पर्यावरण की परिभाषा | paryavaran ki paribhasha

पर्यावरण की परिभाषा

पर्यावरण, पृथ्वी अथवा इसके किसी भाग पर प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली सभी जैव तथा अजैव वस्तुओं को चारों ओर से घेरे रहता है। उसमें उन सभी जैव तथा अजैव कारकों को सम्मिलित किया जाता है जो प्रकृति में एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।
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सभी सजीव तत्वों जैसे पक्षी, जन्तु, पौधे, वन आदि को जैव घटक में सम्मिलित किया जाता है। दूसरी ओर, सभी निर्जीव वस्तुएं जैसे वायु, जल, चट्टान, सूर्य आदि पर्यावरण के अजैव घटक के उदाहरण हैं। इस प्रकार पर्यावरण का अध्ययन पर्यावरण के जैव तथा अजैव घटकों में अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन है।

पर्यावरण की परिभाषाएँ

  • फिटिंग के अनुसार - "पर्यावरण किसी जीवधारी को प्रभावित करने वाले समस्त कारकों का योग है।" (Environment is the sum total of all the factors that inefluence an organism-Fitting)
  • हरकोविट्ज के अनुसार - "किसी जीवित तत्व के विकास चक्र को प्रभावित करने वाली समस्त बाह्य दशाओं को पर्यावरण कहते हैं।" (Envrionment is the sum total of all the external conditions and its influences on the external conditons and its influences ont he development cycle of biotic elements-Herkovitz)
  • डगलस एवं रोमन हालैण्ड के अनुसार - “पर्यावरण उन सभी बाहरी शक्तियों एवं प्रभावों का वर्णन करता है, जो प्राणी जगत के जीवन, स्वभाव, व्यवहार, विकास और परिपक्वता को प्रभावित करता है।"
  • रॉस के अनुसार - "पर्यावरण एक वाह्य शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।" (Environment is an extemal force which influences us.- Ross)
  • बोरिंग के अनुसार - “एक व्यक्ति के पर्यावरण में वह सब कुछ सम्मिलित किया जाता है जो उसके जन्म से मृत्युपर्यन्त उसे प्रभावित करता है।"
  • बुडबर्थ के अनुसार - "पर्यावरण शब्द का अभिप्राय उन सभी बाहरी शक्तियों और तत्वों से है, जो व्यक्ति को आजीवन प्रभावित करते हैं।"
  • डेविस के अनुसार -  पर्यावरण को मूर्त वस्तु न मानकर अमूर्त वस्तु मानी है। (Environment does not refer to anything tangible but to an abstraction.-Devis)
  • अर्नेस्ट हैकेल के अनुसार - “पय्यावरण का तात्पर्य मनुष्य के चारों ओर पायी जाने वाली परिस्थितियों के उस समूह से है जो उसके जीवन और उसकी क्रियाओं पर प्रभाव डालती है।"
  • एनास्टैसी के अनुसार - "पर्यावरण प्रत्येक वह वस्तु है जो जीन्स (Genes) के अतिरिक्त व्यक्ति को प्रभावित करती है।"
वर्तमान समय में पारिस्थितिविद् Environment शब्द के स्थान पर habiat अथवा Milieu शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, जिसका तात्पर्य समस्त परिवृत्तित है। पार्क, ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण उन सभी दशाओं का योग है जो मानव जाति को निश्चित समयावधि में स्थित नियत स्थान पर आवृत्ति करती है।
पर्यावरण उन सब सजीव तथा निर्जीव घटकों का सकल योग है, जो जीव के चारों ओर मौजूद है एवं उसे प्रभावित करते है। सजीव घटकों को जैविक घटक तथा निर्जीव घटकों को अजैविक घटक कहते हैं।
परि और आवरण शब्दों की संधि करके पर्यावरण शब्द बनता है जिसका शाब्दिक अर्थ है जो पारितः (चारो ओर) आवृत (ढके हुए) है। समस्त जीवधारियों को अजैविक या भौतिक पदार्थ घेरे हुए हैं अतः हम कह सकते हैं कि हम जीवधारियों तथा वनस्पतियों के चारों ओर जो आवरण है उसे पर्यावरण कहते हैं।
आम जन में सामान्य रूप से पर्यावरण की 'प्रकृति' (Nature) से समानता की जाती है, जिसके अन्तर्गत ग्रहीय पृथ्वी के भौतिक घटकों (स्थल, वायु, जल, मृदा आदि) को सम्मिलित किया जाता है जो जीवमण्डल में विकास हेतु अनुकूल दशाएँ प्रदान करते हैं। इसके साथ ही साथ में सब इससे प्रभावित भी होते हैं और उसे प्रभावित भी करते हैं।
प्राकृतिक पर्यावरण शब्द से जिस बात का विचार आता है वह है भू-दृश्य जिसके अनेक पहलू हैं और मिट्टी, पानी, रेगिस्तान अथवा पर्वत जिन्हें हम भौतिकीय प्रभावों के रूप में ज्यादा जैसे आर्द्रता, तापमान, मृदा-गठन में पाए जाने वाले अंतर तथा जैविकीय प्रभावों के रूप में सही-सही एवं ठीक-ढंग से समझ सकते हैं। साधारण रूप से पर्यावरण में अजैव (निर्जीव) (Abiotic) और जैव (सजीव) (Biotic) घटक होते हैं।

