोतरी होने लगती है। कुछ समय के पश्चात जन्तुप्लवकों की जनसंख्या में भी वृद्धि हो जाती है और यह प्रक्रिया खाद्य शृंखला के समस्त पोषण स्तरों में निरंतर चलती रहती है।
ध्यान दीजिए कि समस्थापन तंत्र के अन्तर्गत किसी पारितंत्र में स्थायित्व को बनाए रखने के लिए नकारात्मक पुनर्भरण प्रक्रिया उत्तरदायी (Negative feedback mechanism) होती है।
यद्यपि पारितंत्र की समस्थापन क्षमता असीमित नहीं होती है और न ही पारितंत्र में हर एक चीज भलीभांति नियमित रहती है। आप समस्थापन प्रक्रिया की सीमाओं और कार्यक्षेत्र का अध्ययन उस समय करेंगे जब आप पारितंत्र के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कर लेंगे। पारितंत्रों में असंतुलन का सबसे बड़ा स्रोत मनुष्य है।

पादपप्लवकों की अधिक संख्या
अधिक भोजन उपलब्ध होने के कारण जन्तुप्लवकों की जनसंख्या में वृद्धि
पादपप्लवकों की संख्या में कमी
भुखमरी (भोजन की कमी) के कारण जन्तुष्लवकों की जनसंख्या में कमी
कम उपभोग के कारण पादपप्लवकों की जनसंख्या में वृद्धि प्रारम्भ हो जाती हैं।

आपने क्या सीखा
  • पारितंत्र जैव मण्डल के जैविक और अजैविक घटकों की कार्यात्मक रूप से स्वतंत्र इकाई है।
  • जलवायु, अकार्बनिक वस्तुएं, कार्बनिक यौगिक, उत्पादक वृहत उपभोक्ता तथा सूक्ष्म उपभोक्ता पारितंत्र के संरचनात्मक घटक हैं।
  • ऊर्जा प्रवाह, खाद्य श्रृंखलाएँ, पोषक चक्र, पारितंत्र का विकास और समस्थापन किसी पारितंत्र की कार्यात्मक प्रक्रियाएं हैं।
  • प्रकाश, तापमान, दाब, आर्द्रता, लवणता, स्थलाकृति (topography) जैसे अजैविक घटक तथा विभिन्न पोषक तत्व जन्तुओं और पौधों की वृद्धि और वितरण को परिमित करते हैं ।
  • पारितंत्र के समस्त जीव खाद्य श्रृंखला और खाद्य जाल के द्वारा एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। समुदाय की किसी भी एकल प्रजाति के समाप्त हो जाने से पारिस्थितिक असंतुलन हो सकता है।
  • सभी पारितंत्रों के लिए ऊर्जा का स्रोत सौर विकिरण है जिसे स्वपोषी अवशोषित करके भोजन (जैव पदार्थ) के रूप में उपभोक्ताओं को स्थानांतरित कर देते हैं। ऊर्जा प्रवाह सदैव ऊपर से नीचे की ओर होता है तथा एकदिशिक होता है।
  • सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) सौर ऊर्जा की वह मात्रा है जो हरे पादपों के द्वारा कार्बनिक पदार्थों के रूप में अवशोषित और संग्रहित की जाती है। नेट प्राथमिक उत्पादकता कार्बनिक पदार्थों की वह मात्रा है जो पादपों में इनकी अपनी उपापचीय क्रिया के पश्चात शेष रह जाती है। अर्थात GPP -NPP + पादप श्वसन।
  • पारितंत्र में जीवों के पोषण संबंधों को आलेख के द्वारा पारिस्थितिक पिरैमिड के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। पिरैमिड का आधार उत्पादकों को दर्शाता है तथा क्रमागत श्रेणियां अनुवर्ती उच्चतर स्तरों को दर्शाती हैं।
  • पोषक तत्व निर्जीव तन्त्र से सजीव तंत्र में गमन करते हैं और फिर पारितंत्र के अजैविक घटक में चक्रीय अंदाज में वापस आ जाते हैं। यह पोषक चक्र भूजैवरासायनिक चक्र कहलाते हैं।
समस्त भूजैवरासायनिक चक्रों के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:-
(क) भंडार निकाय- मृदा या वायुमण्डल जिनमें पोषक तत्वों का विपुल भंडार है। 
(ख) चक्रण निकाय जोकि सजीव है (उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक)

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