निर्जीव घटक
  • प्रकाशः सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा मिलती है। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हैं, जिससे वे स्वयं तथा अन्य जीवधारियों के लिए भोजन का संश्लेषण करते हैं।
  • वर्षाः प्रत्येक जीवधारी के लिए पानी जरूरी होता है। अधिकतर जैव रासायनिक अभिक्रियाएं जलीय माध्यम में ही होती हैं। जल शरीर के तापमान का नियमन करने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त, जलाशय कई प्रकार के जलीय पौधों और जंतुओं के पर्यावास होते हैं।
  • तापमानः तापमान पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण घटक होता है, जिसका जीवों की उत्तरजीविता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जीव तापमान और आर्द्रता के केवल एक निश्चित परास तक ही सहन कर सकते हैं।
  • वायुमंडल: पृथ्वी का वायुमंडल 21%ऑक्सीजन, 78% नाइट्रोजन और 0.03% कार्बन डाइऑक्साइड से बना होता है। कुछ अन्य निष्क्रिय गैस (0.03% आर्गन, निऑन आदि) भी होती है।
  • अधःस्तरः जीव स्थलीय या जलीय हो सकते हैं। भूमि मिट्टी से ढकी होती है और बहुत तरह के सूक्ष्मजीवों, प्रोटोजोआ, फफूंद तथा छोटे जंतु (अकशेरुकी) इस पर पनपते हैं। पौधों की जड़ें जमीन में घुसकर, पानी तथा पोषक तत्वों की तलाश में मिट्टी से बाहर आ जाती हैं। स्थलीय जंतु भूमि पर रहते हैं। जलीय जीव-जंतु तथा सूक्ष्मजीव अलवणीय जल तथा समुद्र में भी रहते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव समुद्र के नीचे गर्म पानी के निकास-रंध्रों में भी रहते हैं।

सजीव घटक
  • हरे पौधेः प्रकाश संश्लेषण के द्वारा सभी जीवधारियों के लिए भोजन तैयार करते हैं।
  • जंतुः एक ही स्पीशीज़ के प्राणी किसी विशेष प्रकार के पर्यावास पर ही पाये जाते हैं। वे अन्य स्पीशीजों के साथ भी रहते हैं। एक स्पीशीज दूसरी के लिए आहार बनाती है। सूक्ष्मजीव और फफूंद मरे हुऐ पौधों और जंतुओं में सड़न पैदा करते हैं जिससे मृत जीवाणुओं के शरीरों के भीतर विद्यमान पोषक तत्व बाहर आ जाते हैं जिन्हें पनपते पौधे दोबारा उपयोग में ले लेते हैं। इसीलिए जीवधारी की उत्तरजीविता के लिए पर्यावरण के सजीव और निर्जीव दोनों प्रकार के घटकों की आवश्यकता रहती है। इसलिए जीवधारियों की उत्तरजीविता के लिए अपने वातावरण के साथ एक अत्यंत नाजुक संतुलित संबंध बनाये रखना अत्यंत जरूरी है।
कोई भी जीव दूसरे जीव के साथ पारस्परिक क्रिया किए बिना अकेला जीवित नहीं कह सकता। अतः प्रत्येक जीव के साथ अन्य जीव भी पर्यावरण के एक अंश के रूप में होते हैं। हम सब यह जानते हैं कि पर्यावरण स्थिर नहीं रहता, जैविक और अजैविक दोनों कारक ढेर सारे होते हैं तथा लगातार बढ़ते रहते हैं। जीव अपने पर्यावरण में एक परास (Range) के भीतर ही होने वाले परिवर्तनों को सहन कर सकता है और उसे सहनता-परास (tolerance-range) कहते हैं।

पर्यावरण की संरचना

पर्यावरण भौतिक एवं जैविक दोनों प्रकार की संकल्पनाओं से निर्मित है। अतः इसमें पृथ्वी के दोनों अर्थात् अजीवित तथा जीवित संघटकों को सम्मिलित किया जाता है।

1. भौतिक पर्यावरण - भौतिक पर्यावरण तीन प्रकार का होता है
  • स्थलमण्डलीय पर्यावरण
  • वायुमण्डलीय पर्यावरण
  • जलमण्डलीय पर्यावरण
विभिन्न स्थानिक मापकों पर इन तीन प्रकार के पर्यावरणों को कई स्तरीय लघु इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है। जैसेपर्वत पर्यावरण, पठार पर्यावरण, मैदान पर्यावरण, झील पर्यावरण, सरिता पर्यावरण, हिमनद पर्यावरण, मरुस्थल पर्यावरण, सागर तटीय पर्यावरण, सागरीय पर्यावरण आदि।

2. जैविक पर्यावरण की संरचना पौधों तथा मानव सहित सभी प्रकार के जीव-जंतुओं द्वारा निर्मित होती है। इन सभी में मनुष्य एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। वृहद स्तर पर जैविक पर्यावरण को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है
  • वानस्पतिक पर्यावरण (Floral Environment)
  • जंतु पर्यावरण (Faunal Environment)
पर्यावरण मुख्यतः तीन प्रकार के तत्त्वों से मिलकर बना है- जैव तत्त्व, अजैव तत्त्व, मौसम विषयक।
  1. जैव तत्त्व - इसके अन्तर्गत सभी जीवित वस्तुएँ शामिल हैं जो मनुष्य के साथ रहकर उसे प्रभावित करती हैं।
  2. अजैव तत्त्व - इसके अन्तर्गत मूलतः तीन वर्ग आते हैं- वायुमण्डल, जलमण्डल तथा स्थलमण्डल।
  3. मौसम विषयक - इसके अन्तर्गत वे स्थितियाँ सम्मिलित होती हैं जो हमें दिखती नहीं हैं या दिखती हैं तो उनका मूल स्रोत हमारे परिवेश से बाहर होता है। सामान्यतः ये वे तत्त्व हैं जो किसी स्थान विशेष की जलवायु का निर्माण करते हैं जैसे सूर्य का प्रकाश, वर्षा, आर्द्रता, तापमान, पवन की गति इत्यादि।
पर्यावरण के ये तीनों तत्त्व एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि परस्पर संबंधित हैं। इनके संतुलन को पर्यावरणीय संतुलन या पारिस्थितिकीय संतुलन कहा जाता है। जो तत्त्व इस संतुलन को बाधित करते हैं उन्हें प्रदूषक तत्त्व कहा जाता है।
पर्यावरण मानव के शारीरिक, सामाजिक तथा आर्थिक विकास का महत्त्वपूर्ण पहलू है। जिस प्रकार भोजन, वस्त्र, आवास के अतिरिक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, यातायात की समुचित व्यवस्था आदि का सामाजिक विकास पर प्रभाव पड़ता है, उसी प्रकार के सर्वांगीण विकास में पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन के इस महत्त्वपूर्ण पहलू की उपेक्षा का ही परिणाम है कि पर्यावरण की सुरक्षा आज विश्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन कर उभरी है।

पर्यावरण का महत्व

  1. पर्यावरण मनुष्य को नवीकरणीय तथा गैर-नवीकरणीय दोनों संसाधन प्रदान करता है। नवीकरणीय संसाधन वे संसाधन हैं जिनकी समय के साथ पूर्ति हो जाती है तथा इसलिये बिना इस संभावना के उनका उपयोग किया जा सकता है कि इन संसाधनों का क्षय हो जायेगा अथवा ये समाप्त हो जायेंगे। नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरणों में वनों में वृक्षों, महासागर में मछलियों आदि को सम्मिलित किया जाता है। दूसरी ओर, गैर-नवीकरणीय संसाधन वे संसाधन हैं जो खर्च हो जाने के कारण समय के साथ समाप्त हो जाते हैं अथवा उनका क्षय हो जाता है। गैर-नवीकरणीय संसाधनों के उदाहरणों में जीवाश्म ईंधन तथा खनिज, जैसे पैट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, कोयला आदि को सम्मिलित किया जाता है। इसलिये भावी पीढ़ियों की आवश्यकतओं को ध्यान में रखते हुए इन संसाधनों का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिये।
  2. पर्यावरण हानिकारक अपशेषों तथा उप-उत्पादों को आत्मसात भी करता है अर्थात यह अपशेषों को पचाता है। चिमनियों तथा मोटर गाड़ियों के निकास-पाइपों से निकलने वाला धुआं, शहरों तथा नगरों के मल पदार्थ, औद्योगिक स्राव सभी को पर्यावरण आत्मसात कर लेता है। इन सभी अपशेषों तथा उप-उत्पादों का विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा आत्मसात तथा पुनर्चक्रीकरण किया जाता है।
  3. पर्यावरण जैव-विविधता द्वारा जीवन को भी धारित करता हैं। जीवन के विभिन्न रूपों पर पर्यावरण के दबाव द्वारा उत्पन्न आनुवंशिक विभिन्नताएं जीवन के उन रूपों का अनुकूलन करने, विकसित होने तथा आनुवंशिक विभिन्नताएं उत्पन्न करने की अनुमति देती हैं जो कठोर पर्यावरण में जीवित रह सकें। अतः पर्यावरण जीवन के विभिन्न रूपों तथा अजैव घटकों में सम्बन्ध उत्पन्न करता है, उसको बनाये रखता है तथा जीवन को धारित करता है। इसलिये पर्यावरण को सुरक्षित रखकर जीवन के इन विभिन्न रूपों को सुरक्षित रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  4. पर्यावरण के जीव विज्ञान से सम्बन्धित महत्व के अतिरिक्त, पर्यावरण सौंदर्यकला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह हमें दृष्य तथा दृश्यभूमि प्रदान करता है, जो हमारे लिये अमूल्य हैं तथा प्रायः सारे विश्व में मानवीय संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

क्या आप जानते हैं?

चालू अनुमानों के आधार पर संसार का सारा निष्कर्षण योग्य कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस तथा यूरेनियम-235 के भंडार अर्थात हमारे ऊर्जा के सभी वर्तमान स्रोत लगभग 50-75 वर्षों के अन्दर समाप्त हो जायेंगे।


पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएं

मानवीय सभ्यता की उन्नति के साथ मानवीय आवश्यकताओं में वृद्धि तथा विविधता उत्पन्न हुई है। इससे प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र गति से क्षय हुआ है। अनेक संसाधन तीव्र गति से खर्च किये जा रहे हैं जिससे बहुत से संसाधनों का अत्यधिक प्रयोग और क्षय हुआ है। संसाधनों के अत्यधिक प्रयोग से अनेक पर्यावरण संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। इनमें वायु-प्रदूषण, जल प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों जैसे भूमि तथा वनों का निम्नीकरण तथा गैर-नवीकरणीय संसाधनों जैसे जीवाश्म ईंधन और खनिजों का निम्नीकरण सम्मिलित हैं। निम्न भागों में आप इन पर्यावरण संबंधी समस्याओं का अध्ययन करेंगे और उनके अर्थव्यवस्था तथा पृथ्वी ग्रह पर पड़ने वाले प्रभाव के महत्व को समझ पायेंगे।

प्रदूषण
प्रदूषण शब्द से अभिप्राय प्राकृतिक संसाधनों अथवा प्राकृतिक जैव तंत्र की गुणवत्ता में अवांछनीय परिवर्तन से है। यह परिवर्तन तत्काल अथवा लम्बी समय अवधि में जीवन के लिये हानिकारक हो सकता है। इस प्रकार प्रदूषण जीवधारियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
प्रदूषण किसी प्रदूषक द्वारा होता है। प्रदूषक कोई व्यर्थ पदार्थ अथवा वस्तु होता है जो प्राकृतिक संसाधनों अथवा प्राकृतिक जैवतंत्र में अवांछनीय परिवर्तन लाता है।धुआं, वातावरण में धूल तथा जहरीली गैसें, जल में औद्योगिक स्राव तथा शहरों से जल में मल पदार्थ प्रदूषकों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त मानवीय गतिविधियां भी उष्मा तथा ध्वनि उत्पन्न करती हैं तथा जीवधारियों को अन्य अनेक प्रकार से हानि पहुंचाती हैं।

वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण, रासायनिक पदार्थों, पदार्थों के कण अथवा जैव पदार्थों जो मनुष्यों अथवा अन्य जीवधारियों को हानि या असुविधा का कारण बनते हैं अथवा प्राकृतिक या स्थित पर्यावरण को हानि पहुंचाते है, का वातावरण में आने से है। प्रमुख वायु प्रदूषकों में सल्फर के आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड (जो एक प्रमुख ग्रीन हाउस गैस भी है), जहरीले पदार्थ तथा पदार्थों के कणों को सम्मिलित किया जाता है।
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क्या आप जानते है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि प्रत्येक वर्ष 24 लाख लोगों की प्रत्यक्ष रूप से वायु प्रदूषण से संबंधित कारणों से मृत्यु हो जाती है। प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में मोटर गाड़ी दुर्घटनाओं की अपेक्षा अधिक मृत्यु वायु प्रदूषण से जुड़ी होती हैं।


वायु प्रदूषण के स्रोत
वायु प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों में सांस लेने में कठिनाई, घरघराहट के किया जा सकता है। इन प्रभावों के परिणामस्वरूप औषधि प्रयोग, चिकित्सकों की संख्या अथवा आपातकालीन विभागों में आगमन में वृद्धि, अस्पतालों में अधिक प्रवेश तथा असामयिक मृत्यु में वृद्धि हो सकती है।

वायु प्रदूषण के स्रोत
  • वायु प्रदूषण के प्रमुख कृत्रिम स्रोतों (मानव द्वारा होने वाले) में सम्मिलित हैं :
  • ऊर्जा संयत्रों, फैक्ट्रियों, शवदाह गृहों तथा भट्टियों आदि से निकलने वाला धुआं।
  • वाहनों तथा मोटर गाड़ियों जैसे कार, बस, बाइक, वायुयान, जलयान आदि से निकली गैस।
  • रासायनिक पदार्थ जैसे कीटनाशक और उर्वरक तथा कृषि तथा अन्य कृषि संबंधित क्रियाओं की धूल।
  • रंग-रोगन से धुआं, बालों के स्प्रे, वार्निश, एरोसौल स्प्रे तथा अन्य विलायक।
  • गड्ढ़ों में व्यर्थ पदार्थों का जमाव जो मीथेन उत्पन्न करता है तथा जो वैश्विक उष्णता में भी योगदान देता है।

वायु प्रदूषण के प्रमुख प्राकृतिक स्रोतों में सम्मिलित हैं:
  • प्राकृतिक स्रोतों आमतौर पर बंजर भूमि से धूल
  • जानवरों द्वारा भोजन के पाचन में निकलने वाली मीथेन, उदाहरण के लिये बैलों द्वारा।
  • जंगलों की आग से धुआं, पदार्थों के कण तथा कार्बन मोनोआक्साइड।
  • ज्वालामुखी गतिविधियां, जो सल्फर, क्लोराइड तथा राख के कण उत्पन्न करती हैं।

जल प्रदूषण

जल प्रदूषण हानिकारक यौगिकों को हटाये बिना उनका जल स्रोतों (जैसे, झील, नदियां, महासागर तथा भू-जल) में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से निस्सरण है।
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जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में औद्योगिक रासायनिक पदार्थ तथा स्राव, पोषक पदार्थ, व्यर्थ जल, मल पदार्थ आदि सम्मिलित हैं।

जल प्रदूषण के प्रभाव
जल से उत्पन्न अनेक बीमारियां जैसे हैजा, टायफाइड, अतिसार आदि प्रदूषित जल में उपस्थित रोगाणुाओं द्वारा उत्पन्न होती हैं जो मनुष्यों तथा जन्तुओं को समान रूप से प्रभावित करती हैं। प्रदूषण जल के गुणों को प्रभावित करता है। प्रदूषक, जिसमें जहरीले रसायन शामिल हैं, जल की अम्लीयता संचालकता तथा तापक्रम में परिवर्तन कर सकते हैं। यह जलीय जैवतंत्रों में निवास करने वाले जीवों जैसे मछली, पक्षी, पौधे आदि को भी मार देते हैं और इस प्रकार प्राकृतिक खाद्य श्रृंखला में बाधा उत्पन्न कर देते हैं जिसके कारण जैव तंत्रों में अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है।

जल प्रदूषण के स्रोत
जल प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में निम्नलिखित हैं:
  • मल उपचार संयंत्रों तथा नगरों और कस्बों से मल पदार्थों के पाइपों से निस्सारण।
  • फैक्ट्रियों द्वारा जल स्रोतों में छोड़े जाने वाले औद्योगिक स्राव।
  • कृषि भूमि से रसायन जैसे कीटनाशक तथा उर्वरक जो खेतों से बहने वाले पदार्थों का निर्माण करते हैं का निकास।
  • नगरों में बरसाती नालों से प्रदूषित वर्षा जल।
  • ऊर्जा संयंत्रों द्वारा जल में गर्म अथवा रेडियोधर्मी जल को छोड़ना।
  • तेल के जहाजों से तेल का छलकना तथा रिसाव।
  • जल स्रोतों में शैवालों की वृद्धि।

ध्वनि प्रदूषण

ध्वनि प्रदूषण अत्यधिक तथा अप्रिय पर्यावरण संबंधित ध्वनि है जो मानव अथवा जन्तु जीवन की गतिविधियों अथवा संतुलन को अस्त-व्यस्त कर देती है।
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ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव
अवांछनीय ध्वनि के रूप में ध्वनि प्रदूषण शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को हानि पहुंचा सकता है। ध्वनि प्रदूषण चिड़न तथा आक्रामकता, उच्च रक्तचाप, उच्च तनाव स्तर, बहरापन, नींद में बाधा तथा अन्य हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। दीर्धकाल तक ध्वनि का अपावरण ध्वनि-प्रेरित बहरापन उत्पन्न कर सकता है। वे लोग जो अधिक व्यवसायिक ध्वनि के संपर्क में रहते हैं, ध्वनि के संपर्क में न रहने वालों की तुलना में, श्रवण संवेदनशीलता में अधिक कमी प्रदर्शित करते हैं। उच्च तथा मध्यम श्रेणी की उच्च ध्वनि स्तर हृदय की रक्त वाहिनियों पर प्रभाव, रक्तचाप तथा तनाव में वृद्धि कर सकती है और इस प्रकार लोगों का शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।

ध्वनि प्रदूषण के स्रोत
ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में सम्मिलित हैं:
  • मोटर गाड़ी यातायात जैसे कार, बसें, हवाई जहाज, रेल गाड़ियां आदि।
  • औद्योगिक प्रक्रियाएं जैसे पत्थर का चूरा बनाना, इस्पात पत्तियां बनाना, लकड़ी चीरना, छपाई करना आदि।
  • सड़कों, पुलों, इमारतों आदि पर निर्माण कार्य।
  • घरों से विभिन्न प्रकार की ध्वनियां जैसे स्टीरियो, टेलीविजन आदि।
  • उपभोक्ता उत्पाद जैसे एयर कन्डीशनर, रैफ्रीजरेटर आदि।
उपर्युक्त भाग में आपने विभिन्न प्रकार के प्रदूषण, उनके स्रोत तथा प्रभावों के बारे में पढ़ा है। विभिन्न प्रकार के प्रदूषण पर विचार कीजिये जो आप को और आपके परिवार को प्रभावित करते हैं और उनकी एक सूची तैयार कीजिये। वे कौन से उपाय हैं जो आप, आपका परिवार तथा समाज प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिये कर सकते हैं?

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